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शनिवार, 13 जुलाई 2013

व्यथा

उत्तराखंड की त्रासदी एक सन्देश है ........


पर्वत नदियाँ झरने वन , कितना सुन्दर था संगम
तृप्त आँखें पीती थीं अमृत , देख -देख द्रश्य विहंगम


मूल प्राकर्तिक थी रचनाएँ , बहती अनेक थी जलधाराएं
जल प्रपात ऊपर से गिरता , वन में संगीत महोत्सव सजता

अहा ! धरा का सौन्दर्य नैसर्गिक , चहुँ और थी खुशहाली
 स्वर सुरीले समा बांधते , जब गाती थी हरियाली

मानव को सूझा विकास , कर बैठा अपना विनाश
पश्चाताप के अश्रू है क्या  ??? , लगता है शायद हताश

कहीं काट दिए वृक्ष असंख्य , कहीं रोक दी जल धारा
हर पग बढ़ा रहा ओर विनाश की , नहीं समझता मतिमारा

वन्य जीव हैं आश्रय हीन ,
बना दिया मानव ने दीन

रोते पर्वत और कंदराएं ,मानव को कैसे समझाएं
बार-बार सन्देश मिल रहे , क्यों ये सब वो समझ ना पाए

बीच -बीच में क्रोधित होती ,प्रकृति का समझो सन्देश ,
कदम समय पर नहीं रुके तो , नहीं रह पायेगा कुछ शेष







7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (13-07-2013) को समय की कमी ने मार डाला में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर और सामयिक विषय पर आपने अपनी प्रस्तुति दी है।
    अगर इसमें कुछ दोहे भी होते तो बहुत अच्छा रहता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज रविवार (28-07-2013) को त्वरित चर्चा डबल मज़ा चर्चा मंच पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं