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रविवार, 6 जनवरी 2019

सम्हले हिन्दुस्तान, सोचे हिन्दुस्तान----जागें भारत वासी ---डा श्याम गुप्त

सम्हले हिन्दुस्तान, सोचे हिन्दुस्तान,जागें भारत वासी ---निम्न देखें चित्र 
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यही तो होरहा है हमारे देश में , सदा से ---नक़ल की संस्कृति अपनाना------अपने स्वयं के व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कार्य करना, माताएं भी इसमें शामिल हैं------देश समाज के लिए कौन त्याग, तप करता है 
-------अच्छी खासी एक लड़की विज्ञान की छात्रा बनकर न जाने क्या क्या नवीन अनुसन्धान करके देश समाज मानवता के लिए कुछ कर सकती थी-----क्रिकेट जैसे एक व्यर्थ के कार्य में लग गयी ----
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------फिर हमारे युवा, नवजवान, विदेशी चमक से चकाचौन्ध में रत युवा व अंग्रेजीदां वयस्क, वरिष्ठ जन ---कहते हैं कि हमने तो कभी कुछ बनाया ही नहीं,,, हम तो धर्म,जाति अदि के नाम पर , राजनीति के नाम पर लड़ते ही रहते हैं----सब कुछ अमेरिका, चीन में बनता है----चीन जापान ने कितनी तरक्की की है ---हम तो कुछ करते ही नहीं ---
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-------सोचें , कि क्यों है ऐसा -----
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-----------कि हम तो लगे हैं विदेशों की नक़ल करने में -----अपनी संस्कृति, धर्म , समाज जाए भाड में ----
-----हमें तो पैदा होते ही विदेशी शानदार कपडे, जूते, खिलौने, टीवी, मोबाइल , बैक, कारें चाहिए , नगर में शानदार बहुमंजिली इमारत में सर्व सुविधा सहित में भव्य बंगला चाहिए...हज़ार हज़ारों के क्रिकेट बल्ले, बौल, ड्रेसें , एस्ट्रो टर्फचाहिए....पढ़ने लिखने की बजाय नाच-गाने, खेल -कूद , विदेशी गाने,डांस चाहिए --
---बच्चों के लिए विदेशी चमक दमक वाले अंग्रेज़ी स्कूल चाहिए ..
------बड़े बड़े नगर चमचमाती सड़कें , बड़े बड़े माल में विदेशी डिशें, पिज्जा, बर्गर , शराब , नाच-गाने, विडियो, सीडी , विदेशी यू-ट्यूब चाहिए---
----- इस सब को प्राप्ति हेतु 80 लाख पैकेज की नौकरी चाहिए, नौकरी करने वाली पत्नी चाहिए --
-----चाहे ये सब किराये का हो या नक़ल का या बच्चों के हितों की अनदेखी के साथ अथवा विदेशी कंपनियों की गुलामी से मिले-----
------देश के लिए त्याग तपस्या अन्य करें हम तो बस भोग करेंगे----
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अमेरिका का 200 वर्ष पहले तक नाम भी नहीं था --- वे अपने यहाँ जैसी मिल रहे है उसी से जीवन चलाते थे, विदेशी नक़ल पर ज़िंदा नहीं थे, ण विदेशी संस्कृति, न कोइ खेल तमाशा कुछ भी -----इस त्याग, तपस्या, परिश्रम के बल पर ऊपर उठे---दुनिया पर छाये 
----चीन व रूस --पहले 50 वर्षों तक विश्व के लिए सारे दरवाज़े बंद थे , न बाहर की कोइ वस्तु आयेगी, न कोइ विचार , न कोइ संस्कृति, न खेल -----जो अपना है जैसा है उसी में काम चलाइये, कम खाकर, भूखे पेट रहकर परिश्रम कीजिये -----इसी त्याग तपस्या के कारण उन्होंने उन्नति की ,,,स्व- उन्नति के बाद वे आगे आये , विश्व पर छागये--- अब उसके फल चख रहे हैं---
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अपनी संस्कृति त्यागकर, भुलाकर , उसपर चलना छोड़कर कौन , राष्ट्र-देश, समाज आगे बढ़ा है----
---नक़ल की संस्कृति पर कौन देश आगे बढ़ा है
-----गुलामी में रहकर , गुलामी की संस्कृति अपना कर सुख-भोग सरल है वही आज हम कर रहे हैं-----दोष देश को, धर्म, समाज को दे रहे हैं--
-----जागे हिन्दुस्तान ---फिर न कहना बताया नहीं ----है किसी में हिम्मत जो ये सुख सुविधाएँ छोड़कर , स्वदेशी भाव-विचार अपनाएं , जो हमारे यहाँ मिलता है उसे ही  अपनाएं---
-----आज भी हमारे यहाँ अच्छा व सस्ता स्वदेशी कपड़ा, जूता, घरेलू सामान सब मिलता है ---

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

सृष्टि-महाकाव्य --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२.... डा श्याम गुप्त....

  महाकाव्य ---सृष्टि --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२ ....उपसर्ग..

               सृष्टि -सृजन के आधुनिक वैज्ञानिक, वैदिक एवं दार्शनिक-आध्यात्मिक तथ्यों का समन्वित विवेचन द्वारा उत्तर की खोज विषयक यह महाकाव्य ११ सर्गों में विरचित है | इस महाकाव्य हेतु मैंने अगीत विधा का एक विशिष्ट नवीन छंद की सृष्टि की है जिसे मैंने  "लयबद्ध षटपदी अगीत छंद"  का नाम दिया है इसे हम इसे क्रमिक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं  |  प्रस्तुत है द्वितीय  सर्ग - उपसर्ग ....

