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बुधवार, 21 जून 2017

मेरे मन की....




मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा के द्वारा बुक कर सकते है| मेरी पहली बुक कविताओ और कहानीओ का अनुपम संकलन है|


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शुक्रिया

रविवार, 21 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
\\
प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                   ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "

के तृतीय भाग ..”मा गृध कस्यविद्धनम." का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका –मा गृध =लालच मत कर/ अपहरण मत कर ...कस्यविद्धनम = किसी के भी धन एवं स्वत्व का /किसी के भी/ किसका हुआ है ..धनं = धन की /यह धन...|
\
मूलार्थ -किसी के भी धन व स्वत्व का अपहरण व लालच मत करो | यह धन किसी का नहीं हुआ है |
\\

किसी के धन की सम्पति श्री की,
इच्छा लालच हरण नहीं कर |
रमा चंचला कहाँ कब हुई ,
किसी एक की सोच अरे नर !

धन वैभव सुख सम्पति कारण,
ही तो द्वेष द्वंद्व होते हैं|
छीना-झपटी, लूट हरण से,
धन वैभव सुख कब बढ़ते हैं |

अनुचित कर्म से प्राप्त सभी धन,
जो कालाधन कहलाता है |
अशुभ अलक्ष्मी वास करे गृह,
मन में दैन्य भाव लाता है |

शुचि भावों कर्मों को प्राणी,
मन से फिर बिसराता जाता |
दुष्कर्मों में रत रहकर नित,
पाप-पंक में धंसता जाता |

यह शुभ ज्ञान जिसे हो जाता,
शुभ-शुचि कर्मों को अपनाता |
ज्ञानमार्ग युत जीवन-क्रम से,
मोक्ष मार्ग पर चलता जाता ||

-----क्रमश :----द्वतीय मन्त्र का काव्यभावानुवाद -----

शुक्रवार, 19 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----


पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

                             


\\
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका – तेन = उसी के /उसे...त्यक्तेन= उपयोगार्थ दिए हुए /त्याग के भाव से...भुंजीथा = भोगकर /भोगना चाहिए ...
\
मूलार्थ- उसके द्वारा उपयोगार्थ दिए हुए पदार्थों को ही भोगना चाहिए, उसे ईश्वर का दिया हुआ ही समझकर ( प्राकृतिक सहज रूप से प्राप्य)...अथवा उसे त्याग के रूप में, अनासक्त भाव से भोगना चाहिए |
\
सब कुछ ईश्वर की ही माया,
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |


पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||
--------क्रमश-आगे प्रथम मन्त्र के तृतीय भाग का काव्यभावानुवाद ----


सोमवार, 15 मई 2017

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त



ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त

                                       

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                           ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
\
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
\
1.
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
2.
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
3.
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
4.
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
5.
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
6.
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||

-------क्रमश.........ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .
के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......


शुक्रवार, 12 मई 2017

सूखे गुलाब ---ग़ज़ल---डा श्याम गुप्त

सूखे गुलाब ---ग़ज़ल---डा श्याम गुप्त

                             .
ग़ज़ल----
इन शुष्क पुष्पों में आज भी जाने कितने रंग हैं |
तेरी खुशबू, ख्यालो-ख्वाब किताबों में बंद हैं |

न गुलाब पुस्तकों में अब, न अश्रु-सिंचित  पत्र,
यादों को संजोयें वो दरीचे ही बंद हैं |

क्या ख्वाबो-ख्याल का फायदा, इस हाथ ले और दे,
किताबों में गुलाब, इश्क का ये भी कोइ ढंग है |

फसली है इश्क, रंग, खुशबू, पुष्प भी नकली,
ये आज की दुनिया भी कितनी हुनरमंद है |

कल की न सोच, न कल को सोच, बस आज पर ही चल,
है प्यार वही आज, अब जो तेरे संग है |

जो है सामने उसे याद रख, जो नहीं उसे तू भूल जा,
इस युग में इश्क की राह श्याम’ कैसी तंग है ||

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मंगलवार, 2 मई 2017

डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ---

डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ----
 
 ग़ज़ल-१...

साडी व दुपट्टे में यही फ़ायदा है दोस्तो,
भीड़ में भी आँचल डाल, माँ दूध पिला लेती है |

हर जगह अलग से एक केबिन चाहिए उन्हें,
माताएं जो पेंट जींस टॉप सिला लेती हैं |


पत्तियों और छाल की स्कर्ट टॉप पहनते थे सभी,
प्रगति क्या हमें उसी मुकाम पे ला देती है |

पढ़ लिख के हुए काबिल और बदन को ढकना सीखा,
नारी यूं सौन्दर्य, शील औ लज्जा बचा लेती हैं |

कहते हैं ज़माना है नया, माडर्न है नारी औ नर,
दौरे उन्नति क्या श्याम’ कपडे उतरवा लेती है |


ग़ज़ल ---२.
न प्यार मोहब्बत का ग़ज़ल गीत चाहिए |
न हुश्न नाजो-अदा की ही रीति चाहिए |

अब देश पे जीने की मरने की कसम की,
झंकार भरा गीत कोइ मीत चाहिए |

हैं हर तरफ दुश्मनी की अंधेरी वादियाँ ,
अब शौर्य के उजाले भरे गीत चाहिए |

साकी शराब मयकदे की शायरी न कह,
तलवार तीर गोलियों से प्रीति चाहिए |

वीरों के गीत फिर सुना तू ऐ कलम ‘श्याम,
भरे रक्त में उबाल ऐसे गीत चाहिए ||

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

आधुनिकता और नारी उत्प्रीणन के नए आयाम --डा श्याम गुप्त


---------आधुनिकता और नारी उत्प्रीणन के नए आयाम ------
\\
                    पुरातन समय में नारी की, भारतीय समाज की तथा कथित रूढिगत स्थिति में नारी के उत्प्रीणन पर न जाने कितने ठीकरे फोड़े गए एवं टोकरे भर-भर कर ग्रन्थ, आलेख, कहानियां, कथन, वक्तव्य लिखे-कहे जाचुके हैं एवं कहे-लिखे जा रहे हैं, परन्तु आधुनीकरण के युग में व नारी-उन्नयन के दौर में, प्रगतिशीलता की भाग-दौड़ में स्त्री पर कितना अत्याचार व उत्प्रीणन हो रहा है उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा |
\
                     मूलतः घर से बाहर जाकर सेवा करना, चाकरी करना, आज के दौर में नारी-प्रगति का पर्याय माना जा रहा है | पति-पत्नी दोनों का ही सर्विस करना प्रगतिशील दौर का फैशन है एवं एक आवश्यकता बन गयी है | परन्तु यहीं से नारी पर अत्यधिक अनावश्यक भार एवं सामाजिक-उत्प्रीणन की राह प्रशस्त होती है और साथ ही साथ शारीरिक शोषण की भी |
\
                     पारंपरिक गृहणी, नारी पर सिर्फ गृह का दायित्व होता था, परिवार पति व बच्चों का दायित्व दोनों मिलकर उठाते थे| पति-पुरुष सदैव ही आंशिक रूप में सहायक होते थे | धनोपार्जन एवं बाहर के समस्त कार्य पुरुष का दायित्व होता था |
---------परन्तु आज के दौर में नारी पर तीनों भार डाल दिए जा रहे हैं | सेवा द्वारा धनोपार्जन के उपरान्त भी अपने गृह-कार्य पारिवारिक दायित्व, बच्चों के लालन पालन से नारी किसी भी भांति विरत नहीं हो पारही, न हो सकती है|
---------पति-पुरुष सहायक होते हैं किन्तु कहाँ तक? निश्चय ही नारी को उससे पूर्ण मुक्ति नहीं मिल सकती | सभी जानते हैं कई-कई सेवक-सेविकाएं होने पर भी संतान पालन व गृह कार्यों के दायित्व से नारी पूर्णतः विरत नहीं होसकती | यह नारी के मूल स्वभाव के विपरीत है|
--------पति-पुरुष, सेवक-सेविकाएँ –मां नहीं बन सकते, पत्नी नहीं बन सकते, गृह-स्वामिनी नहीं बन सकते | स्त्री की देख-रेख के बिना गृह-कर्म व संतान लालन-पालन सुचारू रूप से नहीं चल सकता, पति –पुरुष चाहे जितना भी सहायता करें या सहायता का दिखावा करें परन्तु गृह-कार्य को ठीक प्रकार से नहीं कर पाते | यह उनके मूल पुरुष-स्वभाव के विपरीत है, और रहेगा |
\
आधुनिक दौर में स्त्री के घर से बाहर जानेके कारण एवं पति के समकक्ष शिक्षित होने के कारण बाहर व परिवार के कार्य भी जो पुरुषों के होते थे प्रायः पत्नी-स्त्री पर थोपे जारहे हैं |
-------पति-पत्नी दोनों के ही अपने अपने व्यवसायिक कार्य में व्यस्त रहने पर अतिरिक्त कार्य प्रायः स्त्री को ही करने होते हैं –घर लौटने पर या घर लौटते समय | बच्चे –पति सहायता करते हैं एवं आधुनिक दिखावे वश शिकायत भी नहीं करते परन्तु चिडचिड़ाहट, झुन्झुलाहट तो रहती ही है|
--------७० हज़ार पाने वाली पत्नी १०-१२ हज़ार सेवक-सेविकाओं- आयाओं पर खर्च करके भौतिक सुविधाओं हेतु धन कमाती-बचाती है...परन्तु किस कीमत पर | वे भूल जाते हैं कि जो बच्चे / घर/ परिवार, ७० हज़ार की सक्षमता व ज्ञान-भाव वाली स्त्री / मां/ पत्नी से पलने चाहिए वे १०-१२ हज़ार की क्षमता–ज्ञान वाली स्त्री द्वारा पाले जा रहे हैं| अंततः हानि संतति व आने वाली पीढ़ियों की / समाज /देश / संस्कृति की ही होती है |
\
इस प्रकरण में युवा-युगल बच्चे पैदा करने से भी काफी समय तक गुरेज़ करते हैं एवं अधिक उम्र पर गर्भधारण की अपनी अन्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है |
------विवाह के समय पति-पत्नी जो बचन लेते हैं उसमें – पति कहता है कि तुम्हारा पालन-पोषण करना मेरा दायित्व है | पत्नी बचन भरती है कि घर-परिवार के लालन-पालन व देख-रेख की व्यवस्था वह करेगी | आज के दौर में ये बचन भी भंग हो रहे हैं |
\
जहां तथाकथित आज के युग की आदर्श स्थिति है अर्थात सारे कार्य, गृहकार्य, परिवार के कार्य, रसोई, बच्चे, मार्केटिंग आदि पति-पत्नी बांटकर करते हैं, तो उस स्थिति की कीमत किसी से छुपी हुई नहीं है |
-------दोनों दिन भर दफ्तर के कार्य के पश्चात थके-हारे गृहकार्य आदि निपटाते हैं और सो जाते हैं| प्रातः से पुनः वही चक्र.. भागम-भाग | इसमें न तो दोनों को आपस में बैठकर खाना, पीना, क्रीडा, बच्चों के साथ एवं आपसी व पारिवारिक विचार-विमर्श का अवसर मिलता है न कला, साहित्य, मनोरंजन राष्ट्र-भक्ति आदि उदात्त भावों पर सोचने व बच्चों को शिक्षित करने का, जो नारी का मूल कृतित्व है| जिसके अभाव में वे तनाव के शिकार होकर चिडचिडे असंवेदनशील हो रहे हैं ( इसीलिये दिखावटी संवेदनशीलता का प्रभाव काफी बढ़ा है आजकल ), जो नारी का मानसिक उत्प्रीणन ही है |

