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सोमवार, 15 जनवरी 2018

गीत, अगीत और नवगीत...डा श्याम गुप्त



                               


गीत, अगीत और नवगीत
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आजकल हिन्दी साहित्य व काव्य में पद्य-विधा के सनातन रूप गीत के दो अन्य रूप अगीत एवं नवगीत काफी प्रचलन में हैं | --------गद्य-विधा से भिन्नता के रूप में जिस कथ्य में, लय के साथ गति व यति का उचित समन्वय एवं प्रवाह हो वह काव्य है,गीत है|
------तुकांत छंदों के अतिरिक्त, अन्त्यानुप्रास के अनुसार गीत- तुकांत या अतुकांत होते हैं | अतुकांत गीतों को गद्य-गीत भी कहा गया | गीत तो सनातन व सार्वकालिक है ही अतः आगे कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है|
--------यहाँ अगीत व नवगीत पर कुछ दृष्टि डालने का प्रयत्न किया जायगा|
अगीत ---
************
-----एक अतुकांत गीत है, जिसमें मूलतः संक्षिप्तता को ग्रहण किया गया है | निराला जी द्वारा स्थापित लम्बे-लम्बे अतुकांत गीतों से भिन्न ये ५ से ८ पंक्तियों में पूरी बात कहने में सक्षम हैं | लय, गति, यति के साथ प्रवाह इनकी विशेषता है जो इन्हें गीतों की श्रेणी में खडा करती है एवं अतुकान्तता पारंपरिक पद्य-गीत से पृथक करती है और संक्षिप्तता प्रचलित पारंपरिक अतुकांत गीतों से भिन्नता प्रदर्शित करती है | इस प्रकार अगीत एक स्वतंत्र व स्पष्ट विधा है एवं उसका का एक स्पष्ट तथ्य-विधान, लिखित शास्त्रीय ग्रन्थ में छंद विधान व रचना संसार है ...उदाहरणार्थ ---
“टूट रहा मन का विश्वास
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं |
रोक रहीं मुझ को,
गहरी बाधाएं |
अन्धकार और बढ़ रहा,
उलट रहा सारा आकाश ||” --- डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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\
नवगीत व उसका भ्रामक संसार ---गीत का सलाद या खिचड़ी----
*****************************
--- नवगीत की बात काफी समय से एवं काफी जोर-शोर से कही जा रही है| नवगीत को प्राय: गीत के नवीन एवं आधुनिक स्थानापन्न रूप में प्रचारित किया जाता है|
------नवगीतकार प्रायः यह कहते हैं कि अब गीत पुरानी विधा होगई है नवगीत का युग है | परन्तु यदि ध्यान से विश्लेषण किया जाय तो यह एक भ्रांत धारणा ही है |
-------वस्तुतः नवगीत कोई नवीन विधानात्मक तथ्य नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही तोड़-ताड़ कर लिख दिया जाता है | इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है | इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है |
------ इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता | वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | उदाहरणार्थ---- एक नवगीत है—
“जग ने जितना दिया
ले लिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपने पन का
जाल बुना |
सबके हाथ-पाँव बन
सब की साधें
शीश धरे
जीते जीते
सबके सपने
हर पल रहे मरे
थोपा गया
माथ पर पर्वत
हमने कहाँ चुना | --मधुकर अस्थाना का नवगीत
-------इसे १२-१४ या १६-१० या २६ पंक्तियों वाला सामान्य गीत की भाँति लिखा जा सकताहै –-
जग ने जितना दिया, ११
लेलिया उससे कई गुना | १५
बिन मांगे जीवन में, १२
अपने पन का जाल बुना |१४
या -----
जग ने जितना दिया, लेलिया उससे कई गुना, २६
बिन मांगे जीवन में, अपने पन का जाल बुना| २६
-------
सबके हाथ-पाँव बन, १२ सबके हाथ पाँव बन सबकी- १६
सबकी साधें शीश धरे | १४ या साधें शीश धरे | १०
.जीते जीते सबके – जीते जीते सबके सपने,
सपने हर पल रहे मरे | हर पल रहे मरे |
टेक- थोपा गया माथ पर १२
पर्वत हमने कहाँ चुना
या
थोपा गया माथ पर पर्वत हमने कहाँ चुना | २६


