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सोमवार, 22 जुलाई 2013

छंद कुण्डलिया : चिट्ठी

(1)
बीते दिन वो सुनहरे  नैन  ताकते द्वार
कब आएगा डाकिया  , लेकर चिट्ठी- तार
लेकर चिट्ठी -तार , डाकखाने के चक्कर
पत्र कभी नमकीन,कभी ले आते शक्कर
सीने से लिपटाय ,  खतों को लेकर जीते
नैन ताकते द्वार   सुनहरे वो दिन बीते ||
(2)
सोना  चाँवल   चिट्ठियाँ  ,   जितने  हों  प्राचीन
उतने   होते   कीमती   ,   और   लगें नमकीन
और   लगें    नमकीन   भुला दें  टूजी  थ्रीजी
चिट्ठी    की   तासीर  ,  मिले     कैसे    भाई जी
ठीक नई तकनीक,किंतु मत कल को खोना
बिना कल्पना-स्वप्न  ,भला क्या होता सोना ?
(3)
लिखना  भी  दुश्वार था  -"मुझको तुमसे प्यार"
अब  तो  सीधे  हो  रहा  ,  जता-जता कर प्यार
जता-जता कर  प्यार , आज उससे कल इससे
पहले   सालोंसाल   ,   बना    करते  थे  किस्से
सौ सुख देता एक झलक सजनी का दिखना
डूब   कल्पना   रात रात   भर   चिट्ठी  लिखना ||
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

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