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सोमवार, 15 जून 2015

"अमन 'चाँदपुरी' का संस्मरण" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी' का भेजा संस्मरण प्राप्त हुआ।
जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-
नाम- अमन सिहं 
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई. 
पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर 
तहसील- टांडा 
जिला- अम्बेडकर नगर 
(उ.प्र.)-224230
संपर्क : 09721869421
ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com
     यह संस्मरण है इक्कीसवीँ सदी के दूसरे दशक के दूसरे साल यानी सितम्बर 2012 का। उसी साल हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैनेँ ग्यारहवीँ मेँ दाखिला लिया था। उसी दौरान मुझ पर एक अजीब सा नशा चढ़ा था। मैँ अपने जनपद की कुछ प्रसिद्द, महान हस्तियोँ के बारे मेँ जानने के लिए और उन पर लिखने के लिए अखबारोँ की कटिँग आदि माध्यमोँ से जानकारी जुटाने लगा था। डॉ. लोहिया, मेँहदी हसन, सैय्यद अहमद, जयराम वर्मा और ध्रुव जायसवाल आदि लोग इस कड़ी मेँ मेरी रुचि को और भी प्रखर करते गये। 
    मैं जिनके बारे मेँ जानना चाहता था। जल्द ही दो-चार दिनोँ मेँ भरपूर जानकारी सम्बन्धित व्यक्ति के बारे मेँ जुटा लेता था। मुझे इस विषय मेँ रुचि तब आयी; जब मैनेँ श्रीकृष्ण तिवारी, जो कि उसी क्षेत्र के हैँ। जहाँ से मैँ हूँ. की पुस्तक "जिला अम्बेडकर नगर का आईना" पढ़ी। जिसमेँ वर्तमान समय और पूर्व की कुछ प्रमुख हस्तियोँ का संक्षिप्त परिचय है; केवल एक महापुरुष को छोडकर जिसपर उन्होंने विस्तृत पुस्तक, उनकी जीवनी लिखी है जिसका नाम है "पूर्वाँचल के गांधी जयराम वर्मा" यानी स्वर्गीय जयराम वर्मा जी। 
    मैनेँ इनके बारे मेँ काफी कुछ सुना था। ये उत्तर प्रदेश के आधे से ज्यादा भाग के गांधी कहलाते हैं। जो ईमानदारी, सादगी की मिशाल थे। प्रदेश सरकार मेँ मन्त्री भी रहे। राज्यपाल तक का पद जनता की सेवा मेँ समर्पित रहने के लिए ठुकरा दिया। 
    यह पुस्तक मुझे बहुतोँ प्रयास के बाद भी हासिल न हुई। इसका एक मात्र संस्करण 1999 मेँ छपा था जिसकी बमुश्किल 150 प्रतियाँ ही छपी थी। जिसे लेखक और प्रकाशक ने चुनिन्दा लोगोँ को ही नि:शुल्क वितरण किया था। यह पुस्तक बजार मेँ भी उपलब्ध नहीँ थी। इसे पाने का एक मात्र जरिया लेखक ही थे।
     सितम्बर से लेकर नवम्बर के मध्य मैँ हर दस-पन्द्रह दिनोँ मेँ एक बार जरुर श्रीकृष्ण तिवारी जी के घर जाता रहा। लेकिन उनके अस्वस्थ होने और लखनऊ मेँ होने कि वजह से मुझे हर बार निराश होकर लौटना पडता था। एक बार उनके सबसे छोटे सुपुत्र ने बताया जिनका नाम इस वक्त याद नहीँ आ रहा है कि यह पुस्तक मुझे एक और जगह (व्यक्ति) से प्राप्त हो सकती है और वो हैं श्रीराम अशीष वर्मा जी। 
    जो जयराम वर्मा जी द्वारा ही स्थापित "जयराम वर्मा बापू स्मारक इंटर कालेज" के प्रधानाचार्य और "पूर्वाँचल के गांधी जयराम वर्मा" के प्रकाशक भी है। मैँ इनके पास भी गया। और उस पुस्तक को पढ़ने के लिए अपनी उत्सुकता का जिक्र भी किया। लेकिन परिणाम वही रहा ढाक के तीन पात निराश लौटना पडा। इन्होनेँ साफ इनकार कर दिया और कहा "मेरे पास उपलब्ध नहीँ है।" जबकि उनके पास उस पुस्तक की दस-बारह से भी ज्यादा प्रतियाँ थी। फिर भी नहीँ है कहा। 
    खैर कोई बात नहीँ, मैं भी निराश होकर उसे पढने की मंशा छोड चुका था। मगर मैंने अपने अन्दर जब थोडी-सी काव्य प्रतिभा विकसित कर ली तो यह पुस्तक मुझे खुद ही ढूढती हुई चली आयी। 
     चार फरवरी को जयराम वर्मा जी की जयन्ती होती है। उस वर्ष उनकी 110 वीँ जयंती थी। इल्तिफातगंज मेँ जहां मैँ रहता था वहां घर के एकदम बगल मेँ ही जयराम वर्मा बापू स्मारक इंटर कालेज के इतिहास के लेक्चरर श्री राकेश वर्मा जी रहते थे। जिन्हेँ मैँ अपनी रचित काव्य पक्तियाँ कभी-कभी सुनाता था। इन्होनेँ जयराम वर्मा जी पर उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मुझसे एक कविता रचने का प्रस्ताव रखा। जिसे मैनेँ भी स्वीकार कर लिया। मगर समस्या यह थी कि मुझे जयराम वर्मा जी के बारे मेँ मालूम तो था; पर उतना पर्याप्त नहीँ था, काव्य रचना के लिए। 
      इन्होनेँ मुझे बताया कि उनके कालेज के लाइब्रेरी मेँ जयराम वर्मा जी की जीवनी है। उन्होनेँ कहा "मैँ अपने कालेज से पुस्तक ले आऊगां, तुम उसको पढ़कर जयराम वर्मा जी पर कविता लिख देना।" मैनेँ भी स्वीकृति दे दी। और जयराम वर्मा जी पर कविता भी रची। और वह पुस्तक जिसे पढ़ने के लिए मैँ महीनोँ ढूढता रहा, वह आखिरकार मुझे ही ढूढते हुऐ मेरे पास आ गयी। -चाँदपुरी

