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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

पुस्तक चर्चा -----अगीत त्रयी--डा श्याम गुप्त---


               पुस्तक चर्चा -----अगीत त्रयी

                        


पुस्तक----अगीत त्रयी----अगीत-विधा के तीन स्तम्भ -----लेखक---डा श्याम गुप्त ...सम्पादक --डा रंगनाथ मिश्र सत्य....प्रकाशक --अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ 
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अगीत त्रयी का कथ्य 
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आज कविता की अगीत-विधा का संसार व्यापक हो चुका है तथा विश्व भर में फैले कवियों, अगीत रचनाओं, अगीत-काव्य व साहित्य के प्रति आलेखों, समीक्षाओं, काव्य-कृतियों, खंड-काव्यों, महाकाव्यों, पत्र-पत्रिकाओं एवं विविध आयोजनों के माध्यम से केवल भारत में ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित होकर दैदीप्यमान हो रहा है |
-------- बेंगलोर के तमिल-अंग्रेज़ी कवि डा नेव्युला बी राजन का अंग्रेज़ी ब्लेंक-वर्स में एक त्रिपदा-अगीत देखें ....
The world as it stands today
Is because of the dreamers
Their dreams never die. --
---Dreams never die.
…..जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है----
आज जो यह दुनिया जैसी दिखती है,
सपने देखने वालों के कारण है;
जिनके सपने कभी नहीं मरते |....( अनुवाद –डा श्याम गुप्त )
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अगीत-विधा की इस व्यापकता की उद्देश्य यात्रा में उसके स्तम्भ रूप तीन साहित्यकार, रचनाकार व कृतिकार हैं जो इस विधा के संस्थापक, गति प्रदायक एवं उन्नायक रहे हैं |
------- १९६६ई में अगीत-विधा के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’,
-------अगीत-विधा में सर्वप्रथम खंडकाव्य एवं महाकाव्य रचकर उसे गति देने वाले स्व.श्री जगत नारायण पाण्डे एवं
--------अगीत-विधा में प्रथमबार सृष्टि-रचना जैसे गूढ़तम दार्शनिक, वैज्ञानिक विषय पर हिन्दी में प्रथम महाकाव्य ‘सृष्टि-ईषत इच्छा या बिगबेंग-एक अनुत्तरित उत्तर‘ के रचयिता, अगीत-विधा के विविध छंदों के सृजक एवं अगीत-काव्य का सर्वप्रथम छंद-विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जैसी कृति रचकर विधा के उन्नायक डा श्याम गुप्त |
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अगीत-त्रयी के ये कवि समाज के भिन्न भिन्न क्षेत्रों व व्यवसाय एवं विचार-धारा से हैं एवं मूल में साहित्य के बाहर के क्षेत्र होते हुए भी साहित्य की शास्त्रीय छंदीय-विधा, तुकांत काव्य-विधा, गीति-विधा एवं कथा-समीक्षा-लेख आदि गद्य-काव्य में भी सफलतापूर्वक रचनारत हैं | वे पर्याप्त अनुभवी हैं, समाज में गहन रूचि रखते हुए प्रतीत होते हैं जिसके कारण वे साहित्यिक क्षेत्र में अवतरित हुए | वे अगीत के क्षेत्र में उस विधा की काव्य-जिजीविषा, काव्य-विकास एवं समकालीन काव्य की प्रगति की संभावना दृष्टिगत होने के कारण पदार्पित हुए |
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अगीत-त्रयी- ‘अगीत साहित्य दर्पण’ की भांति एक ऐतिहासिक दस्तावेज तो है ही, साठोत्तरी दशक की काव्य-प्रगति को समझने के लिए भी यह अनिवार्य है।
------ इस सदी के साठोत्तरी काल का कवि अपने समय से अग्रगामी काव्य-तत्व लिए हुए नवीन काव्य विधा ..अगीत...से किस ढंग से प्रभावित हुआ और आज वह विधा व कवि का कविता तत्व से सम्बन्ध किस प्रकार विभिन्न रूप भंगिमाएँ ग्रहण करता कहाँ पहुँचा है, यह इसके यथार्थबोध की कृति है |
------- कहना असंगत न होगा कि बीसवीं सदी के साठोत्तरी दशक एवं समकालीन काव्य-इतिहास में ‘अगीत काव्य-विधा’ ने जो स्थान पाया और जिस अर्थ और भाव में उसका प्रभाव परवर्ती काव्य-विकास में व्याप्त है एवं व्याप्त होता जा रहा है उसके व्यक्त-अव्यक्त प्रभाव को प्रस्तुत प्रकाशन रेखांकित करता है |
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कम ही होती हैं काव्य-कृतियाँ जो स्वयं इतिहास का एक अंग बन जाएँ और आगे के लिए दिशा-दृष्टि दे सकें| कहा जा सकता है कि प्रस्तुत काव्य-संकलन, हिन्दी काव्य का दिशाबोधक है और आज के सन्दर्भ में आधुनिक हिन्दी काव्य के इतिहास में अगीत कविता विधा के छंद-विधान “अगीत साहित्य दर्पण” की भांति एक और मील का पत्थर है, एक और प्रगतिशील आलोक शिखा समान है |
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प्रस्तुत कृति “अगीत-त्रयी” अगीत के इन तीन स्तंभों के परिचय, साहित्य सेवा एवं उनके ३०-३० श्रेष्ठ अगीतों के संकलन के साथ हिन्दी काव्य जगत में प्रस्तुत की जा रही है, इस दृष्टि व आत्मविश्वास के साथ कि यह कृति अगीत-विधा को नए नए आयाम प्रदान करने के साथ नए नए कवियों, साहित्यकारों को अगीतों की रचना हेतु प्रोत्साहित करेगी एवं अगीत कविता विधा और समृद्धि शिखर की और अग्रसर होती रहेगी |
-- डा श्याम गुप्त

