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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

पुस्तक चर्चा -----अगीत त्रयी--डा श्याम गुप्त---


               पुस्तक चर्चा -----अगीत त्रयी

                        


पुस्तक----अगीत त्रयी----अगीत-विधा के तीन स्तम्भ -----लेखक---डा श्याम गुप्त ...सम्पादक --डा रंगनाथ मिश्र सत्य....प्रकाशक --अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ 
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अगीत त्रयी का कथ्य 
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आज कविता की अगीत-विधा का संसार व्यापक हो चुका है तथा विश्व भर में फैले कवियों, अगीत रचनाओं, अगीत-काव्य व साहित्य के प्रति आलेखों, समीक्षाओं, काव्य-कृतियों, खंड-काव्यों, महाकाव्यों, पत्र-पत्रिकाओं एवं विविध आयोजनों के माध्यम से केवल भारत में ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित होकर दैदीप्यमान हो रहा है |
-------- बेंगलोर के तमिल-अंग्रेज़ी कवि डा नेव्युला बी राजन का अंग्रेज़ी ब्लेंक-वर्स में एक त्रिपदा-अगीत देखें ....
The world as it stands today
Is because of the dreamers
Their dreams never die. --
---Dreams never die.
…..जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है----
आज जो यह दुनिया जैसी दिखती है,
सपने देखने वालों के कारण है;
जिनके सपने कभी नहीं मरते |....( अनुवाद –डा श्याम गुप्त )
\
अगीत-विधा की इस व्यापकता की उद्देश्य यात्रा में उसके स्तम्भ रूप तीन साहित्यकार, रचनाकार व कृतिकार हैं जो इस विधा के संस्थापक, गति प्रदायक एवं उन्नायक रहे हैं |
------- १९६६ई में अगीत-विधा के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’,
-------अगीत-विधा में सर्वप्रथम खंडकाव्य एवं महाकाव्य रचकर उसे गति देने वाले स्व.श्री जगत नारायण पाण्डे एवं
--------अगीत-विधा में प्रथमबार सृष्टि-रचना जैसे गूढ़तम दार्शनिक, वैज्ञानिक विषय पर हिन्दी में प्रथम महाकाव्य ‘सृष्टि-ईषत इच्छा या बिगबेंग-एक अनुत्तरित उत्तर‘ के रचयिता, अगीत-विधा के विविध छंदों के सृजक एवं अगीत-काव्य का सर्वप्रथम छंद-विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जैसी कृति रचकर विधा के उन्नायक डा श्याम गुप्त |
\
अगीत-त्रयी के ये कवि समाज के भिन्न भिन्न क्षेत्रों व व्यवसाय एवं विचार-धारा से हैं एवं मूल में साहित्य के बाहर के क्षेत्र होते हुए भी साहित्य की शास्त्रीय छंदीय-विधा, तुकांत काव्य-विधा, गीति-विधा एवं कथा-समीक्षा-लेख आदि गद्य-काव्य में भी सफलतापूर्वक रचनारत हैं | वे पर्याप्त अनुभवी हैं, समाज में गहन रूचि रखते हुए प्रतीत होते हैं जिसके कारण वे साहित्यिक क्षेत्र में अवतरित हुए | वे अगीत के क्षेत्र में उस विधा की काव्य-जिजीविषा, काव्य-विकास एवं समकालीन काव्य की प्रगति की संभावना दृष्टिगत होने के कारण पदार्पित हुए |
\
अगीत-त्रयी- ‘अगीत साहित्य दर्पण’ की भांति एक ऐतिहासिक दस्तावेज तो है ही, साठोत्तरी दशक की काव्य-प्रगति को समझने के लिए भी यह अनिवार्य है।
------ इस सदी के साठोत्तरी काल का कवि अपने समय से अग्रगामी काव्य-तत्व लिए हुए नवीन काव्य विधा ..अगीत...से किस ढंग से प्रभावित हुआ और आज वह विधा व कवि का कविता तत्व से सम्बन्ध किस प्रकार विभिन्न रूप भंगिमाएँ ग्रहण करता कहाँ पहुँचा है, यह इसके यथार्थबोध की कृति है |
------- कहना असंगत न होगा कि बीसवीं सदी के साठोत्तरी दशक एवं समकालीन काव्य-इतिहास में ‘अगीत काव्य-विधा’ ने जो स्थान पाया और जिस अर्थ और भाव में उसका प्रभाव परवर्ती काव्य-विकास में व्याप्त है एवं व्याप्त होता जा रहा है उसके व्यक्त-अव्यक्त प्रभाव को प्रस्तुत प्रकाशन रेखांकित करता है |
\
कम ही होती हैं काव्य-कृतियाँ जो स्वयं इतिहास का एक अंग बन जाएँ और आगे के लिए दिशा-दृष्टि दे सकें| कहा जा सकता है कि प्रस्तुत काव्य-संकलन, हिन्दी काव्य का दिशाबोधक है और आज के सन्दर्भ में आधुनिक हिन्दी काव्य के इतिहास में अगीत कविता विधा के छंद-विधान “अगीत साहित्य दर्पण” की भांति एक और मील का पत्थर है, एक और प्रगतिशील आलोक शिखा समान है |
\
प्रस्तुत कृति “अगीत-त्रयी” अगीत के इन तीन स्तंभों के परिचय, साहित्य सेवा एवं उनके ३०-३० श्रेष्ठ अगीतों के संकलन के साथ हिन्दी काव्य जगत में प्रस्तुत की जा रही है, इस दृष्टि व आत्मविश्वास के साथ कि यह कृति अगीत-विधा को नए नए आयाम प्रदान करने के साथ नए नए कवियों, साहित्यकारों को अगीतों की रचना हेतु प्रोत्साहित करेगी एवं अगीत कविता विधा और समृद्धि शिखर की और अग्रसर होती रहेगी |
-- डा श्याम गुप्त

