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सोमवार, 6 मार्च 2017

पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी .डा श्याम गुप्त .....

पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी .डा श्याम गुप्त .....

                 





पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी ...
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                       आधुनिक विज्ञान, दर्शन, अद्यात्म व अनुभव किसी समारोह हेतु सभा-स्थल पर एकत्र हुए तो परिचय प्रारम्भ हुआ |

               युवा ऊर्जा एवं ज्ञान से दीप्त विज्ञान ने बताया- मैं विज्ञान हूँ, प्रत्येक वस्तु व तथ्य के बारे में प्रयोगों पर विश्वास रखता हूँ, विस्तृत प्रयोगों के पश्चात ही प्रतिशत प्रतिफल के आधार पर निश्चित परिणाम के ज्ञान के पश्चात् ही सिद्धांत बनाता हूँ... मानव के उन्नत व प्रगति के कृतित्व हेतु |
             ललाट पर दीर्घ कालीन व्यवहारिक ज्ञान से अनुप्राणित अनुभव ने कहा- मैं तो जीवन के लम्बे अनुभव के बाद नियम बनाता हूँ तत्पश्चात सिद्धांत एवं प्राणी को ज्ञान प्रदान कर उन पर चलने की प्रेरणा देता हूँ |
            सुदर्शन व्यक्तित्व एवं शास्त्रीय ज्ञान से तेजस्वित दर्शन बोला- मैं तर्क व अनुभवों को शास्त्रीय तथ्यों की तुला पर तौल कर प्राणी को परमार्थ हित व सत्य के दर्शन कराता हूँ ताकि वह उच्च नैतिक आचरण एवं सत्य पर चले |
            धीर-गंभीर वाणी में अद्यात्म ने कहा – मैं परहित व परमार्थ कर्म को ईश्वर प्रेरणा व ईश्वर- प्रणनिधान द्वारा जीव को सत्य व कल्याण पर चलने को प्रेरित करता हूँ |
            वे वाद-विवाद व तर्क-वितर्क द्वारा स्वयं को अन्य से श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे थे कि लगे कि एक सुन्दर एवं तेजस्वी युगल ने प्रवेश किया |

           अपना परिचय दें श्रीमान, सभी ने कहा |

           मैं कला हूँ – प्रत्येक वस्तु, तथ्य व कृतित्व को समुचित रूप से कैसे किया जाय इसका ज्ञान कराती हूँ ताकि वह सुन्दरतम हो | मैं ही श्रेष्ठ हूँ |

          मैं ज्ञान हूँ उसका साथी कहने लगा – और मैं ही तो आप सब में अनुप्राणित हूँ, यदि मैं ही न रहूँ तो विज्ञान, अनुभव, अद्यात्म, दर्शन, कला..... सत्य का ज्ञान कैसे कर पायेंगे एवं अपने को कैसे व्यक्त करेंगे | मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ |

           वे आपस में पुनः तर्क-वितर्क में उलझ गए | तभी कर्मठता से हृष्ट-पुष्ट काया वाले एक अन्य व्यक्ति ने प्रवेश किया एवं झगड़े का कारण जानकर हँसते हुए, बोला –
‘मैं ही आप सबको, संसार को व प्राणी को कृतित्व में प्रवृत्त करता हूँ मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ |’

 सबने साश्चर्य पूछा, आप कौन है श्रेष्ठ्वर?

‘मैं कर्म हूँ |’

         तभी सौम्य वेशधारी, ललाट पर चन्दन-लेप की शीतलता धारण किये हुए धर्म अवतरित हुआ और कर्म को लक्ष्य करके कहने लगा, ‘ परन्तु मित्र, तुम भी मेरे आधार पर चले बिना प्राणी को परमार्थ भाव पर उन्मुख नहीं कर सकते| अतः मैं श्रेष्ठतम हूँ |

           एक ओर चुपचाप बैठे ‘प्राण’ ने वाद-विवाद में भाग लेते हुए कहा, मैं ही महानतम हूँ, जिस जीव के हेतु आप हैं, मैं ही तो उसमें समाहित रहता हूँ, तभी वह जीव अनुप्राणित होता है ...जीव कहलाता है |

