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शनिवार, 13 जुलाई 2013

"मेरा अनुरोध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मित्रों!
      प्रसन्नता की बात है कि दोहों पर 36 पोस्ट अब तक आ चुकी हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास है कि हमारे पाठकों को दोहा छन्द के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला होगा। सोमवार 15-07-2013 से किसी और छन्द पर चर्चा शुरू की जायेगी।
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कृपया सम्बन्धित दोहाकार ध्यान देंगे-
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इस दोहे में कुछ खटक रहा है-
दुर्बुद्धि हर नष्ट हो, बन कर रहें प्रबुद्ध |
सब जन कुमति निवार कर,करें धारणा शुद्ध ||
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इसकी प्रथम पंक्ति में कुछ तो गड़बड़ है..। 
अगर इसे इस प्रकार कर दें तो शायद शुद्ध हो जाये -
मेधावी हो लोग सब, बन कर रहें प्रबुद्ध |
सारी कुमति निवार कर,करें धारणा शुद्ध ||
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इसे भी देख लें! 
नए वर्ष में न मिले, कोई कठिन मुकाम |
थोड़े सबल प्रयास से, बन जाएं सब काम ||
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा कम है-
नए वर्ष में ना मिले, कोई कठिन मुकाम |
थोड़े सबल प्रयास से, बन जाएं सब काम ||
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एक दोहा और देखिए-
तेरे कुकृत्य का मनुज, होगा बुरा प्रभाव।
आने वाली पीढ़िया, पायेंगी बस घाव।।
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
तेरे कर्मों का मनुज, होगा बुरा प्रभाव।
आने वाली पीढ़िया, पायेंगी बस घाव।।
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सुधि आई मधु-रात्रि की,   भेजी  प्रियतम गेह |
सास,ससुर और ननद का,पाया अनुपम स्नेह |
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
सुधि आई मधु-रात की,   भेजी  प्रियतम गेह |
सास,ससुर और ननद का,पाया अनुपम स्नेह |
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मलयानल सी चल पड़ी, ले चन्दन की गंध |
पूर्ण - रात्रि टूटे सभी, पुन:- पुन: प्रतिबंध ||
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दोहे के तृतीय चरण में एक मात्रा अधिक है-
मलयानल सी चल पड़ी, ले चन्दन की गंध |
टूटे सभी सारी रात भर, पुन:- पुन: प्रतिबंध ||
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कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, न विषाद न हर्ष |
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दोहे के चौथे चरण में एक मात्रा कम है-
कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, न विषाद न हर्ष |
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कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, ये कोमल अनुदर्ष |
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खिची कमान भोंहें रची, पलक सितारे डाल |
नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल |
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
भौंहें खिचीं कमान सी, पलक सितारे डाल |
नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल |
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इस दोहे के तृतीय चरण में एक मात्रा अधिक है-
ना कोई चूल्ह जले, ना लकड़ी ना तेल।
मन्त्रियों तक दौड़ रही, सिलेण्डरों की रेल।।
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ना कोई चूल्ह जले, ना लकड़ी ना तेल।
दौड़ वजीरों तक रही, सिलेण्डरों की रेल।।
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सरिता भाटिया जी द्वारा लिखे गये निम्न दोहों में भी कुछ खटकता है-
सुप्रभात दोहे रचने,  मैं आई हूँ आज |
अधर पर मुस्कान लिए,करती हूँ आगाज ||
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मेरे विचार से तो ये दोहा निम्नवत होना चाहिए था-
सुप्रभात के दोहरे, मैं लायी हूँ आज।
अधरों पर मुस्कान ले, करती हूँ आगाज।।
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निम्न दोहे में भी गेयता में कुछ रुकावट प्रतीत होती है मुझे!
रोज ले आए नई ,सुबह सुखद सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरे गणेश||
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अगर दोहे को इस प्रकार लिखा जाता तो गेयता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होती 
और भाव भी ज्यों के त्यों ही रहते..
प्रतिदिन ही हम भोर में, लिखते हैं सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरें गणेश||
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निम्न दोहे की दूसरी पंक्ति भी गेयता को प्रभावित करती है। 
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुबह संदेश आपका ,दे गया नई आस  ||
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मेरे अनुसार तो इसे निम्न प्रकार लिखा जाना चाहिए था...
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुप्रभात का आगमन, जगा गया उल्लास ||
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मित्रों!
     मैंने पक्षपात रहित होकर अब तक प्रकाशित दोहों का विश्लेषण आपके समक्ष प्रस्तुत किया है।
इस परिपेक्ष्य में बहन राजेश कुमारी जी का निम्न दोहा ही काफी है-
गलती से मत  भागिये ,छुपना है बेकार|
गलती, गलती ही रहे ,हो कोई आकार||
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सभी रचनाधर्मियों से मेरा अनुरोध है कि छन्द से सम्बन्धित आलेख या छन्दबद्ध रचना ही यहाँ प्रकाशित करें।
क्योंकि सृजनमंच छन्दों को सीखने और सिखाने का ही 
ऑनलाइन मंच है।
सादर आपका-
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