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

सखीं संग राधाजी दर्शन पाए----‘श्याम सवैया छंद...श्याम गुप्त...


-----सखीं संग राधाजी दर्शन पाए------..
\

चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर,
तुलसी दास चन्दन घिसें तिलक देत रघुबीर |

-------इस घटना को चाहे कुछ लोग कल्पित रचना मानते हों परन्तु रचना में अन्तर्निहित जो भगवद भक्ति, जो कल्पना व भावना के अंतर्संबंध का जो सत्य स्वरुप आनंद है, रसानंद है, ब्रह्मानंद है, वह अनिर्वचनीय है |


\\--उसी प्रकार ---
-------यदि आपको बिहारी जी के विग्रह के दर्शन रूपी रसानंद के साथ तुरंत ही राधाजी के सचल स्वरुप के दर्शन –सुख का आनंद प्राप्त होजाय तो वह अनिर्वचनीय परमानंद वर्णनातीत है, मोक्ष स्वरुप है | 
 
--------- एसी ही एक सत्य घटना का काव्यमय वर्णन प्रस्तुत है | जिसके लिए मैंने सवैया छंद के नवीन प्रारूप का सृजन किया और उसे ‘श्याम सवैया छंद’ का नाम दिया |
( श्याम सवैया छंद –छः पंक्तियाँ, वर्णिक, २४ वर्ण, अंत यगण )


**** सखीं संग राधाजी दर्शन पाए..***** १.
श्रृद्धा जगी उर भक्ति पगी प्रभु रीति सुहाई जो निज मन मांहीं |
कान्हा की वंसी जु मन मैं बजी सुख आनंद रीति सजी मन मांहीं|
राधा की मथुरा बुलावे लगी मन मीत बसें उर प्रीति सुहाई |
देखें चलें कहूँ कुञ्ज कुटीर में बैठे मिलहिं कान्हा राधिका पाहीं |
उर प्रीति उमंग भरे मन मांहि चले मथुरा की सुन्दर छाहीं |
देखी जो मथुरा की दीन दशा मन भाव भरे अँखियाँ भरि आईं ||

२.
ऐसी बेहाल सी गलियाँ परीं दोउ लोचन नीर कपोल पे आये |
तिहूँ लोक ते न्यारी ये पावन भूमि जन्मे जहं देवकी लाल सुहाए |
टूटी परीं सड़कें चहुँ और हैं लता औ पता भरि धूरि नहाए |
हैं गोप कहाँ कहँ श्याम सखा किट गोपी कुञ्ज कतहूँ नहिं पाए |
कित न्यारे से खेल कन्हैया के कहूँ गोपीन की पग राह न पाए |
हाय यही है मथुरा नगर जहं लीला धरन लीला धरि आये ||
३.
रिक्शा चलाय रहे ब्रज वाल किट ग्वाल-गुपाल के खेल सुहाए |
गोरस की नदियाँ बहें कित गली राहन कीचड़ नीर बहाए |
कुंकुम केसरि की धूर कहाँ धुंआ डीज़ल कौ चहुँ ओर उडाये |
माखन मिसरी के ढेर कितें चहुँ ओर तो कूड़न ढेर सजाये |
सोची चले वृन्दावन धाम मिलें वृंदा वन बहु भाँति सुहाए |
दोलत ऊबड़-खाबड़ राह औ फाँकत धूल वृन्दावन आये ||
४.
कालिंदी कूल जो निरखें लगे मन शीतल कुञ्ज कुटीर निहारे ,
कौन सो निरमल पावन नीर औ पाए कहूँ न कदम्ब के डारे |
नाथ के कालिया नाग प्रभो जो किये तुम पावन जमुना के धारे |
कारी सी माटी के रंग को जल हैं प्रदूषित कालिंदी कूल किनारे |
दुई सौ गज की चौड़ी नदिया कटि छीन तिया सी बहे बहु धारे |
कौन प्रदूषण नाग कों नाथि कें पावन नीर को नाथ सुधारे ||
५.
गोवरधन गिरिराज वही जेहि श्याम धरे ब्रज वृन्द बचाए |
खोजी थके हरियाली छटा पग राह कहूं औ कतहूँ नहिं पाए |
सूखे से ठूंठ से ब्रक्ष कदम्ब कटे फटे गिरि पाहन बिखराये |
शीर्ण विदीर्ण किये अंग भंग गिरिराज बने हैं कबंध सुहाए |
सब ताल तलैया हैं कीच भरे गिरिराज परे रहें नीर बहाए |
कौन प्रदूषन, खननासुर संहार करहि ब्रजधाम बचाए ||
६.
मंदिर देखि बिहारी लला मन आनंद शीतल नयन जुड़ाने |
हिय हर्षित आनंद रूप लखे, मन भाव, मनों प्रभु मुसकाने |
बोले उदास से नैन किये अति ही सुख आनंद हम तौ सजाने |
देखी तुमहूँ मथुरा की दशा हम कैसें रहें यहाँ रोज लजाने |
अपने अपने सुख चैन लसे मथुरा के नागर धीर सयाने |
श्याम कछू अब तुमहिं करौ, हम तौ यहाँ पाहन रूप समाने ||
७.
भाव भरे कर जोरि कें दोऊ, भरे मन बाहर गलियन आये |
बांस फटे लिए हाथन में सखियन संग राधाजू भेष बनाए |
नागरि चतुर सी मथुरा कीं रहीं घूमि नगर में धूम मचाये |
हौले से राधा सरूप नै पायं हमारे जो दीन्हीं लकुटियां लगाए |
जोरि दोऊ कर शीश नवाय हम कीन्हों प्रनाम हिये हुलसाये |
जीवन धन्य सुफल भयो श्याम, सखीं संग राधाजी दर्शन पाए ||

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

श्याम स्मृति- १७४.....पत्नी-सह-धर्मिणी..... डा श्याम गुप्त

श्याम स्मृति- १७४.....पत्नी-सह-धर्मिणी..... डा श्याम गुप्त

                                        
श्याम स्मृति- १७४.....पत्नी-सह-धर्मिणी.....

