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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....डा श्याम गुप्त


                             

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....
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                          काफी समय पश्चात वयोवृद्ध कविवर श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी से मैंने उनके घर पर मुलाक़ात की | मैं भी पर्याप्त समय से नगर के बाहर था एवं विभिन्न कार्यक्रमों में व्यस्त था, वे भी अमेरिका गए हुए थे | सैनी जी वहां के संस्मरण सुनाते रहे| वहां रचित एक कविता भी उन्होंने सुनाई | एक अन्य कविता जो सैनी जी ने डा रामाश्रय सविता के लिए लिखी थी वह भी सुनाई, मेरी प्रतिक्रया एवं साहित्यिक समीक्षात्मक सम्मति भी पूछी | मैंने भी उन्हें अपनी पुस्तक ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ भेंट की एवं उनके अनुरोध पर दो गज़लें भी सुनाईं |
--------यह एक संक्षिप्त द्विपक्षीय गोष्ठी थी | सैनी जी यद्यपि अपने अन्तरंग मित्रों प्रतिष्ठा संस्था के अध्यक्ष श्री स्व. रामाश्रय सविता, वीरेन्द्र अंशुमाली एवं जगत नारायण पांडे के स्वर्गारोहण के पश्चात गोष्ठियों में कम ही आते जाते हैं परन्तु उम्र के इस मुकाम पर भी वे साहित्य सृजन में व्यस्त हैं| पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं|
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श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी आशियाना व आलमबाग क्षेत्र में प्रत्येक गुरूवार को होने वाली साहित्यिक गोष्ठी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं|
-------वर्ष सन २००५ में प्रतिष्ठा संस्था, आलमबाग के महामंत्री (स्व)  श्री वीरेन्द्र प्रकाश गुप्ता’अंशुमाली’ एवं महाकवि( स्व.)प. जगतनारायण पांडे ने विचार-विमर्श के उपरांत एक एसी गोष्ठी-वर्ग बनाने का निश्चय किया जो अनौपचारिक हो एवं संस्थाओं के विविध प्रोटोकोल अध्यक्ष, नियम–कायदे आदि से स्वतंत्र केवल सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का हेतु हो, जिसमें अधिक कवि भी न हों |
--------यह एक अन्तरंग गोष्ठी की परिकल्पना थी जिसमें एक दूसरे की रचनाओं पर पारस्परिक विमर्श एवं कमियों व विशेषताओं पर विचार हो, जिसका मूल उद्देश्य केवल कविता पढ़कर चल देने की अपेक्षा साहित्यक-सामाजिक श्रेष्ठता पर भी ध्यान दिया जाना था|
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दोनों मनीषियों ने श्री प्रेमचन्द्र सैनी को साथ लिया एवं जगत नारायण पांडे जी के घर पर प्रथम गोष्ठी का आयोजन किया एवं मुझे भी सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया गया |
------इस प्रकार यह चार कवियों द्वारा प्रारंभ यह गोष्ठी अपने विशिष्ट साहित्यिक कार्यक्रम के साथ प्रारंभ हुई| तत्पश्चात श्री मधुकर अष्ठाना, रामदेवलाल विभोर को भी शामिल किया गया | --------बारी बारी से सदस्यों के आवास पर आयोजित होने वाली गोष्ठी में बसंत राम दीक्षित, स्व.पंकज श्रीवास्तव, स्व. निर्मला साधना व अन्य कवि भी शामिल होते गए और अपना वर्तमान संस्थागत रूप लेती गयी |
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इस प्रकार लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में यह एक विशिष्ट गोष्ठी के रूप में स्थापित हुई जिसमें न कोइ अध्यक्ष, न अतिथि न संचालक है | न कोइ चन्दा, न मासिक अंशदान इत्यादि | सभी के घर पर बारी बारी से अनवरत रूप से होती रहती है | सभी एक क्रम से अपनी अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करते हैं, उन पर सामाजिक-साहित्यिक रूप से विचार विमर्श भी होता है |
----लखनऊ में प्रायः गोष्ठियां रविवार को ही होती हैं एक या दो को छोड़कर जो शनिवार को या फिर अनियातिकालीन , जो कभी भी होजाती हैं |
-------अतः इस गोष्ठी को प्रत्येक गुरूवार को होना सुनिश्चित किया गया एवं कोइ विशिष्ट औपचारिक नाम न रखकर इसे ***गुरुवासरीय गोष्ठी*** का नाम दिया गया |
----अनौपचारिकता, उच्च कोटि की साहित्यिक प्रगति एवं साहित्य के सामाजिक सरोकार जिसका मुख्य उद्देश्य है |
------- वर्त्तमान में यह गोष्ठी प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, सेक्टर-के , लखनऊ पर होती है |
चित्र में---गुरुवासरीय गोष्ठियों के दृश्य ------
श्री अंशुमाली व जगत नारायण पांडे .....डा रामाश्रय सविता व प्रेम चन्द्र सैनी मेरे आवास पर गोष्ठी में .......प्रेम चन्द्र सैनी --कुछ शायरी की बात होजाए --पढ़ते हुए ........गुरुवासरीय गोष्ठी के विविध दृश्य ..
Image may contain: 5 people, including Kamlesh Narain Srivastava and Ramdeo Lal Vibhor, people sitting, table and indoor









मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार---डा श्याम गुप्त






                                



           
 
                           विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार  
       प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, नवसृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, कविवर श्री बिनोद कुमार सिन्हा,अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री रामदेवलाल विभोर,  प्रदीप कुशवाहा, महेश अस्थाना, प्रदीप गुप्ता, श्रीमती पुष्पा गुप्ता, विजयलक्ष्मी महक , मंजू सिंह एवं श्रीमती सुषमागुप्ता व डा श्यामगुप्त ने भाग लिया |
       वाणी वंदना डा श्याम गुप्त, सुषमागुप्ता व श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने की | गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने तम्बाकू की हानियों पर प्रकाश डालते हुए दोहे प्रस्तुत किये---
तम्बाकू से फेफड़े होने लगते ग्रस्त |

उल्टी होती जब कभी गिरने लगता रक्त |
       डा.योगेशगुप्त ने नदी रेत व सागर के अंतर्संबंध की दार्शनिक व्याख्या करते हुए अतुकांत रचना प्रस्तुत की ---बाँध बांधने से भी क्या होगा

          नदी को तो खोना ही है ;

          रेत के विस्तार में

          या सागर के प्यार में |
       श्रीमती पुष्प गुप्ता ने गृहस्थ जीवन को अग्निपथ बताते  हुए कहा—
गृहस्थ जीवन अग्निपथ, गृहणी की कर्मभूमि,

तपोभूमि, निष्ठा परिपक्व, सहज मन, अच्युत थिर हो | 
      श्रीमती मंजू सिंह ने फूलों की विशिष्टता पर गीत सुनाते हुए कहा-
फूल कभी रोते नहीं ,

फूलों को तो बस हंसना आता है |
       श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने बेटी व दुल्हन समन्वित गीत प्रस्तुत किया—
बेटी वाला क्या देगा, क्या लोगो तुम,

बेटी से बढकर कोइ सौगात नहीं होती
      कविवर  श्री महेश अस्थाना प्रकाश ने दिल से दिल को राहत पर गुनगुनाया---
आओ हम गुनगुनालें, दिल से दिल मिला हम लें |

ना शिकवा हो ना शिकायत, दिल से दिल को राहत मिले |
    कवि प्रदीप गुप्ता ने भी फूलों की नाजुकता यूं बयाँ की---
फूल आहिस्ता फैंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,

होजाते हैं खुद तो घायल, पर औरों को सुख देते हैं|
    प्रदीप कुशवाहा ने जीवन के बारे में अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा –
जीवन स्वयं एक प्रश्न है,सबको हल करना है |

हंसकर या रोकर, प्रदीप जीवन जीना है |
      
      बिनोद कुमार सिन्हा ने पुराने ज़माने को याद करते हुए गुनगुनाया—
वे भी क्या ज़माने थे  हर क्षण खुश के तराने थे |

मेरी हसरत भरी निगाहें, बेसब्र रही थी दीदार के |
    श्री रामदेव लाल विभोर ने अँधेरे और जुगनूं की बात की –
चमकना गर न आता हो, तो पूछो उस अँधेरे से,

उड़ा करता जहां जुगनूं, है खुद की रोशनी लेकर |
     सुषमागुप्ता जी ने मुरलीधर कान्हा को करुणा का सागर बताते हुए गीत प्रस्तुत किया—
हे करुणा के सागर श्याम,

मुरलीधर कान्हा घनश्याम |
       डा श्यामगुप्त ने आजकल चिकित्सकों व अस्पतालों में हो रही लापरवाही पर जन सामान्य को भी दोषी बताते हुए एक नवीन तथ्य की प्रस्तुति की ---
पैसा आज बहुत पब्लिक पर, सभी चाहते, ‘वहीं’ दिखाएँ |

चाहे जुकाम या कुछ खांसी, विशेषज्ञ ही हमको देखे |.......
    तथा उन्होंने नारी की त्रासदी को इंगित करते हुए एक प्रश्न उठाया---–
औरत आज भी डर डर कर जिया करती है ,

जाने किस बात की कीमत अदा करती है |
        अगीत विधा के प्रवर्तक एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष साहित्यभूषण साहित्यमूर्ति डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने गोष्ठी की समीक्षात्मक सराहना करते हुए अपना सुप्रसिद्ध गीत सुनाया....
जगमगाता हुआ दीप मैं बन सकूं

स्नेह इतना ह्रदय में भरो आज तुम |
      द्वितीय सत्र में कविगण पुष्पा गुप्ता, विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, प्रदीप कुशवाहा, महेश अष्ठाना, श्री रामदेव लाल विभोर एवं सुषमा गुप्ता को सम्मान पात्र देकर को सम्मानित भी किया गया |
      संक्षिप्त जलपान एवं डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात् गोष्ठी समाप्त हुई |

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