|
विनीता अग्निहोत्री की कविता
अगस्त पाँच को दीवाली है मनने वाली
फिर से भूमि अयोध्या की है सजने वाली
खूब बजेंगे शंख-ढोल, मंजीरे-थाली
चातक मोर-पपीहा धुन गायेंगे मतवाली
झूम उठेगी फिर सरयू के तट हरियाली
अब शुभ वेला की तारीख न जाये टाली
गाओ नाचों और बजाओ दिल से ताली
दीप जलेंगे खुशियों के तो हो जायेगी दीवाली
साधू-सन्त मिटा देंगे अब रजनी काली
बोलो जय श्रीराम पियो मधु रस की प्याली
![]()
- विनीता अग्निहोत्री
|
यह ब्लॉग खोजें
विनीता अग्निहोत्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विनीता अग्निहोत्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, 2 अगस्त 2020
अगस्त पाँच को दीवाली मनने वाली (विनीता अग्निहोत्री)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
फ़ॉलोअर
-
निर्मम दुनियाँ से सदा , चाहा था वैराग्य पत्थर सहराने लगा , हँसकर अपना भाग्य हँस कर अपना भाग्य , समुंदर की गहराई ...
-
हलचल होती देह से, मन से होता ध्यान लहरों को माया समझ, गहराई को ज्ञान गहराई को ज्ञान , मिलें गहरे में मोती सीधी-सच्ची बा...
-
राष्ट्रीय ग्रन्थ हम कितने मूर्ख हैं जो विश्व की धरोहर महात्मा गांधी को भारत का राष्ट्रपिता बनाकर सीमित किये दे रहे हैं, बिना मतलब के ...