               

सोमवार, 15 जनवरी 2018

गीत, अगीत और नवगीत...डा श्याम गुप्त



                               


गीत, अगीत और नवगीत
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आजकल हिन्दी साहित्य व काव्य में पद्य-विधा के सनातन रूप गीत के दो अन्य रूप अगीत एवं नवगीत काफी प्रचलन में हैं | --------गद्य-विधा से भिन्नता के रूप में जिस कथ्य में, लय के साथ गति व यति का उचित समन्वय एवं प्रवाह हो वह काव्य है,गीत है|
------तुकांत छंदों के अतिरिक्त, अन्त्यानुप्रास के अनुसार गीत- तुकांत या अतुकांत होते हैं | अतुकांत गीतों को गद्य-गीत भी कहा गया | गीत तो सनातन व सार्वकालिक है ही अतः आगे कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है|
--------यहाँ अगीत व नवगीत पर कुछ दृष्टि डालने का प्रयत्न किया जायगा|
अगीत ---
************
-----एक अतुकांत गीत है, जिसमें मूलतः संक्षिप्तता को ग्रहण किया गया है | निराला जी द्वारा स्थापित लम्बे-लम्बे अतुकांत गीतों से भिन्न ये ५ से ८ पंक्तियों में पूरी बात कहने में सक्षम हैं | लय, गति, यति के साथ प्रवाह इनकी विशेषता है जो इन्हें गीतों की श्रेणी में खडा करती है एवं अतुकान्तता पारंपरिक पद्य-गीत से पृथक करती है और संक्षिप्तता प्रचलित पारंपरिक अतुकांत गीतों से भिन्नता प्रदर्शित करती है | इस प्रकार अगीत एक स्वतंत्र व स्पष्ट विधा है एवं उसका का एक स्पष्ट तथ्य-विधान, लिखित शास्त्रीय ग्रन्थ में छंद विधान व रचना संसार है ...उदाहरणार्थ ---
“टूट रहा मन का विश्वास
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं |
रोक रहीं मुझ को,
गहरी बाधाएं |
अन्धकार और बढ़ रहा,
उलट रहा सारा आकाश ||” --- डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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\
नवगीत व उसका भ्रामक संसार ---गीत का सलाद या खिचड़ी----
*****************************
--- नवगीत की बात काफी समय से एवं काफी जोर-शोर से कही जा रही है| नवगीत को प्राय: गीत के नवीन एवं आधुनिक स्थानापन्न रूप में प्रचारित किया जाता है|
------नवगीतकार प्रायः यह कहते हैं कि अब गीत पुरानी विधा होगई है नवगीत का युग है | परन्तु यदि ध्यान से विश्लेषण किया जाय तो यह एक भ्रांत धारणा ही है |
-------वस्तुतः नवगीत कोई नवीन विधानात्मक तथ्य नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही तोड़-ताड़ कर लिख दिया जाता है | इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है | इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है |
------ इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता | वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | उदाहरणार्थ---- एक नवगीत है—
“जग ने जितना दिया
ले लिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपने पन का
जाल बुना |
सबके हाथ-पाँव बन
सब की साधें
शीश धरे
जीते जीते
सबके सपने
हर पल रहे मरे
थोपा गया
माथ पर पर्वत
हमने कहाँ चुना | --मधुकर अस्थाना का नवगीत
-------इसे १२-१४ या १६-१० या २६ पंक्तियों वाला सामान्य गीत की भाँति लिखा जा सकताहै –-
जग ने जितना दिया, ११
लेलिया उससे कई गुना | १५
बिन मांगे जीवन में, १२
अपने पन का जाल बुना |१४
या -----
जग ने जितना दिया, लेलिया उससे कई गुना, २६
बिन मांगे जीवन में, अपने पन का जाल बुना| २६
-------
सबके हाथ-पाँव बन, १२ सबके हाथ पाँव बन सबकी- १६
सबकी साधें शीश धरे | १४ या साधें शीश धरे | १०
.जीते जीते सबके – जीते जीते सबके सपने,
सपने हर पल रहे मरे | हर पल रहे मरे |
टेक- थोपा गया माथ पर १२
पर्वत हमने कहाँ चुना
या
थोपा गया माथ पर पर्वत हमने कहाँ चुना | २६


