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रविवार, 14 जुलाई 2013

"कुण्डलियाँ छन्द पर अपना आलेख या कुण्डलियाँ पोस्ट करे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
      अभी तक आप सबने दोहा छन्द पर एक से एक बढ़िया पोस्ट लगायीं। आप सभी रचनाधर्मियों को हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
अब इस क्रम में कल सोमवार (15-07-2013) से दोहा से ही सम्बन्धित कुण्डलिया छन्द की शुरूआत की जा रही है।
    मुझे आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि आपके योगदान से स्वयं मुझे, आप सभी योगदानकर्ताओं और पाठकों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
    यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि हमारे सहयोगियों में श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता “रविकर” जैसा कुण्डलियों का पुरोधा है। जिसने 3000 से अधिक कुण्डलियों की रचना की है।
अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार कुण्डलिया के बारे में अपना मत प्रस्तुत कर रहा हूँ।
अधिकांश विद्वान कुण्डलिया छन्द की परिभाषा निम्नवत् देते हैं-
कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता हैउसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। परन्तु यह मेरी समझ के बाहर है। क्योंकि यह तर्क परिभाषा की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है।
यह बिल्कुल सत्य है कि कुण्डलिया छन्द का प्रारम्भ दोहे से ही होता है। जिसके प्रथम और तीसरे चरण में 13 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं। परन्तु अन्तिम दो पंक्तियों को हम दोहे की श्रेणी में नहीं रख सकते क्योंकि इसके प्रथम और तीसरे चरण में 11 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। इसे हम सोरठा या रोला भी कह सकते हैं परन्तु दूसरे और अन्तिम चरण के वर्ण दीर्घ होने चाहिएँ। जिससे की छन्द की लय और गेयता बनी रहे। 

कुण्डलिया छन्द में जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता हैउसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। इसमें कुण्डलिया का बहुत बड़ा रहस्य छिपा है। सत्य तो यह है कि इसी से इसका कुण्डलिया नाम पड़ा है। 
सर्प जब कुण्डली बना कर बैठता है तो उसका मुँह और पूँछ बिल्कुल पास में होते हैं। सम्भवतः काव्यशास्त्र के मनीषियों ने इससे प्रेरणा लेकर ही इसका नाम कुण्डलिया रखा होगा और इसकी उत्पत्ति की होगी।
--
इस क्रम में आज प्रस्तुत कर रहा हूँ
स्वरचित दो कुण्डलियाँ!

(1)
केशर-क्यारी को सदास्नेह सुधा से सींच।
पुरुष न होता उच्च हैनारि न होती नीच।।
नारि न होती नीचपुरुष की खान यही है।
विडम्बना की बात, इसे सम्मान नहीं है।।
कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी।
बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।।

(2)
दिल मिल जाएँ परस्परसमझो तभी बसन्त।
पल-प्रतिपल मधुमास हैसमझो आदि न अन्त।।
समझो आदि न अन्तखिलेंगे सुमन मनोहर।
रखना इसे सँभालप्यार अनमोल धरोहर।।
कह ‘मयंक’ कविरायहृदय में चाह जगाएँ।
ऐसे करें उपायजगत में दिल मिल जाएँ।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब,सुंदर प्रस्तुति,,,, कुंडलियाँ लिखने की कोशिश कर आपको भेजता हूँ !!!

    RECENT POST : अपनी पहचान

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  2. गुरु जी प्रणाम
    लाजवाब कुण्डलिया
    तस्वीर तो और भी लाजवाब

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  3. आदरणीय शास्त्री जी, कुण्डलिया छंद के बारे में बहुत ही उपयोगी जानकारी प्रस्तुत की गई है.
    मेरी जानकारी के अनुसार एक दोहा और एक रोला का मेल कुण्डलिया छंद होता है. दोहा दो पंक्तियों में लिखा जाता है किंतु इसके चार चरण होते हैं. इसी प्रकार रोला चार पंक्तियों में लिखा जाता है किंतु इसके आठ चरण होते हैं.दोहा में 13 और 11 मात्रायें होती हैं.[विषम चरण में 13 तथा सम चरण में 11 मात्रा]
    रोला में 11 और 13 मात्रायें होती हैं.[विषम चरण में 11 तथा सम चरण में 13 मात्रा]

    सादर........

    उत्तर देंहटाएं
  4. जी अरुण जी!
    अब शुद्ध कर दिया है।
    आपका आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति....

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीय गुरूदेव बहुत ही उपयोगी जानकारी उपलब्ध करायी है आपने! हम सभी को इससे बहुत लाभ होगा।

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  7. बहुत खूब,सुंदर प्रस्तुति,,,

    उत्तर देंहटाएं