यह ब्लॉग खोजें

मंगलवार, 24 मई 2016

Memories --poem--- Dr shyam gupta

                             

Memories --poem---


Through the campus of Staff College
Beneath the trees, I pass-
To reach in time
For management class.


The memories of college
Strike my mind,
Like a revolution-
Of cyclonic wind.


The friends the gossips,
The class-room heats,
Sweet sour memories
Of functions and treats.


The memories of-
Sports and fetes,
Of unsolved issues,
And sweet sour dates.


What memories are?
When I think apart,
These are books and magazines
In the library of heart.


We open them up,
In the secret hours lane,
To live those forgotten-
Moments again.


शुक्रवार, 20 मई 2016

दो मुक्तक "आहुति देते परवाने हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

(1)
जीवन में तम को हरने को, चिंगारी आ जाती है।
घर को आलोकित करने को, बहुत जरूरी बाती है।
होली की ज्वाला हो चाहे, तम से भरी अमावस हो-
हवनकुण्ड में ज्वाला बन, बाती कर्तव्य निभाती है।
(2)
हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं। 

शुक्रवार, 13 मई 2016

डेमोक्रेसी की जीत या मानव आचरण की हार --डा श्याम गुप्त ..


               डेमोक्रेसी की जीत या मानव आचरण की हार 
 
       चार शेर मिलकर एक हाथी या जन्गली भैंसे को मार गिराते हैं तो क्या आप इसे शेरों की 
 शानदार विजय कहेंगे या ईश्वर की  ना इंसाफी कहेंगे कि उसने हाथी को तीब्र नाखून सहित पंजे क्यों नहीं दिए | यह जंगल नियम है डेमोक्रेसी नहीं | जंगल में ऐसा ही होता है | भोजन प्राप्ति हेतु | इस प्रक्रिया में आचरण –सत्यता का कोइ अर्थ नहीं होता |
 
          राजाओं के समय में एवं अंग्रेजों के समय में भी शेर को हांका द्वारा घेर कर लाचार अवस्था में बन्दूक से मारा जाता था और बड़ी शान से इसे शिकार कहा जाता था | यह भी जंगल क़ानून की ही भाँति था, मनुष्य का जंगल  क़ानून  |
 
          १३वीं शताब्दी में विश्व के सबसे प्रसिद्द, शक्तिशाली, धनाढ्य एवं सुराज वाले राज्यतंत्र विजयनगर साम्राज्य को दक्षिण भारत की छः छोटी छोटी विधर्मी रियासतों ने मिलकर धोखे से पराजित कर दिया था, एवं ६ माह तक वह विश्व प्रसिद्द राज्य व जनता लूटी जाती रही थी |
 
          यही आजकल होरहा है, राजनीति में  –डेमोक्रेसी के नाम पर | धुर विरोधी नीतियाँ, आचरण वाली राजनैतिक पार्टियां आपस में मिलकर, जनमत द्वारा बहुमत में आई हुई पार्टी को किसी व्यर्थ के विन्दु विशेष पर हरा देते हैं और फिर चिल्ला चिल्ला कर डेमोक्रेसी के बचने की दुहाई दी जाती है |
 
         अभी हाल में ही उत्तराखंड की विधान सभा का घटनाक्रम इसी प्रकार का घटनाक्रम है | यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी प्रश्न चिन्ह उठाता है | आखिर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा अवैध घोषित किये गए सदस्यों को वोटिंग से वंचित क्यों किया, जबकि राज्यपाल के आदेश की वैधता का कोर्ट से फैसला नहीं हुआ था | फ्लोर-टेस्ट से पहले इस वैधता के प्रश्न का फैसला क्यों नहीं किया गया, ताकि सदस्यों के वैधता/अवैधता एवं उनके वोट देने के अधिकार का सही उपयोग होपाता | फ्लोर टेस्ट की ऐसी क्या जल्दी थी क्या राज्य कुछ दिन और राष्ट्रपति शासन में नहीं चल सकता था, जब तक अन्य सभापति, राज्यपाल व राष्ट्रपति के आदेशों पर फैसला नहीं होजाता | 
    यह कैसी डेमोक्रेस की जीत है जहां विधान सभा के सभापति, राज्यपाल, राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट सभी के फैसले एक प्रश्नवाचक चिन्ह लिए हुए हैं| 
 
     यह वास्तव में तो डेमोक्रेसी की हार ही है |
 
    यदि यह डेमोक्रेसी की जीत है तो निश्चय ही मानव आचरण की हार है, और देश, समाज, राष्ट्र के लिए क्या आवश्यक है, यह तथाकथित डेमोक्रेसी या मानव आचरण |


गुरुवार, 5 मई 2016

कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?----डा श्याम गुप्त

                     कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?


              एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
             इस पर श्री हरि बोले, "गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"

                        सदानीरा व परमपावन गंगा नदी को प्राणियों के समस्त पापों को दूर करने वाली कहा जाता है | परन्तु वह स्वयं अपवित्र नहीं होती| प्रत्येक हिंदू व उसके परिवार की इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए | युगों से ये प्रथा चली आ रही है | अस्थियाँ गंगा में विसर्जित होती आरही हैं फिर भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह अस्थियां जाती कहां हैं?

                  गौमुख से गंगासागर तक खोज करने के बाद भी वैज्ञानिक भी आज तक इस प्रश्न का उत्तर इसका उत्तर नहीं खोज पाए | क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है।

  सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार-------
 
-----मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। ”पारद“ शब्द में -पा = विष्णु...र = रूद्र शिव और ‘द’ = ब्रह्मा के प्रतीक है। यह अस्थियां सीधे श्रीहरि के चरणों में बैकुण्ठ चली जाती हैं। जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे मरणोपरांत मुक्ति मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से----- 

-----पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततः शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते है। पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को माँ पार्वती का स्वरूप। इसलिए गंगा में ताम्र के सिक्के फैकने की प्रथा है | इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है।

  वैज्ञानिकों के अनुसार-----

--- गंगाजल में पारा (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में उपस्थित कैल्शियम और फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक तत्व है। हड्डियों में गंधक (सल्फर) होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण करता है जो जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों, मूलतः क्लोराइड व ब्रोमाइड, आयोडाइड,कार्बन, मेग्नीशियम, पोटेशियम द्वारा औषधीय गुण उत्पन्न करते हैं। मूलतः यह मरकरी सल्फाइड साल्ट (HgS) का निर्माण करते हैं। जल में उपस्थित वायु द्वारा ऑक्सीकृत होने पर पारद पुनः मुक्त हो जाता है। और अस्थियों के रासायनिक विसर्जन यह क्रम चलता रहता है | हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है।

---- पारा एक तरल पदार्थ होता है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न अन्य धातुओं जैसे कि स्वर्ण, रजत, ताम्र सहित विभिन्न जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण, रज़त और ताम्र के साथ मिला कर, फिर उन्हें पिघला कर आकार दिया जाता है। जो पारद-शिव लिंग बनाने के काम लाया जाता है | ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इससे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं|

---- पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है। मर्क्यूरोक्रोम हीलिंग के लिए प्रयुक्त एक मुख्य रसायन है |

------ पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से फिलोस्फर्स स्टोन भी कहा जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं| उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थमा, डायबिटीज में पारद से बना मणिबंध (ब्रेसलेट ) पहनाया जाता है |

मंगलवार, 3 मई 2016

‘मैं तुम हम---कुण्डली छंद .. डा श्याम गुप्त .....

मैं तुम हम---कुण्डली छंद ..


मैं’ औ ‘तुम’ हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व, द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ ‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’ ||





तुम मैं प्रभु! हैं एक ही, लोकनाथ हम आप |
बहुब्रीहि हूँ नाथ मैं, आप तत्पुरुष भाव |
आप तत्पुरुष भाव, लोक के नाथ सुहाए ,
लोक हमारा नाथ, नाथ मेरे मन भाये |
खोकर निज अस्तित्व, मुक्ति पाजाऊँ जग में,
मेरा ‘मैं’ हो नष्ट, लीन होजाए तुम में ||



