यह ब्लॉग खोजें

समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 21 जनवरी 2018

पुस्तक-समीक्षा —-जिज्ञासा काव्य-संग्रह ---डा श्यामगुप्त

पुस्तक-समीक्षा —-जिज्ञासा काव्य-संग्रह ---डा श्यामगुप्त

                               



Image may contain: 1 person, closeupImage may contain: flower, sky, plant, cloud, nature and outdoorImage may contain: 1 person, sunglasses and closeup
 पुस्तक-समीक्षा------
समीक्ष्य कृति—-जिज्ञासा काव्य-संग्रह --- रचनाकारश्री प्रेमशंकर शास्त्री ‘बेताव’ ..प्रकाशक—अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ ..प्रकाशन वर्ष—२०१७ ई....मूल्य -१५०/- समीक्षक---डा श्यामगुप्त
----------
                    श्री प्रेमशंकर शास्त्री बेताब जी द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘जिज्ञासा’ का अवगाहन करने का अवसर प्राप्त हुआ | हिन्दी के प्रवक्ता पद पर कार्यरत बेताब जी की हिन्दी साहित्य व काव्य में रूचि स्वाभाविक है | एक शिक्षक होने के नाते सामाजिक सरोकार, मानवीय आचरण एवं उपदेशात्मक भाव कृति में सर्वत्र समाहित हैं|
                      ------आपके पिता व माताजी को समर्पित इस काव्यकृति में छप्पन विविध विषयक एवं विविध प्रकार के छंद युक्त रचनाओं से युक्त इस कृति में कलम, ग्राम-सुधार, मानव आचरण, भाग्य व ईश्वर, हिन्दी की प्रशस्ति, शिक्षक गरिमा, पर्यावरण, स्वच्छता जैसे सांसारिक व दार्शनिक विषयों के साथ साथ सामयिक सन्देश भी सौन्दर्यमयता से वर्णित हैं|
                ------अपनी बात में वे अपने कविकर्म का उद्देश्य व स्वदृष्टि प्रकट करते हैं ,”क्योंकि जो समाज में होरहा है, या होता है, उससे रचनाकार अछूता नहीं रह सकता |’...”इसप्रकार रचनाकार समाज का सजग प्रहरी है
-------कविता का भाव अर्थ व मानव जीवन पर वृहद् प्रभाव पर अपनी दृष्टि बेताब जी प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर देते हैं, ---
-’हमेशा दो दिलों को जोड़कर कविता दिखा देती ..”
----इतिहास साक्षी है की काव्य ने समय समय पर समाज व साम्राज्यों की संरचनाओं को प्रभावित किया है |
सरस्वती वन्दना में कवि माँ से मानवता के लिए प्रार्थना करता है-
हम चलें नेक राहों पर, मन शुभ भावों से भरा रहे |’
\
                         माँ की विविध नामों से एवं विविध देवों की वन्दना वही नवीन प्रयोग है जो मैंने अपने महाकाव्यों सृष्टि एवं प्रेमकाव्य में दस दस वन्दनाएँ प्रस्तुत करके किया था |
                ----साहित्यकार बोधक एवं लिखने हेतु विभिन्न विषयों का सांगोपांग समुचित वर्णन रचना ‘कलम की आवाज’ में दिया गया है भाग्य-चक्र में, ‘भाग्य से ही प्रभु वन पथ पर चले “ द्वारा भाग्य को कोसने की अपेक्षा कर्म पर विश्वास जताया गया है | नीति के दोहों में वैज्ञानिकता युक्त शास्त्र सम्मत विविध कर्मों व कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया है |
\
                          नारी की अस्मिता किसी भी राष्ट्र का ही पर्याय है | रचना ‘--
 नारी का सम्मान करो, 
