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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

तटबंध होना चाहिये......डा श्याम गुप्त....



      तटबंध होना चाहिये.........

साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चहिये ।
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिये ।

समाचारों के लिये अखबार छपते रोज़ ही,
साहित्य में समाधान सरोकार होना चाहिये।

आज हम उतरे हैं इस सागर में कहने को यही,
साहित्य है तो गहन सागर भाव होना चाहिये ।

डूब कर उतरा सके जन-जन व मन-मानस जहां,   
 अर्थ हो ऋजु-पुष्ट, सार्थक भाव होना चाहिये।

चित्त भी हर्षित रहे, नव-प्रगति भाव रहें यथा,
कला सौन्दर्य भी सुरुचि शुचि रूप होना चाहिये।

क्लिष्ट शब्दों से सजी, दूरस्थ भाव न अर्थ हों,
कूट भाव न हों,  सुलभ संप्रेष्य होना चाहिये ।

ललित भाषा, ललित कथ्य, न सत्य-तथ्य परे रहे,
व्याकरण, शुचि-शुद्ध, सौख्य-समर्थ होना चाहिये ।

श्याम , मतलब सिर्फ़ होना शुद्धता वादी नहीं,
बहती दरिया रहे, पर तटबंध होना चाहिये ॥

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