हम तुम मैं वह आप सब उस ईश्वर के अंश,
फिर कैसा क्यों द्वंद्व दें, इक दूजे को दंश |
इक दूजे को दंश, स्वार्थ अपने-अपने रत ,
परमार्थ को त्याग, स्वयं को ही छलते सब |
अपने को पहचान दूर होजायं सभी भ्रम,
उसी ईश के अंश, श्याम’ सब मैं वह तुम हम ||

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

""कवि और कविता" का लोकार्पण सम्पन्न हुआ" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

दिनांक 24-04-2016 को हल्द्वानी के  होटल आमोर के सभाकक्ष में
स्व. मोहनचन्द्र जोशी के काव्य संग्रह "कवि और कविता" 
का लोकार्पण सम्पन्न हुआ।
जिसका प्रकाशन 29 वर्षों के बाद 
स्व. मोहनचन्द्र जोशी 
के ज्येष्ट पुत्र गिरीश जोशी जी ने कराया है।
 
लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. गोविन्द सिंह 
(निदेशक-उत्तराखण्ड मुक्त विश्विद्यालयहल्द्वानी) रहे 
तथा अध्यक्षता खटीमा के साहित्यकार डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंकने की ।
इस कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्ध नागरिकों के साथ 
जोशी परिवार के समस्त सम्बन्धी भी थे।
कार्यक्रम का शुभा रम्भ व्यापक जोशी द्वारा 
सरस्वती वन्दना से किया गया। तत्पश्चात्
स्व. मोहनचन्द्र जोशी जी की श्रीमती नन्दी जोशी का 
नागरिक अभिनन्दन किया गया और उन्हें
"कवि और कविता" की प्रति भेंट की गयी।
दिल्ली से पधारे नरेन्द्र सिंह 'नीरवने कार्यक्रम का 
सफल और सुरुचिपूर्ण संचालन किया।
इस कृति का सम्पादन करने वाले "शब्दांकुर प्रकाशन" के काली शंकर 'सौम्यने 
अपने उद्बोधन में पुस्तक के विषय में प्रकाश डालते हुए अपनी कुछ रचनाओं का भी पाठ किया।
स्व. मोहनचन्द्र जोशी के कनिष्ठ पुत्र
दिव्यांग जीवन चन्द्र जोशी भी समारोह में उपस्थित थे
जिन्होंने "एक पहल दिव्यांग स्वयं सहायता समूह" के माध्यम से 
 दिव्यांगों को जीवन की जीने की दिशा दी। 
जिस पर दिव्यांगी सुश्री कविता और निर्मला मेहता ने
प्रकाश डाला। पुस्तक का आवरण चित्र बनाने वाले विमल पाण्डेय ने अपने सम्बोधन मेंआवरण की सार्थकता पर अपने उद्गार व्यक्त किये।
स्व. मोहनचन्द्र जोशी 
की पुत्री सुश्री निर्मला जोशी 'निर्मल
और श्रीमती मीनू पाण्डेय ने
काव्य संग्रह की कुछ रचनाओं का वाचन भी किया। 
इसके अतिरिक्त सौरभ पन्तअमर उजालादैनिक जागरण आदि 
समाचार पत्रों के सम्वाददाता भी समारोह में उपस्थित थे।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ ---डा श्याम गुप्त

माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ 


                    लखनऊ-नई दिल्ली नेशनल हाईवे-24-सीतापुर रोड  स्थित बख्शी का तालाब कस्बे से 11 किमी आगे सड़क पर चन्द्रिका देवी तीर्थधाम है। गोमती नदी के समीप स्थित महीसागर संगम तीर्थ के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में माँ दुर्गा के नौ रूपों के साथ उनकी वेदियाँ चिरकाल से सुरक्षित रखी हुई हैं। जो पत्थर की  पिंडियों के रूप में स्थित हैं|

               अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध से यहाँ माँ चन्द्रिका देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। अमीर हो अथवा गरीब, अगड़ा हो अथवा पिछड़ा, माँ चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मेले आदि के व्यवस्थापक कठवारा गाँव के प्रधान होते हैं। महीसागर संगम तीर्थ के पुरोहित और यज्ञशाला के आचार्य ब्राह्मण। माँ के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ) पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। यह समभाव का एक समेकित उदाहरण है।
चन्द्रिका देवी धाम की तीन दिशाओं उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में गोमती नदी की जलधारा प्रवाहित होती है तथा पूर्व दिशा में महीसागर संगम तीर्थ स्थित है। जनश्रुति है कि महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता और इसका सीधा संबंध पाताल से है।

