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सोमवार, 10 जुलाई 2017

बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....


  बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....                            



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                  जीवन व जगत को एक साथ जीने वाले, संवेदनशील, भावुक, कवि हृदय, लखनऊ के वरिष्ठ कवि व साहित्यकार डा श्यामगुप्त एक अनुभवी, प्रतिभावान व सक्षम, वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो विज्ञान के छात्र रहे हैं एवं चिकित्सा विज्ञान व शल्यक्रिया-विशेषज्ञता उनका जीविकोपार्जन | डा श्यामगुप्त भारतीय रेलवे की सेवा में चिकित्सक के रूप में देशभर में कार्यरत रहे अतः समाज के विभिन्न वर्गों, अंगों, धर्मों, व्यक्ति व परिवार व समाज की संरचना एवं अंतर्द्वंद्वों को आपने करीब से देखा, जाना व समझा है | वे एक संवेदनशील, विचारशील, तार्किक के साथ साथ सांसारिक-आध्यात्मिक-धार्मिक व नैतिक समन्वय की अभिरूचि पूर्ण साहित्यकार हैं, उनकी रचनाएं व कृतित्व स्वतःस्फूर्त एवं जीवन से भरपूर हैं|
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                         वे साहित्य के प्रत्येक अनुशासन-गद्य व पद्य की सभी विधाओं में समान रूप से रचनारत हैं, साहित्य में सतत सृजनशील हैं तथा अंतर्जाल ( इंटरनेट) पर हिन्दी, ब्रजभाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं में रचनारत हैं| उनकी अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से पत्र-पत्रिकाओं व अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं|
-------- अब तक आपके द्वारा दस प्रकाशित पुस्तकों के अतिरिक्त लगभग २०० गीत, २५० ग़ज़ल, नज़्म, रुबाइयां, कते, शे’र आदि... ३०० अगीत छंद, ६० कथाएं व २०० से अधिक आलेख, स्त्री-विमर्श, वैज्ञानिक-दार्शनिक, सामाजिक, पौराणिक-एतिहासिक विषयों, हिन्दी व साहित्य आदि विविध विषयों पर लिखे जा चुके हैं एवं आप अनेक निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं आदि भी लिख चुके हैं |
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                           बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त साहित्य की पद्य व गदय की सभी विधाओं उपन्यास, कहानी, समीक्षा, आलेख एवं शास्त्रीय तुकांत छंद, गीत, अतुकांत छंद व गीत तथा अगीत और ग़ज़ल में भी रचनारत हैं| आपने मूलतः खड़ी बोली में साहित्य रचना की है तथा ब्रजभाषा में भी साहित्य रचना करते हैं, अंग्रेज़ी में भी |
----------आपकी कृतियों व रचनाओं से आपके ज्ञान वैविध्य, सतत अध्ययनशीलता, साहित्य में विविधता एवं विषयवस्तु, शैली एवं भाषा में नवीनता के पोषण की ललक परिलक्षित होती है | समाज के सरोकार, जन-जन के उत्थान की ललक, स्व-संस्कृति एवं मानव-सदाचरण के आप पक्षधर हैं जो आपकी प्रत्येक कृति में झलकता है | इसके अतिरिक्त समकालीन परिवेश पर गहन चिंतन-मनन, सूक्ष्म अंतर्दृष्टि तथा व्यष्टि व समष्टि का व्यवहारिक एवं तत्वज्ञान उनकी रचनाओं में समाहित रहता है जो उन्हें एवं उनकी कृतियों को विशिष्टता प्रदान करता है | धर्म, अध्यात्म एवं विविध शास्त्रों के अध्ययन व ज्ञान के झलक भी आपकी सभी रचनाओं में पाई जाती है |
--------- साहित्य में सुस्थापित तत्वों व मानदंडों के साथ-साथ लीक से हटकर कुछ नवीन करते रहना उनका अध्यवसाय है अतः शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है जो उन्हें अन्य कवियों साहित्यकारों से प्रथक एवं विशिष्ट बनाती है |
---------तीन विशिष्ट काव्य-कृतियाँ, ब्रजभाषा में विविध विधा युत काव्यग्रन्थ, खंडकाव्य का नवीन नामकरण ‘काव्य-उपन्यास, नवीन विषयवस्तु युत उपन्यास इन्द्रधनुष लिखकर वे श्रेष्ठ कवि, लेखक व साहित्यकार तो हैं ही, तुकांत एवं अतुकांत अगीत विधा दोनों में ही नए-नए छंदों की रचना तथा गीति-विधा एवं अगीत-विधा दोनों में ही महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की संज्ञा भी प्राप्त कर चुके हैं |