          उसी समय प्रतिभा से जगमगाते हुए आनन से महिमा मंडित एक अति तेजस्वी व्यक्तित्व ने प्रवेश किया, जिसके साथ-साथ ही एक छाया पुरुष भी चल रहा था | दोनों ही अश्विनी बन्धुओं की भाँति एक ही रूप थे ...रूप, रंग, आकार व तेज में एक समान थे |
         एक कहने लगा,’ आप सब महान हैं परन्तु आप सबका अपना स्वयं का अस्तित्व ही क्या है अतः झगडे का कोई आधार ही नहीं |

          ‘ इसका क्या अर्थ ?’ सभी ने एक साथ पूछा |

          ‘मैं ही आप सबमें समाहित होकर एवं स्वयं में आप सबको समाहित करके सृष्टि के प्रत्येक कृतित्व में प्रवृत्त होता हूँ तभी विश्व एवं विश्व का प्रत्येक कृतित्व आकार लेता है एवं सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है |’

सुन्दरम..सुन्दरं.... आप कौन हैं श्रेष्ठ्वर, सभी एक साथ कहने लगे |

मैं पुरुषार्थ, अपने साथी की आत्मा हूँ न...यह मानव है यह मेरा शरीर है |

----------साधुवाद...साधुवाद....श्रेष्ठ है ..सत्य है ...यह कहते हुए वे सब उनमें प्रविष्ट होगये |

रविवार, 5 मार्च 2017

सुधीर मौर्य के वैदिककालीन उपन्यास 'पहला शूद्र' पे श्री गंगाशरण जी की समीक्षा।

पुस्तक - पहला शूद्र (वैदिककालीन उपन्यास) 
लेखक - सुधीर मौर्य 
प्रकाशक - रीड पब्लिकेशन 
पृष्ठ - १५२ पेपरबैक 
ISBN-13: 978-8190866446
समीक्षक - गंगाशरण सिंह 
Sudheer Maurya जी जी ऐसे लेखक मित्र हैं जो अमूमन न मुझे पढ़ते हैं न मैं उन्हें :)कहा जा सकता है कि हमारी मित्रता के बीच हमारा लिखना पढ़ना आड़े नही आता  सुधीर जी लोकप्रिय लेखकों की उस नयी जमात से हैं जिनका अपना एक बड़ा पाठक वर्ग है और उनके मध्य अपने सरस ( ये दूसरा वाला सरस है....रस वाला) लेखन के चलते वो काफी मक़बूल हैं।
पिछले दिनों पहली बार उनकी जो किताब मैंने पूरा पढ़ा वो है ---- " पहला शूद्र " और इस उपन्यास ने मुझे उनसे ये कहने को बाध्य किया कि वो इस तरह का गंभीर लेखन भी किया करें ताकि मेरे जैसे तथाकथित गंभीर पाठक भी उन्हें पढ़ सकें.:)

पहला शूद्र पौराणिक युग की कथा है, जिसके नायक हैं उस युग के महान वीर दिवोदास के पुत्र सुदास। अपने नाम के "सु" को सार्थक करते हुए एक ऐसे महानायक जिन्होंने अप्रतिम साहस और वीरता का परिचय देते हुए अपने समय में अजेय योद्धा की ख्याति अर्जित की।
पुराण काल जहाँ शौर्य और वीरता के अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है वहीँ दूसरी तरफ़ शासक और पुरोहित वर्ग के षड्यंत्रों के किस्से भी कम नही हैं। स्वयं के प्रभुत्व को स्थापित करने और पूज्य होने की लालसा में उस समय के पुरोहित गणों ने ऐसे ऐसे राजनीतिक षडयंत्रों को जन्म दिया जिसने तत्कालीन समाज को लम्बे लम्बे युद्धों में उलझाये रखा और अपार जन धन की हानि हुई।
दिवोदास, इंद्र, वशिष्ठ, अहिल्या, विश्वामित्र, अगस्त्य, और अन्य बहुत से छोटे बड़े पात्र मिलकर इस रचना की कथाभूमि को प्रशस्त करते हैं। कहानी के तथ्यों पर कोई टिप्पड़ी करना उचित इसलिए नही है क्योंकि उन रचनाओं से अब तक नही गुजरा हूँ जिन्हें पढ़कर सुधीर जी के मन में इस उपन्यास के बीज अंकुरित हुए। कहानी के विस्तार और प्रस्तुति में गजब का तालमेल है और इसीलिए रोचकता कहीं पर बाधित नही होती। प्रूफ़ की कुछ ग़लतियाँ हैं जो अगले संस्करण में सुधार ली जायेंगी ऐसी उम्मीद है। अपने सरस वाले स्वाभाव के अनुसार लेखक यहाँ भी चूकते नही बल्कि जहाँ भी ज़रा सा अवसर मिला रस भरपूर फैलाया है.:)
सुधीर जी, आपका प्रयास और विशेष कर कथानक के अनुरूप आपकी भाषा की प्रौढ़ता सराहनीय लगी। आशा करता हूँ कि आने वाली रचनाओं में छोटी मोटी खामियों को दुरुस्त करेंगे और आपका लेखन निरंतर प्रौढ़ हो, ये सस्नेह शुभकामना है।
--गंगा शरण सिंह