कुछ अन्य उदाहरण देखें ---
१-
------ १४-१२ का पारंपरिक गीत है या नवगीत……
विदा होकर जाते-जाते, १४
बरस बीता कह गया। १२
नवल तुम वो पूर्ण करना, १४
जो नहीं मुझसे हुआ। १२ ----कल्पना रमानी का नवगीत
२-
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे १६
मन के मनके
दर्द हरा है १६ = ३२
ताड़ों पर
सीटी देती हैं
गर्म हवाएँ २४
जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ २४
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ २४
धीरे-धीरे ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है? ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..
------
------ सीधा -सीधा 24 / ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ... इसे ऐसे लिखिए ....
ताड़ों पर सीटी देती हैं गरम हवाएं , २४
जली दूब सी तलवों में चुभती यात्राएं | २४
पुनर्जन्म लेकर आती हैं दुर्घटनाएं | २४
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२
\
अतः इस प्रकार नवगीत कोई नवीन विधा नहीं ठहरती अपितु पारंपरिक गीत ही है जिसे गीत का सलाद सा बना कर पेश किया जाता है | हाँ इस बहाने तमाम नवीन कथ्य –तथ्यों के नाम पर दूर की कौड़ी के नाम पर , दूरस्थ व्यंजना के नाम पर ....असंगत कथ्य व तथ्य पेश कर दिए जाते हैं सिर्फ कुछ अलग दिखने हेतु | अब आप देखिये ---
“जग ने जितना दिया
लेलिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपनेपन का
जाल बुना | ---- “
क्या इस कथ्य का कोई अर्थ निकलता है ? अर्थात व्यक्ति को दुनिया कुछ देती नहीं वह ही दुनिया को देता है और जो कुछ वह अपने साथ पैदा होते ही लाता है दुनिया ले लेती है | हमें किसी( दुनिया, दोस्त, माता-पिता, भगवान ) का शुक्रगुज़ार होने की क्या आवश्यकता है |
----
होगयी है कर्मनाशा
समय की गंगा
नहाकर जिसमें हुआ
हर आदमी नंगा |
---- यदि नदी कर्मनाशा है तो बुरा क्या है वह तो कर्मों का नाश हेतु होती ही है ...कर्मनाशा का अर्थ क्या है ....कर्मों का नाश तो मोक्ष है ..उचित ही है ...फिर दोष क्या....समय की नदी तो दुष्कर्म कृत्या हुई है जिससे हर आदमी नंगा हुआ है .... अनर्गल भाव है नदी के स्थान पर गंगा का प्रयोग भी असाह्तियिक व असांस्कृतिक है ....|

------
और भी------
“जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ “ ----- ??
“आतंकों में-
शांति खोजना
केवल पागलपन
लगता है। “
---- यह कौन सा नया महान तथ्य है सब जानते हैं |
शाखाओं का बोझ उठाये
बरगद उठ न सका |
---- फिर वह बरगद ही क्यों कहलाता है फिर अतिरिक्त शाखाएं तो उसका बोझ स्वयं उठाती हैं क्या अर्थ है कथ्य का ?
----
सोने के पिंजरे में
हमने
हर पल दर्द धुना |
…... दर्द के कारण अंग धुना जाता है नकि स्वयं दर्द .कोइ धुनने की चीज़ है ..
मुझे तो इन असंगत कथ्यों का अर्थ समझ आता नहीं है यदि आपको तार्किक अर्थ समझ आ रहा हो तो बताएं |
-------- मेरे विचार में तो इस प्रकार की कविता ही कविता व साहित्य, कवि-साहित्यकारों को जन जन, सामान्य जन से दूर करती जा रही है |

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

आनिहलवाड की राजकुमारी देवलदेवी पर आधारित उपन्यास।

मेरी स्वर्गीय मित्र निधि जैन ने मेरे उपन्यास देवलदेवी पर ये समीक्षा लिखी थी। अब जबकि इस उपन्यास का दूसरा संस्करण आया है तो मुझे निधि की कमी बहुत खल रही है। देवलदेवी की प्रीबुकिंग अमेज़न पर शुरू है।