               पत्नी को सहकर्मिणी नहीं कहा गया, क्यों? स्त्री, सखी, प्रेमिका, सहकर्मिणी हो सकती है, स्त्री माया रूप है, शक्ति-रूप, ऊर्जा-रूप वह अक्रिय-क्रियाशील ( सामान्य-पेसिव ) पात्र, रोल अदा करे तभी उन्नति होती है, जैसे वैदिक-पौराणिक काल में हुई |

------पत्नी सह-धर्मिणी है, केवल सहकर्मिणी नहीं | हाँ, पुरुष के कार्य में यथासमय, यथासंभव, यथाशक्ति सहकर्म-धर्म निभा सकती है | सह्कर्मिणी होने पर पुरुष भटकता है और सभ्यता अवनति की ओर | अतः पत्नी को सहकर्म नहीं सहजीवन व्यतीत करना है – सहधर्म |

------स्त्री-पुरुष के साथ-साथ काम करने से उच्च विचार प्रश्रय नहीं पाते, व्यक्ति स्वतंत्र नहीं सोच पाता, विचारों को केंद्रित नहीं कर पाता, हाँ भौतिक कर्मों व उनसे सम्बंधित विचारों की बात पृथक है| |

------ तभी तो पति-पत्नी सदा पृथक-पृथक शयन किया करते थे | राजा-रानियों के पृथक-पृथक महल व कक्ष हुआ करते थे | सिर्फ मिलने की इच्छा होने पर ही वे एक दूसरे के महल या कमरे में जाया करते थे | माया की नज़दीकी व्यक्ति को भरमाती है, उच्च विचारों से दूर करती है |

----- यूं तो कहा जाता है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे नारी होती है, पर ये क्यों नहीं कहा गया कि सफल नारी के पीछे पुरुष होता है |

------नारी की तपस्या, त्याग, प्रेम, धैर्य, धरित्री जैसे महान गुणों व व्यक्तित्व की महानता के कारण ही तो पुरुष महान बनते हैं, सदा बने हैं, जो नारी का भी समादर कर पाते हैं और दोनों के समन्वय से समाज व सभ्यता नित नए सोपान चढ़ती है|

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग आठ ---डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत ------

अगीत - त्रयी...---- भाग आठ ---डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत ------
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
\\
----- डा श्यामगुप्त के श्रेष्ठ अगीत ----
--- अगीत ---
\
१.टोपी
वे राष्ट्र गान गाकर
भीड़ को देश पर मर मिटने की,
कसम दिलाकर;
बैठ गए लक्सरी कार में जाकर ;
टोपी पकडाई पी ऐ को
अगले वर्ष के लिए
रखे धुलाकर |
२.अगीत .....
प्रेम विह्वलता, विरह, भावातिरेक की धारा ,
बहती है जब मन में ,
अजस्र, अपरिमित, प्रवाहमान; तब-
गीत निस्रत होते हैं.
सरिता की अविरल धारा की तरह |
वही धारा, प्रश्नों को उत्तरित करती हुई
व्याख्या, विश्लेषण, सत्य को
जन -जन के लिए उद्घाटित करती हुई,
निस्रत निर्झरिणी बन कर -
अगीत बन जाती है |
३.प्रकृति सुन्दरी का यौवन....
कम संसाधन
अधिक दोहन,
न नदिया में जल,
न बाग़-बगीचों का नगर |
न कोकिल की कूक
न मयूर की नृत्य सुषमा ,
कहीं अनावृष्टि कहीं अति-वृष्टि ;
किसने भ्रष्ट किया-
प्रकृति सुन्दरी का यौवन ?
४. संतुलन....
विकास हेतु,
संसाधन दोहन की नासमझ होड़,
अति-शोषण की अंधी दौड़,
प्रकृति का संतुलन देती है बिगाड़;
विकल हो जाते हैं-नदी सागर पहाड़,
नियामक व्यवस्था तभी करती है यह जुगाड़|
चेतावनी देती है,
सुनामी बनकर सब कुछ उजाड़ देती है,
अपना संतुलन सुधार लेती है |
५. माँ और आया
"अंग्रेज़ी आया ने,
हिन्दी मां को घर से निकाला;
देकर, फास्ट-फ़ूड ,पिज्जा, बर्गर -
क्रिकेट, केम्पा-कोला, कम्प्यूटरीकरण ,
उदारीकरण, वैश्वीकरण
का हवाला | "
६.अमर
"मरणोपरांत जीव,
यद्यपि मुक्त होजाता है ,
संसार से , पर--
कैद रहता है वह मन में ,
आत्मीयों के याद रूपी बंधन में ,
और होजाता है अमर | "
७.बंधन-मुक्ति
वह बंधन में थी
धर्म संस्कृति सुसंस्कारों का
चोला ओढ़कर,
अब वह मुक्त है, स्वतंत्र है
लाज व शर्मो-हया के वस्त्रों का
चोला छोड़कर |
८.कालपात्र
किसलिए काल
रचता है रचनाएँ
सम-सामयिक, तात्कालिक,
व सामयिक इतिहास के
सरोकारों को निबद्ध करता है ,
तथ्यों को बढ करता है |
एक कालपात्र होता है
साहित्य
तभी वह होता है कालजयी |
९. अनास्था
अपना दोष
ईश्वर के सिर
इंसान क्यों है इतना तंग नज़र !
क्या केवल कुछ पाने की इच्छा से थी, भक्ति-
नहीं थी आस्था, बस आसक्ति |
जो कष्टों के एक झटके से ही
टूट जाए ,
वह अनास्था
आस्था कब कहलाये |
१०. अर्थ
अर्थ स्वयं में एक अनर्थ है |
मन में भय चिंता भ्रम की
उत्पत्ति में समर्थ है |
इसकी प्राप्ति, रक्षण व उपयोग में भी
करना पड़ता है कठोर श्रम,
आज है, कल होगा या नहीं या होगा नष्ट
इसका नहीं है कोइ निश्चित क्रम|
अर्थ मानव के पतन में समर्थ है,
फिर भी जीवन के -
सभी अर्थों का अर्थ है |
\\
-----लयबद्ध अगीत----
\
११.
तुम जो सदा कहा करती थीं
मीत सदा मेरे बन रहना |
तुमने ही मुख फेर लिया क्यों
मैंने तो कुछ नहीं कहा था |
शायद तुमको नहीं पता था ,
मीत भला कहते हैं किसको |
मीत शब्द को नहीं पढ़ा था ,
तुमने मन के शब्दकोश में ||
१२.
" यह कंचन सा रूप तुम्हारा
निखर उठा सुरसरि धारा में;
अथवा सोनपरी सी कोई,
हुई अवतरित सहसा जल में ;
अथवा पद वंदन को उतरा,
स्वयं इंदु ही गंगाजल में |
१३.
तेरे मन की नर्म छुअन को,
बैरी मन पहचान न पाया|
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया |
अब बैठा यह सोच रहा हूँ
तुमने क्यों न मुझे समझाया |
ज्ञान ध्यान तप योग साधना,
में मैंने इस मन को रामाया |
यह भी तो माया संभ्रम है ,
यूंही हुआ पराया तुमसे |
\\
-----नव-अगीत ----
\
१४.प्रश्न
कितने शहीद ,
कब्र से उठकर पूछते हैं-
हम मरे किस देश के लिए ,
अल्लाह के, या-
ईश्वर के |
१५..बंधन
वह बंधन में थी ,
संस्कृति संस्कार सुरुचि के
परिधान कन्धों पर धारकर ;
अब वह मुक्त है ,
सहर्ष , कपडे उतारकर ||
१६.. दिशाहीन
मस्त हैं सब -
अपने काम काज, या -
मनोरंजन में; और -
खड़े हैं हर मोड़ पर
दिशाहीन ||
१७.. मेरा देश कहाँ
यह अ जा का ,
यह अ ज जा का ,
यह अन्य पिछड़ों का ,
यह सवर्णों का ;
कहाँ है मेरा देश ?
१८..तुम्हारी छवि
" मन के अंधियारे पटल पर ,
तुम्हारी छवि,
ज्योति-किरण सी लहराई;
एक नई कविता,
पुष्पित हो आई |
\\
-----त्रिपदा अगीत ----
\
१९..
खडे सडक इस पार रहे हम,
खडे सडक उस पार रहे तुम;
बीच में दुनिया रही भागती।
२०..
चर्चायें थीं स्वर्ग नरक की,
देखी तेरी वफ़ा-ज़फ़ा तो;
दोनों पाये तेरे द्वारे।।
२१..
क्यों पश्चिम अपनाया जाए,
सूरज उगता है पूरब में;
पश्चिम में तो ढलना निश्चित |
२२..
" पायल छनका कर दूर हुए,
हम कुछ ऐसे मज़बूर हुए ;
उस नाद-ब्रह्म मद चूर हुए |"
२३..
" मिटा सके भूखे की हसरत,
दो रोटी भी उपलब्ध नहीं ;
क्या करोगे ढूँढ कर अमृत | "
\\
-----लयबद्ध षटपदी अगीत----
\
२४..
पुरुष-धर्म से जो गिर जाता,
अवगुण युक्त वही पति करता;
पतिव्रत धर्म-हीन, नारी को |
अर्थ राज्य छल और दंभ हित,
नारी का प्रयोग जो करता;
वह नर कब निज धर्म निभाता ? ...
२५..
वह समाज जो नर-नारी को,
उचित धर्म-आदेश न देता |
राष्ट्र राज्य जो स्वार्थ नीति-हित,
प्रजा भाव हित कर्म न करता;
दुखी, अभाव-भाव नर-नारी,
भ्रष्ट, पतित होते तन मन से ||
२६..
माया-पुरुष रूप होते हैं,
नारी-नर के भाव जगत में |
इच्छा कर्म व प्रेम-शक्ति से ,
पुरुष स्वयं माया को रचता |
पुनः स्वयं ही जीव रूप धर,
माया जग में विचरण करता || …… शूर्पणखा से
२७..
" परम व्योम की इस अशान्ति से ,
द्वंद्व भाव कण-कण में उभरा ;
हलचल से गति मिली कणों को ,
अप:तत्व में साम्य जगत के |
गति से आहत नाद बने ,फिर -
शब्द वायु ऊर्जा जल और मन | .
२८.
" जग की इस अशांति-क्रंदन का,
लालच लोभ मोह-बंधन का |
भ्रष्ट पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों, इस यक्ष -प्रश्न का |
एक यही उत्तर सीधा सा ;
भूल गया नर आप स्वयं को || " …. सृष्टि से
२९.
बालू से सागर के तट पर ,
खूब घरोंदे गए उकेरे |
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा ले गयी |
छोड़ गयी कुछ घोंघे-सीपी,
सजा लिए हमने दामन में | …प्रेम काव्य से
\\