जनकवि कोदूराम "दलित" : १०७ वीं जयन्ती पर विशेष


जनकवि कोदूराम “दलित” की साहित्य साधना :
( 5 मार्च को 107 वीं जयन्ती पर विशेष)

मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बड़े बड़े  तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों को हिन्दुस्तान छोड़ कर भागना पड़ता है । मनुष्य की सबसे बड़ी पूञ्जी है उसकी आज़ादी, जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छत्तीसगढ़ स्थिर कैसे रहता ? छत्तीसगढ़ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छत्तीसगढ़ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र – मुग्ध हो गई  -

" अपन - देश आज़ाद  करे -  बर, चलो  जेल - सँगवारी
 कतको झिन मन चल देइन, आइस अब - हम रो- बारी।
जिहाँ लिहिस अवतार कृष्ण हर,भगत मनन ला तारिस
दुष्ट- जनन ला मारिस अउ,   भुइयाँ के भार - उतारिस।
उही  किसम जुर - मिल के हम, गोरा - मन ला खेदारी
अपन - देश आज़ाद  करे  बर चलो - जेल - सँगवारी।"

15 अगस्त सन् 1947 को हमें आज़ादी मिल गई, तो गाँधी जी की अगुवाई में दलित जी ने जन - जागरण को संदेश दिया –

" झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग
सत अउर अहिंसा सफल रहिस, हिंसा के मुँह मा लगिस आग ।
जुट - मातृ - भूमि के सेवा मा, खा - चटनी बासी - बरी - साग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग, अब तोर देश के खुलिस भाग ।
उज्जर हे तोर- भविष्य - मीत,फटकार - ददरिया सुवा - राग
झन सुत सँगवारी जाग - जाग अब तोर देश के खुलिस भाग ।"



हमारे देश की पूँजी को लूट कर, लुटेरे फिरंगी ले गए, अब देश को सबल बनाना ज़रूरी था, तब दलित ने जन -जन से, देश की रक्षा के लिए, धन इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया –

कवित्त –

" देने का समय आया, देओ दिल खोल कर, बंधुओं बनो उदार बदला ज़माना है
देने में ही भला है हमारा औ’ तुम्हारा अब, नहीं देना याने नई आफत बुलाना है।
देश की सुरक्षा हेतु स्वर्ण दे के आज हमें, नए- नए कई अस्त्र- शस्त्र मँगवाना है
समय को परखो औ’ बनो भामाशाह अब, दाम नहीं अरे सिर्फ़ नाम रह जाना है।"

छत्तीसगढ़ के ठेठ देहाती कवि कोदूराम दलित ने विविध छंदों में छत्तीसगढ़ की महिमा गाई है। भाव - भाषा और छंद का सामञ्जस्य देखिए –

चौपाई छंद

"बन्दौं छत्तीसगढ़ शुचिधामा, परम - मनोहर सुखद ललामा
जहाँ सिहावादिक गिरिमाला, महानदी जहँ बहति विशाला।
जहँ तीरथ राजिम अति पावन, शबरीनारायण मन भावन
अति - उर्वरा - भूमि जहँ केरी, लौहादिक जहँ खान घनेरी ।"