--------काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ, एक काव्य विधा का सम्पूर्ण लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर उन्हें साहित्याचार्य की संज्ञा से भी पुकारा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | वे सतत रचनारत व साधनारत हैं जो उनके शायरी ग्रन्थ, श्याम स्मृति की स्मृतियाँ रूपी विभिन्न विषयों पर स्व-विचारों की लघु-आलेखों की श्रृखला, कहानियाँ, गीत, सामाजिक, एतिहासिक, नारी विमर्श, चिकित्सकीय, साहित्य व भाषा, शास्त्र व स्व-संस्कृति आदि विविध विषयक आलेखों से ज्ञात होता है | अगीत कविता की साहित्य यात्रा एवं उसके छंद विधान का विस्तृत व शोधपूर्ण वर्णन लक्षण ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ में प्रस्तुत होता है |
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                           अगीत काव्यविधा का लक्षण काव्यग्रंथ एवं सफल उपन्यास इन्द्रधनुष, कथाएं एवं विविध विषयों पर लिखे जा चुके अनेकों आलेख, निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं, के आधार पर गद्य-साहित्य की प्रस्तुति में भी डा श्याम गुप्त एक सफल गद्य-साहित्यकार, उपन्यासकार एवं ग्रंथकार के रूप में प्रस्तुत हुए हैं|
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                          उनके साहित्य के प्रिय मूल विषय हैं ... स्त्री-विमर्श –जिसे वे स्त्री-पुरुष विमर्श का नाम देते हैं, पुरा शास्त्रीय ग्रंथों, वेद, पुराण आदि में उपस्थित वैज्ञानिक ज्ञान व तथ्य, दर्शन, सामाजिक व व्यवहारिक जीवन-संसार के ज्ञान को जनभाषा हिन्दी में लेखन द्वारा समाज व विश्व के सामने लाना, मानव आचरण संवर्धन विषयक आलेख व रचनाएँ जो सम-सामयिक मानव अनाचरण से उत्पन्न सामाजिक कठिनाइयों व बुराइयों को पहचानकर उनका निराकरण भी प्रस्तुत करे, जिसका प्रमाण उनके द्वारा रचित कृति ‘ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद‘ के रूप में है |
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              डा श्यामगुप्त की साहित्यिक दृष्टि व काव्य-प्रयोजन मूलतः नवीनता के प्रति ललक एवं रूढ़िवादिता के विरोध की दृष्टि है| साहित्य के मूलगुण-भाव-प्रवणता, सामाजिक सरोकार, जन आचरण संवर्धन हेतु प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण व गति-प्रगति के वे पक्षधर हैं|
------ कविता के मूलगुण -गेयता, लयवद्धता, प्रवाह व गति एवं सहज सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ केवल छंदीय कविता, केवल सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता, अतिवादी रूढ़िवादिता व लीक पर ही चलने के वे हामी नहीं हैं|
-------अपने इसी गुण के कारण वे आज की नवीन व प्रगतिशील काव्य-विधा अगीत-कविता की और आकर्षित हुए एवं स्वयं एक समर्थ गीतकार व छंदीय कविता में पारंगत होते हुए भी तत्कालीन काव्यजगत के छंदीय कविता में रूढिगतिता के ठेके सजाये हुए स्वघोषित स्वपोषित संस्थाओं व उनके अधीक्षकों के अप्रगतिशील क्रियाकलापों एवं तमाम विरोधों के बावजूद अगीत-कविता विधा को प्रश्रय देते रहे एवं उसकी प्रगति हेतु विविध आवश्यक साहित्यिक कदम भी उठाये जो उनके विषद अगीत-साहित्य के कृतित्व के रूप में सम्मुख आया जिसके कारण आज अगीत कविता साहित्य की एक मुख्यधारा बनकर निखरी है |
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               डा.श्यामगुप्त नवीन प्रयोगों, स्थापनाओं को काव्य, साहित्य व समाज की प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं की साहित्य व काव्य के मूल उद्देश्यों से विरत कर दिया जाय, नवीनता के नाम पर मात्राओं, पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडम्बर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी देश, काल व तथ्यों को प्रश्रय दिया जाय, यथा वे कहते हैं कि..
‘साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