फेसबुक और whatsapp पर जुड़ने के बाद से मेरा मोबाइल हाथों से छोड़ना अत्यंत दुष्कर हुआ है। घर के काम करते हुए भी बीच बीच में मोबाइल उठा कर देख ही लेती हूँ।
ऐसे में किताबें पढ़ना मेरे लिए चुनौती है। कुछ 15 दिन पहले 4 किताबें खरीदीं थीं जिनमे से अब तक बस खलील जिब्रान की ही एक कहानी पढ़ी।
ऑनलाइन बुक्स के जरिये मैंने दिसम्बर में प्रेमा,श्रीकांत दो उपन्यास और कई सारी कहानियाँ पढ़ीं..तभी दो बुक्स खरीदीं थीं गोदान और प्रेमाश्रम..गोदान तो तो दिलचस्प लगी..खत्म होने के बाद भी यही लगता रहा कि अभी और होता तो पढ़ा जाता। पर यहाँ दो महीने से प्रेमाश्रम खत्म करने की सोच रही हूँ पर नही हो पाता। वैसे भी इतनी मोटी मोटी किताबें और उपन्यास देखकर ही हाथ पाँव फूल जाते हैं मेरे 
ऐसे में एक लेखक महोदय मुझे इनबॉक्स में अपने एक उपन्यास की पीडीएफ फ़ाइल देते हैं  और बोलते हैं पढ़कर प्रतिक्रिया दीजियेगा  मन में तो आया कि कुछ बक दूँ.. पर घर आये मेहमान की इज्जत भी करनी चाहिए तो उनको बोल दिया 'जी जरूर'..फिर सोचा देखूं तो क्या है इसमें..पीडीएफ खोली #देवलदेवी दो तीन पेज नीचे आई 'उफ़ ये तो इतिहास से सम्बंधित था..'नो वे,किसी कीमत पर नही पढूंगी' सोच लिया था.. एक फ्रेंड Vivek को भी भेज दिया कि शायद ये पढ़कर प्रतिक्रिया देगा तो वो ही लिख दूंगी  ..
खैर शाम को fb पर कोई ख़ास नोटिफिकेशन नही थे तो सोचा थोडा नावेल देख ही लिया जाए.. आंय..ये क्या.. शुरू हुआ तो खत्म करने तक सांस भी न ली.. छोटा था रुचिकर था.. भाषा सुंदर.. कथानक ऐतिहासिक.. नायिका में ठोस नायिका वाले गुण.. जिसमे स्वधर्मपालन की जिजीविषा बचपन से ही दिखती है। मुझे बहुत पसंद आया यह उपन्यास इसलिए खत्म करने के बाद तुरंत लिख रही हूँ।
लेखक समीर ओह्ह सॉरी Sudheer Maurya को बहुत बहुत बधाई.. पहली बार किसी लेखक को मुझसे एक उपन्यास वो भी एक सिटींग में खत्म करवाने के लिए भी बधाई.

रविवार, 31 दिसंबर 2017

बणी-ठणी जी--- कवयित्री रसिक बिहारी व किशनगढ़ चित्रकला---डा श्याम गुप्त ...



                              

---- बणी-ठणी जी--- कवयित्री रसिक बिहारी व किशनगढ़ चित्रकला ------
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बनी ठनी जी
“बणी-ठणी” राजस्थान के किशनगढ़ की विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली है| पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि इसका नाम “बणी-ठणी” क्यों और कैसे पड़ा ?
\
राजस्थान के इतिहास में शाही परिवारों की दासियों ने भी अपने कार्यों से प्रसिद्धि पायी है| “बणी-ठणी” भी राजस्थान के किशनगढ़ रियासत के तत्कालीन राजा सावंत सिंह की दासी व प्रेमिका थी| राजा स्वयं बड़े अच्छे कवि व चित्रकार थे| उनके शासन काल में बहुत से कलाकारों को आश्रय दिया गया|
---
-----नागरी दास व रसिक बिहारी -----
------ “बणी-ठणी” रूप सौंदर्य में अदभुत होने के साथ उच्च कोटि की कवयित्री थी| राजा सावंतसिंह तथा दासी दोनों कृष्ण भक्त थे| उनके प्रेम व कला प्रियता के कारण प्रजा ने भी उनके भीतर कृष्ण-राधा की छवि देखी | दोनों को कई अलंकरण प्रदान किये गए | राजा को नागरीदास चितेरे, आदि तो दासी को कलावंती, लवलीज, नागर, उत्सव प्रिया आदि संबोधन मिले| वह स्वयं रसिकबिहारी के नाम से कविता लिखती थी|
-----बनी ठनी --“बणी-ठणी जी ----
------ राजा सावंतसिंह ने इस सौंदर्य और रूप की प्रतिमूर्ति दासी को रानियों की पोशाक व आभूषण पहनाकर एकांत में उसका एक चित्र बनाया| और इस चित्र को नाम दिया “बणी-ठणी” | राजस्थानी भाषा के शब्द “बणी-ठणी” का मतलब होता है "सजी-संवरी","सजी-धजी" | राजा ने अपना बनाया यह चित्र राज्य के राज चित्रकार को दिखाया और उसे अपने दरबार में प्रदर्शित कर सार्वजानिक किया|
----- इस चित्र की सर्वत्र बहुत प्रसंशा हुई और उसके बाद दासी का नाम “बणी-ठणी” पड़ गया| सब उसे “बणी-ठणी” के नाम से ही संबोधित करने लगे|
------ राज्य के चित्रकारों को भी अपनी चित्रकला के हर विषय में राजा की प्रिय दासी “बणी-ठणी” ही आदर्श मोडल नजर आने लगी और “बणी-ठणी” के ढेरों चित्र बनाये गए जो बहुत प्रसिद्ध हुए और इस तरह किशनगढ़ की चित्रशैली को “बणी-ठणी” के नाम से ही जाना जाने लगा|
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राजा नागरीदास व बनी ठनी चित्रकला
------किशनगढ़ के चित्रकारों के लिए यह प्रेम वरदान सिद्ध हुआ है क्योंकि यह विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली भी उसी प्रेम की उपज है और इस चित्रशैली की देश-विदेश में अच्छी मांग है|
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“बणी-ठणी” सिर्फ रूप और सौंदर्य की प्रतिमा ही नहीं थी वह एक अच्छी गायिका व उत्तम कोटि की कवयित्री और भक्त-हृदया नारी थी | बनीठनी की कविता भी अति मधुर, हृदय स्पर्शी और कृष्ण-भक्ति अनुराग के सरोवर है|
-----वह अपना काव्य नाम “रसिक बिहारी” रखती थी| रसिक बिहारी का ब्रज, पंजाबी और राजस्थानी भाषाओँ पर सामान अधिकार था|
-----रसीली आँखों के वर्णन का एक पद उदाहरणार्थ प्रस्तुत है-
रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ |
प्रेम छकी रस बस अलसारणी, जाणी कमाल पांखड़ियाँ |
सुन्दर रूप लुभाई गति मति हो गई ज्यूँ मधु मांखड़ियाँ|
रसिक बिहारी वारी प्यारी कौन बसि निसि कांखड़ियाँ||