कुण्डलिया छन्द -

" छत्तीसगढ़ पैदा - करय अड़बड़ चाँउर - दार
हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अऊ उदार ।
सिधवा अऊ उदार हवयँ दिन रात कमावयँ
दे - दूसर ला मान, अपन मन बासी खावयँ ।
ठगथें ए बपुरा- मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हावय अतेक इही कारण छत्तीसगढ़ ।"


सार  छंद -
" छन्नर छन्नर चूरी बाजय खन्नर खन्नर पइरी
हाँसत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलहिन टूरी ।
काट काट के धान - मढ़ावय ओरी - ओरी करपा
देखब मा बड़ निक लागय सुंदर चरपा के चरपा ।
लकर धकर बपरी लइकोरी समधिन के घर जावै
चुकुर - चुकुर नान्हें बाबू ला दुदू पिया के आवय।
दीदी - लूवय धान खबा-खब भाँटो बाँधय - भारा
अउहाँ झउहाँ बोहि - बोहि के भौजी लेगय ब्यारा।"

खेती का काम बहुत श्रम - साध्य होता है, किंतु दलित जी की कलम का क़माल है कि वे इस दृश्य का वर्णन, त्यौहार की तरह कर रहे हैं। इन आठ पंक्तियों से सुसज्जित सार छंद में बारह दृश्य हैं, मुझे ऐसा लगता है कि दलित जी की क़लम में एक तरफ निब है और दूसरी ओर तूलिका है, तभी तो उनकी क़लम से लगातार शब्द - चित्र बनते रहते है और पाठक भाव - विभोर हो जाता है, मुग्ध हो जाता है ।

निराला की तरह दलित भी प्रगतिवादी कवि हैं । वे समाज की विषमता को देखकर हैरान हैं, परेशान हैं और सोच रहें हैं कि हम सब, एक दूसरे के सुख - दुःख को बाँट लें तो विषमता मिट जाए –

मानव की

" जल पवन अगिन जल के समान यह धरती है सब मानव की
हैं  किन्तु कई - धरनी - विहींन यह करनी है सब - मानव की ।
कर - सफल - यज्ञ  भू - दान विषमता हरनी है सब मानव की
अविलम्ब - आपदायें - निश्चित ही हरनी - है सब- मानव की ।"

श्रम का सूरज (कवित्त)

" जाग रे भगीरथ - किसान धरती के लाल, आज तुझे ऋण मातृभूमि का चुकाना है
आराम - हराम वाले मंत्र को न भूल तुझे, आज़ादी की - गंगा घर - घर पहुँचाना है ।
सहकारिता से काम करने का वक्त आया, क़दम - मिला के अब चलना - चलाना है
मिल - जुल कर उत्पादन बढ़ाना है औ’, एक - एक दाना बाँट - बाँट - कर खाना है ।"

सवैया -

" भूखों - मरै उत्पन्न करै जो अनाज पसीना - बहा करके
बे - घर हैं  महलों को बनावैं जो धूप में लोहू - सुखा करके ।
पा रहे कष्ट स्वराज - लिया जिनने तकलीफ उठा - करके
हैं कुछ चराट चलाक उड़ा रहे मौज स्वराज्य को पा करके ।"

गरीबी की आँच को क़रीब से अनुभव करने वाला एक सहृदय कवि ही इस तरह, गरीबी को अपने साथ रखने की बात कर रहा है । आशय यह है कि - " गरीबी ! तुम यहाँ से नहीं जाओगी, जो हमारा शोषण कर रहे हैं, वे तुम्हें यहाँ से जाने नहीं देंगे और जो भूखे हैं वे भूखे ही रहेंगे ।" जब कवि समझ जाता है कि हालात् सुधर नहीं सकते तो कवि चुप हो जाता है और उसकी क़लम उसके मन की बात को चिल्ला - चिल्ला कर कहती है -

 गरीबी 

" सारे गरीब नंगे - रह कर दुख पाते हों तो पाने दे
दाने दाने के लिए तरस मर जाते हों मर जाने दे ।
यदि मरे - जिए कोई तो इसमें तेरी गलती - क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा ।"

कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि गाय जो हमारे जीवन की सेतु है, जो ' अवध्या' है, उसी की हत्या होगी और सम्पूर्ण गो - वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा । दलित जी ने गो - माता की महिमा गाई है । बैलों की वज़ह से हमें अन्न - धान मिल जाता है और गो -रस की मिठास तो अमृत -तुल्य होती है। दलित जी ने समाज को यह बात बताई है कि-"गो-वर को केवल खाद ही बनाओ,उसे छेना बना कर अप-व्यय मत करो" -

 गो - वध बंद करो

" गो - वध बंद करो जल्दी अब, गो - वध बंद करो
भाई इस - स्वतंत्र - भारत में, गो - वध बंद करो ।
महा - पुरुष उस बाल कृष्ण का याद करो तुम गोचारण
नाम पड़ा गोपाल कृष्ण का याद करो तुम किस कारण ?
माखन- चोर उसे कहते हो याद करो तुम किस कारण
जग सिरमौर उसे कहते हो, याद करो तुम किस कारण ?
मान रहे हो देव - तुल्य उससे तो तनिक-- डरो ॥

समझाया ऋषि - दयानंद ने, गो - वध भारी पातक है
समझाया बापू ने गो - वध राम राज्य का घातक है ।
सब  - जीवों को स्वतंत्रता से जीने - का पूरा - हक़ है
नर पिशाच अब उनकी निर्मम हत्या करते नाहक हैं।
सत्य अहिंसा का अब तो जन - जन में भाव - भरो ॥

जिस - माता के बैलों- द्वारा अन्न - वस्त्र तुम पाते हो
जिसके दही- दूध मक्खन से बलशाली बन जाते हो ।
जिसके बल पर रंगरलियाँ करते हो मौज - उड़ाते हो
अरे उसी - माता के गर्दन- पर तुम छुरी - चलाते हो।
गो - हत्यारों चुल्लू - भर - पानी में  डूब - मरो
गो -रक्षा गो - सेवा कर भारत का कष्ट - हरो ॥"

शिक्षक की नज़र पैनी होती है । वह समाज के हर वर्ग के लिए सञ्जीवनी दे - कर जाता है । दलित जी ने बाल - साहित्य की रचना की है, बच्चे ही तो भारत के भविष्य हैं -

वीर बालक

"उठ जाग हिन्द के बाल - वीर तेरा भविष्य उज्ज्वल है रे ।
मत हो अधीर बन कर्मवीर उठ जाग हिन्द के बाल - वीर।"

अच्छा बालक पढ़ - लिख कर बन जाता है विद्वान
अच्छा बालक सदा - बड़ों का करता  है सम्मान ।
अच्छा बालक रोज़ - अखाड़ा जा - कर बनता शेर
अच्छा बालक मचने - देता कभी नहीं - अन्धेर ।
अच्छा बालक ही बनता है राम लखन या श्याम
अच्छा बालक रख जाता है अमर विश्व में नाम ।"

अब मैं अपनी रचना की इति की ओर जा रही हूँ, पर दलित जी की रचनायें मुझे नेति - नेति कहकर रोक रही हैं । दलित जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । समरस साहित्यकार, प्रखर पत्रकार, सजग प्रहरी, विवेकी वक्ता, गंभीर गुरु, वरेण्य विज्ञानी, चतुर चित्रकार और कुशल किसान ये सभी उनके व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, जिसे काल का प्रवाह कभी धूमिल नहीं कर सकता ।

हरि ठाकुर जी के शब्दों में -
" दलित जी ने सन् -1926 से लिखना आरम्भ किया उन्होंने लगभग 800 कवितायें लिखीं,जिनमें कुछ कवितायें तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का  प्रसारण आकाशवाणी से हुआ । आज छत्तीसगढ़ी में लिखने वाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी सामने आ चुकी है किंतु इस वट - वृक्ष को अपने लहू - पसीने से सींचने वाले, खाद बन कर, उनकी जड़ों में मिल जाने वाले साहित्यकारों को हम न भूलें।"

साहित्य का सृजन, उस परम की प्राप्ति के पूर्व का सोपान है । जब वह अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है तो अपना परिचय कुछ इस तरह देता है, और यहीं पर उसकी साधना सम्पन्न होती है -

