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सोमवार, 25 नवंबर 2013

ग़ज़ल------उन के अश्कों को------डा श्याम गुप्त.....



         ग़ज़ल.....

उन के अश्कों को पलकों से चुरा लाये हैं |
उनके गम को हम खुशियों से सजा आये हैं

आप मानें या न मानें यह तहरीर मेरी ,
उनके अशआर ही ग़ज़लों में उठा लाये हैं|

उस दिए ने ही जला डाला आशियाँ मेरा ,
जिसको बेदर्द हवाओं से बचा लाये हैं |

याद करने से भी दीदार न होता उनका,
इश्क में यूंही तड़पने की सजा पाए हैं|

प्यार में दर्द का अहसास कहाँ होता है,
प्यार में ज़ज्ब दिलों को ही जख्म भाये हैं|

प्रीति है भीनी सी बरसात, क्या आलम कहिये,
रूह क्या अक्स भी आशिक का भीग जाए है|

श्याम करते हैं सभी शक मेरे ज़ज्वातों पे,
हम से ही दर्द के नगमे जहां में आये हैं||

                                     --- चित्र गूगल साभार....  

बुधवार, 11 सितंबर 2013

विचित्र कथ्य-भावों की एक ग़ज़ल 'आईना' पर ..एक रुबाई एवं ग़ज़ल ....डा श्याम गुप्त....



--- कुंवर बेचैन की एक उल-जुलूल ग़ज़ल 'आईना' पर ..एक रुबाई एवं ग़ज़ल ...

          रुबाई...


किसने कहा कि भाग्य-विधाता है आईना |
चांदी की पीठ हो तभी बनता है आईना |
है आपकी औकात क्या, वह बोल जाता है -
क्या इसलिए न आपको भाता है आईना | 




     आईना –ग़ज़ल...

किसने कहा कि भाग्य-विधाता है आईना |
चांदी की पीठ हो तभी बनता है आईना |

ईमान-धर्म है जहां  मिलाते वही हैं हाथ,
ईमां-धरम का अर्थ सिखाता है आईना |

खाकर के चोट आईना टुकड़ों में बंट गया,
फिर भी तो अपना धर्म निभाता है आईना |

है आपकी औकात क्या, वह बोल जाता है -
क्या इसलिए न आपको भाता है आईना |  

शिकवा गिला क्या आईना है बेजुबान श्याम’
खुद आपका ही अक्स दिखाता है आईना |

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