               

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

कश्मीर समस्या का अंतिम हल --डा श्याम गुप्त .


कश्मीर समस्या का अंतिम हल --डा श्याम गुप्त

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देशद्रोह  विश्व में व इस देश में सदैव ही हावी रहाहै | देश के अन्दर छुपे देश द्रोहियों की सूचनाओं के बिना कुछ भी नहीं होसकता |
---पाकिस्तान तो दुश्मन देश है परन्तु अपने देश के अन्दर के देशद्रोहियों से सख्ती से निपटना चाहिए |
----सभी देश विरोधियों एवं देश द्रोहियों को कश्मीर व भारत से बाहर कर देना या मौत के घाट उतार देना ही आतंकवाद एवं कश्मीर समस्या का अंतिम हल है |

----लोहा गर्म है-----धारा ३७० हटाने का उचित समय व अच्छा मौक़ा है ---मत चूको चौहान --

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019





“मानवतावाद का अक्लांत योद्धा"

यह पुस्तक उन सब के लिए अत्यंत पठनीय हैं जो सामाजिक उत्पीड़न, शोषण एवं वंचन के खिलाफ है | उनके लिए भी पठनीय है जो इनके पक्षधर हैं, यह देखने के लिए कि समाज में अब उनकी स्थिति क्या है | 
इस किताब से आपको क्या जानकारी मिलेगी ?
1. कांग्रेस और गांधी जी डॉ आंबेडकर को पसंद नहीं करते थे और न डॉक्टर आंबेडकर कांग्रेस के सदस्य थे, फिर भी डॉक्टर आंबेडकर को संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष क्यों बनाया गया ?
2. द्वितीय गोलमेज बैठक में 123 भारतीय नेताओं के नेता मोहनदास करमचंद गांधी की बात को ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर मैकडॉनल्ड ने क्यों ठुकरा दी और डॉ आंबेडकर की सारी बातें क्यों स्वीकार कर ली ?
३ . अ )शुरुआत में डॉ आंबेडकर ने जनसंख्या अनुपात में संसद और विधानसभा में शूद्रों के लिए आरक्षण मांगा था, साथ में अलग निर्वाचन (Separate Electorate ) व्यवस्था चाहते थे | उन्होंने नौकरी में आरक्षण की मांग नहीं की, फिर--..
ब ) जॉब रिजर्वेशन किस का फार्मूला था जिसे डॉ अंबेडकर स्वीकार करने के लिए वाध्य हो गए ? क्या यह कांग्रेस का था या गांधी जी का था? और क्यों ? 
स) एरोड़ा जेल में गांधीजी आमरण अनशन किस मांग को लेकर किया ?
४ ) डॉक्टर आंबेडकर को कांग्रेस कांस्टिट्यूशन असेंबली में चुनकर आने देना नहीं चाहते थे |उन्हें कांग्रेस पसंद नहीं करते थे,इसलिए उनकी कोई भी सलाह संविधान में शामिल नहीं करना चाहते थे | पूरे भारत में उनके विरुद्ध नाकाबंदी की गई ताकि वह कंस्टीटूशन असेंबली में चुनकर ना आ सके | लेकिन वह बंगाल से चुनकर आ गए | परंतु उसके बाद ऐसा क्या हो गया कि द्वितीय बार कंस्टीटूशन असेंबली के चुनाव में कांग्रेस के डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कांग्रेस के प्रतिनिधि को छोड़ कर डॉक्टर आंबेडकर का पुरजोर समर्थन किया और मुंबई प्रोविंस के प्रधानमंत्री मिस्टर खेर को पत्र लिखकर डॉक्टर अंबेडकर का चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निवेदन किया | क्यों ?????????