कुछ अन्य उदाहरण देखें ---
१-
------ १४-१२ का पारंपरिक गीत है या नवगीत……
विदा होकर जाते-जाते, १४
बरस बीता कह गया। १२
नवल तुम वो पूर्ण करना, १४
जो नहीं मुझसे हुआ। १२ ----कल्पना रमानी का नवगीत
२-
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे १६
मन के मनके
दर्द हरा है १६ = ३२
ताड़ों पर
सीटी देती हैं
गर्म हवाएँ २४
जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ २४
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ २४
धीरे-धीरे ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है? ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..
------
------ सीधा -सीधा 24 / ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ... इसे ऐसे लिखिए ....
ताड़ों पर सीटी देती हैं गरम हवाएं , २४
जली दूब सी तलवों में चुभती यात्राएं | २४
पुनर्जन्म लेकर आती हैं दुर्घटनाएं | २४
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२
\
अतः इस प्रकार नवगीत कोई नवीन विधा नहीं ठहरती अपितु पारंपरिक गीत ही है जिसे गीत का सलाद सा बना कर पेश किया जाता है | हाँ इस बहाने तमाम नवीन कथ्य –तथ्यों के नाम पर दूर की कौड़ी के नाम पर , दूरस्थ व्यंजना के नाम पर ....असंगत कथ्य व तथ्य पेश कर दिए जाते हैं सिर्फ कुछ अलग दिखने हेतु | अब आप देखिये ---
“जग ने जितना दिया
लेलिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपनेपन का
जाल बुना | ---- “
क्या इस कथ्य का कोई अर्थ निकलता है ? अर्थात व्यक्ति को दुनिया कुछ देती नहीं वह ही दुनिया को देता है और जो कुछ वह अपने साथ पैदा होते ही लाता है दुनिया ले लेती है | हमें किसी( दुनिया, दोस्त, माता-पिता, भगवान ) का शुक्रगुज़ार होने की क्या आवश्यकता है |
----
होगयी है कर्मनाशा
समय की गंगा
नहाकर जिसमें हुआ
हर आदमी नंगा |
---- यदि नदी कर्मनाशा है तो बुरा क्या है वह तो कर्मों का नाश हेतु होती ही है ...कर्मनाशा का अर्थ क्या है ....कर्मों का नाश तो मोक्ष है ..उचित ही है ...फिर दोष क्या....समय की नदी तो दुष्कर्म कृत्या हुई है जिससे हर आदमी नंगा हुआ है .... अनर्गल भाव है नदी के स्थान पर गंगा का प्रयोग भी असाह्तियिक व असांस्कृतिक है ....|

------
और भी------
“जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ “ ----- ??
“आतंकों में-
शांति खोजना
केवल पागलपन
लगता है। “
---- यह कौन सा नया महान तथ्य है सब जानते हैं |
शाखाओं का बोझ उठाये
बरगद उठ न सका |
---- फिर वह बरगद ही क्यों कहलाता है फिर अतिरिक्त शाखाएं तो उसका बोझ स्वयं उठाती हैं क्या अर्थ है कथ्य का ?
----
सोने के पिंजरे में
हमने
हर पल दर्द धुना |
…... दर्द के कारण अंग धुना जाता है नकि स्वयं दर्द .कोइ धुनने की चीज़ है ..
मुझे तो इन असंगत कथ्यों का अर्थ समझ आता नहीं है यदि आपको तार्किक अर्थ समझ आ रहा हो तो बताएं |
-------- मेरे विचार में तो इस प्रकार की कविता ही कविता व साहित्य, कवि-साहित्यकारों को जन जन, सामान्य जन से दूर करती जा रही है |

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----डा श्याम गुप्त..


           
अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण
डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


भाग चार--- डा सत्य के अगीत यहाँ प्रस्तुत हैं ..

