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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

दोहा : परिचय एवं विधान

दोहा चार चरणों से युक्त एक अर्धसम मात्रिक छंद है जिसके  पहले व तीसरे चरण में १३, १३ मात्राएँ तथा दूसरे व चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं,
 दोहे के सम चरणों का अंत 'पताका' अर्थात गुरु लघु से होता है तथा इसके विषम चरणों के आदि में जगण अर्थात १२१ का प्रयोग वर्जित है ! अर्थात दोहे के विषम चरणों के अंत में सगण (सलगा ११२) , रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती  है!  
 सम चरणों के अंत में जगण अथवा तगण आना चाहिए अर्थात अंत में पताका (गुरु लघु) अनिवार्य है|

दोहे की रचना करते समय पहले इसे गाकर लिख लेना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! इसमें गेयता का होना अनिवार्य है ! दोहे के तेइस प्रकार होते हैं |

उदाहरण-

नैतिकता सद्चरित का, जिसमें पूर्ण अभाव. 
२११२        २१११       २ ,  ११२      २१   १२१   
दयाहीन उस मनुज के, रहें मलिन ही भाव..--राम शिरोमणि पाठक  
१२२१     ११    १११    २, १२  १११     २   २१ 
              
११२१            १११,    ११   ११       २२१
परिवर्तन तो है नियम, उस पर क्या आवेश.
११       ११२       १११,    १११  १२    ११२१
जब भी बदला है समय, बदल गया परिवेश.. --चंद्रसेन 'विराट'

२११    ११२२      १११,   २११    १११     १२१
दीरघ अनियारे सुगढ़, सुन्दर विमल सुलाज.
१११    १२     २११  १२     २१   १२१    १२१
मकर छबी, बाढह मनोमैन सुरूप जहाज..  --सूरदास मदन मोहन


**राम शिरोमणि पाठक **


5 टिप्‍पणियां:

  1. उपयोगी जानकारी के साथ...बढ़िया पोस्ट!
    आपका स्वागत है राम शिरोमणि पाठक जी!

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  2. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (03-07-2013) के .. जीवन के भिन्न भिन्न रूप ..... तुझ पर ही वारेंगे हम .!! चर्चा मंच अंक-1295 पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

    उत्तर देंहटाएं