"समीक्षा पोस्ट" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
       किसी रचनाधर्मी की पोस्ट पर कलम चलाना उस कड़वी औषधि के समान है जिसको पीना गरल से कम नहीं होता, मगर स्वस्थ होने के लिए यह आवश्यक होती है।
      मैं कोई विद्वान नहीं हूँ लेकिन मेरे अपने अध्ययन के अनुसार दोहे को पहले लिखना चाहिए और उसके बाद गाना चाहिए। यदि इसे गाने में लेशमात्र भी अवरोध होता है तो समझ लीजिए कि दोहा सही नहीं है।
आदरणीया सरिता भाटिया जी ने अपनी टिप्पणी में आदेश दिया है कि "गुरु जी बताएं कहाँ क्या गड़बड़ है?" इसलिए बहुत डरते-डरते अपनी कलम चला रहा हूँ!
      सरिता भाटिया जी द्वारा लिखे गये निम्न दोहे,  दोहे की कसौटी पर बहुत खरे उतरते हैं।
आये कोई विघ्न ना ,सर पर रखना हाथ|
पूरी करना कामना ,हे नाथों के नाथ||

बन जायेंगे आपके, सारे बिगड़े काम |
बिना थके बढते रहें , मन में धारे राम||

सुबह सुहानी आ गई लेकर मस्त  फुहार |
पूरी हो हर कामना  खुशियाँ मिलें अपार||
       मगर इनमें कुछ खटकता है मुझे.... 
सुप्रभात दोहे रचने,  मैं आई हूँ आज |
अधर पर मुस्कान लिए,करती हूँ आगाज ||

मेरे विचार से तो ये दोहा निम्नवत होना चाहिए था-
सुप्रभात के दोहरे, मैं लायी हूँ आज।
अधरों पर मुस्कान ले, करती हूँ आगाज।।

निम्न दोहे में भी गेयता में कुछ रुकावट प्रतीत होती है मुझे!
रोज ले आए नई ,सुबह सुखद सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरे गणेश||

अगर दोहे को इस प्रकार लिखा जाता तो गेयता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होती और भाव भी ज्यों के त्यों ही रहते..
प्रतिदिन ही हम भोर में, लिखते हैं सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरें गणेश||

निम्न दोहे की दूसरी पंक्ति भी गेयता को प्रभावित करती है। 
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुबह संदेश आपका ,दे गया नई आस  ||

मेरे अनुसार तो इसे निम्न प्रकार लिखा जाना चाहिए था...
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुप्रभात का आगमन, जगा गया उल्लास ||
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     सृजन मंच ऑनलाइन सीखने और सिखाने का मंच है। इस मंच का प्रत्येक लेखक/लेखिका किसी भी सहयोगी की पोस्ट की समीक्षा कर सकता है। जिससे कि हम सबको अपनी त्रुटियों का भान हो सके।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

