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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट-पांच--डा श्याम गुप्त





भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण 



           आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट पांच----कथन-समाधान १८ से २१ त१क-----


कथन-१८--- पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाली एक जनजाति के लोग दुर्गापूजा के दौरान मातम मनाते हैं। इस दौरान वे न तो नए कपड़े पहनते हैं और न ही घरों से बाहर निकलते हैं, ये लोग असुर हैं और महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं (BBC HINDI, 2015)उनकी अपनी मान्यताओं में महिषासुर एक नायक हैं और दुर्गा खलनायिका हैं। इसी वजह से पूरा राज्य जब खुशियां मनाने में डूबा होता है तब ये लोग मातम मनाते रहते हैं। इस जनजाति के बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनमें से किसी के कंधे पर सिर नहीं होता। बच्चे शेरों की गर्दन मरोड़ देते हैं। यह दुर्गा की सवारी जो है। कुछ विद्वान तो आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर यह भी सिद्ध करते हैं कि आर्यों का दुर्गा का मिथक भी असल में सुमेरियन/मेसोपोटामियन मिथकों से लिया गया है। सुमेरियन लोगों में इनन्नानामक युद्ध और उर्वरता की देवी की मान्यता थी और यह देवी भी सिंह पर सवारी करती थी।--- इसी देवी के मिथक ने इरान, सिन्धु सभ्यता और बाद में अन्य भारतीय महाद्वीप के मिथकों को आकार दिया (Wolpert, 2006)|
समाधान-१८.---परन्तु गोंड साम्राज्य का राज्य चिन्ह हाथी पर सवार शेर का क्या करेंगे, उसकी गर्दन कौन मरोडेगा | वास्तव में उलटा सोच जा रहा है .....ये कथाएं एवं मिथक यहीं से सारे विश्व में गयीं हैं | जब भारतीयों ने महासमन्वय ( शिव, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा के नतृत्व में हुआ मानव इतिहास का सर्वप्रथम व सबसे बड़ा समन्वय जिसके बारे में आगे यथास्थान बताया जायगा)  के पश्चात समस्त विश्व पर राज्य किया | हो सकता है कि महिषासुर के कुछ वंशज बचे हों, इससे महिषासुर अच्छा व्यक्ति थोड़े ही होजाता है, वंशज तो आज रावण के भी हैं |
कथन -१९- डॉ. अंबेडकर ने अपनी रिसर्च में ये सवाल खड़े किये हैं कि भारत में देवियों और मातृदेवियों का उभार एक गहन पहेली है जिसके आधार पर इस देश के धर्म-दर्शन के उद्विकास के बहुत सारे पहलू उजागर किये जा सकते हैं।
----इस अर्थ में चट्टोपाध्याय और डॉ. अंबेडकर दोनों ही मातृसत्तात्मक परिवार और समाज व्यवस्था सहित ब्राह्मणी धर्म में देवियों की भूमिका के साथ प्राचीन भारतीय भौतिकवादी परम्पराओं को रखकर देखने का आग्रह कर रहे हैं। चट्टोपाध्याय अपनी अकादमिक रिसर्च से वहां पहुँच रहे हैं और डॉ. अंबेडकर अपनी धर्म-दर्शन और धर्म के समाजशास्त्र को आधार बनाकर उस निष्कर्ष तक आ रहे हैं। बालाघाट के लांजी नामक स्थान में नेताम गोंडी वंश के दुर्ग की खुदाई में भगवान् महावीर,  गणेश और बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं जिनका सीधा संबंध श्रमण या लोकायत परम्परा से है |
समाधान १९- अर्थात लोकायत परम्परा व प्राचीन आर्य वैदिक परम्परा का मिश्रण-समन्वय  हुआ है क्योंकि श्रमण संस्था भी वैदिक कालीन संस्था है जो वैदिक ऋषि अपनाते थे | गणेश जैन व बौद्ध धर्म के समय की लोकायत या श्रमण संस्था के नहीं हैं, जो इन संस्थाओं ने वैदिक धर्म से अपनाई, अपितु उनसे बहुत अधिक प्राचीन हैं वे वैदिक देव हैं |.. और यह मूर्तियाँ मिलना कोइ पुराकाल का तथ्य नहीं है अपितु नवीन जैन या बौद्ध काल का तथ्य है | अति पुराकाल में मूर्तिकला कहाँ थी |