आत्म परिचय

" मुझमें - तुझमें सब ही में रमा वह राम हूँ- मैं जगदात्मा हूँ
सबको उपजाता हूँ पालता- हूँ करता सबका फिर खात्मा हूँ।
कोई मुझको दलित भले ही कहे पर वास्तव में परमात्मा हूँ
तुम ढूँढो मुझे मन मंदिर में मैं मिलूँगा तुम्हारी ही आत्मा हूँ।"

शकुन्तला शर्मा, भिलाई                                                    
मो. 
93028 30030                                                           

शनिवार, 4 मार्च 2017

साहित्यकार सम्मलेन----दि-१-३-२०१७..डा श्याम गुप्त...

४६ वें साहित्यकार दिवस, का आयोजन----- डा श्याम गुप्त

४६ वें साहित्यकार दिवस, का आयोजन-----
-----डा रंगनाथ मिश्र सत्य के जन्म की ७६वीं वर्षगाँठ एवं ४६ वें साहित्यकार दिवस, १ मार्च, २०१७ --सिटी कोंवेंट स्कूल राजाजीपुरम के हाल में डा रसाल स्मृति संस्थान एवं अ.भा. अगीत परिषद् द्वारा आयोजित किया गया, इस अवसर पर देश के साहित्यकारों का सम्मान किया गया एवं पुस्तकों का लोकार्पण भी संपन्न हुआ |
आयोजन के अध्यक्ष पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री महेशचंद्र द्विवेदी , मुख्य अतिथि प्रोफ मोह. मुजम्मिल उपकुलपति आगरा वि.विद्यालय , विशिष्ट अतिथि डा उषा सिन्हा पूर्व भाषाविद हिन्दी विभाग , ल.वि वि तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य डा सुल्तान शाकिर हाशमी एवं श्री रामचंद्र शुक्ल पूर्व जज थे | संचालन नव सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त ने किया , वाणी वन्दना श्री वाहिद अली वाहिद एवं कुमार तरल द्वारा की गयी |
दूसरे सत्र में कवि सम्मलेन का आयोजन भी हुआ |

१.श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा डा उषा सिन्हा को माल्यार्पण
२.डा सत्य को साहित्य मार्तंड सम्मान
३.डा श्याम गुप्त को डा रसाल स्मृति पुरस्कार
4. मुरली मनोहर कपूर की कृति मेरी रुबाइयां का लोकार्पण
५..नव सृजन संस्थाके महामंत्री श्री देवेश द्विवेदी देवेश को श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता सम्मान -२०१७ से सम्मानित करते हुए डा श्याम गुप्त व सुषमा गुप्ता
६. सम्मानित साहित्यकार
७..श्रीमती सुषमा गुप्ता को सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान
८.डॉ योगेश गुप्त को रवीन्द्र शुक्ल सम्मान
९. नवोदित कवयित्री प्रेरणा श्रीवास्तव की कृति-मेरी प्रिय कवितायें- का लोकार्पण

गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त


गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त

                 


गुरुवासरीय गोष्ठी दि.२-३-१७ गुरूवार 

             प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर सायं ३ बजे से ६ बजे शाम को आयोजित हुई |

                   गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर , श्रे बिनोद कुमार सिन्हा व सुषमा गुप्ता श्री मनीष श्रीवास्तव, पूजा गुप्ता ने भाग लिया | गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त की वाणी वन्दना---

माँ हमारी चेतना में नवल सुर लय धुन सजादो ,
भाव की ऊंची शिखाएं, मन ह्रदय में जगामगा दो |.....से प्रारंभ हुआ| श्रीमती सुषमा गुप्ता , अनिल किशोर निडर एवं बिनोद कुमार सिन्हा ने भी वाणी वन्दना की ----