    मान्यताओं के अनुसार – मूलतः कूर्म पुराण  एवं स्कन्द पुराण में इनका वर्णन है |
-----सतयुग में दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को श्राप मुक्ति हेतु इसी महीसागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए चन्द्रिका देवी धाम में आना पड़ा था।
-------त्रेता युग में लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) के अधिपति लक्ष्मण-उर्मिला पुत्र चन्द्रकेतु को चन्द्रिका देवी धाम के तत्कालीन इस वन क्षेत्र में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ गोमती पार करते हुए अमावस्या की अर्धरात्रि में जब भय व्याप्त होने लगा तो उन्होंने अपनी माता द्वारा बताई गई नवदुर्गाओं का स्मरण किया और उनकी आराधना की। तब चन्द्रिका देवी की चन्द्रिका ( उजली चांदनी रात ) के आभास से उनका सारा भय दूर हो गया था।
------उन्होंने एक भव्य मंदिर की स्थापना की जो १२वी सदी में विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था |
द्वापर में महाभारतकाल में पाँचों पाण्डु पुत्र द्रोपदी के साथ अपने वनवास के समय इस तीर्थ पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज द्वारा रोके जाने पर युधिष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा, जिसमें उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हुआ था| महाराजा युधिष्ठिर की सेना अर्थात कटक ने यहाँ वास किया तो यह गाँव कटकवासा कहलाया। आज इसी को कठवारा कहा जाता है।
------स्कन्द पुराण के अनुसार द्वापर युग में श्री कृष्ण के परामर्श पर घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपार शक्ति प्राप्त हेतु माँ चन्द्रिका देवी धाम स्थित महीसागर संगम में तप किया था।
-------आज से लगभग २५० वर्ष पहले यह एक घना वन था | यहाँ के कठवारा गाँव के जमींदार को स्वप्न में चंद्रिका देवी के दर्शन हुए | उन्होंने वर्त्तमान मंदिर की स्थापना की एवं अमावस्या के दिन मेले की व्यवस्था प्रारम्भ की जो आज तक चली आरही है |

इस सिद्धपीठ धाम में बर्बरीक द्वार, सुधन्वा कुण्ड, महीसागर संगम तीर्थ के घाट आदि आज भी दर्शनीय हैं।
-------- वस्तुतः यह प्रागैतिहासिक युग की सप्तमातृकाओं का मंदिर –चंडिका देवी मंदिर है | बृक्ष के कोटर में ध्यान से देखने पर सात पिंडियाँ दिखाई देती हैं, शेष रूप नव-निर्मित हैं | ये चंडी या चंडिका ( नारसिंही ) के नाम से प्रसिद्ध आदिशक्ति अम्बिका दुर्गा ने --रक्तबीज के विरुद्ध सप्त-मातृकाओं के रूप के साथ युद्ध किया था जो वैष्णवी, कुमारी, महेश्वरी, ब्रह्माणी, वाराही, एन्द्री (महेंद्री या शची, वज्री ), चामुन्डा ( चर्चिका या काली ) हैं|
------मही सागर तीर्थ --एक पाताल तोड़ कुआँ -- आर्टीजीयन कुआं है ..जिसका आतंरिक जुड़ाव गौमती से हो सकता है ...
---------गौमती नदी स्वयं भारत की एकमात्र नदी है जो हिमालय की बजाय स्वयं एक पातालतोड कुए से उद्भूत होती है --आदि-गंगा है |
चित्र-१.चंद्रिका देवी मुख्य दर्शन ...२.बाहरी द्वार --मुख्य सीतापुर हाईवे , बक्शी का तालाब पर ...मही सागर तीर्थ में भगवान शिव ...४. मही सागर तीर्थ ...५. मंदिर का द्वार

Drshyam Gupta's photo.

फ़ॉलोअर