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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

"रविकान्त पाण्डेय जी का एक आलेख" (प्रस्तुतकर्ता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज गूगल खोज पर कुछ खोज रहा था तभी मुझे
जी का एक आलेख मिला। 
मैं दोहे से सम्बन्धित इसका कुछ अंश साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ।

दोहा और उसका छंद विधान
परिचय: हममे से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने दोहे का नाम न सुना होगा। लोक में कबीर, तुलसी आदि के कतिपय दोहे मुहावरों की तरह प्रचलित हैं-
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम
दास मलूका कहि गये सबके दाता राम

आछे दिन पाछे गयो हरि सों रखा न हेत
अब पछताये होत क्या चिड़िया चुग गइ खेत

सतसइया के दोहरे अरु नावक के तीर
देखन में छोटन लगें घाव करें गंभीर

आवत ही जो हर्ष नहिं नैनन नहीं सनेह
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेंह
दोहे इस तरह हमारे जीवन में प्रविष्ट हो चुके हैं कि सुख-दुख, दर्शन, उपदेश आदि कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। वास्तव में दोहा साहित्य की प्राचीन तथापि संपन्न विधा है।
दोहे का छंद शास्त्र

दोहा मात्रिक अर्द्धसम छंद है। अर्द्धसम की परिभाषा के मुताबिक इसके समचरणों में एक योजना तथा विषम चरणों में अन्य पदयोजना पाई जायेगी। विष चरण यानि पहले और तीसरे चरण में १३ मात्रायें एवं सम चरण यानि दूसरे तथा चौथे चरण में ११ मात्रायें रहेंगी।

विषम चरणों की बनावट: आदि में जगण न हो।

बनावट दो तरह की प्रचलित है- पहली- ३+३+२+३+२ = १३ (यहां चौथे त्रिकल में ।ऽ वर्जित है)
जैसे- राम नाम सुमिरा करो (सही)
राम नाम लो सदा तुम (गलत)

दूसरा प्रकार यूं है- ४+४+३+२ = १३ (यहां भी त्रिकल ।ऽ के रूप में नहीं आ सकता)

सम चरणों की बनावट: पहला प्रकार, ३+३+२+३ = ११
दोसरा प्रकार, ४+४+३ = ११ दोनों ही स्थितियों में अंत का त्रिकल हमेंशा ऽ। के रूप में आयेगा।

उपर्युक्त नियमों पर यदि सूक्ष्म दृष्टि दौड़ायें तो आप पायेंगे कि यहां सम के पीछे सम (४+४) और विषम के पीछे विषम (३+३) यानि एक ही चीज को दुहराया गया है इसी कारण इसे दोहा या दोहरा के नाम से जाना जाता है। साथ ही आप पायेंगे कि विषम चरणों के अंत में सगण, रगण अथवा नगण आयेगा और सम चरणों के अंत में जगण या तगण आयेगा।

विशेष: विषम चरण के प्रारंभ में जगण का निषेध सिर्फ़ नरकाव्य के लिये है। देवकाव्य या मंगलवाची शब्द होने की स्थिति में कोई दोष नहीं है। साथ ही जगण एक शब्द के तीन वर्णों में नहीं आना चाहिये, यदि दो शब्दों से मिलकर जगण बने तो वहां दोष नहीं है जैसे- " महान" एक शब्द के तीन वर्ण जगण बना रहे हैं अतः वर्जित है। जहां जहां = जहांज हां (जगण दो शब्दों से बन रहा है अतः दोष नहीं है।)
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दोहों में विषम पद के बारे में कुछ अन्य उदाहरण
कबीर यहु घर प्रेम का...
जाति न पूछो साधु की...

3 टिप्‍पणियां:


  1. "आवत ही जो हर्ष नहिं नैनन नहीं सनेह
    तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेंह"

    तुलसीदास के इस दोहे का शुद्ध रूप :


    आवत ही हरखे नहीं ,नैनं नहीं सनेह,

    तुलसी तहां न जाइए चाहे कंचन बरखे मेह .

    सनेह यहाँ स्नेह तथा हरखे का अर्थ हर्षे है .बरखे का अर्थ बरसे है .

    बढ़िया शुरुआत के लिए बधाई .

    ॐ शान्ति .

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  2. आदरणीय रविकांत पाण्डेय जी का आलेख दोहा छंद की बारीकियाँ सीखने के लिये बहुत ही उपयोगी है.आभार......

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