कुछ दोहे मेरी कलम से.....
बड़ा सरल संसार है , यहाँ नहीं कुछ
गूढ़
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़.
कहाँ ढूँढता है
मुझे , मैं हूँ तेरे पास
मैं तुझ सा साकार कब, मैं केवल अहसास.
पागल होकर खोजता , सुविधाओं में चैन
भौतिकता करती रही ,
कदम-कदम बेचैन.
मैं मिल जाऊंगा तुझे , तू बस मैं को भूल
मेरी खातिर हैं बहुत , श्रद्धा के दो फूल.
जीवन सारा बीतता , करता रहा तलाश
अहंकार के भाव ने ,सबकुछ किया विनाश.
त्याग दिया माँ-बाप को , कितना किया हताश
अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश.
जिस दिन
जल कर दीप सा ,देगा ज्ञान प्रकाश
मुझमें
तू मिल जा जरा , होगी खतम तलाश.
पाप
भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
लेकर
गठरी स्वर्ण की , मेरी करे तलाश.
जीवित
होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
फिर मेरी मूर्ति
गढ़ने , लाना संग तराश.
ज्येष्ठ
दुपहरी क्यों खिले , सेमल और पलाश
इस क्यों
का कारण कभी, अपने हृदय तलाश.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)