---------उनके द्वारा कृष्ण राधा लीला वैविध्य की मार्मिक अभिव्यक्ति पदों में प्रस्फुटित हुई है| एक सांझी का पद इस प्रकार पाठ्य है-
खेले सांझी साँझ प्यारी|
गोप कुंवरि साथणी लियां सांचे चाव सों चतुर सिंगारी||
फूल भरी फिरें फूल लेण ज्यौ भूल री फुलवारी|
रहया ठग्या लखि रूप लालची प्रियतम रसिक बिहारी||

---------प्रिय की अनुपस्थिति प्रिया के लिए कैसी कितनी पीड़ाप्रद और बैचेनी उत्पन्न करने वाली होती है, यह तथ्य एक पंजाबी भाषा के पद में प्रकट है-
बहि सौंहना मोहन यार फूल है गुलाब दा|
रंग रंगीला अरु चटकीला गुल होय न कोई जबाब दा|
उस बिन भंवरे ज्यों भव दाहें यह दिल मुज बेताब|
कोई मिलावै रसिक बिहारी नू है यह काम सबाब दा || 



चित्र-१-कविवर नागरी दास ( राजा सावंत सिंह ) एवं बनी ठनी चित्रकला
चित्र २ -बणी-ठणी जी रसिक बिहारी ...
चित्र ३ व अन्य चित्रकला राधा कृष्ण व बनी ठनी जी

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार---डा श्याम गुप्त






                                



           
 
                           विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार  
       प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, नवसृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, कविवर श्री बिनोद कुमार सिन्हा,अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री रामदेवलाल विभोर,  प्रदीप कुशवाहा, महेश अस्थाना, प्रदीप गुप्ता, श्रीमती पुष्पा गुप्ता, विजयलक्ष्मी महक , मंजू सिंह एवं श्रीमती सुषमागुप्ता व डा श्यामगुप्त ने भाग लिया |
       वाणी वंदना डा श्याम गुप्त, सुषमागुप्ता व श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने की | गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने तम्बाकू की हानियों पर प्रकाश डालते हुए दोहे प्रस्तुत किये---
तम्बाकू से फेफड़े होने लगते ग्रस्त |

उल्टी होती जब कभी गिरने लगता रक्त |
       डा.योगेशगुप्त ने नदी रेत व सागर के अंतर्संबंध की दार्शनिक व्याख्या करते हुए अतुकांत रचना प्रस्तुत की ---बाँध बांधने से भी क्या होगा

          नदी को तो खोना ही है ;

          रेत के विस्तार में

          या सागर के प्यार में |
       श्रीमती पुष्प गुप्ता ने गृहस्थ जीवन को अग्निपथ बताते  हुए कहा—
गृहस्थ जीवन अग्निपथ, गृहणी की कर्मभूमि,

तपोभूमि, निष्ठा परिपक्व, सहज मन, अच्युत थिर हो | 
      श्रीमती मंजू सिंह ने फूलों की विशिष्टता पर गीत सुनाते हुए कहा-
फूल कभी रोते नहीं ,

फूलों को तो बस हंसना आता है |
       श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने बेटी व दुल्हन समन्वित गीत प्रस्तुत किया—
बेटी वाला क्या देगा, क्या लोगो तुम,

बेटी से बढकर कोइ सौगात नहीं होती
      कविवर  श्री महेश अस्थाना प्रकाश ने दिल से दिल को राहत पर गुनगुनाया---
आओ हम गुनगुनालें, दिल से दिल मिला हम लें |

