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शुक्रवार, 19 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----


पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

                             


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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......
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कुंजिका – तेन = उसी के /उसे...त्यक्तेन= उपयोगार्थ दिए हुए /त्याग के भाव से...भुंजीथा = भोगकर /भोगना चाहिए ...
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मूलार्थ- उसके द्वारा उपयोगार्थ दिए हुए पदार्थों को ही भोगना चाहिए, उसे ईश्वर का दिया हुआ ही समझकर ( प्राकृतिक सहज रूप से प्राप्य)...अथवा उसे त्याग के रूप में, अनासक्त भाव से भोगना चाहिए |
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सब कुछ ईश्वर की ही माया,
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |


पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||
--------क्रमश-आगे प्रथम मन्त्र के तृतीय भाग का काव्यभावानुवाद ----


रविवार, 2 मार्च 2014

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र "ईशावास्यम...." के द्वितीय भाग....”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." . का काव्य-भावानुवाद........ डा श्याम गुप्त ...



ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र  के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद...... 

सब कुछ ईश्वर की ही माया, 
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |

पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||



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