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बुधवार, 10 जुलाई 2013

प्रेम और मनुहार (दोहे)

बीस बरस में थी बनी ,प्रेम भरी दीवार।  
बीस दिवस भी ना लगे ,डाली बीच दरार  

नेह नीर से सींच कर ,बोया था विश्वास।  
दीमक जड़ तक कब गई ,नहीं हुआ आभास॥ 
  
छुपी हुई हर  ह्रदय  में ,देखो एक किताब |
जिसके पन्नो में छुपा,बिसरा हुआ गुलाब ||  
  
मिला खाद में जो दिया ,प्रेम और मनुहार। 

शुष्क वृक्ष ने देख कर ,बदल लिया व्यवहार॥   
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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

मँहगाई की बीन पे , नाच रहे हैं साँप

निर्मल मन मैला बदन , नन्हे नन्हे हाथ।  
रोटी का कैसे जतन, समझे ना ये बात॥  


तरसे इक- इक कौर को ,भूखे कई हजार।  
गोदामों में सड़ रहे, गेहूं के अम्बार॥  

राहत को तकते  नयन , पूछ रहे है बात।  
प्रजा तंत्र के नाम पर,क्यूँ करते हो घात ॥  

सीना क्यूँ फटता नहीं, भूखे को बिसराय।  
हलधर का अपमान कर,गेहूँ दियो सडाय॥  

शासन की सौगात हो, या किस्मत की हार।  
निर्धन को तो झेलनी, है जीवन की मार॥  

ना कोई चूल्हा जले, ना लकड़ी ना तेल।  
मंत्रियों तक दौड रही ,सिलेंडरों की रेल॥  

दिन हैं भ्रष्टाचार के,सत्य रहा है काँप।  
मँहगाई  की बीन पे , नाच रहे हैं साँप॥  

बिगड़ी सूरत देश की ,किस के जल से धोय।  
गंगा भी मैली करी,साधन  बचा न कोय॥  
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बुधवार, 3 जुलाई 2013

जो मन की पाती पढ़ें ,तो दुख काहे होय|| (पांच दोहे)

कंधों पर तू ढो रहा ,क्यों कागज  का भार|
आरक्षण तुझको मिले,पढ़ना है बेकार||-------(व्यंग्य)
मन कागज पर जब चले ,होकर कलम अधीर|
शब्द-शब्द मिलते गले ,बह जाती है पीर||
भावों-शब्दों में चले,जब आपस में द्वंद|
मन के कागज पर तभी,रचता कोई छंद||
टूटे रिश्ते जोड़ दे ,इक नन्हीं सी जान|

कोप सुनामी मोड़ दे ,बालक की मुस्कान||
तन की पाती सब पढ़ें ,मन की पढ़ें कोय|
जो मन की पाती पढ़ें ,तो दुख काहे होय||
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सोमवार, 1 जुलाई 2013

मन के विकार

त्रुटि का कद मत नापिये,कद में ना कुछ भेद|
पूरी नैया दे डुबा, इक नन्हा  सा छेद||

गलती से मत  भागिये ,छुपना है बेकार|
गलती, गलती ही रहे ,हो कोई आकार||

धरती पर जैसे रचे, जन जीवन कर्तार|
माटी से गढ़ता  रहा ,बर्तन देख कुम्हार||

माटी-माटी खेलते,चाक थके ना हाथ|
माटी में पैदा हुआ,जाना उसके साथ||


लगा डुबकियाँ कुंभ में ,तन का मैल उतार| 
कहाँ उतारे सोच ले ,मन का शेष विकार||
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