"समीक्षा पोस्ट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
      दोहा छन्द अर्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में तेरह-तेरह मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा छन्द ने काव्य साहित्य के प्रत्येक काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दी काव्य जगत में दोहा छन्द का एक विशेष महत्व है। दोहे के माध्यम से प्राचीन काव्यकारों ने नीतिपरक उद्भावनायें बड़े ही सटीक माध्यम से की हैं। किन्तु दोहा छन्द के भेद पर कभी भी अपना ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहिए। 
      सच तो यह है कि दोहे की रचना करते समय पहले इसे गाकर लिख लेना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! इसमें गेयता का होना अनिवार्य है !  दोहे के सम चरणों का अंत 'पताका' अर्थात गुरु लघु से होता है तथा इसके विषम चरणों के आदि में जगण अर्थात १२१ का प्रयोग वर्जित है ! अर्थात दोहे के विषम चरणों के अंत में सगण (सलगा ११२) , रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती  है!  सम चरणों के अंत में जगण अथवा तगण आना चाहिए अर्थात अंत में पताका (गुरु लघु) अनिवार्य है|
         सृजन मंच ऑनलाइन सीखने और सिखाने का मच है। यहाँ मैं भी आप से कुछ सीखूँगा और आशा करता हूँ कि आपको भी यहाँ कुछ अवश्य मिलेगा सीखने के लिए।
        मैं कोई विद्वान नहीं हूँ लेकिन अब तक जो भी अध्ययन किया है उसके कारण आज से दोहों पर आयीं अब तक की पोस्टों की समीक्षा करने का प्रयास कर रहा हूँ। इस क्रम में सबसे पहले इस मंच पर प्रकाशित भाई अरुण कुमार निगम जी के दोहों पर कुछ कहना चाहता हूँ।
परिभाषा की कसौटी पर इनके सभी दोहे बिल्कुल खरे उतरते हैं।
बड़ा सरल  संसार है  , यहाँ  नहीं  कुछ गूढ़
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़. 

पागल होकर खोजता ,   सुविधाओं में चैन
भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन. 

जीवन   सारा   बीतता , करता रहा तलाश
अहंकार के भाव ने ,सबकुछ किया विनाश. 

त्याग दिया माँ-बाप को , कितना किया हताश
अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश.

जिस दिन जल कर दीप सा ,देगा ज्ञान प्रकाश
मुझमें  तू  मिल  जा  जरा ,  होगी खतम तलाश. 

जीवित होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
फिर मेरी मूर्ति  गढ़ने  , लाना संग तराश.  

ज्येष्ठ दुपहरी क्यों खिले ,  सेमल और पलाश
इस क्यों का कारण कभी, अपने हृदय तलाश.  

दोहे के विषम चरणों के अंत में सगण (सलगा ११२) , रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती  है। अरुण जी के निमन दोहों में नगण का प्रयोग बहत सुन्दरता से किया गया है। अतः गति-यति और लय का सुन्दर सामंजस्य है इनमें।

कहाँ   ढूँढता  है   मुझे   ,   मैं  हूँ   तेरे   पास
                                                I  I I (लघु-लघु-लघु)
मैं तुझ सा साकार कब, मैं केवल अहसास.  

मैं  मिल   जाऊंगा  तुझे , तू बस मैं को भूल
             I I I (लघु-लघु-लघु)
मेरी  खातिर  हैं  बहुत ,  श्रद्धा   के   दो फूल.  
  
             I  I I (लघु-लघु-लघु)
पाप भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
लेकर गठरी स्वर्ण की  ,  मेरी करे तलाश.  

आभार भाई अरुण कुमार निगम जी!
मुझ जैसे बहुत से लोगों को आपसे सीखने को बहुत कुछ मिलेगा!
Photo: सोमवार, 1 जुलाई 2013

"दोहा छन्द प्रसिद्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
माता जी की कृपा से, करलो इसको सिद्ध।१।

चार चरण-दो पंक्तियाँ, करती गहरी मार।
कह देती संक्षेप में, जीवन का सब सार।२।

सरल-तरल यह छन्द है, बहते इसमें भाव।
दोहे में ही निहित है, नैसर्गिक अनुभाव।३।

तुलसीदास-कबीर ने, दोहे किये पसन्द।
दोहे के आगे सभी, फीके लगते छन्द।४।

दोहा सज्जनवृन्द के, जीवन का आधार।
दोहों में ही रम रहा, सन्तों का संसार।५।

http://srijanmanchonline.blogspot.in/2013/07/blog-post.html

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