                       चर्चा सत्र में काव्य गोष्ठी के आकार –प्रकार पर संक्षिप्त चर्चा में डा श्याम गुप्त व अनिल किशोर जी का कथन था कि गोष्ठी का आकार अधिक बड़ा नही होना चाहिये अन्यथा उसमें काव्य चर्चा व गुणदोष विवेचन जैसा महत्त्व का विषय नहीं हो पाता, बस कविता पढ़ने के कर्म की इतिश्री ही हो पाती है |
श्री बिनोद कुमार सिन्हा की सद्य –प्रकाशित काव्य संग्रह ‘इन्द्रधनुष-एक प्रयास’ की रचनाओं एवं साहित्यकारों के दायित्व पर संक्षिप्त चर्चा की गयी तथा इस कृति के लोकार्पण की भूमि-रेखा पर विचार किया गया |


        श्री बिनोद कुमार सिन्हा को सम्मान -पत्र, प्रतीक चिन्ह व व पुष्प गुच्छ देकर श्री कुमार विजय सम्मान प्रदान किया गया |

कविता सत्र में ----- श्री अनिल किशोर निडर ने प्रस्तुत किया—

हैं धन्य धन्य भारतवासी, है यहाँ बनी नगरी काशी |
काशी में मिलता परम धाम,भोले का मंदिर है ललाम ||

            श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने दर्द और बेदर्द का समायोजन करते हुए गीताज्ञान, गोविन्द और दर्द का रिश्ता गुनगुनाया ---
लोग कहते मुझे बेदर्द हूँ,/ केवल दर्द हूँ बेदर्द नहीं ;
दो दिलों को मिलाता, / हमदर्द हूँ, दिले दर्द नहीं |
दर पर मेरे जो आता / याद करता गोविन्द को ;
होता ज्ञान सहज में /दुख भोगता शरीर, आत्मा नहीं |
देता हूँ ज्ञान गीता, दर्द नहीं / बिनोद कहते दर्द हूँ बेदर्द नहीं ||

          डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राम-गिलहरी, रत्ना-तुलसी, राधा-कृष्ण के प्रेम को रंजित करते हुए सुनाया—
दुष्टों के दलन हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे, श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |

             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने ---कहा---
मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं
मन का दर्पण है ये , मुस्कुराते रहो |..
.तथा—
होली खेली लाल ने, उड़े अबीर गुलाल,
सुर मुनि ब्रहमा विष्णु सब, तीनों लोक निहाल |

                डा श्याम गुप्त ने ---सुनाया ---
हे मन लेचल सत की ओर,
लोभ मोह लालच न जहां हो, लिपट सके ना माया |
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर, प्रेम की शीतल छाया || ...

तथा होली के प्रसंग में—

एरी सखी जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ
श्याम रंग न्यारो चढ़े , सांवरो नियारो है |


                          गोष्ठी के अंत में गुरुवारीय गोष्ठी के सदस्य वयोवृद्ध वरिष्ठ कवि स्व.श्री कौशल किशोर श्रीवास्तव को स्मरण किया गया | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने स्मरण सुनते हुए बताया के श्री कौशल जी चुपचाप मुस्कुराया करते थे तथा कभी कभी किसी विशेष बात पर अड़ भी जाया करते थे| डा श्यामगुप्त ने बताया कि वे अत्यंत स्वाभिमानी एवं परम शिव भक्त थे और गोष्ठी में सदैव एक शिवजी से सम्बंधित रचना एवं एक सम-सामयिक रचना प्रस्तुत करते थे | श्री कौशल किशोर एवं गुजराती नाटकाकार श्री तारक मेहता के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत साहित्यकारों को श्रृद्धांजलि दी गयी |

              -श्री सिन्हा का सम्मान करते हुए डा श्याम गुप्त, डा रंगनाथ मिश्र सत्य , व अनिल किशोर शुक्ल व सुषमा गुप्ता

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स्त्रियों के वस्त्र व पुरुष की सोच-----डा श्याम गुप्त




प्रायः यह कहा जाता है कि कपडे पहनने की बात लोग स्त्रियों पर छोड़दें, हमारी इच्छा , पुरुष अपनी सोच बदलें ----परन्तु प्रत्येक कार्य का एक तार्किक कारण होता है न---- निम्न चित्र देखें जहां तीन पुरुष सम्पूर्ण कपडे पहने हुए हैं तो उपस्थित महिला अध् नंगे वस्त्रों में क्यों है --- क्या किसी को इसमें कोई तर्क या यथोचित उत्तर नज़र आता है |

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