ना शिकवा हो ना शिकायत, दिल से दिल को राहत मिले |
    कवि प्रदीप गुप्ता ने भी फूलों की नाजुकता यूं बयाँ की---
फूल आहिस्ता फैंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,

होजाते हैं खुद तो घायल, पर औरों को सुख देते हैं|
    प्रदीप कुशवाहा ने जीवन के बारे में अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा –
जीवन स्वयं एक प्रश्न है,सबको हल करना है |

हंसकर या रोकर, प्रदीप जीवन जीना है |
      
      बिनोद कुमार सिन्हा ने पुराने ज़माने को याद करते हुए गुनगुनाया—
वे भी क्या ज़माने थे  हर क्षण खुश के तराने थे |

मेरी हसरत भरी निगाहें, बेसब्र रही थी दीदार के |
    श्री रामदेव लाल विभोर ने अँधेरे और जुगनूं की बात की –
चमकना गर न आता हो, तो पूछो उस अँधेरे से,

उड़ा करता जहां जुगनूं, है खुद की रोशनी लेकर |
     सुषमागुप्ता जी ने मुरलीधर कान्हा को करुणा का सागर बताते हुए गीत प्रस्तुत किया—
हे करुणा के सागर श्याम,

मुरलीधर कान्हा घनश्याम |
       डा श्यामगुप्त ने आजकल चिकित्सकों व अस्पतालों में हो रही लापरवाही पर जन सामान्य को भी दोषी बताते हुए एक नवीन तथ्य की प्रस्तुति की ---
पैसा आज बहुत पब्लिक पर, सभी चाहते, ‘वहीं’ दिखाएँ |

चाहे जुकाम या कुछ खांसी, विशेषज्ञ ही हमको देखे |.......
    तथा उन्होंने नारी की त्रासदी को इंगित करते हुए एक प्रश्न उठाया---–
औरत आज भी डर डर कर जिया करती है ,

जाने किस बात की कीमत अदा करती है |
        अगीत विधा के प्रवर्तक एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष साहित्यभूषण साहित्यमूर्ति डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने गोष्ठी की समीक्षात्मक सराहना करते हुए अपना सुप्रसिद्ध गीत सुनाया....
जगमगाता हुआ दीप मैं बन सकूं

स्नेह इतना ह्रदय में भरो आज तुम |
      द्वितीय सत्र में कविगण पुष्पा गुप्ता, विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, प्रदीप कुशवाहा, महेश अष्ठाना, श्री रामदेव लाल विभोर एवं सुषमा गुप्ता को सम्मान पात्र देकर को सम्मानित भी किया गया |
      संक्षिप्त जलपान एवं डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात् गोष्ठी समाप्त हुई |

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

दो कह मुकरियाँ ---डा श्याम गुप्त....



                    

दो कह मुकरियाँ ---

१.
बात गज़ब की वह बतलाये
सोते जगते दिल बहलाए
उसके रँग ढंग की सखि कायल,
री सखि, साजन !, ना मोबायल |

२.
उंगली पर वह मेरी नाचे,
जग भर की वह बातें बांचे
रूप रंग से सब जग घायल
री सखि साजन ? सखि मोबायल |

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’—हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य पथदीप--- एक पुनरावलोकन ---डा श्याम गुप्त...



                    
 डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’—हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य पथदीप--- एक पुनरावलोकन