१.
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान | "

" घर घर में खुशहाली लाएं ,
जीवन साकार करें ;
नवयुग निर्माण करें ,
सबको निज गले लगाएं | "
३.
" दलितों के प्रति मत करो अन्याय
उन्हें भी दो समानता से-
जीने का अधिकार , अन्यथा-
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी, और-
लेगी प्रतिकार ;अतः --
ओ समाज के ठेकेदारो !
उंच-नीच की खाई पाटो ,
दो शोषितों को ही न्याय | "
४.
" बूँद बूँद बीज ये कपास के,
खिल-खिल कर पड रही दरार;
सडी-गली मछली के संग,
ढूँढ रहा विस्मय विस्तार,
डूब गए कपटी विश्वास के | "
५.
दिशाहीन नहीं हूँ अभी-
पाई है केवल बदनामी,
खोज रहे हैं मुझको,
मेरे प्रेरक सपने
मिलनातुर हैं मुझसे
मेरे सारे अपने,
क्रियाहीन नहीं हूँ अभी
यह तो है जग की नादानी |
६.
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है |"

७.
"" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें
८.
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "
९.
" नवयुग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "

१०.
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा |
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "
११.
" आओ हम अंधकार दूर करें ,
रात और दिन खुशी-खुशी बीते;
सारा संसार शान्ति पाए ,
अपना यह राष्ट्र प्रगतिगामी हो ;
वैज्ञानिक उन्नति से ,
इसको भरपूर बनाएँ | "
१२.
"टूट रहा मन का विश्वास ,
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं|
रोक रहीं मुझको
गहरी बाधाएं |
अंधकार और बढ़ रहा ,
उलट रहा सारा इतिहास | "
१३.
"कवि चिथड़े पहने
चखता संकेतों का रस,
रचता -रस, छंद, अलंकार
ऐसे कवि के क्या कहने |"
१४.
" स्तम्भन एक और ....
संबंधी भीड़-भाड
ध्वंस की कतारों में ;
मक्षिका नहा रही-
दूध के पिटारों में |
ढला ढला लगता सब ओर...
अपने में स्नेह-सिक्त,
तिरछा भूगोल |"
१५.
"देव नागरी को अपनाएं
हिन्दी है जन जन की भाषा ,
भारत माता की अभिलाषा |
बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,
सब बहनों की बड़ी बहन है
हिन्दी सबका मान बढाती ,
हिन्दी का अभियान चलायें|"
१६.
"आओ ! हम राष्ट्र को जगाएं
आजादी का जश्न मनाना,
हमारी मजबूरी नहीं-
अपितु कर्तव्य है |
आओ हम सब मिलकर
विश्व-बंधुत्व अपनाएं,
स्वराष्ट्र को प्रगति पथ पर -
आगे बढाएं |"
१७.
"इधर उधर जाने से
क्या होगा ;
मोड़ मोड़ पर जमी हुईं हैं ,
परेशानियां |
शब्द -शब्द अर्थ सहित
कह रहीं कहानियां
मन को बहलाने से
क्या होगा |"
१८.
सबका सम्मान करो
सब भारत मां की हैं संतानें
उनमें मतभेद मत करो |
उंच-नीच का जो
भ्रमजाल आज फैला है,
मिलजुलकर उसको भी दूर करो |
१९.
आशाएं साथ हैं हमारे
कभी कभी द्वार पर टेरती उदासी
तनहाई में मुझको
घेरती उदासी ,
बिछुडन भी होरही उदास
बाधाएं साथ हैं हमारे |
२०.
जीवन तो तुझको है अर्पण
ध्यान मग्न बैठा हूँ मैं
देख रहा तेरा श्रृंगार,
साहस को फिर बटोरकर
आया हूँ फिर तेरे द्वार
शेष सभी तुझको समर्पण |
२१.
नवल प्रात: आया है आज यहाँ
धीरे धीरे रात चली गयी,
ऊषा ने जब प्रभात फैलाया |
सूरज भी चलने को आतुर है,
लाजवंती शाम ढल गयी,
अन्धकार गहराया आज यहाँ |
२२.
आँखों को चित्र भागया
कैसे मैं छोडूं यह महानगर
बाधाएं दो नहीं हज़ारों,
आशाएं कर रहीं श्रृंगार
पार्कों में बैठे कुछ लोग
जीवन का दर्द रहे बाँट
अपने में डूब गया सत्य
देख रहा गोमती डगर |
२३.
धीरज को बाँध नहीं पाता...|
जीवन में छागई उदासी,
मन को समझाता हूँ बार बार,
वह भी तो साथ नहें देता |
कैसे मैं व्यक्त करूँ
अंतर-पीडाओं को
इसका भी ध्यान नहीं आता|

२४.
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
सारा विश्वास तुम्हीं हो,
मेरा आकाश तुम्हीं हो,
सारे संसार में अकेले,
मेरा मधुमास तुम्हीं हो
तुमको तज और कहाँ जाऊं |
१३.
आतप ने सांकल खटकाई जब
बिरहन की पीड़ा दोगुनी हुई |
जोर जोर चलती हैं, विष भरी हवाएं
तन मन में आग लगी
कौन आ बुझाए|
भेजी जब प्रियतम ने पाती परदेश से
सीने पर रखने से
पीड़ा कुछ कम हुई |
२६.
चलना ही नियति हमारी है
घूम घूम कर करता रहता आभास
धरती के साथ साथ
सोया आकाश ,
लक्ष्यों तक जाने को
निश्चित स्वर पाने को
संसृति को होता विश्वास,
चलना ही प्रगति हमारी है |
२७.
संघर्षों से कभी न ऊबें |
जो भी हम आज जीरहे
उसका तो अंत सत्य है,
कर्मों को करते जाएँ हम
अपने कर्तब्यों में बार बार डूबें |

