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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

कुण्डलिया [बरखा]


बरखा छम छम आ गई ,लेकर सुखद फुहार 
सावन के झूले पड़े ,कोयल करे पुकार 
कोयल करे पुकार ,सबहीं का चित चुराए 
मीठे मीठे आम ,सभी के मन को भाए
सखि ना झूला सोहि , ना ही चले अब चरखा
 अभी सजन ना आय , आ गई है रुत बरखा
......................   

4 टिप्‍पणियां:

  1. --- सुन्दर कुण्डलिया ....

    ना ही चले अब चरखा .... गति भंग होती है = चले ना ही अब चरखा ... रख सकते हैं...

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  2. बहुत बढ़िया ,प्रिय सरिता जी

    उत्तर देंहटाएं