मत भारत को बदनाम करो ‘ -----में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते...’ का भाव ही ध्वनित है |
                     -----भारतीय सम्यक दृष्टि का वैश्विक भाव वर्णन वे इस प्रकार करते हैं--
‘वैसे तो हम समदृष्टा हैं 
धर्म आदि का भेद भुलाकर रखते हैं| ‘------यह निश्चय ही ऋग्वेद के अंतिम मन्त्र ---
..’समानी अकूती समानी हृदयानि वा, 
समामस्तु वो यथा सुसहमति “ ----से तादाम्य करती है | शिक्षक गरिमा की बात शिक्षक लेखक कैसे भूल सकता है, कवि का कहना है कि,’ है गुरुतर भार यही हम पर, ज्ञान की ज्योति जलाने का ..’|
.-----बस मज़ा ही कुछ और है..’ शीर्षक विशेष है जिसमें प्रतिदिन के क्रियाकलापों का सुन्दर वर्णन है ..
लम्बी लम्बी हांकने का, भाभी से हाल पूछने का, मज़ा ही कुछ और है ‘.....
\
प्रकृति की आवाज़ ही कवि को रचना हेतु प्रेरणा देती है—‘
जबसे अलि को सुना गुनगुनाते हुए,
तबसे गाने की मुझसे लगन लग गयी ..’ |
         ------अपने इतिहास व अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटकर कोई भी राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता | देववाणी संस्कृति हमारी भाषा, संस्कृति व सामाजिक सभ्यता के प्रवाह की मूल सलिला है | कविवर बेताब आव्हान करते हैं—‘संस्कार की जननी है देववाणी, 
इसका गौरव भी सबको बता दीजिये |
-----------कृति की शीर्षक रचना ‘जिज्ञासा’ में कृति को माँ सरस्वती की अनुकम्पा घोषित करते हुए कविवर प्रेमशंकर बेताब जी अपने कृतित्व से संतुष्ट हैं, वे कहते हैं—“मुराद रही जो मन में मन भर, अब तो पूरी हुई सही |’..यह कवि का आशावाद है, स्वयं पर आत्मविश्वास |
\
                           कृति की भाषा मूलतः सरल सामान्य बोलचाल की खड़ीबोली हिन्दी है, जो स्पष्ट भावसम्प्रेषण में समर्थ है | यथानुसार देशज, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत के शब्द भी प्रयुक्त हैं| रचना ‘चक्कर स्वारथ का देखौ’...में अवधी का प्रयोग हुआ है | शैली सहज सरल प्रवाहयुक्त व अभिधात्मक है कथ्यशैली मूलतः उपदेशात्मक है, यथा विषयानुसार दार्शनिक व वर्णानात्मक भी है | रस, अलंकार भी आवश्यकतानुसार प्रयोग हुए हैं| सदाचार की अगम नदी में –रूपक, मोती सा चमकाती हूँ में उपमा एवं गेहूं घुन जस खाय, में उत्प्रेक्षा अलंकार की सुन्दरता है | अगर जरूरत पडी देश को, अपना लहू बहा देंगे में बीररस एवं भाभी से हाल पूछने का, मज़ा ही कुछ और है में मर्यादित श्रृंगार है |
--------सभी प्रकार के प्रचलित गीत बन्दों एवं दोहा, कुण्डली, घनाक्षरी, सोरठा, पद आदि छंदों का प्रयोग किया गया है –एक सुन्दर कला व भाव युक्त मनहरण कवित्त देखें—
भाव की, भाषा छंद की, प्रगाढ़ गाढ़ ज्ञान की ,
मधु मंद रव की पुकार भर दीजिये
रचना डाकिया में अतुकांत छंद का भी प्रयोग किया गया है ..’औरों की चिंता में डूबा,/ प्राणों से ज्यादा चिट्ठियों का ख्याल,/ यही है उसका हाल,/ आखिर वह कौन / डाकिया, डाकिया |
\
                     इस प्रकार विषय, भाव व कलापक्ष के यथारूप सौन्दर्य से निमज्जित यह कलाकृति जिज्ञासा सुन्दर व सफल कृति है जिसके लिए श्री प्रेमशंकर शास्त्री बेताब जी बधाई के पात्र हैं|


दिनांक-१९ जनवरी, २०१८ ई.                                                                  डा श्यामगुप्त
सुश्यानिदी, के ३४८, आशियाना,                                                  एमबीबीएस, एमएस ( सर्जन )
लखनऊ-२२६०१२.                                                                 हिन्दी साहित्यविभूषण, साहित्याचार्य...
मो. ९४१५१५६४६४



शनिवार, 12 दिसंबर 2015

समीक्षा – अनुभूतियाँ गीत संग्रह....डा श्याम गुप्त

समीक्षा – अनुभूतियाँ गीत संग्रह....डा श्याम गुप्त

                               


समीक्षा – अनुभूतियाँ

कृति—अनुभूतियाँ- गीत संग्रह ..रचनाकार –डा ब्रजेश कुमार मिश्र ..प्रकाशन-- नीहारिकांजलि प्रकाशन, कानपुर ...प्रकाशन वर्ष –२०१५ ई.....मूल्य ..२५०/-रु....समीक्षक –डा श्यामगुप्त ....


 
------- डा ब्रजेश कुमार मिश्र मेरे चिकित्सा विद्यालय के सहपाठी हैं | उन्होंने विशेषज्ञता हेतु काय-चिकित्सा को चुना और मैंने शल्य-चिकित्सा को | वे भावुक, सुकोमल ह्रदय एवं संवेदनशील व्यक्तित्व हैं| काव्य व संगीत में उन्हें प्रारम्भ से ही रूचि है | अपने बैच के पूर्व-छात्र सम्मिलन समारोहों में उन्हें हारमोनियम पर मनोयोग से संगीत प्रस्तुत करते हुए देखकर सुखद आनंद की अनुभूति होती है | आगरा नगर का निवासी होने के कारण अनुभूतियों के आत्म कथ्य..”भाव सुमन...” में उनके द्वारा वर्णित आगरा नगर का सुकोमल भावपूर्ण सौन्दर्य को मैंने भी जिया है| यह डा ब्रजेश के संवेदनशील व कोमल ह्रदय एवं काव्य प्रतिभा का संक्षिप्त परिचय है | ऐसे सुकोमल व्यक्तित्व द्वारा रचित गीत भाव-प्रधान, संगीत-प्रधान व सुकोमल होने ही चाहिए | हम लोगों के कैशोर्य व युवा काल में जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पन्त, मैथिलीशरण गुप्त महानायकों की भाँति सभी काव्यप्रेमी जनों के मन पर छाये हुए थे | यह मूलतः छायावादी गीतों का युग था | अतः डा मिश्र के गीतों में स्वतः ही छायावादी गीत शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है | यह स्वाभाविक है- “महाजनाः येन गतो स पन्था” |
-------- एक चिकित्सक, व्यक्ति व समाज की भावनाओं, संवेदनाओं व अपेक्षाओं को अपेक्षाकृत अधिक निकट से परखता है, जान पाता है एवं ह्रदय तल की गहराई से अनुभव कर पाता है| गीत ह्रदय से निसृत होते हैं| संवेदनाओं, अनुभूतियों व भावनाओं के ज्वार जब उमड़ते हैं तो गीत निर्झर प्रवहमान होते हैं--

“दिल के उमड़े भावों को जब,
रोक नहीं पाए,
भाव बने शब्दों की भाषा
रची कहानी है |” .(डा श्याम गुप्त के गीत..’गीत क्या होते हैं’..से )

------ भावुक व्यक्ति स्मृतियों में जीने वाले होते हैं, प्रीति-स्मृतियाँ जीवन की सुकोमलतम स्मृतियाँ होती हैं, संयोग की हों या वियोग की | डा मिश्र ने स्वयं ही कहा है –
“प्रेम के उद्गीत गाना चाहता हूँ ..” (प्रीति के मृदु गीत ..से ) तथा
“उर वीणा में प्रिय गूँज तुम्हारी पायल की ..” (पृष्ठ ६५ )
------- डा मिश्र की कृति ‘अनुभूतियाँ’ के गीत मूलतः छायावादी हैं| पीड़ा व विरह इनका मूल विषय भाव है | पीड़ा जो प्रकृति वर्णन, वसंत, प्रेम, मिलन, विरह, श्रृंगार, स्मृतियाँ, पायल की गूँज व सामाजिक सरोकार के गीतों को भी आच्छादित किये हुए है | कृति के प्रारम्भ के जो तीन मुक्तक हैं, कवि के कृतित्व के सारभाव हैं |..कवि के अनुसार –
“मृदुल उर की व्यंजना का प्रस्फुटन हैं..” | -----पीड़ा प्रीति का उत्कृष्ट भाव है | कवि का कथन है –--
“ये गीत नहीं मेरे अंतर की आहें हैं |” ...तथा..

“उर से जो छलकीं प्रीति कहो,
इनको मत केवल गीत कहो |”

------ प्रस्तुत कृति एसी ही संवेदनाओं के उदगार हैं | जीवन राह पर चलते चलते मनुष्य सुख-दुःख, सफलता-असफलता, अधूरी कामनाओं, संयोग-वियोग, प्रेम-विरह से दो-चार होता है| उन्हीं अनुभूतियों, संवेदनाओं, भावनाओं का भाव-शब्द प्राकट्य है प्रस्तुत कृति, जिसमें भावपक्ष तो उत्कृष्ट है ही कलापक्ष भी सफल, सुगठित, सुष्ठु व श्रेष्ठ
है | यह वस्तुतः लम्बे समय तक मौन साधनारत व्यक्तित्व की मौन पीड़ा, विरह व आप्लावित हुई संवेदनाओं का मुखरित होना है | पीड़ा का उद्रेक जब ह्रदय में आप्लावित होता है तो कवि कह उठता है ...
“झिलमिला कर अश्रुकण कुछ /
व्यथा चुप चुप कह गए |” (पृष्ठ ११८ )...
स्मृतियाँ कवि के जीवन का महत्वपूर्ण भाग है........
”जिनके नेहिल सुस्मरण मुझे, पल पल हुलसाते रहते हैं|”
----- परन्तु पीड़ा व विरह के मुखरित गीतों में भी नैराश्य नहीं है अपितु आशा की भोर का आव्हान है ---
“सबल शुभ संकल्प लाओ /
भोर के तुम गीत गाओ | ( भोर के गीत से..)
और जब यह पीड़ा स्व से पर की ओर, सामाजिक पीड़ा में, व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होती है, परमार्थ सापेक्ष होती है तो कवि गा उठता है ---
“हों परिवर्तन आमूल चूल.. ./
निकलें जीवन के सभी शूल |
मृदु प्रेम जगे सब बैर भूल ...\ ..
जागे नूतन स्वर्णिम विहान .”..(पृष्ठ ३४..) ....तथा कवि दीप ही बना रहना चाहता है ...
”.दीप लघु प्रतिविम्ब मेरा /
दर्द से अनुबंध मेरा ..” (पृष्ठ ४०..) |

----- यह साहित्य का सामाजिक सरोकार रूप है | यह छायावादी काव्य की विशेषता है | यह साहित्य है, यही कवित्व है | जो काव्य का उद्देश्य है |

--------ज्ञान का आडम्बर सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है | अज्ञानी रो सकता है, परन्तु समाज के ऊंचे पायदान पर खडा व्यक्ति चाहकर भी नहीं रो सकता | सबल, सत्यनिष्ठ, एकाकी, अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए पीड़ा व्यक्त करने का माध्यम गीत व साहित्य ही होजाता है ..
“टुकडे टुकडे दर्पण उर का /
टप टप टप टप रजनी रोई /
मन की पीर न जाने कोई ..|(पृष्ठ ३७..)
------अपनों द्वारा प्रदत्त पीड़ा अधिक कष्टदायी होती है, नैराश्य भी उत्पन्न होता ही है ..
“आश्रयी अहि ने डसा है /
होगये विश्वास खंडित “(पृष्ठ १०६)|
------ संयोग हो या वियोग, प्रकृति वर्णन तो अवश्यम्भावी है...
”अवश मन उष्मित शिराएं देह की /
रच रहा फागुन ऋचाएं नेह की .(पृष्ठ ८९) |
------फूले कचनार, लो फागुन आया रे, घिर घिर बरसो बदरा कारे ...में प्रकृति का सौन्दर्यमय वर्णन है |

------- जीवन दर्शन को भी सुचारू रूप से व्यक्त किया गया है ..
”कुछ स्वप्न अधूरे रहते हैं ..” एवं
“ जीवन की अंधी गलियों में ../
जाने कितने स्वप्न खोगये ..|”..(पृष्ठ ५५)


-------परन्तु कवि निसंकोच सहनशीलता व धैर्य का वरण करता है..
क्यों याद करें जो मिला नहीं/
सोचें क्या हमने पाया है..(प्र-९७)|

------ कवि के अनुसार गीत विश्रांति कारक भी हैं..
”होरहा जीवन हलाहल../
पर अधर पर गीत फिर भी |
------जीवन संघर्ष में कभी कभी नैराश्य भी आता ही है परन्तु कर्म-पथ पर चलते चलते कवि को पता ही नहीं चलता कि—
“जीवन पथ के संघर्षों में /
जाने कब वह शाम होगई |”.....और यह यात्रा अविराम है ..
“मैं राही निर्जन पथ का रे ../
चलना ही है अब जीवन ..|”

------ इस विश्व को सत्यं शिवं सुन्दरं बनाना ही साहित्य का उद्देश्य है ...अतः कवि कह उठता है –
“तमस में भटके पगों को,
सत्य-उज्जवल पथ दिखाने |
शिवं के शुभ गीत गाना चाहता हूँ |”...(प्रीति के मृदु गीत से )
------- प्रस्तुत कृति मूलतः भाव-अनुभूतिजन्य गीत-कृति है अतः कलापक्ष को सप्रयास नहीं सजाया गया है अपितु वह कलात्मक गुणों से स्वतः ही शोभायमान है, सशक्त है| भाषा शुद्ध सरल साहित्यिक हिन्दी है जो कहीं कहीं संस्कृतनिष्ठ है | शब्दावली सुगठित सरल सुग्राह्य है छायावादी शैली के बावजूद दुरूह नहीं | कविवर जयशंकर प्रसाद जैसी प्रसाद गुण युक्त कोमलकांत पदावली में मूलतः अभिधात्मक कथ्य शैली का प्रयोग किया गया है | आवश्यकतानुसार लक्षणा व व्यंजना का भी विम्ब प्रधान प्रयोग है यथा---

“टप टप टप टप नदिया रोई, मन की पीर न जाने कोइ |...अभिधात्मक शैली ..

“अंग अंग भर उमंग, पुरवा के संग अनंग |
खोल रहा ह्रदय बन्ध, बिखरा मृदु मलय गंध |.....लक्षणा ...|

व्यंजना के साथ एक विम्ब प्रस्तुत है –
“मलय झकोरा लगा लपट सा”.....
.”रच रहा फागुन ऋचाएं नेह की ..”
               गीत मूलतः १६ मात्रिक एवं १४ मात्रिक चतुष्पदियों में रचित हैं | कुछ गीतों में पंचपदी एवं २० व २२ मात्रिक छंद भी प्रस्तुत किये गए हैं |
            गीतों में मूलतः विरह श्रृंगार का रसोद्रेक सर्वत्र विकिरित है ....
“ बिना तुम्हारे रोते उर को,
कैसे कोइ धीर बंधाये |
तुम न आये | “
------परन्तु संयोग के बिना विरह का अस्तित्व कहाँ अतः संयोग श्रृंगार, नख-शिख वर्णन एवं प्रकृति वर्णन, के भी यथानुसार सुन्दर विम्ब प्रस्तुत हुए हैं-
“नील शरशय्या पर अभिराम /
कुमुदिनी का वैभव विस्तार |.”.

“पीत चुनरिया सरसों पहने, हरा भरा घाघरा मखमली |” ...एवं ..

“वाणी में वीणा का गुंजन,
गति में सुरवाला का नर्तन |
उर में दहके मादक मधुवन,
मधुमास रहे जिसमें हर क्षण |”
 
विविध अलंकारों की छटा भी देखते ही बनती है ...लगभग सभी मुख्य अलंकारों का समुचित प्रयोग हुआ है- .
“घन अन्धकार का बक्ष चीर,
चमके चपला का रज़त चीर” ..एवं
“अर्थ के राज्य में नेह का अर्थ क्या” ...में चीर एवं अर्थ में यमक का सौन्दर्य है |

मालोपमा की छटा देखिये ... जिसमें अनुप्रास, रूपक के विम्ब की छटा भी उपस्थित है ...
“मदिर मधुमय मृदु सरस मधुमास तुम हो,
प्रथम पावन प्यार का उल्लास तुम हो |
मलय सुरभित उल्लसित वातास तुम हो,
स्वाति जलकण निहित चातक आस तुम हो | “

“गहन सुधि के सुभग सुकोमल कर ...” में मानवीकरण है |

ध्वन्यात्मक व अनुप्रास, का समन्वित उदाहरण ..”छल छल छल छल नदिया रोई ..” में दृष्टव्य है |

“है घट रहा चिर नेह स्तर, क्षीण होता वर्तिका स्वर
धूम रेखा बन बिखरता, व्योम में तनु गात नश्वर |”.....में नेह, वर्तिका, दीप, शरीर के विम्बों में शब्द व अर्थ श्लेष का सुन्दर समायोजन हुआ है |

              आलोचनात्मक दृष्टि के बिना कोई भी समीक्षा अधूरी ही रहेगी | पुस्तक के कवर फ्लैप पर दोनों वक्तव्य अत्यंत छोटे अक्षरों में हैं सुदृश्य नहीं हैं| दोनों विद्वान् साहित्यकारों द्वारा लिखित भूमिकाएं अनावश्यक दीर्घ कलेवर की हैं जो कृति की भूमिका की अपेक्षा समीक्षा अधिक प्रतीत होती हैं जिनमें कृति व कृतिकार के बारे में कथ्य सुस्पष्ट नहीं होपाते |
             संक्षेप में डा ब्रजेश कुमार मिश्र द्वारा रचित ‘अनुभूतियाँ’ कृति चारुता के साथ रचित ह्रदय की अनुभूतियों का सूक्ष्म व कलात्मक अंकन है जिसके लिए रचनाकार बधाई के पात्र हैं |

१०-१२-२०१५ ई. --- डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना मो. ९४१५१५६४६४.
लखनऊ -२२६०१२

फ़ॉलोअर