२८.
"ओ बसंत ! फिर आना
सिहरन के साथ |
तेरे आने की आहट मिल जाती है;
पाहुन से मिलने की,
इच्छा तडपाती है ;
ओ बसंत ! फिर आना ,
मनसिज के साथ | "
२९.
आओ हम सृजन को जियें |
सत्य और संयम, मन में उत्साह भरें
जीवन आशान्वित हो
शान्ति के सहारे |
हिंसा का त्याग करें
सबको सुख दे करके
हम गरल पियें|
३०.
जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों ही मिलते रहते |
जिन्दगी का सत्य क्या रहा
जीवन का तथ्य क्या रहा,
जिन्दगी में शूल यदि मिले
तो फूल भी कभी कभी खिले ,
जिन्दगी में हृदयों के दीप जलते रहते...|
.......क्रमश---भाग पांच----









शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --डा श्याम गुप्त ---


                   

----------बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --------

------------------लय साधने हेतु गीतों व छंदों में तुकांत का प्रयोग सनातन परम्परा से प्रारम्भ हुआ जो हिन्दी में तुकांत वर्णिक व मात्रिक छंदों युत गीतों का प्रयोग महाकाव्यों की लम्बी कवितायें एवं शास्त्रीय काव्य में ही रहा | लोकगीतों में तुकांत की अनिवार्यता कभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुई अपितु केवल लय ही गीतों का मूलतत्व बना रहा | जो महादेवी, प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त आदि तक गीतों के रूप में चलती रही |

----------------- वास्तव में छायावाद के पश्चात के युग में अर्थात सत्तर के दशक में समाज की भांति साहित्य भी ठिठका हुआ था | स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य में अंग्रेज़ी साहित्य एवं अन्य विदेशी साहित्य के प्रभाववश एवं समाज में स्वतंत्र चेतना की उत्पत्ति हुई परन्तु विशिष्ट साहित्यिक दिशा के बिना साहित्य भी समाज की भांति दिशाहीन था ? 

------अतः महादेवी-प्रसाद-पन्त के संक्षिप्त भावसौन्दर्य प्रधान छायावादी गीतों के बाद, निराला के अतुकांत छंदों व गीतों की क्रान्ति के समय तक गीतों की महत्ता व उपादेयता स्पष्ट दिखाई देती रही | 

------छायावादोत्तर युग में बच्चन, नीरज आदि के विलंवित लम्बे लम्बे गीतों के काल में, खुले मंच पर कविता व कवि सम्मेलनों के प्रादुर्भाव के कारण जिनमें लम्बे गीतों को सुनने का किसी के पास समय नहीं था अपितु मंच हेतु हलके-फुल्के काव्य, हास्य-कविता आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही विभिन्न सामयिक वस्तु-विषयों का कविता में प्रवेश के कारण गीतों का प्रभाव कम हुआ|

------गीतों का लंबा होना एक दुर्गुण है इसमें भाव एक नहीं रह पाते और श्रोता भावों की भूलभुलैया में खोजाता है और भूल जाता है की वह क्या सुन रहा था | यही कारण है कि रूढ़ गीत इस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ

-----परन्तु यह गीत की गतिशीलता एवं मृत्युंजय रूप ही है कि वह पारंपरिक रूप बनाए रहते हुए --अतुकांत गीतविधा ‘अगीत’ एवं तुकांत गीतविधा नवगीत के नए रूप में प्रतिष्ठित होकर भी आज अपने मूल रूप में जीवित है |
-------------------------------- इन सभी कारणों से कविता जगत में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का प्रवेश हुआ जो अकविता, नयी कविता, गद्यगीत, अतुकांत गीत एवं उसका संक्षिप्त रूप अगीत तथा तुकांत-गीत के संक्षिप्त रूप नवगीत का अवतरण हुआ |

-----ग़ज़ल विधा के लोकप्रिय होने से भी गीतों की चमक पर प्रभाव पड़ा और यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गीत मर गया’ परन्तु इस सब के बाबजूद भी हिन्दी में लोक व पारंपरिक गीत परम्परा की अजस्र धारा निरंतर प्रवहमान रही और आज भी प्रवहमान है |

