मोहब्बत की हसीं राहें
तुम्हारे प्यार को खुश्बू बसा, इस दिल में लाया हूँ
मोहब्बत की हसीं राहों में, यादें छोड़ आया हूँ
कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें
मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ
मेरी उल्फत की यादें, जब कभी तुम भूल जाओगे
चुभाने के लिये दिल में, मैं काँटे छोड़ आया हूँ
जहाँ में खुश्बू-ए-गुल सा महकना, घर को महकाना
तुम्हारे बन्द कमरों में, उजाले छोड़ आया हूँ
तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला
दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ
उन्हें अब दायरों में बाँधना, “बदनाम” करना है
महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ
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(गुरू सहाय भटनागर "बदनाम")
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मंगलवार, 8 जुलाई 2014
"ग़ज़ल - गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 22 फ़रवरी 2014
"ग़ज़ल-वस्ल की शाम-गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
महकी-महकी सी है वादियों की सबा
शौक़ से आ के इसका मज़ा लीजिए
बन गई मैं ग़ज़ल आपके सामने
चाहे जैसे मुझे गुनगुना लीजिए
मय को पीकर अगर दिल मचलने लगे
अपना दिलबर हमें फिर बना लीजिए
ये बहारों का रँग, हुस्न की तिश्नगी
प्यास नज़रों की अपनी बुझा लीजिए
मैं बियाबां में हूँ ख़ुशनुमा इक कली
मुझको जैसे जहाँ हो सजा लीजिए
कल तलक़ आरज़ूएँ तो ‘बदनाम’ थीं
वस्ल की शाम है दिल लुटा लीजिए

(गुरूसहाय भटनागर बदनाम)
सोमवार, 17 फ़रवरी 2014
"ग़ज़ल-गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दर्दे-मोहब्बत
मोहब्बत दर्द बन जाएगी ये सोचा न था हमने
भरी काँटों की राहों में बनाया आशियाँ हमने
वह मंजि़ल तक हमें लाकर अकेला छोड़ जाएँगे
बनाया अपने दिल का फिर उन्हें क्यों राज़दाँ हमने
भुलाने से न भूले हम जो कसमें उसने खाई थीं
सनमखानों में भी अक्सर उन्हें ढूँढ़ा किया हमने
अँधेरों में मेरी वो रोशनी बनकर के आए थे
ग़मों की आँधियों में भी सजाया आशियाँ हमने
हवाएँ रुख़ बदल देतीं तो शाखें बच गई होतीं
उन्हीं शाख़ों की ज़द में क्यों बनाया आशियाँ हमने
हमें ‘बदनाम’ होने का ज़रा भी ग़म नहीं है अब
चलो यह हक मोहब्बत का अदा तो कर दिया हमने

(गुरूसहाय भटनागर बदनाम)
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