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                            काँधे पर झोला डाले, आँखों पर काला चश्मा, मुखमंडल पर विद्वतापूर्ण ओजस्वी एवं तेजपूर्ण आभा के साथ सरल भोलापन लिए हुए, सबकी सुनते हुए, सबसे सहज व कपटहीन भाव से मिलते हुए, अगणित युवा, प्रौढ़ व वरिष्ठ कवि, कवयित्रियों, साहित्यकारों, विद्वानों द्वारा गुरूजी, सत्यजी, डा सत्य संबोधन के साथ अभिवादन को सहेज़ते हुए काव्य व मंच संचालन में व्यस्त-अभ्यस्त व्यक्तित्व, जो काव्य गोष्ठियों व मंचों से प्रत्येक उपस्थित कवि को उनके नाम से पहचान कर बुलाते हैं, कविता पाठ किये बिना जाने नहीं देते, हर युवा कवि के प्रेरणास्रोत, वरिष्ठ कवियों के सहयोगी साथी सहायक प्रेरक कविवर डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में एवं हिन्दी साहित्याकाश में एक अप्रतिम व निराले व्यक्तित्व हैं|
                              स्वतन्त्रता पश्चात एवं परवर्ती निराला युग में जब कविता का क्षेत्र असमंजस, भ्रम, कुंठा, हताशा, वर्ग संघर्ष, पौर्वात्य व पाश्चात्य समीकरणों के मिश्रत्व के विभ्रम से गुजर रहा था तथा अधिकाँश साहित्यकार समाज को दिशा देने की अपेक्षा समाज से दिशा ले रहे थे तथा उसी प्रकार का साहित्य-सृजन कर रहे थे जो तात्कालिक लाभ व लोभ की पूर्ति तो करता था परन्तु दीर्घकालीन श्रेष्ठता संवर्धक एवं अत्यावश्यक आचरण संवर्धन की दिशा-प्रदायक नहीं था |
                ऐसे समय में हिन्दी साहित्याकाश में एक नये युगप्रवर्तक का उद्भव हुआ जो अतुकांत कविता की एक नवीन विधा ‘अगीत’ के सूत्रपात के साथ ही एक नए रूप में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अग्रगण्य बनकर उभरे | वे डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ के नाम से हिन्दी जगत में जाने जाते हैं|
                   इस संक्रांति-काल में सभी प्रकार की कविता व साहित्य की सभी विधाओं में समर्थ व सक्षम होते हुए भी डा रंगनाथ मिश्र ने काव्य को गति व दिशा प्रदान करने हेतु सरलता, संक्षिप्तता की अधुना आवश्यकता के साथ सर्वग्राहिता, जन-जन सम्प्रेषणीयता सरल भाषा के साथ काव्य में सामजिक सरोकारों की भारतीय भाव-भूमि प्रदायक काव्य हेतु “अगीत कविता “ का उद्घोष किया | इन शब्दों के साथ ....
“ मैं भटकते हुओं का सहारा बनूँ,
डूबते साथियों का किनारा बनूँ |
दे सकूं मैं प्रगति साधना से भरी,
जागरण-ज्योति का ही इशारा बनूँ |” 

     तथा “
हिन्दी हिन्दवासियों की
चेतना का मूल मन्त्र, 

सब मिल देवनागरी
 को अपनाइए | “
                          काव्य हो या संस्था, समाज, मानवता सभी को प्रगतिवादी दृष्टिकोणयुत एवं अग्रगामी होना चाहिए| गतिमयता ही जीवन है | परिवर्तन प्रकृति का नियम है, प्रवाह है, निरंतरता है | अगीत कविता उसी प्रवाह, निरंतरता, नवीनता की ललक लिए हुए अवतरित हुई डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ नाम के उत्साही व समर्थ कवि साहित्यकार के मनो-गगनांगन से | आज एक वटवृक्ष की भांति विविध छंदों, स्वरूपों,काव्यों, महाकाव्यों,आलेखों, शोधों, शोधग्रंथों तथा अगणित कवियों, साहित्यकारों, साहित्याचार्यों रूपी शाखाओं के साथ स्थापित है, हिन्दी साहित्य के आकाश में |
                     “चलना ही नियति हमारी है ...” के मंत्रदाता डा सत्यजी यहीं नहीं रुके अपितु हिन्दी साहित्य की प्रत्येक विधा को गति प्रदान करने के अंदाज़ में आपने १९७५ ई. में ‘संतुलित कहानी’ एवं १९९५ ई. में ‘संघात्मक समीक्षा पद्धति ‘ को जन्म दिया | इसके साथ ही ‘अगीतायन’ पत्रिका का सम्पादन , अपने स्वगृह का नाम ‘अगीतायन’ रखना एवं माह के प्रत्येक अंतिम रविवार को अपने आवास पर काव्य-गोष्ठी आयोजित करना उन्होंने अपनी नियति ही बनाली |
                १९६६ से आजतक इस गोष्ठी की क्रमिकता भंग नहीं हुई, किसी भी स्थिति में | इस गोष्ठी में कोइ भी सम्मिलित होसकता है बिना किसी आमंत्रण के | उनकी इस सर्व-समर्थता एवं सबको साथ लेकर चलने की क्षमता के कारण ही आज लखनऊ, प्रदेश व देश में अगीत साहित्य परिषद् के अगणित सदस्य, कवि, शिष्य-शिष्याओं का समूह अगीत साहित्य के साथ-साथ साहित्य की प्रत्येक विधा गदय-पद्य, गीत-अगीत में रचनारत हैं| उनके लिए कोइ भी विधा अछूत नहीं है | वे अगीत के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ की ही भांति गीत, छंद, कहानी, उपन्यास, समीक्षा ग़ज़ल, हाइकू आदि सभी में पारंगत हैं|
                         ऐसे युगप्रवर्तक, हिन्दी साहित्य के प्रकाश-स्तम्भ डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ जो अपने साहित्यिक कार्यकाल में अब तक लगभग ५ हज़ार काव्य-गोष्ठियों, मंचों, सम्मेलनों से सम्बंधित रहे हैं | उनके व उनकी संस्था अखिल भारतीय अगीत परिषद् के तत्वावधान में, संयोजन में जाने कितनी संस्थाएं समारोह आयोजन कराने को तत्पर रहती हैं | यह एक मानक है रिकार्ड है | आज भी ७४ वर्ष की आयु में वे युवा जोश के साथ साहित्य को नयी-नयी ऊचाइयों पर लेजाने हेतु क्रियाशील हैं| वे निश्चय ही हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य साहित्यकार हैं| आशा है वे एक लम्बे समय तक हिन्दी साहित्य के पथदीप बने रहेंगे |

                                                                                             ---डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८ ,                                                    , एम् बी बी एस, एम् एस (सर्जन)
आशियाना लखनऊ २२६०१२.                                        . साहित्याचार्य, साहित्यविभूषण
मो.-९४१५१५६४६४ .