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                            इस प्रकार डा श्यामगुप्त के सम्पूर्ण काव्य पर अनुशीलक दृष्टि से बोध होता है कि आप एक प्रतिभा संपन्न श्रेष्ठ कवि एवं लेखक हैं | शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है | नए-नए छंदों की रचना तथा महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की एवं काव्य-शास्त्रीय लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर साहित्याचार्य की संज्ञा के भी योग्य सिद्ध होते हैं| वे सतत सृजनशील हैं और आशा है कि भविष्य में और भी कृतियों के प्रणयन से माँ भारती की भण्डार भरेंगे |

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--- साहित्यभूषण डा.रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’, डी.लिट्.
संस्थापक अध्यक्ष, अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त....

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दि.६-७-१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य , नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, अनिल किशोर शुक्ल ‘निडर’, श्री रामदेव लाल विभोर महामंत्री काव्य कला संगम , प्राची संस्था के अध्यक्ष डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, श्री बिनोद कुमार सिन्हा उपस्थित थे | विशेष अतिथि एवं श्रोता के रूप में रेलवे अस्पताल लखनऊ के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. पुरुषोत्तम सिंह एवं पूर्व रेडियो व टीवी सिंगर श्रीमती पुरुषोत्तम सिंह ने गोष्ठी को शोभायमान किया |
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श्री बिनोद सिन्हा द्वारा अपनी कृति –पांडुलिपि में गणेश वंदना पहले लिखे जाने पर चर्चा हुई | सिन्हा जी का कथन था कि उनके विचार से गणेश भगवान हैं अतः वन्दना पहले की जानी चाहिए | श्याम गुप्त का मत था की गणेश प्रथम पूज्य देव हैं परन्तु भगवान् नहीं हैं | इस प्रकरण में ब्रह्म, भगवान् व ईश्वर पर भी संक्षिप्त चर्चा हुई |
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डा.योगेश के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं, उनकी प्रथम पूजा विभिन्न धार्मिक आदि कार्यों में तो की ही जानी चाहिए परन्तु साहित्यिक कृतियों में वाग्देवी माँ सरस्वती की ही वन्दना पहले होनी चाहिए | डा श्याम गुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि दोनों की वंदना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ‘वन्दे वाणी विनायकौ’ कहा है |
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श्री अनिल किशोर निडर की जिज्ञासा पर डा श्यामगुप्त ने बताया की संयुक्ताक्षर से पूर्व आने वाले लघु अक्षर को मात्रा गणना हेतु दीर्घ माना जाता है |
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बिनोद सिन्हा जी का कथन था की कविता स्वयंभू उद्भूत होती है , यदि सप्रयास लिखा जाय तो ता वह बनावटी कविता ही होती है |
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डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित रचना ;ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद; एवं बिनोद कुमार सिन्हा की शीघ्र प्रकाश्य कृति ‘गीता सारांश, अगीत में’ के तादाम्य में गीता पर ईशोपनिषद का प्रभाव दोनों की विषय समनुरूपता पर डा श्यामगुप्त व सिन्हा जी में चर्चा हुई |
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सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि डा योगेश गुप्त ने अपनी कई दार्शनिक रचनायें प्रस्तुत की, अपने अपने नाम को ढूँढने में व्यस्त हम ---
हम सब मानते थे / हमारा नाम ही
पहचान है ,/ और विडम्बना यह थी कि,
हम स्वयं को भी / अपने नाम से ही पहचानते थे |
--------श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने वर्षा गीत इस प्रकार प्रस्तुत किया---
नभ पर काले बादल छाते,
कभी रंगीले बनकर आते
वसुधा को रसमय कर जाते |
------- श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने महाकवि विद्यापति की शब्दावली निहित तान में गिरधर गोपाल का वर्णन किया---
गले वैजन्ती कनक मोर मुकुट अति भावन
अंग गगन सम कान्ति श्यामल श्यामल
अलक भ्रमर सी तिलक कस्तूरी माल सुहावन,
झलक चन्द्र छवि श्यामल गिरिधर गोवर्धन |
------- डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत, श्रृंगार गीत एवं एक ग़ज़ल यूं पढी –
पुरस्कार की तो थी हमको भी चाहत बहुत
मगर कभी शर्त पूरी हम नहीं कर पाए |
--------श्री रामदेव लाल विभोर ने अपनी रचना प्रस्तुत की ----
मर्ज़ एस दावा बेअसर,
नब्ज़ बोले की मीठा ज़हर है |
------- डा सुरेश प्रकाश शुक्ल ने किसान से तादाम्य बिठाते हुए गाया –
किसना होईगे चतुर किसान / पैदा करत हैं गेहूं धान |
गन्ना आलू बोवें नकदी की आशा मा,
आल्हा बिरहा गावैं झूमें चौमासा मा |
------ श्रीमती सुषमा गुप्ता ने पावस गीत सुनाया ...
आई सावन की बहार
बदरिया घिर घिर आये
---------अगीताचार्य डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने कई रचनाये व गीत प्रस्तुत किये, एक मुक्तक देखिये ....
‘शील से बोझिल झुका हो वह नयन है,
हो न सीमा जिस पटल की वह गगन है |
रोकने पर भी न रुकता हो कभी जो ,
नित्य नूतन पंथ शोधे वह चरण है ||
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डा सत्य द्वारा दो शब्द बोलने के अनुरोध पर विशिष्ट अतिथि व श्रोता डा पी सिंह ने कहा आप लोग विज्ञजनों के सान्निध्य का अवसर मिला, काव्य रस का आनंद मिला | श्रीमती सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे आनंददायक क्षण बताया |
जलपान के उपरांत सुषमा गुप्ता जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |

