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सोमवार, 8 जुलाई 2013

अरुण निगम के दोहे :



जल  वे  भरने    गये   ,  जलवे  लेकर  साथ
नल  की  साँसें  थम  गई , खाली  गगरी  हाथ  |

नल  नखरे  दिखला  रहा , चिढ़ा रहा नलकूप
पल  भर में  मुरझा  गया , निखरा निखरा रूप |

ताल - तलैया  शुष्क थे  , नल की थी  हड़ताल
नयनों का जल छलकता, काजल बहता गाल  |

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पानी  पानी  हो  गई  ,   ऐसी  आई  लाज
घूंघट पट खोला नहीं  , सैंया  हैं  नाराज |

देख सकी पनघट नहीं, कैसे भरती नीर
घूंघट  ही   बैरी  हुआ , कासे  कहती  पीर |

घूंघट पट पलटा गई ,  ऐसी  चली  बयार
निर्निमेष  पिय  देखते , सूरत  पानीदार |
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