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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

पुस्तक चर्चा--इन्द्रधनुष ----स्त्री-पुरुष विमर्श पर उपन्यास--डा श्याम गुप्त


पुस्तक चर्चा-----

इन्द्रधनुष ----स्त्री-पुरुष विमर्श पर उपन्यास --- 

-----लेखक --डा श्याम गुप्त ----
------समीक्षक -डा वी वे ललिताम्बा, प्राचार्य  व विभागाध्यक्ष ,हिन्दी विभाग , मैसूर विश्व विद्यालय ---
----प्रकाशक --सुषमा प्रकाशन , आशियाना, लखनऊ 














डा ललिताम्बा 




रविवार, 13 जनवरी 2019

शीत ऋतु-----डा श्याम गुप्त





-------हेमन्त ऋतु की आहट हो चली  है , रात्रि- समारोहों आदि में ठिठुरन से बचने के लिए  अलाव जलाए जाने  का क्रम प्रारम्भ हो चला है | प्रस्तुत है एक ठिठुरती हुई रचना .....
                         १.
(
श्याम घनाक्षरी --३० वर्ण , १६-१४, अंत दो गुरु -यगण)
 
थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि ,
उर मांहि उमंगायेपीर  वो  पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नरधूप बैठे  तापि रहे ,
धूप भी है कुछ, खोई सोई अलसानी |
शीत की लहर, तीर भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की, वो लहर अजानी ||

                        
     २.
( श्याम घनाक्षरी -३० वर्ण ,१६-१४, अंत दो गुरु - मगण)
 
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग- विरंगी ओढे, धरती रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम ,मेहंदी रंग,
घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं लता, चहुँ और मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||

                          
   ३.
( मनहरण घनाक्षरी -३१ वर्ण ,१६-१५,अंत लघु-गुरु -रगण )
 
ठंडी ठंडी भूमि नंगे पाँव लगे हिमशिला ,
जल छुए लगे छुआ बिजली का तार है |
कठिन नहाना नल लगे जैसे सांप कोई,
काँप रहा तन चढ़ा जूडी का बुखार है |
शीत में तुषार से है मंद रवि प्रभा हुई,
पत्तियों पै बहे ओस जैसे अश्रु धार है |
घर बाग़ वन जला आग बैठे लोग जैसे,
ऋषि मुनि करें यज्ञ विविधि प्रकार हैं ||


गुरुवार, 10 जनवरी 2019

महिलायें, घर में और बाहर - डा श्याम गुप्त

महिलायें, घर में और बाहर -----देखें चित्र में --- 


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यह विचार #गलत है कि -----
स्त्री-पुरुष के मध्य कामों का बंटवारा महज़ एक परम्परा है और लिंग के मुकाबले काम की बजाय उसे काम का चुनाव करने दिया जाय
-------वस्तुतः यह महज़ एक परम्परा ही नहीं अपितु एक सोची समझी हुई सुदृढ़ परम्परा है| 
------ जव मानव समाज उन्नत होकर घुमंतू से स्थिर हुआ तो स्त्री-पुरुष दोनों ही भोजन की खोज में घर से बाहर जाया करते थे और आज के पशु पक्षियों के बच्चों की भांति उनकी संतान भी असुरक्षित रह जाती थी, अतः किसी एक को निवास स्थान पर रुकने की आवश्यकता उत्पन्न हुई |
------ स्त्री शारीरिक बल में कमजोर व गर्भधारण के समय अक्रिय परन्तु #आपत्तिकाल में सदा #प्रत्युत्पन्नमति एवं #तात्कालिक प्रयासों में #तेज होने के कारण उसने स्वयं ही गृह व संतति सुरक्षा का कार्य स्वीकार किया |
------- यह मानव इतिहास का #सर्वप्रथमकार्यविभाजन था, समाज व संतति की सुरक्षा हेतु | पुरुष का कार्य व दायित्व गृह, संतति व स्त्री का पालन पोषण स्थिर हुआ | 
\
यह सही है कि----
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हम कर सकते हैं “ --महिलायें सब कुछ कर सकती हैं--- 
-------कब नहीं कर सकती थीं, परन्तु #आपत्तिकालमें क्योंकि “आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति” | प्रथम कार्य-विभाजन का मूल अस्तित्व ही इस तथ्य पर था |
------ प्रत्येक ऐसे काल में जब पुरुष वर्ग असहाय हुआ है स्त्री ने ही समाज को संरक्षित करने की कमान सम्हालने का महत कार्य किया है |
------- चाहे सरमा-सरस्वती के रूप में या दुर्गा-पार्वती-काली के रूप में, घोषा, भारती, इडा, कैकेयी, सीता, राधा, सावित्री, मदालसा, या सत्यभामा व लक्ष्मीबाई, जीजाबाई मुगलों की सेना व आतातायी विधर्मियों से लोहा लेने वाली वीरांगनायें हों| 
------परन्तु सामान्य काल में उन्हें अपने स्वाभाविक कार्यों से विमुख होकर यह कृत्य करने के क्या आवश्यकता | 
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यह भी उचित विचार-कथ्य नहीं है ---
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कि एक महिला कमाएगी तो परिवार की स्थिति सुधरेगी और देश समाज की भी |
------- घर, पत्नी व संतान का पालन-पोषण ==दायित्व पुरुष का है== उसे क्यों इस कार्य से छुटकारा दिया जाय, नाकारा बनाया जाय | स्त्री क्यों इस कार्य को अपने हाथ में ले | 
-------फिर संतान, घर व समाज की देखभाल कौन करेगा जो अधिक महत्वपूर्ण है, पुरुष निश्चय ही इसमें उतना सक्षम नहीं है| 
------#माँ व #सेविका में अंतर होता है यह सभी जानते हैं गुणवान व सक्षम माँ से पलने वाले संतान का पालन अक्षम व बाहरी तत्व, अनपढ़ या कम गुणों वाली स्त्री से होना उसका ही नहीं ==देश-समाज का भी दुर्भाग्य ==है | ----------------#संततिवर्धन के दायित्व में कमी होना देश-समाज-राष्ट्र व मानवता की सबसे बड़ी क्षति है, जो आज युवाओं व बालकों के कृतित्वों से परिलक्षित हो रही है | 
\
सोचिये कि क्यों आखिर महिलाओं को इतने लम्बे समय से सेवा एवं कार्य करने के इतने प्रगतिशील फैसलों के पूर्ण रूप से लागू होने के बाद भी अभी तक उनको ==पुरुषों के बराबर भुगतान नहीं किया जा रहा==है, क्यों सभी देशों में पुरुषों को उनसे बेहतर माना जाता है |
------- यह केवल नकारात्मक मानसिकता नहीं अपितु आर्थिक फैसले हैं जिनके अनुसार महिलायें कम प्रोडक्शन-लाभ देती हैं | एवं यह सत्य ही है |