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

"पहाड में मामा-मामी उपहार में मिले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)



पहाड़ में मामा-मामी उपहार में मिले!
यह बात 1966 की है। उन दिनों मैं कक्षा 11 में पढ़ रहा था। परीक्षा हो गईं थी और पूरे जून महीने की छुट्टी पड़ गई थी। इसलिए सोचा कि कहीं घूम आया जाए। तभी संयोगवश् मेरे मामा जी हमारे घर आ गये। वो उन दिनों जिला पिथौरागढ़ में ठेकेदारी करते थे। उन दिनों मोटरमार्ग तो थे ही नहीं इसलिए पहाड़ों के दुर्गम स्थानों पर सामान पहुँचाने का एक मात्र साधन खच्चर ही थे।

   मेरे मामा जी के पास उन दिनों 20 खच्चर थीं जो आरएफसी के चावल को दुर्गम स्थानों तक पहुँचातीं थीं। दो खच्चरों के लिए एक नौकर रखा गया था इसलिए एक दर्जन नौकर भी थे। खाना बनाने वाला भी रखा गया था और पड़ाव बनाया गया था लोहाघाट। मैं पढ़ा-लिखा था इसलिए हिसाब-किताब का जिम्मा मैंने अपने ऊपर ही ले लिया था।
मुझे यहाँ कुछ दिनों तक तो बहुत अच्छा लगा। मैं आस-पास के दर्शनीय स्थान मायावती आश्रम और रीठासाहिब भी घूम आया था। मगर फिर लौटकर तो पड़ाव में ही आना था और पड़ाव में रोज-रोज आलू, अरहर-मलक की दाल खाते-खाते मेरा मन बहुत ऊब गया था। हरी सब्जी और तरकारियों के तो यहाँ दर्शन भी दुर्लभ थे। तब मैंने एक युक्ति निकाली जिससे कि मुझे खाना स्वादिष्ट लगने लगे।
मैं पास ही में एक आलूबुखारे (जिसे यहाँ पोलम कहा जाता था) के बगीचे में जाता और कच्चे-कच्चे आलूबुखारे तोड़कर ले आता। उनको सिल-बट्टे पर पिसवाकर स्वादिष्ट चटनी बनवाता और दाल में मिलाकर खाता था। दो तीन दिन तक तो सब ठीक रहा मगर एक दिन बगीचे का मालिक नित्यानन्द मेरे मामा जी के पास आकर बोला ठेकेदार ज्यू आपका भानिज हमारे बगीचे में से कच्चे पोलम रोज तोड़कर ले आता है। मामा जी ने मुझे बुलाकार मालूम किया तो मैंने सारी बता दी।
नित्यानन्द बहुत अच्छा आदमी था। उसने कहा कि ठेकेदार ज्यू तुम्हारा भानिज तो हमारा भी भानिज। आज से यह खाना हमारे घर ही खाया करेगा और मैं नित्यानन्द जी को मामा जी कहने लगा।
उनके घर में अरहर-मलक की दाल तो बनती थी मगर उसके साथ खीरे का रायता भी बनता था। कभी-कभी गलगल नीम्बू की चटनी भी बनती थी। जिसका स्वाद मुझे आज भी याद है। पहाड़ी खीरे का रायता उसका तो कहना ही क्या? पहाड़ में खीरे का रायता विशेष ढंग से बनाया जाता है जिसमें कच्ची सरसों-राई पीस कर मिलाया जाता है जिससे उसका स्वाद बहुत अधिक बढ़ जाता है। ऐसे ही गलगल नीम्बू की चटनी भी मूंगफली के दाने भूनकर-पीसकर उसमें भाँग के बीज पीसकर मिला देते हैं और ऊपर से गलगल नींबू का रस पानी की जगह मिला देते हैं। (भाँग के बीजों में नशा नहीं होता है)
एक महीने तक मैंने चीड़ के वनों की ठण्डी हवा खाई और पहाड़ी व्यंजनों का भी मजा लिया। अब सेव भी पककर तैयार हो गये थे और आलूबुखारे भी। जून के अन्त में जब मैं घर वापिस लौटने लगा तो मामा और मामी ने मुझे घर ले जाने के लिए एक कट्टा भरकर सेव और आलूबुखारे उपहार में दिये।
आज भी जब मामा-मामी का स्मरण हो आता है तो मेरा मन श्रद्धा से अभिभूत हो जाता है।
काश् ऐसी पिकनिक सभी को नसीब हो! जिसमें की मामा-मामी उपहार में मिल जाएँ!
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आज वो पहाड़ी मामा-मामी तो नहीं रहे मगर उनका बेटा नीलू आज भी मुझे भाई जितना ही प्यार करता है।
पहाड़ का निश्छल जीवन देखकर मेरे मन में बहुत इच्छा थी कि मैं भी ऐसे ही निश्छल वातावरण में आकर बस जाऊँ और मेरा यह सपना साकार हुआ 1975 में। मैं पर्वतों में तो नहीं मगर उसकी तराई में आकर बस गया।

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