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(१)
सुन्दरियाँ इठला रहीं, रन वर्षा के साथ।
अंग प्रदर्शन कर रहीं, हिला-हिला कर हाथ।।
हिला-हिला कर हाथ, खूब मटकाती कन्धे।
खुलेआम मैदान, इशारे करतीं गन्दे।।
कह मयंक कविराय, हुई नंगी बन्दरियाँ।
लाज-हया को छोड़, नाचती हैं सुन्दरियाँ।।
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(२)
आई कैसी सभ्यता, फैला कैसा रोग।
रँगे विदेशी रंग में, भारत के अब लोग।।
भारत के अब लोग, चले हैं राह वनैली,
उपवन में उग रही, आज है घास विषैली।।
कह मयंक कविराय, वतन में आँधी छाई।
घटे बदन के वस्त्र, सभ्यता कैसी आई।।
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