(1)
बीते दिन वो सुनहरे , नैन ताकते द्वार
कब आएगा डाकिया , लेकर चिट्ठी- तार
लेकर चिट्ठी -तार , डाकखाने के चक्कर
पत्र कभी नमकीन,कभी ले आते शक्कर
सीने से लिपटाय , खतों को लेकर जीते
नैन ताकते द्वार , सुनहरे वो दिन बीते ||
(2)
सोना चाँवल चिट्ठियाँ , जितने हों प्राचीन
उतने होते कीमती , और लगें नमकीन
और लगें नमकीन , भुला दें टूजी थ्रीजी
चिट्ठी की तासीर , मिले कैसे भाई जी
ठीक नई तकनीक,किंतु मत
कल को खोना
बिना कल्पना-स्वप्न ,भला
क्या होता सोना ?
(3)
लिखना भी दुश्वार था -"मुझको तुमसे प्यार"
अब तो सीधे हो रहा , जता-जता कर प्यार
जता-जता कर प्यार , आज उससे कल इससे
पहले सालोंसाल , बना करते
थे किस्से
सौ सुख देता एक झलक
सजनी का दिखना
डूब कल्पना रात रात भर
चिट्ठी लिखना ||
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर,
जबलपुर (मध्यप्रदेश)