-----त्रिपदा अगीत ग़ज़ल.----
\..
३०. बात करें
भग्न अतीत की न बात करें ,
व्यर्थ बात की क्या बात करें ;
अब नवोन्मेष की बात करें |
यदि महलों में जीवन हंसता ,
झोपडियों में जीवन पलता ;
क्या उंच-नीच की बात करें |
शीश झुकाएं क्यों पश्चिम को,
क्यों अतीत से हम भरमाएं ;
कुछ आदर्शों की बात करें |
शास्त्र बड़े-बूढ़े और बालक ,
है सम्मान देना, पाना तो ;
मत श्याम’व्यंग्य की बात करें |
---------------

प्लास्टिकासुर---डा श्याम गुप्त


प्लास्टिकासुर---डा श्याम गुप्त

                                    .
 -------धरती दिवस -----
----------यूं तो धरती को प्रदूषित करने में सर्वाधिक हाथ हमारे अति-भौतिकतावादी जीवन व्यवहार का है | यहाँ हमारी धरती को कूड़ा घर बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक एवं जो प्राप्ति, उपयोग , उपस्थिति एवं समाप्ति के प्रयत्नों से
सर्वाधिक प्रदूषण कारक है उस तत्व को निरूपित करती हुई , पृथ्वी दिवस पर ....एक अतुकांत काव्य-रचना प्रस्तुत है----
\
प्लास्टिकासुर
\

पंडितजी ने पत्रा पढ़ा, और-
गणना करके बताया,
जज़मान ! प्रभु के -
नए अवतार का समय है आया।

सुनकर छोटी बिटिया बोली,
उसने अपनी जिज्ञासा की पिटारी यूं खोली;
"महाराज, हम तो बड़ों से यही सुनते आये हैं,
बचपन से यही गुनते आये हैं, कि -
असुर - देव ,दनुज, नर, गन्धर्व की -ता है, तो वह-
ब्रह्मा, विष्णु या फिर शिव-शम्भो के
वरदान से ही सम्पन्न होता है।
प्रारम्भ में जग, उस महाबली के,
कार्यों से प्रसन्न होता है;
पर जब वही महाबलवान,
बनकर सर्व शक्तिमान,
करता है अत्याचार,
देव दनुज नर गन्धर्व हो जाते हैं लाचार,
सारी पृथ्वी पर मच जाता है हाहाकार;
तभी लेते हैं, प्रभु अवतार।
हमें तो नहीं दिखता कोई असुर आज,
फिर अवतार की क्या आवश्यकता है महाराज?"

पंडित जी सुनकर, हडबडाये, कसमसाए,
पत्रा बंद करके मन ही मन बुदबुदाए;
फिर, उत्तरीय कन्धों पर डालकर मुस्कुराए; बोले -
"सच है बिटिया, यही तो होता है,
असुर - देव,दनुज, नर, गन्धर्व की -
अति सुखाभिलाषा से ही उत्पन्न होता है।
प्रारम्भ में लोग उसके कौतुक को,
बाल-लीला समझकर प्रसन्न होते हैं।
युवावस्था में उसके आकर्षण में बंधकर
उसे और प्रश्रय देते हैं।
वही जब प्रौढ़ होकर दुःख देता है तो,
अपनी करनी को रोते हैं।
वही देवी आपदाओं को लाता है,फैलाता है;
अपनी आसुरी शक्ति को बढाता है, दिखाता है।

आज भी मौजूद हैं पृथ्वी पर, अनेकों असुर,
जिनमें सबसे भयावह है,' प्लास्टिकासुर '।
प्लास्टिक, जिसने कैसे कैसे सपने दिखाए थे,
दुनिया के कोने-कोने के लोग भरमाये थे।

वही
बन गया है, आज --
पर्यावरण का नासूर,
बड़े बड़े तारकासुरों से भी भयावह है
आज का ये प्लास्टिकासुर।।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय----डा श्याम गुप्त

*******अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त*****---------



|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-



भाग सात------ डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय ---- Image may contain: 1 person, eyeglasses, sunglasses, closeup and outdoor

















---वक्तव्य --
------- “काव्य सौन्दर्य प्रधान हो या सत्य प्रधान, इस पर पूर्व व पश्चिम के विद्वानों में मतभेद हो सकता है, आचार्यों के अपने अपने तर्क व मत हैं | सृष्टि के प्रत्येक वस्तु-भाव की भाँति कविता भी ‘सत्यं शिवं सुन्दरं‘ होनी चाहिए | साहित्य का कार्य सिर्फ मनोरंजन व जनरंजन न होकर समाज को एक उचित दिशा देना भी होता है, और सत्य के बिना कोइ दिशा, दिशा नहीं हो सकती | केवल कलापक्ष को सजाने हेतु एतिहासिक, भौगोलिक व तथ्यात्मक सत्य को अनदेखा नहीं करना चाहिए | ---काव्य निर्झरिणी से
\
-------- “साहित्य व काव्य किसी विशेष समाज, शाखा व समूह या विषय के लिए न होकर समग्र समाज के लिए, सबके लिए होता है| अतः उसे किसी भाषा, गुट या शाखा विशेष की संकीर्णता की रचनाधर्मिता न होकर भाषा व काव्य की समस्त शक्तियों, भावों, तथ्यों, शब्द-भावों व सम्भावनाओं का उपयोग करना होता है | प्रवाह व लय काव्य की विशेषताएं हैं जो काव्य-विषय व भावसम्प्रेषण क्षमता की आवश्यकतानुसार छंदोबद्ध काव्य में भी हो सकती है एवं छंद-मुक्त काव्य में भी| अतः गीत-अगीत कोई विवाद का विषय नहीं है |”
--शूर्पणखा अगीत काव्य उपन्यास से
\
-------- “ समाज में जब कभी भी विश्रृंखलता उत्पन्न होती है तो उसका मूल कारण मानव मन में नैतिक बल की कमी होता है भौतिकता के अतिप्रवाह में शौर्य, नैतिकता, सामाजिकता, धर्म, अध्यात्म, व्यवहारगत शुचिता, धैर्य, संतोष, समता, अनुशासन आदि उदात्त भावों की कमी से असंयमता पनपती है | अपने इतिहास, शास्त्र, पुराण, गाथाएँ, भाषा व ज्ञान को जाने बिना भागम-भाम में नवीन अनजाने मार्ग पर चल देना अंधकूप की और चलना ही है | आज की विश्रृंखलता का यही कारण है |” ------- शूर्पणखा से
\
--------- ‘ मेरे विचार से समस्या-प्रधान व तार्किक विषयों को मुक्त-छंद रचनाओं में सुगमता से कहा जा सकता है, जो जनसामान्य के लिए सुबोध होती हैं|’ --काव्य मुक्तामृत से

