समर्थक

Google+ Followers

मित्रों!
आज से आप अपने गीत
"सृजन मंच ऑनलाइन" पर
प्रकाशित करने की कृपा करें।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिए Roopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। आपका मेल मिलते ही आपको सृजन मंच ऑनलाइन के लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

प्रकृति होय बदरंग...डॉ. देवेंद्र मोहन मिश्रा



जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकै कुसंग।
संगत बुरी अगर मिलै प्रकृति होय बदरंग।।

बड़े बढ़ाई ना करैं, बड़े न बोलें बोल।
खुद की पब्लिसिटी ना करै तो हो जीरो मोल।।

सत्ता थिर न कबहुं रहै यही जानत सब कोय।
आज सोनिया हाथ है कल मोदी संग होय।।

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी का अब काम क्या, बीयर पियो हो टुन्न।।

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
काटो पैर तत्काल जो मारना चाहे लात।।

तरुवर फल नहीं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
खाएं-पिएं वो तो तभी, जब छोड़े इंसान।।

जो बड़ेन को लघु कहे, न‍हीं रहीम घटी जाए।
तुच्छ कहें यदि बोस को, तुरंत नौकरी जाए।।

झूठ बराबर तप नहीं, सांच बराबर पाप।
यह कलियुग का मंत्र है, ह्रदय संजोएं आप।। 

- डॉ. देवेंद्र मोहन मिश्रा
(अप्रवासी भारतीय)


5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(20-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. achchhe nav-neeti dohe.....

    kuchh doosari linon men matra dosh hain...dekhen...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुभ प्रभात
      कृपया सुधारें (ध्यानाकर्षित करें)
      सादर

      हटाएं
  3. दोहों के द्वारा रोचक रूप से संदेश दिए हैं...
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं