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शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

पिता ...डा श्याम गुप्त



पिता
=====
एक पिता
झेलता है कितने झंझावात,
संसार के द्वेष-द्वन्द्व, छल-छंद;
भरने हेतु
समाज के सरोकार |
करने हेतु,
सात बचनों की पूर्ति
परिवार की आशाओं
पत्नी की इच्छाओं,
संतान की सुख अभिलाषाओं
व उनका भविष्य संवारने,
के लिए खटता है दिन-रात चुपचाप ,
बिना किसी शिकायत के, संताप के |
जीवन के स्वर्णिम पल-छिन,
युवावस्था के सुहाने दिन
उड़ जाते हैं न जाने कब
अधिकाधिक कमाने में,
आश्रितों को आनंद प्रदान हेतु
करता है सर्वस्व न्योछावर,
बनकर एक पुत्र, भाई, पति, पिता |
खुश होता है पिता,
सफल हुआ उसका श्रम, त्याग
उसकी शिक्षा |
बच्चे जब बड़े होकर ,
जाते हैं देश-विदेश, उच्च शिक्षा हेतु
बनाते हैं अपना भविष्य,
सजाते हैं अपना स्वयं का संसार |
पर जब वे,
अपनी सभ्यता, संस्कृति को भुलाकर ,
पाश्चात्य रंग में रंग जाते हैं ।
विस्मृत कर देते हैं,
परिवार को, माता-पिता को;
उस पिता को जिसने
उसे जीवन का अर्थ दिया
जीवन जीने का अर्थ दिया
जीवन जीने का सामर्थ्य दिया ,
तब उसकी आन्तरिक पीड़ा को समझना,
अनुभव करना
किसके वश के बात है ?



चित्र-गूगल साभार

बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

मी टू----- फिर नक़ल -----डा श्याम गुप्त

मी टू-----
===========

------जबसे हिन्दुस्तान पर अंग्रेज़ी राज हुआ हम भारतीय अंग्रेजों के गुलाम हुए, गुलामी की आदत सी होगयी---अर्थात हर बात में उन्हीं की नक़ल ---- चाहे वह हिन्दी की बात हो, भारतीय संस्कृति की बात हो या कुछ और----
----अब जबसे अमेरिका की महिलायें 'मी टू' कह कर अपने स्वार्थवश , अपने लाभ के लिए किये गए पापों को, सारा सुख भोग लेने के बाद मुद्दतों बाद प्रसिद्द पुरुषों पर डालने में लगीं है ------हमारी भारतीय महिलायें भी --हम क्यों पीछे --के भाव नक़ल मारने में लगीं हैं|
\
---- प्रश्न है कि आखिर उसी समय ये महिलायें क्यों नहीं शोर मचातीं जब उनका शोषण किया जाता है --
----क्योंकि वे स्वयं लाभ की स्थिति में होती हैं , क्या आर्थिक, भौतिक, नौकरी का, धंधे का लाभ इतना महत्वपूर्ण है कि शोषण करवाते रहना आवश्यक है | यह स्वयं का स्वार्थ ही है ---महिलायें पहले तो स्वयं के स्वार्थ हेतु स्वयं को चारा बनाकर पेश करती हैं, जब मतलब निकल जाता है एवं उनका बाज़ार गिरने लगता है तो लाइम लाईट में आने के लिए आरोप लगाने लगती हैं |
\
----ऐसा कौन सा समाज, देश है जिसमें स्त्रियाँ ,महिमा मंडित पुरुषों के आगे-पीछे नहीं दौड़तीं, स्व-लाभ हेतु | हर युग में यह होता आया है परन्तु स्त्रियाँ व पुरुष अपने कृत्यों का बोझा ढोने से कतराते नहीं थे |
---- परन्तु आज यह नया चलन प्रारम्भ हुआ है , काम निकल जाने पर दोषारोपण का |
\
-----कब स्त्री इतनी, मजबूत, हिम्मतवर होगी कि किसी को अपना शोषण न करने दे चाहे कितना भी बड़ा लालच, स्वार्थ क्यों न हो | और 'मी टू' कहने, करने की आवश्यकता न रहे |

सोमवार, 27 अगस्त 2018

एक और शम्बूक कथा---- डा श्याम गुप्त

एक और शम्बूक कथा----
====================
भारतीय शास्त्रों की महत्ता उनमें स्थित मानव के सभी आचरण व दुराचरणों का सत्य सत्य ज्यों का त्यों वर्णन एवं समाधान हेतु सदाचरण प्रस्तुति के कारण ही है, जिसके कारण यह देश-समाज उत्तरोत्तर अपनी कमियों पर अंकुश लगा कर उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर चल कर विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति बन सका |
-------प्रारंभ से ही इस संस्कृति के विरुद्ध अनाचरण युत अप-संस्कृति के भाव उपस्थित होते आये हैं, जो असुर कथाएं, शम्बूक कथा, रावण प्रसंग आदि विभिन्न रूप में सर उठाती रही हैं|
\
एक ताजा आधुनिक शम्बूक कथा जैसा प्रसंग, प्रस्तुत चित्र में आलेख देखिये |
------ये महाशय नेहरू के पश्चिमी ज्ञानोदय से प्रेरणा लेते हैं एवं उनकी सामान्य पुस्तक भारत एक खोज को साइंटिफिक टेम्पर बताते हैं |
------ इनके अनुसार वैदिक साइंस व वेदों में स्थित समस्त ज्ञान अंधविश्वास और अवैज्ञानिक है | पता नहीं ये देश की किस वास्तविक संस्कृति की बात करते हैं | यही शम्बूक –भाव है |
----इन्हें अत्याधुनिक खोजों , भारतीय वैदिक व शास्त्रीय ज्ञान के आधुनिक सन्दर्भों का कोइ न ज्ञान है न संज्ञान |
\
शम्बूक एक वेद विरुद्ध, भारतीय-अध्यात्मिक जीवन की धारा के विरुद्ध, धर्म विरुद्ध अति-भौतिक विचारधारा का पोषक था | अनैतिक अविचारशील विचारधारा का पोषण होने से पूर्व ही उसे जड़ से उखाड़ देना चाहिए | यही शम्बूक की कथा का अर्थार्थ है |
\
आज भी ऐसी विचारा धाराएं अनधिकृत प्रश्रय पा रही हैं | आवश्यकता है इन्हें रोकने की | आगे न बढ़ने देने की |
----- पर आज राम नहीं हैं |