 

 

 


    

(यह महाकाव्य अगीत विधा में आधुनिक-विज्ञान ,दर्शन व वैदिक विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन व मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषय को सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है ....एवं अगीत विधा के लयबद्ध षटपदी छंद में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है.... रचयिता )


सृष्टि -अगीत विधा महाकाव्य-

रचयिता----डा.श्याम गुप्त.....प्रकाशक---अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
               अगीत विधा में ब्रह्माण्ड  की रचना एवं जीवन की उत्पत्ति  के वैदिक, दार्शनिक व आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों का विवेचनात्मक प्रबंध-काव्य
( छंद ----लय बद्ध,षटपदी अगीत छंद ---छह पंक्ति, १६ मात्रा प्रत्येक पंक्ति में, अतुकांत, लय-वद्ध )


सृष्टि महाकाव्य--द्वितीय सर्ग... -उपसर्ग -( प्रस्तुत सर्ग में आज की स्वार्थपरकता से उत्पन्न अभिचार, द्वंद्व,अशांति क्यों है मानव ने ईश्वर को क्यों भुला दिया है एवं उसके क्या परिणाम हो रहे हैं और सृष्टि जैसे दार्शनिक विषयको कोई क्यों जाने-पढ़े इस पर विवेचन किया गया है )
.
नर ने भुला दिया प्रभु नर से,
ममता बंधन नेह समर्पण;
मानव का दुश्मन बन बैठा ,
अनियंत्रित वह अति-अभियंत्रण।
अति सुख अभिलाषा हित जिसको,
स्वयं उसी ने किया सृजन था।।
.
निजी स्वार्थ के कारण मानव,
अति दोहन कर रहा प्रकृति का;
प्रतिदिन एक ही स्वर्ण अंड से,
उसका लालच नहीं सिमटता;
चीर कलेजा, स्वर्ण खजाना,
पाना चाहे एक साथ ही।।
.
सर्वश्रेष्ठ है कौन?, व्यर्थ ,
इस द्वंद्व भाव में मानव उलझा;
भूल गया है मानव ख़ुद ही ,
सर्वश्रेष्ठ कृति है, ईश्वर की ।
सर्वश्रेष्ठ, क्यों कोई भी हो ,
श्रेष्ठ क्यों न हों,भला सभी जन।।
.
पहले सभी श्रेष्ठ बन जाएँ,
आपस के सब द्वंद्व मिटाकर;
द्वेष,ईर्ष्या, स्वार्थ भूलकर,
सबसे समता भाव निभाएं;
मन में भाव रमें जब उत्तम,
प्रेम भाव का हो विकास तब।।
.
जन संख्या के अभिवर्धन से,
अनियंत्रित यांत्रिकी करण से;
बोझिल बोझिल मानव जीवन।
भार धरा पर बढ़ता जाता,
समय-सुनामी की चेतावनि,
समझ न पाये,प्रलय सुनिश्चित।

.
जग की इस अशांति क्रंदन का,
लालच लोभ मोह बंधन का;
भ्रष्ट- पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों? इस यक्ष प्रश्न(१) का,
एक यही उत्तर, सीधा सा,
भूल गया नर आज स्वयं को।।
.
क्यों मानव ने भुला दिया है,
वह ईश्वर का स्वयं अंश है;
मुझमें तुझमें शत्रु मित्र में;
ब्रह्म समाया कण-कण में वह|
और स्वयं भी वही ब्रह्म है,
फ़िर क्या अपना और पराया।।
.
सोच हुई है सीमित उसकी,
सोच पारहा सिर्फ़ स्वयं तक;
त्याग, प्रेम उपकार-भावना,
परदुख,परहित,उच्चभाव सब ;
हुए तिरोहित,सीमित है वह,
रोटी कपडा औ मकान तक।।  
.
कारण-कार्य,ब्रह्म औ माया(२)
सद-नासद(3) पर साया किसका?
दर्शन और संसार प्रकृति के ,
भाव नहीं अब उठते मन में;
अन्धकार- अज्ञान- में डूबा,
भूल गया मानव ईश्वर को।।
१०.
सभी समझलें यही तथ्य यदि,
हम एक बृक्ष के ही फल हैं;
वह एक आत्म-सत्ता, सबके,
उत्थान-पतन का कारण है;
जिसका भी बुरा करें चाहें,
वह लौट हमीं को मिलना है।।
११.
हम कौन?,कहाँ से आए है?
और कहाँ चले जाते हैं सब?
यह जगत-पसारा कैसे,क्यों?
और कौन? समेटे जाता है।
निज को,जग को यदि जानेंगे,
तब मानेंगे, समता भाव ।।
१२.
तब नर,नर से करे समन्वय ,
आपस के भावों का अन्वय;
विश्व-बंधुत्व की अज़स्र धारा;
प्रभु शीतल करदे सारा जग,
सारा हो व्यापार सत्य का,
सुंदर, शिव हो सब संसार ॥

{ (
१)=ज्वलंत समस्या का प्रश्न ; (२)=वेदान्त दर्शन का द्वैत वाद -ब्रह्म व माया, दो सृजक-संचालक शक्तियां हैं; (३)=ईश्वर व प्रकृति -हैं भी और नहीं भी ( नासदीय सूक्त -ऋग्वेद )
                     ----क्रमश:--सर्ग तीन--









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