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रविवार, 30 जून 2013

दोहा छंद...


कुछ दोहे मेरी कलम से.....

बड़ा सरल  संसार है  , यहाँ  नहीं  कुछ गूढ़
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़. 

कहाँ   ढूँढता  है   मुझे   ,   मैं  हूँ   तेरे   पास
मैं तुझ सा साकार कब, मैं केवल अहसास.  

पागल होकर खोजता ,   सुविधाओं में चैन
भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन. 

मैं  मिल   जाऊंगा  तुझे , तू बस मैं को भूल
मेरी  खातिर  हैं  बहुत ,  श्रद्धा   के   दो फूल.  

जीवन   सारा   बीतता , करता रहा तलाश
अहंकार के भाव ने ,सबकुछ किया विनाश. 

त्याग दिया माँ-बाप को , कितना किया हताश
अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश.

जिस दिन जल कर दीप सा ,देगा ज्ञान प्रकाश
मुझमें  तू  मिल  जा  जरा ,  होगी खतम तलाश.   

पाप भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
लेकर गठरी स्वर्ण की  ,  मेरी करे तलाश.  

जीवित होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
फिर मेरी मूर्ति  गढ़ने  , लाना संग तराश.  

ज्येष्ठ दुपहरी क्यों खिले ,  सेमल और पलाश
इस क्यों का कारण कभी, अपने हृदय तलाश.  

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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