शुक्रवार, 30 जून 2017

उपन्यास "कल्याणी माँ"

एक खुश खबर !
प्रिय मित्रो , आपको यह खुश खबर देते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि मेरा उपन्यास "कल्याणी माँ' प्रकाशित हो चुका है और amazon.in and flipkart.com में उपलब्ध है | इसका लिंक नीचे दे रहा हूँ | गाँव की एक गरीब स्त्री जिसने सदियों पुरानी परम्पराओं को तोड़कर नई राह बनाई ,और लोगो की प्रेरणा बन गई ,उसकी कहानी एकबार जरुर पढ़िए | मुझे विश्वास है कि कभी आप उसके साथ हँसेंगे तो कभी उसके साथ रोयेंगे |
http://www.bookstore.onlinegatha.com/boo…/…/Kalyani-Maa.html




कालीपद 'प्रसाद'

बुधवार, 21 जून 2017

मेरे मन की....




मेरी पहली पुस्तक "मेरे मन की" की प्रिंटींग का काम पूरा हो चुका है | और यह पुस्तक बुक स्टोर पर आ चुकी है| आप सब ऑनलाइन गाथा के द्वारा बुक कर सकते है| मेरी पहली बुक कविताओ और कहानीओ का अनुपम संकलन है|


आप सभी इसे ऑनलाइन गाथा (Online Gatha) के ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर भी ऑर्डर कर सकते है| इसे अभी ऑर्डर करने के लीये इस लींक पर जाएं| 

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शुक्रिया

रविवार, 21 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
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प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                   ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "

के तृतीय भाग ..”मा गृध कस्यविद्धनम." का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका –मा गृध =लालच मत कर/ अपहरण मत कर ...कस्यविद्धनम = किसी के भी धन एवं स्वत्व का /किसी के भी/ किसका हुआ है ..धनं = धन की /यह धन...|
\
मूलार्थ -किसी के भी धन व स्वत्व का अपहरण व लालच मत करो | यह धन किसी का नहीं हुआ है |
\\

किसी के धन की सम्पति श्री की,
इच्छा लालच हरण नहीं कर |
रमा चंचला कहाँ कब हुई ,
किसी एक की सोच अरे नर !

धन वैभव सुख सम्पति कारण,
ही तो द्वेष द्वंद्व होते हैं|
छीना-झपटी, लूट हरण से,
धन वैभव सुख कब बढ़ते हैं |

अनुचित कर्म से प्राप्त सभी धन,
जो कालाधन कहलाता है |
अशुभ अलक्ष्मी वास करे गृह,
मन में दैन्य भाव लाता है |

शुचि भावों कर्मों को प्राणी,
मन से फिर बिसराता जाता |
दुष्कर्मों में रत रहकर नित,
पाप-पंक में धंसता जाता |

यह शुभ ज्ञान जिसे हो जाता,
शुभ-शुचि कर्मों को अपनाता |
ज्ञानमार्ग युत जीवन-क्रम से,
मोक्ष मार्ग पर चलता जाता ||

-----क्रमश :----द्वतीय मन्त्र का काव्यभावानुवाद -----

शुक्रवार, 19 मई 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----


पुस्तक----ईशोपनिषद केप्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा.का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----

                             


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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......
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कुंजिका – तेन = उसी के /उसे...त्यक्तेन= उपयोगार्थ दिए हुए /त्याग के भाव से...भुंजीथा = भोगकर /भोगना चाहिए ...
\
मूलार्थ- उसके द्वारा उपयोगार्थ दिए हुए पदार्थों को ही भोगना चाहिए, उसे ईश्वर का दिया हुआ ही समझकर ( प्राकृतिक सहज रूप से प्राप्य)...अथवा उसे त्याग के रूप में, अनासक्त भाव से भोगना चाहिए |
\
सब कुछ ईश्वर की ही माया,
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |


पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||
--------क्रमश-आगे प्रथम मन्त्र के तृतीय भाग का काव्यभावानुवाद ----


सोमवार, 15 मई 2017

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त



ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र . के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद...... \---डा श्याम गुप्त

                                       

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त-----
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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                           ”तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
के प्रथम भाग..”ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
\
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
\
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|
\
1.
ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |
2.
ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |
3.
अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |
4.
तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |
5.
भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |
6.
अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||

-------क्रमश.........ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र .
के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद......