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रविवार, 13 अप्रैल 2014

ईशोपनिषद के द्वितीय मन्त्र .... के द्वितीय भाग ... ' एवंत्वयि नान्यथेतो S स्ति न कर्म लिप्यते नरे ||'.... का काव्य-भावानुवाद .... डा श्याम गुप्त.....

ईशोपनिषद के द्वितीय मन्त्र .... 

                                               कुर्वन्नेवेह कर्माणि  जिजीविषेच्छतम समा |                                                   एवंत्वयि नान्यथेतो S स्ति न कर्म लिप्यते नरे ||'

के द्वितीय भाग ... ' एवंत्वयि नान्यथेतो S स्ति न कर्म लिप्यते नरे ||'.... का काव्य-भावानुवाद ....


सदकर्मों की इच्छा ले यदि ,
मानव, सेवा-धर्म निभाये |
जीवन अल्प हो चाहे जितना ,
शत शत शरद का जीवन पाए |

इसी भावयुत कर्म किये जा ,
यही एक बस उचित पंथ है |
अन्य न जीवन राह है कोई ,
यह जीवन का सत्य मन्त्र है |

कन्टकीर्ण है राह कर्म की,
पग पग पर बाधाएं मग में |
जाने कितने तृष्णा-लालच ,
के पल आते हैं इस पथ में |

कर्म लिपट ही पाते हैं कब,
उससे जो त्यागी अलिप्त है|
लिप्सा तृष्णा उसे बांधती,
अपकर्मों में नर जो लिप्त है |

कर्म भाव के सत्य मार्ग पर,
चलता दृड़ता से जो कोई |
लिप्त न होता उसे न होती ,
कर्मों में आसक्ति न कोई |

लिप्सा लालच स्वार्थ भावना,
नहीं लिपट पाती तन मन से |
ईश्वर प्राप्ति, मोक्ष क्या होगी,
सुन्दर उस पावन जीवन से ||





                                 

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