2

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

बुराई की उत्पत्ति एवं सार्वकालीन उपस्थिति ---डा श्याम गुप्त


बुराई की उत्पत्ति एवं सार्वकालीन उपस्थिति


     अभी फेसबुक पर एक टिप्पणी थी कि ‘काश, इस दुनिया में सिर्फ सच्चाई का राज हो जाये तो समस्या कहाँ है?’---प्रायः सदा से ही बार बार यह कहा सुना जाता रहा है |
      इस सम्बन्ध में जैसा सभी कहते हैं, कहाजाता है कि बुराई अधिक तेजी से फैलती है | क्योंकि हम स्वयं की बुराई नहीं देखते अपितु दूसरे की बुराई अधिक देखते हैं –
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल देखा आपना, मुझसा बुरा न कोय |
     तो फिर बुराई सदा के लिए कैसे समाप्त होसकती है | एक पहलू यह भी है कि बुराई होगी ही नहीं तो अच्छाई की पहचान कैसे होगी |
    वस्तुतः बुराई के सार्वस्थानिक, सार्वकालिक उपस्थिति का मूल कारण है कि जब ब्रह्मा सृष्टि सृजन कर रहे थे उन्हें नींद आगई और इसी असावधानीवश अंधकारमय सृष्टि की उत्पत्ति होगई जो विभिन्न बुराइयों का प्रतीक बनी | |
        ब्रह्मा द्वारा मानव  की कोटियों में की गयी सृष्टि----
१.-ब्रह्मा के तमभाव देह से---आसुरी प्रव्रत्ति,  इस  देह के त्याग से रात्रि व अज्ञान भाव की उत्पत्ति हुई ।
२.सोते समय  सृष्टि—तिर्यक सृष्टि —जो अज्ञानी,  भोगी,  इच्छा-वशी, क्रोधी,  विवेक शून्य,  भ्रष्ट आचरण वाले एवं पशु-पक्षी जो पुरुषार्थ के सर्वथा अयोग्य थे ।
३.अन्य विशिष्ट कोटियां-- अन्धेरे में व क्रोध में -राक्षस, यक्ष आदि सदा भूखी सृष्टि --
          अब जो सृष्टिकर्ता की सृष्टि है उसकी सदा के लिए समाप्ति कैसे होसकती है |
          इस प्रकार मानव रक्त में आसुरी भाव अर्थात अति-भौतिकता जनित सुखाभिलाषा के प्रति आकर्षण के कारण विद्रोह करने की क्षमता पुराकाल से ही चली आ रही है, यही आसुरी भाव प्रत्येक काल में पुनः पुनः सिर उठाता रहता है ।--हर युग में,  –और कृष्ण को कहना पडा--
              यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |...
               धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे | 
    इसका अर्थ यह नहीं कि हम स्वयं बुराई उन्मूलन हेतु कुछ करें ही नहीं, कृष्ण की ही प्रतीक्षा करते रहें | हमें तो नियमित रूप से बुराई के विरुद्ध युद्ध लड़ते ही रहना चाहिए | यदि एक बुरे को भी आपकी बात अच्छी लग गयी तो आपका कर्तव्य पूरा हुआ |
वैज्ञानिक खोज---
      परन्तु प्रकृति माता जो अपने पुत्र, मानव की भांति क्रूर नहीं होसकती एवम उसे अपनी आज्ञा पर अपने अनुकूलन में सम्यग व्यवहार से चलाने का यत्न करती आई है, ने कदम बढाया है। यह कदम मानव मस्तिष्क में एक एसे केन्द्र को विकसित करना है जो मानव को आज से भी अधिक विवेकशील सामाज़िक, सच्चरित्र, संयमित, विचारवान, संस्कारशील व्यवहारशील व सही अर्थों में महामानव बनायेगा। वह केन्द्र हैमानव मस्तिष्क के प्रमस्तिष्क में विकसित भाग बेसल नीओ कार्टेक्स (basal neo cortex)|

   वैग्यानिकों प्रो.ह्यूगो स्पेत्ज़ व मस्तिष्क विज्ञानी वान इलिओनाओ के अध्ययनो के अनुसार  पता चलता है कि मानव मस्तिष्क भी अभी अपूर्ण है तथा मानव के प्रमस्तिष्क के आधार भाग में एक नवीन भाग ( केन्द्र ) विकसित होरहा है, जो मानव द्वारा प्राप्त उच्च मानसिक अनुभवों, संवेगों, विचारों व कार्यों का आधार होगा।
      
यह नवीन विकासमान भाग प्रमस्तिष्क के अग्र व टेम्पोरल भागों के नीचे कंकाल बक्स( क्रेनियम-cranium) के आधार पर स्थित है। इसी को बेसल नीओ कार्टेक्स ( basal neo cortex) कहते हैं। प्राइमरी होमो सेपियन्स (प्रीमिटिव मानव) में यह भाग विकास की कडी के अन्तिम सोपान पर ही दिखाई देता है व भ्रूण के विकास की अन्तिम अवस्था मेंबनता है। बेसल नीओ कार्टेक्स के दोनों भागों को निकाल देने या छेड देने पर केवल मनुष्य के चरित्र व मानसिक विकास पर प्रभाव पडता है, अन्य किसी अंग व इन्द्रिय पर नहीं । अतः यह चरित्र व भावना का केन्द्र है।
     इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भविष्य में इस नवीन केन्द्र के और अधिकाधिक विकसित होने से  एक महामानव ( यदि हम स्वयम मानव बने रहें तो) का विकास होगा ( इसे महर्षि अरविन्द के अति-मानस की विचार धारा से तादाम्य किया जा सकता है ); जो चरित्र व व्यक्तित्व मे मानवीय कमज़ोरियों से ऊपर होगा, आत्म संयम व  मानवीयता को समझेगा, मानवीय व सामाज़िक संबंधों मे कुशल होगा और भविष्य में मानवीय भावनाओं के विकास के महत्व को समझेगा।  
      और हमारा स्वप्न सच हो सके कि---- काश,  इस दुनिया में सिर्फ सच्चाई का राज हो जाये ...|