------परम्परा से हटकर तुकांत व अतुकांत गीतों की एवं कविता की नवीन धाराओं के रूप में अतुकांत गीत की धारा अगीत एवं तुकांत गीत की धारा नवगीत ही आज जीवित हैं | अन्य सभी धाराएं काल के गाल में समा चुकी हैं|
--------------अगीत - अतुकांत गीत का संक्षिप्त रूप है जो गीत की मुख्य शर्त लय पर ही आधारित सामायिक आवश्यकता – संक्षिप्तता एवं तीब्र भाव-सम्प्रेषण के आधार दोहे व शेर की तर्ज़ पर रचा गया है |
-----अगीत का एक सुनिश्चित छंद विधान “ अगीत साहित्य दर्पण “ ( लेखक- डा श्यामगुप्त, प्रकाशक-सुषमा प्रकाशन एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ..प्रकाशन –जनवरी २०१२ ई.) प्रकाशित होचुका है
-----एवं तुकांत गीति विधा के भांति ही इसके विभिन्न प्रकार के विविध छंद भी सृजित किये जाचुके हैं | आज यह गीत की एक सुस्थापित विधा है |
--------------नवगीत - वास्तव में मूल रूप से गीत ही है गीत के पारंपरिक रूप का पुनर्नवीनीकरण | गीत और नवगीत में काव्यरूपात्मक अंतर नहीं है। यह कोई नवीन विधानात्मक तथ्य भी नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही मोड़-तोड़ कर लिख दिया जाता है |
----इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है |
----मेरे विचार से इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है | इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता तथा प्रायः कवि अपने निजी (ज़्यादातर काल्पनिक) अवसाद-आल्हाद को ऐकान्तिक भाव में गाता दिखाई देता है |
-----वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | ----उदाहरणार्थ---- एक नवगीत का अंश है—
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे     १६
मन के मनके
दर्द हरा है      १६ = ३२
धीरे-धीरे
ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है?     ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..

----सीधा -सीधा ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ...

----इसे ऐसे लिखिए --
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२

--------------------कहने का अर्थ है कि गीत आज भी जीवित है, अपने पारंपरिक रूप में भी एवं विविध नवीन रूपों में भी | वर्तमान में अनेकों गीतकार अपने गीतों से सरस्वती का भण्डार भर रहे हैं|
------भविष्य में या साहित्य के इतिहास में जब कभी सुरुचिपूर्ण गेय साहित्य या कविता की बात होगी तो गीतों-लोकगीतों-प्रेमगीतों का नाम सर्वोपरि रहेगा एवं गीत के दोनों नवीन रूपों अगीत एवं नवगीत का भी महत्वपूर्ण उल्लेख अवश्य किया जाएगा |
-----सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहे हैं, अतः पारम्परिक गीतों से गीत के इन नये स्वरूपों की समन्वित पहचान बनी |
-----यही कारण है, कि गीत के मर जाने की घोषणा का गीत के नये प्रारूपों, अगीत व नवगीत, दोनों विधाओं ने न केवल प्रतिकार किया अपितु स्वयं को सक्षम व प्रभावशाली रूप में साहित्य व समाज के सम्मुख विस्तृत रूप में प्रस्तुत भी किया |

-----क्रमशः---भाग चार ( अंतिम किश्त )-----

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

चाय पर साहित्यिक चर्चा ..डा श्याम गुप्त...

