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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

पाखंड (कुछ दोहे

निर्मल बाबा नाम है ,मन में रखते मैल!
खुद को समझे लोमड़ी ,बाकी सबको बैल !!

बाहर से सुन्दर दिखें, भीतर मैला अंग।
"गिरगिट जैसा बदलते, पल-पल अपना रंग"

बोलबचन भौकाल से,छाप रहे है नोट,
पाखंडी लड्डू चखें , जनता चाटे होठ ।!

संसद हो या सड़क हो,लूट मची चहुँ ओर!
अब तो देश चला रहे , कातिल-डाकू-चोर।!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है...
    असुर जैसा बदल रहे , भांति भांति से रंग
    इस पंक्ति को दोबारा से जाँच लीजिए!
    मेरे विचार से...
    "गिरगिट जैसा बदलते, पल-पल अपना रंग"

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुभ संध्या
    राम जी
    मैं तो समझ रही थी निर्मल जेल में है
    ये तो अभी भी मैदान ए खेल में है

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह राम भाई! बहुत सुन्दर!

    उत्तर देंहटाएं

  4. सुन्दर प्रस्तुति-
    आपका आभार आदरणीय -

    उत्तर देंहटाएं