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

अगीत विधा का अमूल्य दस्तावेज़ : 'अगीत साहित्य दर्पण '----समीक्षा -डा उषा सिन्हा ....डा श्याम गुप्त



                                         पुस्तक समीक्षा -  
         अगीत विधा का अमूल्य दस्तावेज़ : 'अगीत साहित्य दर्पण '
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नाम पुस्तक---- अगीत साहित्य दर्पण ..... रचयिता -- डा श्याम गुप्त ....प्रकाशक-- अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ एवं सुषमा प्रकाशन , लखनऊ ...मूल्य --१५०/- रु.

समीक्षक --प्रोफ. उषा सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष , भाषा विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्व विद्यालय , लखनऊ ...

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---------------मुझे डा श्याम गुप्त द्वारा प्रणीत 'अगीत साहित्य दर्पण' के अवगाहन का सुयोग प्राप्त हुआ | शल्य चिकित्सक डा गुप्त साहित्य के प्रति समर्पित अगीत विधा के सशक्त रचनाकार हैं| उन्होंने अत्यंत परिश्रमपूर्वक प्रचुर सामग्री का संकलन करके वर्णानात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्दतियों के आधारपर अगीत विधा का सांगोपांग अध्ययन प्रस्तुत करके नि:संदेह श्लाघनीय कार्य किया है | हिन्दी साहित्य की स्थापित एवं समृद्ध अगीत विधा का समग्र अध्ययन छः सुगठित अद्यायों में विभाजित है |
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---------------अगीत विधा के प्रणेता, दिशावाहक, ध्वजावाहक डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' द्वारा लिखित प्रस्तावना में अगीत विधा का सम्यग् परिचय स्तुत्य है | मंगलाचरण से कृति का शुभारम्भ हुआ है जिसमें रचनाकार ने वाग्देवी माँ सरस्वती से अगीत को नवीन भावों के साथ सुर लय ताल से परिपूर्ण करने और उसके प्रचार-प्रसार हेतु आशीर्वाद प्रदान करने की याचना की है |
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------प्रथम अध्याय 'एतिहासिक पृष्ठभूमि व परिदृश्य ' ------में डा. गुप्त विवेचन ने अगीत के आविर्भाव एवं विकास यात्रा का सम्यक विवेचन किया है | डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' द्वारा लखनऊ में स्थापित 'अखिल भारतीय अगीत परिषद् . के बढ़ते चरणों, अभिनव कलेवर, अगीत त्रैमासिक मुखपत्र 'अगीतायन', संतुलित कहानी विधा, संघात्मक समीक्षा पद्धति तथा विश्व-विद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में अगीत विधा को महत्त्व प्राप्त होने की सार्थक चर्चा की गयी है | अगीत विधा के प्रचार प्रसार में योगदान देने वाले वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ ही नवांकुरों के कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर इसकी अनुगूंज को भी रेखांकित किया गया है |
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-------द्वितीय अध्याय---- के अंतर्गत अगीत की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि, अवधारणा व अभिप्राय की सारगर्भित व्याख्या करते हुए डा गुप्त ने उसके स्वरुप, वैशिष्ट्य एवं उपयोगिता को रेखांकित किया है | लेखक का मानना है.. 'यह एक वैज्ञानिक पद्धति है, सामाजिक सरोकारों व उनके समाधान के लिए एक विद्रोह है, एक नवीन खोज है | भाषा की नयी संवेदना, कथ्य का अनूठा प्रयोग, संक्षिप्तता व परिमाण की पोषकता, बिम्बधर्मी प्रयोग के साथ सरलता से भाव सम्प्रेषण अगीत का एक और गुण है ' .... अगीत रचनाकार सिर्फ कल्पनाजीवी नहीं वह स्वजीवी, यथार्थजीवी व समाजजीवी है | वह निराशावादिता के विपरीत सौन्दर्यबोध व आशावादिता को स्वीकारता है | अगीत में पश्चिम के अन्धानुकरण की अपेक्षा कविता को अपनी जमीन, अपने चारों और के वातावरण पर रचने का प्रयास खूब है |