                                     चाय पर चर्चा

                                  उ.प्र.हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित, लखनऊ के चर्चित वरिष्ठ साहित्यकार एवं अगीत कविता विधा के संस्थापक एवं संतुलित कहानी तथा संघीय समीक्षा पद्धति के जनक.. साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ को मैंने सोमवार ०५-१०-१५ को अपने घर पर चाय पर आमंत्रित किया | डा रंगनाथ मिश्र को साहित्यभूषण पुरस्कार मिलना अगीत-विधा की सम्पूर्ण स्वीकृति के साथ साथ, साहित्य की सभी विधाओं में पारंगत एक कर्मठ, कर्मयोगी की भांति चुपचाप, निरंतर, बिना लाग-लपेट, सभी कवियों साहित्यकारों व विधाओं के साथ सहज, समन्वय व समभाव से व्यवहार करने वाले सरल ह्रदय, उदारमना एवं हिदी साहित्य में एक दुर्लभ व विरले साहित्यकार का सम्मान है, जो हिन्दी व साहित्य का सम्मान ही है |
                               चाय की चुस्कियों के मध्य साहित्य व गीत की वर्त्तमान स्थिति एवं अगीत पर चर्चा हुई | डा सत्य ने बताया कि १९६० ई में भारतीय दर्शन के विचारों से ओत-प्रोत अगीत का सूत्रपात मैंने इसलिए किया कि अनाटक, अकविता, अकहानी जैसे आंदोलन पाश्चात्य नक़ल पर चल रहे थे | अगीत का सम्बन्ध मनुष्य की आस्था से है, भारतीयता से है, उसकी संस्कृति से है | अतः अगीत- हिन्दी व हिन्दी साहित्य के लिए विकास व उसे गति देने में सहायक व सक्षम है और इसीलिये यह विश्व भर में फ़ैल चुका है | गीत में 'अ' प्रत्यय लगा कर मैंने अगीत को संज्ञा के रूप में स्वीकार किया | अगीत, गीत नहीं के रूप में न लिया जाय | यह एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसने संक्षिप्तता को ग्रहण किया है, सतसैया के दोहरे की भांति |
                             अगीत की सम्पूर्ण स्वीकृति के सम्बन्ध में डा सत्य ने स्पष्ट किया कि यूं तो आज अगीत विधा नई नहीं रही वह पहले ही अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर आलोकित है | आज विश्व भर में अगणित कवि व साहित्यकार अगीत कविता में रचनारत हैं | इसमें लगभग १०० से अधिक पुस्तकें रची जा चुकी हैं जिनमें श्री जगतनारायण पांडे के एवं आपके स्वयं के ( मेरे –डा श्याम गुप्त) रचित महाकाव्य व खंडकाव्य तथा अगीत का प्रथम शास्त्रीय ग्रंथ छंद विधान “अगीत साहित्य दर्पण” हैं | अभी हाल में ही बुद्धकथा पर कुमार तरल का अगीत महाकाव्य का लोकार्पण हुआ है | परन्तु पुरस्कार व सम्मान निश्चय ही किसी कवि, साहित्यकार, काव्य व विधा को नवीन गति प्रदान करते हैं | अतः इसे अगीत-विधा का भी विधिवत सम्मान समझा जायगा |
मेरे शीघ आने वाले प्रेम व श्रृंगार गीतों की कृति ‘तुम तुम और तुम’ के सन्दर्भ में गीत के प्रश्न पर उनका मत था कि गीत मृत्युंजय है | गीत परंपरा सदैव की भांति जीवित रहेगी | गीत व अगीत का अथवा नयी कविता का आपस में कोई मतभेद नहीं है न तुकांत व अतुकांत छंद या कविता में | सभी साहित्य की विविध कोटियाँ हैं, सभी आदर की पात्र हैं | मेरे सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ के सन्दर्भ में उनका मत था कि हिन्दी ग़ज़ल को भी पुरा उर्दू नियमों व अप्रचलित फारसी उर्दू के शब्दों से मुक्त किया जाना चाहिए | प्रगति के लिए यह आवश्यक है |
                               लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा ‘डा श्याम गुप्त के व्यक्तित्व व कृतित्व’ पर की गयी शोध पर चर्चा करते हुए मैंने उन्हें बताया कि इसमें वस्तुपरक व शिल्प परक अध्ययन में मेरे अगीत महाकाव्य सृष्टि व अगीत खंडकाव्य शूर्पणखा का विशद व व्याख्यायित रूप में उल्लेख किया गया है | सृष्टि को कामायनी की भांति एक शोध-प्रबंध कहा गया है | मेरे द्वारा नवीन सृजित अगीत के विविध छंदों का उल्लेख करते हुए ‘अगीत पर अलग से शोध की आवश्यकता है’ कहा गया है | महाकाव्य प्रेमकाव्य में ‘प्रेम-अगीत’ खंड में प्रयुक्त के ‘लयबद्ध अगीत छंद’ का भी उल्लेख है| ब्रजभाषा काव्य-ब्रजबांसुरी के अगीत में लिखित द्रौपदी के पत्र को सोदाहरण प्रस्तुत किया गया है |

चित्र-- चाय पर चर्चारत --साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य व डा श्याम गुप्त ...

बुधवार, 5 अगस्त 2015

अगीत कविता विधा के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार ड़ा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' को उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा "साहित्य-भूषण" सम्मान-2014 देने की घोषणा --ड़ा श्याम गुप्त

        ड़ा रंगनाथ मिश्र सत्य


                       साहित्य में अगीत कविता विधा के स्थापक   "सृजन" संस्था के संरक्षक व अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक-अध्यक्ष देश के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रंगनाथ मिश्र 'सत्य' जी को उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने "साहित्य-भूषण" सम्मान-2014 देने की घोषणा की।



 जीवन परिचय....
      साठोत्तरी कविता जगत में कविता की नवीन विधा अगीत के संस्थापक साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र सत्य का जन्म १ मार्च १९४२ को जनपद रायबरेली ( उ.प्र.) के ग्राम कुर्री सुदौली के एक संभ्रांत कान्यकुब्ज परिवार में हुआ | आपके पिता का नाम श्री रघुनन्दन प्रसाद एवं माता श्रीमती शिवानाथा देवी मिश्रा था| धार्मिक वातावरण में जन्मे डा सत्य जी अपने भाइयों में सबसे छोटे थे | अल्पायु में ही पिता का निधन होने पर प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही बड़े भाइयों के संरक्षण में हुई|
        आपने कानपुर श्रमिक शिक्षा केंद्र से श्रमिक-शिक्षक का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया आगे की उच्च शिक्षा शिक्षा लखनऊ के विद्यांत डिग्री कालेज से प्राप्त की | इन्टरमीडिएट की परीक्षा के उपरांत  उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में अपनी सेवायें अर्पित कीं एवं साथ-साथ ही उच्च शिक्षा भी प्राप्त करते रहे | हिन्दी-साहित्य में परास्नातक की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से करने के उपरांत डा उषा गुप्ता के निर्देशन में ‘नए हिन्दी काव्य में कतिपय प्रमुख वाद‘ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की | आप सन 2000 ई में उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में केंद्र प्रभारी पद से सेवानिवृत्त हुए| वे हिन्दी साहित्य परिषद् के महामंत्री तथा लखनऊ वि वि के हिन्दी विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष भी रहे |
       आपका विवाह कालूखेडा उन्नाव के स्व. गंगाचरण शुक्ल की पुत्री श्रीमती कल्याणी देवी से हुआ| आपके दो पुत्र अनुराग मिश्र व आशुतोष मिश्र एवं दो पुत्रियाँ मधु व सीमा हैं| 