५. हिंदू कोड बिल की अधिकांश बातें अब हिंदू समाज मानने लगे हैं फिर उस समय विरोध क्यों हुआ ?
६. संविधान के मूल स्वरूप में राजनैतिक ,सामाजिक और आर्थिक आजादी थी, पहले को संविधान में स्वीकार किया गया , बाकी दोनों को क्यों नहीं स्वीकार किया गया ?
इतिहास की इस सच्चाई को नई पीढ़ी को जानना जरूरी है क्योकि उन्हीं को आरक्षण के विरुद्ध आंदोलन करने के लिए पीछे से प्रोत्साहित किया जाता है उन्हें तत्वों को तोड़ मोड़ कर पेश किया जाता है, और नई पीढ़ी सचाई से अनभिज्ञ होकर आंदोलन के माध्यम से सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है | 
यह पुस्तक क्रॉसवर्ड (CROSSWORD)मेगा स्टोर पुणे, नोएडा और राजस्थान के कुछ शहरों में उपलब्ध है|
कीमत-- केवल ₹ 250/- 
प्रकाशक और लेखक से सीधे प्राप्त करने पर 40% डिस्काउंट और मुफ्त डाक खर्च का लाभ ले सकते हैं | 
कांटेक्ट नंबर 965 792 7931.. और 942 324 5086

कालीपद 'प्रसाद'

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

पुस्तक चर्चा--इन्द्रधनुष ----स्त्री-पुरुष विमर्श पर उपन्यास--डा श्याम गुप्त


पुस्तक चर्चा-----

इन्द्रधनुष ----स्त्री-पुरुष विमर्श पर उपन्यास --- 

-----लेखक --डा श्याम गुप्त ----
------समीक्षक -डा वी वे ललिताम्बा, प्राचार्य  व विभागाध्यक्ष ,हिन्दी विभाग , मैसूर विश्व विद्यालय ---
----प्रकाशक --सुषमा प्रकाशन , आशियाना, लखनऊ 














डा ललिताम्बा 




रविवार, 13 जनवरी 2019

शीत ऋतु-----डा श्याम गुप्त





-------हेमन्त ऋतु की आहट हो चली  है , रात्रि- समारोहों आदि में ठिठुरन से बचने के लिए  अलाव जलाए जाने  का क्रम प्रारम्भ हो चला है | प्रस्तुत है एक ठिठुरती हुई रचना .....
                         १.
(
श्याम घनाक्षरी --३० वर्ण , १६-१४, अंत दो गुरु -यगण)
 
थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि ,
उर मांहि उमंगायेपीर  वो  पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नरधूप बैठे  तापि रहे ,
धूप भी है कुछ, खोई सोई अलसानी |
शीत की लहर, तीर भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की, वो लहर अजानी ||

                        
     २.
( श्याम घनाक्षरी -३० वर्ण ,१६-१४, अंत दो गुरु - मगण)
 
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग- विरंगी ओढे, धरती रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम ,मेहंदी रंग,
घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं लता, चहुँ और मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||

                          
   ३.
( मनहरण घनाक्षरी -३१ वर्ण ,१६-१५,अंत लघु-गुरु -रगण )
 
ठंडी ठंडी भूमि नंगे पाँव लगे हिमशिला ,
जल छुए लगे छुआ बिजली का तार है |
कठिन नहाना नल लगे जैसे सांप कोई,
काँप रहा तन चढ़ा जूडी का बुखार है |
शीत में तुषार से है मंद रवि प्रभा हुई,
पत्तियों पै बहे ओस जैसे अश्रु धार है |
घर बाग़ वन जला आग बैठे लोग जैसे,
ऋषि मुनि करें यज्ञ विविधि प्रकार हैं ||