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-------अगीत के वर्त्तमान परिदृश्य एवं संभावना------ की विस्तृत विवेचना तृतीय अध्याय की विषय वस्तु है | अगीत के विस्तृत फलक की चर्चा करते हुए डा गुप्त ने लखनऊ व बाहर के अनेक रचनाकारों, समीक्षकों, कवियों, उनकी रचनाओं, पत्र-पत्रिकाओं, महाकाव्य, खंडकाव्यों शोधग्रंथों का सम्यक निरूपण किया | विदेशों में बसे अगीत रचनाकारों का भी उल्लेख किया है | इसके अतिरिक्त अगीत के प्रचार-प्रसार में सक्रिय साहित्यकारों द्वारा आयोजित गोष्ठियों, बृहद आयोजनों, सम्मानों आदि विविध गतिविधियों को भी उद्घाटित किया है | इसी सन्दर्भ में अगीत के उत्कर्ष में सहायक विभिन्न भारतीय एवं अभारतीय विद्वानों, कवियों, साहित्यकारों के विचारों, सम्मतियों तथा टिप्पणियों को भी प्रस्तुत किया गया है|
------चतुर्थ अध्याय -'अगीत छंद एवं उनके रचना विधान' -------अत्यंत महत्वपूर्ण है | वर्त्तमान में अगीत विधा में प्रचलित एवं विविध नवीन प्रयोगों यथा अगीत छंद, लयबद्ध अगीत, शताप्दी अगीत, नव-अगीत, गतिमय सप्तपदी अगीत, त्रिपदा अगीत एवं त्रिपदा अगीत ग़ज़ल के रचना विधान को डा गुप्त ने समुचित उद्धरणों के माध्यम से स्पष्ट करने का सार्थक प्रयास किया है|
-------------अगीत विधा एक भावपक्ष प्रधान सशक्त काव्य-विधा है, इसका गहन चिंतन एवं विवेचन -----पंचम अध्याय 'अगीत की भाव संपदा' -------के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है | अगीत की बहुआयामी भाव-भूमि ...सामाजिक सरोकार, सामाजिक बदलाव,युग परिवर्तन, विचारक्रान्ति, स्त्री विमर्श, प्रकृति चित्रण, हास्य-व्यंग्य, सन्दर्भ, मनोविज्ञान, धर्म एवं दर्शन के साथ ही स्वदेश, स्वभाषा, स्वसंस्कृति के प्रति निष्ठा,प्रेम की अभिव्यक्ति का निरूपण विभिन्न रचनाओं के उद्धरणों के माध्यम से डा गुप्त ने अपने विषय ज्ञान का परिचय दिया है |
-------'अगीत का कलापक्ष ' षष्ट अध्याय -------है जिसमें कलापक्ष पर समुचित प्रकाश डाला गया है | इस सन्दर्भ में इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया है कि " यद्यपि अगीत रचनाकार शव्द-विन्यास, अलंकार, रस लक्षणाओं आदि कलापक्ष पर अधिक आधारित नहीं रहता तथापि छंद विधा व गीत का समानधर्मा होने के कारण अगीत में भी पर्याप्त मात्रा में आवश्यक रस, छंद अलंकर व अन्य काव्य के गुण सहज व स्वतः रूप से ही आजाते हैं| डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य', सोहनलाल सुबुद्ध,पार्थोसेन व डा श्याम गुप्त ने अपने आलेखों एवं कृतियों के माध्यम से अगीत काव्य में प्रयुक्त शिल्प सौन्दर्य की चर्चा की है| डा श्याम गुप्त ने इस अध्याय में अनेक सटीक उद्धरणों द्वारा अगीत में रस, छंद , अलंकारों, माधर्य, ओज,प्रसाद के साथ अभिधा, लक्षणा, व्यंजना के प्रयोग की सारगर्भित एवं विषद विवेचना की है |
----------------इस प्रकार अगीत रचनाकार डा श्याम गुप्त ने अगीत काव्य की सुदीर्घ सृजन यात्रा विभिन्न आयामों एवं अभिनव कलेवर का सार्थक विवेचन करके इस तथ्य को भी उदघाटित किया है कि हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में इसका सराहनीय योगदान आज सर्वस्वीकृत है | कृति की भाषा सहज, बोधगम्य व प्रवाहपूर्ण एवं शैली विषयानुरूप है | तथ्यानुसंधान एवं प्रस्तुतीकरण के दृष्टि से यह कृति अगीत काव्य को समझने एवं इस दिशा में रचनाक्रम में प्रवृत्त होने के लिए डा श्याम गुप्त को हार्दिक बधाई एवं अगीत काव्य एवं समस्त रचनाकारों के उज्जवल भविष्य हेतु मंगल कामनाएं |
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--प्रोफ. उषा सिन्हा
पूर्व अध्यक्ष
भाषा विज्ञान विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ


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