रविवार, 15 जुलाई 2018

राजहठ, बालहठ, त्रियाहठ और मीडिया ---डा श्याम गुप्त

राजहठ, बालहठ, त्रियाहठ और मीडिया 
 ================================
             राजहठ, बालहठ, त्रियाहठ ये तीन हठ शास्त्र प्रसिद्द हैं| आजकल फेसबुक, ब्लोग्स  आदि मीडिया पर ये तीनों हठ खूब प्रश्रय पा रही हैं|
               मुफ्त लेखन एवं अभिव्यक्ति की सुविधा व स्वतंत्रता के चलते फेसबुक पर तमाम ग्रुपों की भरमार है जिनमें बच्चे अर्थात युवा वर्ग-युवक युवतियां, एवं कुछ प्रौढ़ जन भी, मैं चाहूँ ये करूँ, वो करूं कुछ भी करूँ, मेरी मर्जी.. के भाव में सब अपनी अपनी ढफली अपना अपना राग अलाप रहे हैं|
              अतः मीडिया पर तमाम अज्ञानतापूर्ण भाव, विषय, कथ्य, तथ्य से युक्त, अनर्गल बातें, द्वंद्व-द्वेष युक्त, देश-समाज-संस्कृति के विरुद्ध एवं असाहित्यिक भाव युत, कलापक्ष से हीन काव्य व साहित्य की बाढ़ आई हुई है | और अधिकाँश जन, मित्र समूह, केवल लाइक, अच्छा है, या कौन झंझट में पड़े वाह –करके निकल लेते हैं, बिना तार्किक टिप्पणी आदि के
           और साहित्य व काव्यकला का ह्रास होता जा रहा है --जिस स्थिति के लिए तुलसीदास जी ने कहा है —


हरित भूमि तृण संकुल समुझ परहि नहिं पंथ |
जिमी पाखण्ड विवाद तें लुप्त होयं सदग्रंथ
|

                ग्रुपों के एडमिन बन कर तमाम लोग स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान, सर्वेसर्वा डिक्टेटर जैसा व्यवहार कर रहे हैं, कि हम जो कह रहे हैं वही सही है, मेरा ग्रुप मेरी मर्जी, विरोधी विचार प्रकट वाले का पत्ता काट देंगे,
====== यह राजहठ के अनुरूप है |
                           वे एडमिन  एवं उनके चंद समर्थक जो आपस में व्यक्तिगत अच्छी टिप्पणी करते हैं जिसका रचना से कोइ सम्बन्ध नहीं होता –यथा - Poetry is reflection of you...a pious soul...आदि,| उनकी रचनाओं पर विरुद्ध टिप्पणी करते ही, विषय से हटकर व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप, अज्ञानता एवं गाली-गलौज की अभद्र भाषा पर उतर आते हैं, बिना यह जाने, समझे की टिप्पणीकार का व्यक्तित्व, ज्ञान क्या है कैसा है |
                         सभी ऐसे नहीं हैं| कुछ ग्रुप समन्वित भी हैं | अभिव्यक्ति की आजादी अच्छी बात है| हमारा युवा वर्ग एवं सदियों से दबी, प्रताणित नारी अपनी आवाज बुलंद करे, स्वयं की सार्थक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करे, अभिनंदनीय है |
         परन्तु अति सर्वत्र वर्ज्ययेत | अधजल गगरी छलकत जाय की भाँति अल्प-ज्ञानयुत ये जन किसी के द्वारा विरोधी टिप्पणी पर तुरंत धैर्य खोकर अनुचित व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने लगते हैं एवं अपनी बात को येन केन प्रकारेण सही सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं |
===== यह बालहठ है |

               युवकों से अधिक युवतियां अपनी बात पर अधिक अड़ती हुई दिखाई देती हैं | किसी ने उनकी पुरुष विरोधी या समाज विरोधी रचना पर ज़रा सा कमेन्ट किया नहीं कि तुरंत रूढ़िवादी, नारी विरोधी, पुराणपंथी यहाँ तक कि कुंठित, मानसिक रोगी आदि जैसे व्यक्तिगत कमेन्ट भी मिल जायेंगे |
======= यह त्रियाहठ का रूप है |