\\
.
----जीवन परिचय
\
------------- चिकित्सा व साहित्य जगत में जाना पहचाना नाम, चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक डा एस बी गुप्ता व साहित्यकार डा श्याम गुप्त का जन्म पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा में १० नवंबर १९४४ ई में हुआ | आपके पिता का नाम स्व.जगन्नाथ प्रसाद गुप्त व माता स्व.श्रीमती रामभेजी देवी हैं; पत्नी का नाम श्रीमती सुषमा गुप्ता है जो हिन्दी में स्तानाकोत्तर हैं एवं स्वयं भी एक कवियत्री व गायिका हैं | आपके एक पुत्र व एक पुत्री हैं | पुत्र श्री निर्विकार बेंगलोर में फिलिप्स कंपनी में वरिष्ठ प्रोजेक्ट प्रवन्धक व पुत्रवधू श्रीमती रीना गुप्ता क्रीडेन्शियल कंपनी की फाइनेंशियल सलाहकार व प्रवन्धक हैं | पुत्री दीपिका गुप्ता प्रवंधन में स्नातकोत्तर व दामाद श्री शैलेश अग्रहरि फिलिप्स पूना में महाप्रवन्धक पद पर हैं |
\
------- डा श्याम गुप्त की समस्त शिक्षा-दीक्षा आगरा नगर में ही हुई | सेंट जांस स्कूल आगरा, राजकीय इंटर कालिज आगरा व सेंट जांस डिग्री कालिज आगरा से अकादमिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय आगरा ( आगरा विश्वविद्यालय ) से चिकित्सा शास्त्र में स्नातक की उपाधि एम् बी बी एस व शल्य-क्रिया विशेषज्ञता में स्नातकोत्तर ‘मास्टर आफ सर्जरी’ की उपाधि प्राप्त की | इस दौरान देश- विदेश की चिकित्सा पत्रिकाओं व शोध पत्रिकाओं में उनके चिकित्सा आलेख व शोध आलेख छपते रहे | चिकित्सा महाविद्यालय में दो वर्ष तक रेज़ीडेंट-सर्जन के पद पर कार्य के उपरान्त आप भारतीय रेलवे के चिकित्सा विभाग में देश के विभिन्न पदों व नगरों में कार्यरत रहे एवं उत्तर रेलवे मंडल चिकित्सालय, लखनऊ से वरिष्ठ चिकित्सा-अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए | सम्प्रति उनका स्थायी निवास लखनऊ है |
--- संपर्क— सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२ (उ प्र), भारत, मो-०९४१५१५६४६४, ईमेल- drgupta04@gmail.com
\\
-----साहित्यिक परिचय ---
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--------धर्म, अध्यात्म के वातावरण -- रामायण के सस्वर पाठ से दिनचर्या प्रारम्भ करने वाली व चाकी-चूल्हे से लेकर देवी-देवता, मंदिर की पूजा-अर्चना करने वाली माँ व झंडा-गीत एवं देशभक्ति के गीतों के गायकों की टोली के नायक, देश-भक्ति व सर्व-धर्म, सम-भाव भावना प्रधान पिता के सान्निध्य में वाल्यावस्था में ही कविता-प्रेम प्रस्फुटित हो चुका था |
\
--------शिक्षाकाल से ही आगरा नगर की पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें व आलेख प्रकाशित होते रहे | आगरा से प्रकाशित " युवांतर" साप्ताहिक के वे वैज्ञानिक-सम्पादक रहे एवं बाद में लखनऊ नगर से प्रकाशित -“निरोगी संसार " मासिक के नियमित लेखक व सम्पादकीय सलाहकार |
\
---------- आप हिन्दी भाषा में खड़ी-बोली व ब्रज-भाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं के साहित्य में रचनारत हैं | ब्रज क्षेत्र के होने के कारण वे कृष्ण के अनन्य भक्त भी हैं उनके पद एवं अन्य तमाम रचनाएँ कृष्ण व राधा पर आधारित हैं एवं ब्रजभाषा में काव्य-रचना भी करते हैं |
\
---------हिन्दी-साहित्य की गद्य व पद्य दोनों विधाओं की गीत, अगीत, नवगीत .छंदोवद्ध-काव्य, ग़ज़ल, कथा-कहानी, आलेख, निवंध, समीक्षा, उपन्यास, नाटिकाएं सभी में वे समान रूप से रचनारत हैं |
\
-------आप कविता की अगीत विधा के सशक्त अगीतकार कवि, सन्घीय समीक्षा पद्धति के समीक्षक व सन्तुलित कहानी के कहानी कार के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं | वे लखनऊ की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्वद्ध हैं, एवं अगीत परिषद, प्रतिष्ठा व चेतना परिषद के आजीवन सदस्य हैं| आप अनेक काव्य रचनाओं के सहयोगी रचनाकार हैं व कई रचनाओं की भूमिका के लेखक भी हैं|
\
--------अंतरजाल ( इंटरनेट ) पर विभिन्न ई-पत्रिकाओं हिन्दी साहित्य मंच, रचनाकार, हिन्दी-कुन्ज, हिन्द-युग्म, कल्किओन-हिन्दी व कल्किओन-अन्ग्रेज़ी आदि के लेखक एवं सहयोगी रचनाकार हैं | श्याम स्मृति The world of my thoughts .., साहित्य श्याम, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व विजानाति-विजानाति-विज्ञान उनके स्वतंत्र चिट्ठे (ब्लॉग) हैं एवं कई सामुदायिक चिठ्ठों के सहयोगी रचनाकार व सलाहकार |
\
-----उनके अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं| अब तक उनके द्वारा लगभग १५० गीत, १५० ग़ज़ल, १५० गीत-अगीत छंद, ६० कथाएं व अनेक आलेख, वैज्ञानिक-दार्शनिक, वैदिक-पौराणिक विज्ञान व धर्म-दर्शन एवं भारतीय पुरा इतिहास तथा विविध विषयों पर आलेख और निवंध तथा कई पुस्तकों की समीक्षाएं आदि लिखी जा चुकी हैं |
\
-------उनकी शैली मूलतः उद्बोधन, देशप्रेम, उपदेशात्मक व दार्शनिक है जो यथा-विषयानुसार होती है| श्रृंगार की एवं ललित रचनाओं में रीतिकालीन अलंकार युक्त शैली में शास्त्रीय छंद घनाक्षरी, दोहे, पद, सवैये आदि उन्होंने लिखे हैं| भावात्मक एवं व्यंगात्मक शैली का भी उन्होंने प्रयोग किया है स्पष्ट भाव-सम्प्रेषण हेतु| मूलतः वे अभिधात्मक कथ्य-शैली का प्रयोग करते हैं| आपको व आपकी विभिन्न कृतियों को विभिन्न संस्थाओं व संस्थानों द्वारा अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं|
\
-------------डा गुप्त ने कई नवीन छंदों की सृष्टि भी की है ..उदाहरणार्थ...अगीत-विधा के ..लयबद्ध-अगीत, षटपदी अगीत, त्रिपदा अगीत , नव-अगीत छंद व त्रिपदा अगीत ग़ज़ल...तथा गीति विधा के " श्याम सवैया छंद " व पंचक श्याम सवैया छंद |
\
----------आपकी प्रकाशित कृतियां---काव्य-दूत, काव्य निर्झरिणी, काव्यमुक्तामृत (सभी काव्य-संग्रह), सृष्टि-अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्य—गीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा-अगीत-विधा काव्य-उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास --नारी विमर्श पर एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण तथा ब्रजभाषा में विभिन्न काव्य-विधाओं का संग्रह ‘ब्रज बांसुरी’ एवं शायरी काव्य विधा में ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ हैं | अन्य शीघ्र प्रकाश्य कृतियाँ में ---गीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, अगीत संग्रह, कथा-संग्रह, श्याम दोहा संग्रह, काव्य-कंकरियाँ व श्याम-स्मृति एवं ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद आदि हैं |




                                                       -----क्रमश भाग आठ----डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत----



रविवार, 16 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे---डा श्याम गुप्त

अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे----
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
\
श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत -----
Image may contain: 1 person, eyeglasses and closeup
----- अगीत छंद----
१.
लिखता हूँ कविता
आखिर मैं किसलिए,
उत्तर दिया मन ने
अपने ही मन के लिए |
सत्य ने कहा रंग को
बिखरने दो जगत में
सार्थक होजायगी
तभी तेरी कविता |
२.
भूल गया अपना नाम
धुंए और शोर से
प्रदूषण के दूषण से
उड़ नहीं पाता हीरामन
घायल हैं पंख
रुंधा है कंठ
कैसे बोले राम राम |
३.
झुरमुट के कोने में
कमर का दर्द लपेटे
दाने बीनती परछाईं |
जमाना ढूंढ रहा है
खुद को किसी ढेर में |
४.
साधन और संकल्प
अन्योन्याश्रित हैं |
छूट गया अगर साथ
मलते रहेंगे हाथ,
धरे रह जायेंगे फिर
अंधेर में अरमान सब
सुलगने के लिए बस |

५.
काल की लहरों पर
मिलते बिछुड़ते रहे
प्रश्नों ने मांगे जब
उत्तर हम देते रहे
उत्तर न पा सके
अपने ही प्रश्न मगर |
६.
गिरेबां चमन के
होगये चाक
खिजाँ से आशना हुए
रहगुजर का निजाम है
दस्तो-पा खून आलूद हैं
मायूस है दिल गम से
कातिल का नाम पर हम न लेंगे |
७.
मात्र एक अहंकार
देता है जन्म विवेकहीनता को,
शून्य हो जाती है
अपनी पहचान, और-
विलीन होजाता है
सत्य का आकार |
८.
अक्षर और शब्द
गूंगे नहीं होते हैं !
कला आती नहीं
सामर्थ्य भी है नहीं
शब्दकोश केवल
पलटते रह जायेंगे !
अनुभव की कसौटी
रचती है नया कोश
रहता नहीं निरर्थक कोई शब्द |

९.
प्रथम रश्मि का आँचल
मृदुल पवन की लहर
तुहिन के मुक्ताकण
पल्लवों पर ठिठककर
गतिमान कर देते हैं
कवि की कल्पना के
प्राणों को अविरल |
१०.
कर रहे हो हत्या तुम
कन्या के भ्रूण की !
कर रहे हो पाप, छीन कर जीवन
भविष्य की मां का तुम |
जन्म देगा कौन फिर
अवतारों पैगम्बरों को
अवरुद्ध कर रहे क्यों
भविष्य की गति को तुम |
११.
उंच और नीच, दलित और पीड़ित
सबका है योगदान
राष्ट्र की प्रगति में
भूलें ये कभी न हम |
समरसता बंधुत्व से
सिंचित कर राष्ट्र को
उगाते रहें सदा
प्रगति के बीज |
१२.
आदिम युग में जाने क्यों
जी रहा है आज भी
सभी समाज यह
करके पैने नाखून
धंसा रहा है सीने में
इंसानियत के
क्यों आखिर ?
१३.
एक क्षितिज पर
उगता है सूरज
और डूब जाता है
दूसरे क्षितिज पर |
देखा नहीं कभी उसे चलते हुए
अपनी राह भटक कर |
१४.
क्या होगा आखिर
फूलों का, बहारों का
चांदनी का, हवाओं का
खुशनुमा नजारों का
मोती भी शबनमी,
सूख सब जायंगे
जलती रही धरती अगर
सूनी होजायगी
कलम की माँग फिर|
१५.
लूट में बंदी युवक से मैंने कहा,
’शक्ति यह-लगाओ देश की रक्षा में ‘
नेताओं की कृपा से-
लूटमार करके मैं
करता हूँ ऐश, फिर-
फ़ायदा क्या है भला
सीमा पर खून बहाने से ,
बोला वह धीमे से |
\
----गतिमय सप्तपदी अगीत छंद ---
. ..(महाकाव्य सौमित्र गुणाकर से)
१६.
चला जारहा मानव ऊपर
चिंता नहीं धरा की किंचित
भाग रहा है अपने से ही
संग निराशा की गठरी ले |
पंथ प्रकाशित हो संयम का
दे वरदान ज्योति का हे मां !
करून वन्दना रामानुज की | ..
१७.
गणनायक की कृपादृष्टि से
मां वाणी ने दिया सहारा
खुले कपट बुद्धि के जब, तब,
हुए शब्द-अक्षर संयोजितफ
पाई शक्ति लेखनी ने, फिर |
रामानुज की विमल कथा का
प्रणयन है अगीत शैली में |
१८.
स्रोत सृष्टि के लगे सूखने
सुख के सब आधार मिट गए |
लोभ मोह मद काम क्रोध की
महिमा का विस्तार होगया
ह्रास होगया सत्संगति का
क्षीण हुए सामाजिक बंधन
असंतुलन होगया सृष्टि का |....
१९.
सुनकर धनुष यज्ञ की चर्चा
विश्वामित्र होगये पुलकित |
राम लक्ष्मण को प्रेरित कर
जागृत की उत्कंठा मन में ,
धनुष यज्ञ दर्शन करने की |
अनुज सहित प्रभु की सहमति पा
चले साथ मुनिवर मिथिला को |
२०.
किया सुदृड़ भूतल लक्ष्मण ने
लेपन करके मृदा भित्ति पर |
भिन्न भिन्न पुष्पों के रंग से
रचना की सुन्दर चित्रों की |
प्रभु की पर्णकुटी से हटकर
था विशाल वटबृक्ष अवस्थित
स्वयं व्यवस्थित हुए वहां पर |
\
. .. खंड काव्य – मोह और पश्चाताप से -----
२१.
छुब्ध होरहा है हर मानव
पनप रहा है वैर निरंतर |
राम और शिव के अभाव में
विकल होरहीं मर्यादाएं ,
व्याप्त होरहा विष चन्दन में |
पीडाएं हर सकूं जगत की
ज्ञान मुझे दो प्रभु प्रणयन का |
२२.
काम क्रोध मद लोभ मोह सब
भाव बंधन के करक है बस,
ऋषि मुनि देव असुर औ मानव
माया से बच सका न कोइ
पश्चाताप शरण प्रभु की, है
मार्ग मुक्ति का हर कल्मष से
हो जाता अंतर्मन निर्मल |
२३.
नारद विष्णु भक्त थे ज्ञानी
काम विजय से उपज मोह ने
काम-क्रोध ने अहंकार ने
निरत लोक-कल्याण भक्त को
विचलित किया पंथ से, लेकिन
शाप भोग कर श्री हरि ने फिर
किया निवारण उनके भ्रम को |
२४.
सीता के प्रति चिंता को फिर
व्यक्त किया शबरी से प्रभु ने
बोली,’ अधमाधम नारी को
दर्शन देकर धन्य किया है
आगे ऋष्यमूक पर्वत पर
प्रभु ! हनुमान ,सुकंठ मिलेंगे
देंगे वह सहयोग आपको |
२५.
अहंकार का नाश होगया
नष्ट हुआ असुरों का संकुल
स्थिर हुआ शान्ति का शासन
हुए प्रसन्न संतगण, मुनिजन
होने लगे यज्ञ निष्कंटक
राम राज्य के शुभारम्भ की
शंखध्वनि गूंजी लंका में |
\
-----नवअगीत छंद ( अगीतिका से )-----
२६.
अँधेरे में छिपा लेते हैं पाप
दिन में पर रखते हैं
चेहरा ,
हर दम साफ़ |
२७.
सब के सब टूट गए
निष्ठा के प्रतिमान
जीवित संबंधों के
तटबंध डूब गए
स्रोत संकल्पों के रीत गए |
२८.
सिद्धांत का अभाव
डराता है सत्य को
यही है –
सत्ता का स्वभाव |

२९.
संकल्प ले चुके हम
पोलियो मुक्त जीवन का |
धर्म और आतंक के
विष से मुक्ति का
संकल्प भी तो लें हम |
३०.
बैठा था पनघट पर
अधूरी प्यास लिए
अतृप्त मन का
कर दिया तर्पण
नयनों ने छलककर |
--------क्रमश भाग सात---- महाकवि डा श्याम गुप्त .....
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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे---- डा श्याम गुप्त

अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
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वक्तव्य ..
“अहंकार की संतुष्टि न होने से संशय, भ्रम, लोभ मोहादि का जन्म होता है जिनकी पूर्ति न होने से क्रोध होता है जो अंततः विनाश का कारण बनता है | अहंकारजन्य विकार अनुशासन, सामाजिक-समरसता और लोक मंगल को नष्ट करते हैं और सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है |”
“संस्कृत छंद अतुकांत होते हुए भी लय एवं गेयता से पूर्ण होते हैं | अगीत, अतुकांत, तुकांत एवं अगेय अथवा लयबद्ध एवं गेय होते हैं|”
"अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत-तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है|”
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जीवन परिचय....
साहित्य की प्रत्येक विधा ...गद्य-पद्य, गीत-अगीत, छंद-ग़ज़ल सभी में समान रूप से सिद्धहस्त एवं रचनारत तथा कविता की अगीत-विधा के गति-प्रदायक महाकवि श्री जगत नारायण पांडे का जन्म लखनऊ के कान्यकुब्ज परवार में सं. १९३३ में हुआ| कुछ अपरिहार्य कारणों से आपकी शिक्षा-दीक्षा बिलम्ब से प्रारम्भ हुई| आलमबाग, लखनऊ के अमरूदही बाग़ मोहल्ले में घर के समीप ही प्राइमरी स्कूल से आपने चहर्रुम तक शिक्षा पाई परन्तु उर्दू में भी ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल के हेडमास्टर श्री वृन्दाबख्स ने उनकी लगन देख कर उन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देकर ‘कान्यकुब्ज कालेज में दाखिले योग्य बनादिया| जहां से आपने हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा पास की | वे अपने पिता के साथ रामायण की मंडली में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन भी किया करते थे, जिसने उन्हें देवी-देवताओं के प्रति भक्ति भावना प्रधान बना दिया| इसी परिवेश के चलते उन्होंने बी ऐ, एल एल बी तक शिक्षा प्राप्त की | कालिज की हिंदी गतिविधियों में वे बराबर भाग लेते रहे|
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आपका विवाह सीतापुर निवासी स्व. शिवनारायण मिश्र की की पुत्री मालती से हुआ | आपके चार संताने हैं बड़े पुत्र विजय का व्यवसाय है, छोटे पुत्र केशव पांडे एम् ऐ एल एल बी,एडवोकेट है व तीसरे पुत्र राजीव जेसी आईएसएफ़ में इन्स्पेक्टर हैं| सबसे बड़ी पुत्री हैं जो बीऐ हैं एवं उनका विवाह डा रमेश चन्द्र शर्मा से हुआ है|
अधिवक्ता के रूप में आप दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में निष्णात थे एवं अन्य अधिवक्ता भी उनसे परामर्श लेते थे| न्यायालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यों में उनका योगदान रहता था| आप विधिक सेवा प्राधिकरण के मानद सदस्य भी रहे| ऐसी महान विधिक व साहित्यिक विभूति महाकवि पं .जगत नारायण पांडे १६ फरवरी २००७ ई. को भगवदधाम प्रयाण कर गए |
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साहित्यिक परिचय—
आपकी साहित्यिक यात्रा का सूत्रपात कालिज के दिनों से ही होचुका था| तत्पश्चात वकालत के व्यवसाय के साथ साथ ही वे काव्यसाधना में भी रत रहे| हिन्दी, अंग्रीजी, उर्दू पर उनका अच्छा अधिकार था एवं संस्कृत भाषा का भी अच्छा ज्ञान था| काव्य की हर विधा-- गद्य-पद्य, गीत अगीत, छंद , हाइकू ,ग़ज़ल, मुक्तक, संतुलित कहानियां, व्यंग्य आलेख आदि पर उनका समानाधिकार था| देश की विभिन्न पात्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशन के अतिरिक्त ,आकाशवाणी से काव्यपाठ के अतिरिक्त दूरदर्शन पर पत्रोत्तर कार्यक्रम को भी स्थान दिया गया | लगभग २० काव्य-कृतियों की भूमिकाएं भी उन्होंने लिखी है जिनमें श्री वीरेन्द्र अंशुमाली की ‘तात्याटोपे’ मधुकर अस्थाना की ‘वक्त आदमखोर’, डा योगेश गुप्ता की कृति’ अंतर-क्षितिज’ एवं महाकवि डा श्याम गुप्त के अगीत महाकाव्य ‘सृष्टि’ व अतुकांत काव्यसंग्रह ‘काव्य-मुक्तामृत‘ उल्लेखनीय हैं |
अगीत काव्य विधा को उन्होंने पूरे मनोयोग से अपनाया एवं निखारने व गति प्रदान करने में अतुलनीय सहयोग दिया| अगीत विधा में अगीत के नवीन छंद गतिमय सप्तपदी अगीत की रचना की जिसमें आपने प्रथम खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर‘ की रचना करके आपने अगीत-विधा को निखारने एवं अग्रगामी होने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| आपके ३३१ अगीतों का संग्रह ‘अगीतिका’ भी प्रकाशित है| शिव-पार्वती विवाह के विषय पर सवैया व बरवै छंदों में आपने ‘इदम शिवाय’ कृति की भी रचना की है|
पता--५६५/१०, अम्ररूदही बाग़,
आलमबाग ,लखनऊ
              .क्रमश ---भाग छः ---श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत ...
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----डा श्याम गुप्त..


           
अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण
डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


भाग चार--- डा सत्य के अगीत यहाँ प्रस्तुत हैं ..

१.
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान | "

" घर घर में खुशहाली लाएं ,
जीवन साकार करें ;
नवयुग निर्माण करें ,
सबको निज गले लगाएं | "
३.
" दलितों के प्रति मत करो अन्याय
उन्हें भी दो समानता से-
जीने का अधिकार , अन्यथा-
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी, और-
लेगी प्रतिकार ;अतः --
ओ समाज के ठेकेदारो !
उंच-नीच की खाई पाटो ,
दो शोषितों को ही न्याय | "
४.
" बूँद बूँद बीज ये कपास के,
खिल-खिल कर पड रही दरार;
सडी-गली मछली के संग,
ढूँढ रहा विस्मय विस्तार,
डूब गए कपटी विश्वास के | "
५.
दिशाहीन नहीं हूँ अभी-
पाई है केवल बदनामी,
खोज रहे हैं मुझको,
मेरे प्रेरक सपने
मिलनातुर हैं मुझसे
मेरे सारे अपने,
क्रियाहीन नहीं हूँ अभी
यह तो है जग की नादानी |
६.
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है |"

७.
"" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें
८.
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "
९.
" नवयुग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "

१०.
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा |
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "
११.
" आओ हम अंधकार दूर करें ,
रात और दिन खुशी-खुशी बीते;
सारा संसार शान्ति पाए ,
अपना यह राष्ट्र प्रगतिगामी हो ;
वैज्ञानिक उन्नति से ,
इसको भरपूर बनाएँ | "
१२.
"टूट रहा मन का विश्वास ,
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं|
रोक रहीं मुझको
गहरी बाधाएं |
अंधकार और बढ़ रहा ,
उलट रहा सारा इतिहास | "
१३.
"कवि चिथड़े पहने
चखता संकेतों का रस,
रचता -रस, छंद, अलंकार
ऐसे कवि के क्या कहने |"
१४.
" स्तम्भन एक और ....
संबंधी भीड़-भाड
ध्वंस की कतारों में ;
मक्षिका नहा रही-
दूध के पिटारों में |
ढला ढला लगता सब ओर...
अपने में स्नेह-सिक्त,
तिरछा भूगोल |"
१५.
"देव नागरी को अपनाएं
हिन्दी है जन जन की भाषा ,
भारत माता की अभिलाषा |
बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,
सब बहनों की बड़ी बहन है
हिन्दी सबका मान बढाती ,
हिन्दी का अभियान चलायें|"
१६.
"आओ ! हम राष्ट्र को जगाएं
आजादी का जश्न मनाना,
हमारी मजबूरी नहीं-
अपितु कर्तव्य है |
आओ हम सब मिलकर
विश्व-बंधुत्व अपनाएं,
स्वराष्ट्र को प्रगति पथ पर -
आगे बढाएं |"
१७.
"इधर उधर जाने से
क्या होगा ;
मोड़ मोड़ पर जमी हुईं हैं ,
परेशानियां |
शब्द -शब्द अर्थ सहित
कह रहीं कहानियां
मन को बहलाने से
क्या होगा |"
१८.
सबका सम्मान करो
सब भारत मां की हैं संतानें
उनमें मतभेद मत करो |
उंच-नीच का जो
भ्रमजाल आज फैला है,
मिलजुलकर उसको भी दूर करो |
१९.
आशाएं साथ हैं हमारे
कभी कभी द्वार पर टेरती उदासी
तनहाई में मुझको
घेरती उदासी ,
बिछुडन भी होरही उदास
बाधाएं साथ हैं हमारे |
२०.
जीवन तो तुझको है अर्पण
ध्यान मग्न बैठा हूँ मैं
देख रहा तेरा श्रृंगार,
साहस को फिर बटोरकर
आया हूँ फिर तेरे द्वार
शेष सभी तुझको समर्पण |
२१.
नवल प्रात: आया है आज यहाँ
धीरे धीरे रात चली गयी,
ऊषा ने जब प्रभात फैलाया |
सूरज भी चलने को आतुर है,
लाजवंती शाम ढल गयी,
अन्धकार गहराया आज यहाँ |
२२.
आँखों को चित्र भागया
कैसे मैं छोडूं यह महानगर
बाधाएं दो नहीं हज़ारों,
आशाएं कर रहीं श्रृंगार
पार्कों में बैठे कुछ लोग
जीवन का दर्द रहे बाँट
अपने में डूब गया सत्य
देख रहा गोमती डगर |
२३.
धीरज को बाँध नहीं पाता...|
जीवन में छागई उदासी,
मन को समझाता हूँ बार बार,
वह भी तो साथ नहें देता |
कैसे मैं व्यक्त करूँ
अंतर-पीडाओं को
इसका भी ध्यान नहीं आता|

२४.
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
सारा विश्वास तुम्हीं हो,
मेरा आकाश तुम्हीं हो,
सारे संसार में अकेले,
मेरा मधुमास तुम्हीं हो
तुमको तज और कहाँ जाऊं |
१३.
आतप ने सांकल खटकाई जब
बिरहन की पीड़ा दोगुनी हुई |
जोर जोर चलती हैं, विष भरी हवाएं
तन मन में आग लगी
कौन आ बुझाए|
भेजी जब प्रियतम ने पाती परदेश से
सीने पर रखने से
पीड़ा कुछ कम हुई |
२६.
चलना ही नियति हमारी है
घूम घूम कर करता रहता आभास
धरती के साथ साथ
सोया आकाश ,
लक्ष्यों तक जाने को
निश्चित स्वर पाने को
संसृति को होता विश्वास,
चलना ही प्रगति हमारी है |
२७.
संघर्षों से कभी न ऊबें |
जो भी हम आज जीरहे
उसका तो अंत सत्य है,
कर्मों को करते जाएँ हम
अपने कर्तब्यों में बार बार डूबें |

२८.
"ओ बसंत ! फिर आना
सिहरन के साथ |
तेरे आने की आहट मिल जाती है;
पाहुन से मिलने की,
इच्छा तडपाती है ;
ओ बसंत ! फिर आना ,
मनसिज के साथ | "
२९.
आओ हम सृजन को जियें |
सत्य और संयम, मन में उत्साह भरें
जीवन आशान्वित हो
शान्ति के सहारे |
हिंसा का त्याग करें
सबको सुख दे करके
हम गरल पियें|
३०.
जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों ही मिलते रहते |
जिन्दगी का सत्य क्या रहा
जीवन का तथ्य क्या रहा,
जिन्दगी में शूल यदि मिले
तो फूल भी कभी कभी खिले ,
जिन्दगी में हृदयों के दीप जलते रहते...|
.......क्रमश---भाग पांच----









बुधवार, 12 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग तीन -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय .------डा श्याम गुप्त

अगीत - त्रयी...---- भाग तीन -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय .------


--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
---------भाग-तीन------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय Image may contain: 1 person, sunglasses and closeup
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----वक्तव्य—
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.." अगीत का सम्बन्ध मनुष्य की आस्था से है, भारतीयता से है, उसकी संस्कृति से है | अगीत, हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य को गति व दिशा देने में सहायक, सक्षम व सफल है ; इसीलिये यह आज विश्वभर में फ़ैल रहा है और मैं भविष्य के प्रति आशान्वित हूँ |"..
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“गीत में 'अ' प्रत्यय लगा कर मैंने अगीत को संज्ञा के रूप में स्वीकार किया | अगीत, गीत नहीं के रूप में न लिया जाय | यह एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसने संक्षिप्तता को ग्रहण किया है, सतसैया के दोहरे की भांति |" "अगीत विधा में भाव को प्रधानता दी जाती है | यदि गीत नियमों की बंदिश से मुक्त कोई तुकांत या अतुकांत रचना, चार से दस पंक्तियों में अपने भाव, लय, गति व्यक्त करने में सक्षम है तो वह अगीत है |”
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----जीवन परिचय.----...
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साठोत्तरी कविता जगत में कविता की नवीन विधा अगीत के संस्थापक साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र सत्य का जन्म १ मार्च १९४२ को जनपद रायबरेली ( उ.प्र.) के ग्राम कुर्री सुदौली के एक संभ्रांत कान्यकुब्ज परिवार में हुआ | आपके पिता का नाम श्री रघुनन्दन प्रसाद एवं माता श्रीमती शिवानाथा देवी मिश्रा था| धार्मिक वातावरण में जन्मे डा सत्य जी अपने भाइयों में सबसे छोटे थे | अल्पायु में ही पिता का निधन होने पर प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही बड़े भाइयों के संरक्षण में हुई|
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आपने कानपुर श्रमिक शिक्षा केंद्र से श्रमिक-शिक्षक का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया आगे की उच्च शिक्षा शिक्षा लखनऊ के विद्यांत डिग्री कालेज से प्राप्त की | इन्टरमीडिएट की परीक्षा के उपरांत उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में अपनी सेवायें अर्पित कीं एवं साथ-साथ ही उच्च शिक्षा भी प्राप्त करते रहे | हिन्दी-साहित्य में परास्नातक की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से करने के उपरांत डा उषा गुप्ता के निर्देशनमें ‘नए हिन्दी काव्य में कतिपय प्रमुख वाद‘ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की | आप सन 2000 ई में उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में केंद्र प्रभारी पद से सेवानिवृत्त हुए| वे हिन्दी साहित्य परिषद् के महामंत्री तथा लखनऊ वि वि के हिन्दी विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष भी रहे |
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आपका विवाह कालूखेडा उन्नाव के स्व. गंगाचरण शुक्ल की पुत्री श्रीमती कल्याणी देवी से हुआ| आपके दो पुत्र अनुराग मिश्र व आशुतोष मिश्र एवं दो पुत्रियाँ मधु व सीमा हैं|
-------साहित्यिक परिचय .------
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क्रान्तियुगोत्तर साहित्यकार, अगीत काव्य के प्रणेता, ‘संतुलित कहानी विधा’ के जनक एवं ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ के अगुआ तथा आधुनिक हिन्दी कविता और वर्तमान भारत की भाषायी व सांस्कृतिक गौरव को पहचान दिलाने में समकालीन नव-साहित्यकारों व युवाओं के प्रेरणास्रोत साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ का नाम हिन्दी साहित्य जगत के लिए नया नहीं है| वाल्याकाल से ही आप कविता से जुड़े रहे | आपने तरुण साहित्यकार सम्मलेन एवं कवि-कोविद क्लब के मंत्री पद से साहित्य सेवा में अमूल्य योगदान दिया | आपने सं १९६६ई. में साठोत्तरी कविता जगत में अतुकांत काव्य की एक नयी विधा ‘अगीत कविता’ को जन्म दिया|, १९७५ में ‘संतुलित कहानी; तथा १९९८ में ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ का प्रचलन किया | आपका प्रथम स्वरचित काव्य संग्रह ‘बिछुड़े मीत’ १९६० में प्रकाशित हुआ| ‘कवि सोहनलाल सुबुद्ध एक परिचय’ तथा ‘ महाकवि जगत नारायण पांडे; एक परिचय ‘ आपकी अन्य लोकप्रिय कृतियाँ हैं| आपने ‘अगीत काव्य के चौदह रत्न’, ‘अगीत के इक्कीस स्तम्भ’, ‘अगीत काव्य के अष्टादश पथी’ एवं ‘अगीत के सोलह महारथी’ आदि पुस्तकों का सम्पादन किया| ‘अगीतोत्सव -89’, ‘कश्मीर हमारा है’, ‘जवानो आगे बढ़ो’ ‘पनघट’ आदि काव्य संग्रहों तथा ‘समीक्षा पद्धति की पुस्तक गुणदोष (पार्थोसेन), लघु उपन्यास ‘सुमि’ निबंध संग्रह ‘स्वयंगंधा’, का भी संपादन किया | १९६६ से आपने लगभग १५ वर्षों तक अगीत-त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तत्पश्चात उनके संरक्षण में ‘अगीतायन साप्ताहिक पत्र’ का लगातार संपादन किया जा रहा है| आपने दर्ज़नों पुस्तकों की भूमिका लिखी जिनमें महाकाव्य, खंडकाव्य, काव्य संग्रह भी शामिल हैं|
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नियमित रूप से आपके कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होते रहते हैं| आप लगभग साढ़े चार हज़ार से अधिक साहत्यिक व सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन संचालन व अध्यक्षता कुशल पूर्वक कर चुके हैं| प्रथम विश्व हिन्दी सम्मलेन नागपुर एवं हिन्दी सम्मलेन दिल्ली में वे अ.भा. अगीत परिषद् का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं| आपके ऊपर एक लखनऊ विशाविद्यालय द्वारा शोध-प्रबंध ‘ अगीत परिषद् साहित्यिक संस्था, एक अनुशीलन ‘ किया जा चुका है| आपको देश भर के अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से समानित किया जा चुका है|
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संपर्क- अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ-१७.,दू.भा. ०५२२-२४१४८१७ ..मो.९३३५९९०४३५ ..