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शुक्रवार, 30 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त


                             

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
          भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
          विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
             -------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
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   कथन २२---     
------ यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
 
 समाधान २२ --
------गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी | 
----गलत व अज्ञानी है ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध, जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे जाते रहे | मूर्ख है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण  ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं | 
 
कथन-२३--
-----हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है। यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक, धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
 
 समाधान २३--- 
-------अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव में  अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है | और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |
कथन २४----
 
गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित ठहराया गया हैये दर्शन और ये समाज आत्मा या परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
         आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह (हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
 
समाधान -२४.. 
----------क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |  वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
     सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
      यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर ...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर उन्नत मानव होचुके थे )  तादाम्य करके एक उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |
कथन २५--
----------------डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी दर्शन भी इश्वर को नही मानता, बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
 
समाधान २५---
-----------------निश्चय ही गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी | जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानवमनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का अंग है बौद्ध, जैन, लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं...  |
 
 कथन २६--
-----मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ भूमि, गगन, वायु अ अग्नि और न नीर है।
     यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन में है,  इसमें कोई  अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा डाला।
समाधान २६  ---
यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है, बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही आया है ?
   पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक,  अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है,  बुद्धि-ज्ञान के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर हुआ,  ब्रह्म,  परमात्मा  | भगवान्,  मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |


-----------क्रमश --पोस्ट सात--आगे
चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....

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गुरुवार, 29 मार्च 2018

डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित, ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह )


                     

 डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित,  ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह ) 
----- वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा प्रकाशित ------



       काव्य-काँकरियाँ: काव्य संग्रह
डॉ श्यामगुप्त  26 मार्च 2018
वर्जिन साहित्यपीठ
  कंकड़ फैंकना एक सहज मानवी प्रवृत्ति है। कभी यूंही खेल खेल में अपनों पर या दूसरों पर। बचपन में पोखर-तालावों में, मेंढ़कों, पक्षियों, कुत्ते-बिल्लियों पर, पेड़ों पर फलों को तोड़ने हेतु ढेले फैंकना किसे नहीं सुहाया। बालिकाओं के आदि-खेल कंकड़गुटके और बालकों के रंग-बिरंगे कंचों का खेल कौन नहीं जानता।


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Literature & Fiction
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25 March 2018---by Dr Shyam Gupt

2008
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15 March 2018---by सिल्वा बैरोस, विलियम
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27 February 2018----by सिंह, जगमोहन

14 March 2018
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