                                 यह अति है, इस स्वरुप में आज समाज में नारी में गरिमा का अभाव है, पाश्चात्य संस्कृति व व्यवहार के प्रचलन व उनके षड्यंत्रों व स्व-संस्कृति के विरुद्ध कथनों/ प्रचार के कारण एवं स्व-संस्कृति के ज्ञान के अभाव में महिलायें शालीनता खो रही हैं| समाज, स्वसंस्कृति, गुरुजनों, शास्त्रों, विज्ञजनों की गरिमा के आदरभाव का अभाव है | पता नहीं क्यों वे तुलसी की उस प्रसिद्द चौपाई को सत्य सिद्ध करने पर तुली हैं |

        नारी का यह भाव देश, समाज, संस्कृति व मानवता के लिए घातक है | संभल जाएँ अन्यथा फिर न कहना कि बताया नहीं |

शुक्रवार, 1 जून 2018

अच्छे उद्देश्य के कार्य हेतु बुरा तरीका ----डा श्याम गुप्त



                            



             अच्छे उद्देश्य के कार्य हेतु बुरा तरीका ----- डा श्याम गुप्त

            -क्या इस अच्छे उद्देश्य के लिए कोइ अन्य अच्छा व शालीन तरीका नहीं अपनाया जा सकता था------परन्तु आसुरी प्रवृत्ति वाले क्षेत्रों में सोच का तरीका ही वही है ----



सोमवार, 14 मई 2018

भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना ----भाग चार— केवल वैदिक हिन्दू धर्म ही जीवित रहा - –डा श्यामगुप्त


                


भारत में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की कट्टरता -एक ऐतिहासिक आईना
================================================= - –डा श्यामगुप्त
भाग चार— केवल वैदिक हिन्दू धर्म ही जीवित रहा --(अंतिम क़िस्त )
======================================
-- हिन्दू धर्म जीवित रहा----
*******************************
                 जो कुछ ऊपर लिखा है वो अन्य देशों में भी हुआ वहां के मज़हब मिट गए और यह धर्म ज़िंदा है, सिर्फ बचे सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले –--
यूनान मिस्र रोमा, सब मिट गये जहाँ से
पर अब तलक है बाकी, नामों निशाँ हमारा |

\
                  पूरे के पूरे मज़हब ख़त्म हो गए दुनिया के नक़्शे से, कहाँ गया पारसी मज़हब अपनी जन्म भूमि ईरान से ? क्या क्या ज़ुल्म नहीं सहे यहूदियों और यज़ीदियों ने अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए, कहाँ है वे ।
-------कहाँ है बौद्ध धर्म का वो वटवृक्ष जिसकी शाखाएँ बिहार से लेकर अफगानिस्तान मंगोल चीन इंडोनेशिया तक में फैली हुईं थीं ?
-------कौन सा मज़हब बचा मोरक्को से लेकर मलेशिया तक ?
--------सिर्फ और सिर्फ बचे तो सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले।
\
                  यहाँ तक कि पं.जवाहरलाल नेहरू, जो मुस्लिमों के पक्षधर थे, ने भी अपनी पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया "में पूर्णतः आश्वस्त न होते हुए भी हिन्दू वर्णव्यवस्था के सम्बन्ध में लिखा है –
There is truth in that and its origin was probably a device to keep the foreign conquerors apart from and above the conquered people. Undoubtedly in its growth it has acted in that way, though originally there may have been a good deal of FLEXIBILITY about it.
-----यह सच्चाई लगती है कि इसकी उत्पत्ति विदेशी विजेताओं से स्वयं को पृथक रखने हेतु हुई | निश्चय ही प्रारम्भ में इसमें काफी लचीलापन रहा होगा |
Yet that is only a part of the truth and it does not explain its power and cohesiveness and the way it has lasted down to the present day.
----यह केवल एक सचाई है परन्तु इससे यह इसकी शक्ति एवं सबको जोड़कर रखने की क्षमता ज्ञात नहीं होती जिसके कारण ये आज तक वर्तमान स्थिति में मौजूद है |
It survived not only the powerful impact of Buddhism and Moughal rule and the spread of Islam.
-----यह व्यवस्था शक्तिशाली बौद्ध धर्म, मुग़ल शासन एवं इस्लाम के प्रसार के उपरांत भी जीवित रही |
\
                    और आज अपने को शूद्र कहने वाले, ब्राह्मणों या क्षत्रियों को दोष देने वाले अपने, स्वयं को तथाकथित भारत के आदि-निवासी कहने वाले, सेक्यूलर, काले अँगरेज़ आदि, मित्रों को ज़िम्मेदार कभी नहीं ठहराते और डा. सविता माई (आंबेडकर जी की ब्राह्मण पत्नी) के संस्कारों को ज़बरदस्ती छुपा लेते हैं|
-------- वे लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते, जिनकी वजह से वे आज भी हिन्दू हैं और उन्मुक्त कण्ठ से उन उच्चवर्णों ब्राह्मणो और क्षत्रियों को गाली भी दे सकते हैं जिनके पूर्वजों ने न जाने इस धर्म को ज़िंदा रखने के लिए क्या क्या कष्ट सहे।
\
                     शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो अपने पूर्वजों के बलिदानों को भूल कर, इस बात पर गर्व नहीं करते कि आज उनका धर्म ज़िंदा है, मगर वो रो रहे हैं कि वर्णव्यवस्था ज़िंदा क्यों है। क्या भील, गोंड, सन्थाल और सभी आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए क्या वर्णव्यवस्था जिम्मेदार है?
                    वस्तुतः आज जिस वर्णव्यवस्था में हम विभाजित हैं उसका श्रेय 1881 एवं 1902 की अंग्रेजों द्वारा की गयी जनगणना को है जिसने डेमोग्राफी को सरल बनाने के लिए हिंदू समाज
को इन तथाकथित चार वर्णों में वर्गीकृत कर दिया |
-----कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे प्रकरण के लिए ---
*****************************************************
------समकालीन आवश्यकतावश, अनजाने या भूलवश धर्म में विकृतियाँ लाने वाले पंडित,
-----उच्च जातियां, या उन्हें मजबूर करने वाले मुसलमान आक्रांता या
-------आपसे सच्चाई छुपाने वाले तथाकथित छद्म सेक्यूलर एवं इतिहास के वामपंथी व हिन्दू विरोधी विचारधारा वाले लेखक |
-----हमें क्या करना चाहिए---
***************************
                  कोई भी ज़िम्मेदार हो पर सभी हिन्दू भाइयो अब तो आपस में लड़ना छोड़ कर भविष्य की तरफ एक सकारात्मक कदम उठाओ। अगर एक पिछड़ी जाति के मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो उतने ही रास्ते तुम्हारे लिए भी खुले हैं, मान लिया कल तक तुम पर समाज के बहुत बंधन थे पर आज तो नहीं हैं ।
\
                      अतः आज आवश्यकता है कि पुरानी, नई व अधुना पीढ़ी को चाहिए कि विदेशी शक्तियों के विभिन्न लालचपूर्ण, लुभावने, तथाकथित प्रगतिशील, भौतिक उन्नति के बहाने सहायता-सहयोग आदि के रूप में आपके धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीय व जातीय एकता के विनाश व भविष्य की संतति के मानसिक व वैचारिक अप-परिवर्तन के षडयंत्रों को पहचानें व सकारात्मक विरोध व विरोध प्रदर्शन करें |
\
                   संज्ञान लेना चाहिए कि जिनके पूर्वजों ने ये सब अत्याचार किए, 800 साल तक राज किया, वो तो अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण व सभी सुविधाएं भी पा गये हैं और कटघरे में खड़े हैं, मूल देशवासी हिन्दू ---क्यों--- ??
\
------अगर आज हिन्दू एक होते तो कश्मीर घाटी में गिनती के 2984 हिन्दू न बचते और 4.50 लाख कश्मीरी हिंदू 25 साल से अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह न रह रहे होते, पार्लियामेंट पर हमला, तिरंगे का अपमान, स्वदेशी सेना पर पत्थरवाजी और 16 दिसंबर, निर्भया काण्ड, मेरठ काण्ड, हापुड़ काण्ड, जम्मू काण्ड आदि इस देश में न होते।
                                                                 ------इति---