साहित्यिक परिचय .
       क्रान्तियुगोत्तर साहित्यकार, अगीत काव्य के प्रणेता, ‘संतुलित कहानी विधा’ के जनक एवं ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ के अगुआ तथा आधुनिक हिन्दी कविता और वर्तमान भारत की भाषायी व सांस्कृतिक गौरव को पहचान दिलाने में समकालीन नव-साहित्यकारों व युवाओं के प्रेरणास्रोत डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ का नाम हिन्दी साहित्य जगत के लिए नया नहीं है| वाल्याकाल से ही आप कविता से जुड़े रहे | आपने तरुण साहित्यकार सम्मलेन एवं कवि कोविद क्लब के मंत्री पद से साहित्य सेवा में अमूल्य योगदान दिया | आपने सं १९६६ में साठोत्तरी कविता जगत में अतुकांत काव्य की एक नयी विधा ‘अगीत कविता’ को जन्म दिया|, १९७५ में ‘संतुलित कहानी; तथा १९९८ में ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ का प्रचलन किया | आपका प्रथम स्वरचित काव्य संग्रह ‘बिछुड़े मीत’ १९६० में प्रकाशित हुआ| ‘कवि सोहनलाल सुबुद्ध एक परिचय’ तथा ‘ महाकवि जगत नारायण पांडे; एक परिचय ‘ आपकी अन्य लोकप्रिय कृतियाँ हैं| आपने ‘अगीत काव्य के चौदह रत्न’, ‘अगीत के इक्कीस स्तम्भ’, ‘अगीत काव्य के अष्टादश पथी’ एवं ‘अगीत के सोलह महारथी’ आदि पुस्तकों का सम्पादन किया| ‘अगीतोत्सव -89’, ‘कश्मीर हमारा है’, ‘जवानो आगे बढ़ो’ ‘पनघट’ आदि काव्य संग्रहों तथा  ‘समीक्षा पद्धति की पुस्तक गुणदोष (पार्थोसेन), लघु उपन्यास ‘सुमि’ निबंध संग्रह ‘स्वयंगंधा’, का भी संपादन किया | १९६६ से आपने लगभग १५ वर्षों तक अगीत-त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तत्पश्चात उनके संरक्षण में ‘अगीतायन साप्ताहिक पत्र’ का लगातार संपादन किया जा रहा है| 
                  आपने दर्ज़नों पुस्तकों की भूमिका लिखी जिनमें महाकाव्य, खंडकाव्य, काव्य संग्रह भी शामिल हैं| जिनमें अगीत विधा खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम अगीत महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर ( ले.श्री जगत नारायण पांडे ) एवं  सृष्टि-अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्यगीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा-अगीत-विधा काव्य-उपन्यास एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण ( ले. ड़ा श्याम गुप्त ) उल्लेखनीय हैं | 



       नियमित रूप से आपके कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होते रहते हैं| आप लगभग साढ़े चार हज़ार से अधिक साहत्यिक व सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन संचालन व अध्यक्षता कुशल पूर्वक कर चुके हैं| प्रथम विश्व हिन्दी सम्मलेन नागपुर एवं हिन्दी सम्मलेन दिल्ली में वे अ.भा. अगीत परिषद् का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं| आपके ऊपर एक लखनऊ विशाविद्यालय द्वारा शोध-प्रबंध ‘ अगीत परिषद् साहित्यिक संस्था, एक अनुशीलन ‘ किया जा चुका है| आपको देश भर के अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से समानित किया जा चुका है|                             


 संपर्क- अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ-१७.,दू.भा. ०५२२-२४१४८१७ ..मो.९३३५९९०४३५ ..                
                    

 

बुधवार, 27 मई 2015

अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त

अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त


                                  
                        मेरे लक्षण ग्रन्थ -----अगीत साहित्य दर्पण.... अगीत साहित्य का छंद विधान व शास्त्रीय पक्ष की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी में ......


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