      कथन २०- गोंडों सहित बैगा, मारिया, भील, ओराव, हलवा आदि जनजातियों में भूमि, वन, जल, पर्वत सहित धरती और स्त्री की उर्वरा शक्ति को सम्मान देने की परम्पराएं एक जैसी हैं। ये लोग अपनी विशेष जीवन शैली लिए जंगलों में सिमटते रहे हैं या सिमटने को मजबूर हुए हैं और इनके परितः शहरी या नागर समाज में भिन्न किस्म की या पित्रसत्तात्मक संस्कृति ने सत्ता स्थापित की है। इस तरह देखें तो दो ही संभावनाएं हैं पहली यह कि या तो मूलनिवासी जनजातियों ने कभी भी नगर नहीं बसाए और खेती नहीं की है और सदैव ही वनवासी जीवन व्यतीत किया है और दूसरी यह कि उन्होंने नागर सभ्यता भी पैदा की लेकिन किसी कारण से कालान्तर में उनकी सभ्यता जंगलों में सिकुड़ते जाने को विवश हो गयी।
     भौतिकवादी, श्रमण, नास्तिक, वेदविरोधी, मूलनिवासी, स्त्रीवादी और अंबेडकरवादी विचारक सब के सब अपने-अपने और अलग-अलग प्रस्थान बिन्दुओं से यात्रा करते हुए भी एक साझे निष्कर्ष तक चले आ रहे हैं। वे सब के सब अनिवार्य रूप से ब्राह्मणवाद को मूल भारतीय भौतिकवादी और मातृसत्तात्मक संस्कृति के खिलाफ खड़ी की गयी प्रतिसंस्कृतिनिरूपित करते हैं।
      इसका सीधा अर्थ ये है कि वर्तमान में जो दलित, मूलनिवासी या स्त्रीवादी आन्दोलन हैं वे जिस संस्कृति का नक्शा बना रहे हैं या खोज कर रहे हैं वही असल में इस देश की प्राचीन और प्रगतिशील संस्कृति थी जिसके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक ब्राह्मणवादी और भाववादी दर्शन पर आधारित प्रतिसंस्कृति खड़ी की गयी थी।
समाधान २०---ये सभी जातियां निश्चय ही हमारी पुरा आदि निवासी जातियां हैं जो सदैव से ही भारत के वनांचल सभ्यता रही हैं | यही सभ्यताएं समय समय पर नागरी सभ्यता में परिवर्तित होती रही हैं | यह ऐसा ही है जैसे आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्र व नागरी क्षेत्र भिन्न भिन्न है उनके रहन-सहन भिन्न भिन्न हैं और समय समय पर ग्रामीण परिवार नगर में आकर बसते रहते हैं तथा दोनों के क्रियाकलाप व्यवहार आदि का मिश्रण-समन्वय होता रहता है |
     निश्चय ही प्रतिसंस्कृति किसी उन्नत संस्कृति के प्रति ही खडी की जाती है, जिसे विनष्ट नहीं किया जा सकता | यह इस देश का, किसी भी देश का इतिहास रहा है, बुरी संस्कृति को तो विनष्ट किया जाता है चाहे वह कितनी भी वलशाली हो, जैसा दैत्यों, असुरों, रावण, कंस, दुर्योधनों आदि शक्तिशाली अप-संस्कृतियों का किया गया |
     इस देश में सदा से ही प्रगतिशील, भाववादी संस्कृति रही है | कथन में वर्णित आन्दोलन जिस संस्कृति की खोज का नक्शा बनारहे हैं यह वही संस्कृति है जो देश की सनातन आदि संस्कृति है जो सदा से वनांचल संस्कृति, ग्रामीण संस्कृति व नागरी संस्कृति का समन्वित रूप है और आज भी वही संस्कृति बहुरंगी रूप में भारत के कोने कोने गाँव गाँव नगर नगर में मौजूद है | जो हमारे त्यौहार, ऋतुएँ, पर्व, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक व्यवहार की सर्वत्र समानताओं से परिलक्षित होता है जिसे अनेकता में एकता कहा जाता है ,जिसे तोड़ने के असफल प्रयत्न किये जारहे हैं|
कथन २१- देवअसुर संग्राम,  ब्राह्मणक्षत्रिय या ब्राह्मणबौद्ध संघर्ष  ----
     प्राचीन कोयवंशीय गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन के हिस्से के रूप में देखना न केवल तर्कपूर्ण है बल्कि अब आवश्यक भी हुआ जा रहा है। प्राचीन संहिताएँ और मिथक जिन संघर्षों का उल्लेख करते हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं।....इनसे जुड़े रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं।
         यह समानता यह सिद्ध करती है कि एक आततायी संस्कृति ने किसी प्राचीन संस्कृति के वाहकों  को एक जैसे समाज मनोवैज्ञानिक उपाय से छलपूर्वक नष्ट किया था।
     इस बात का स्पष्ट उल्लेख न सिर्फ महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के चिन्तन में मिलता है, बल्कि जनजातीय समाज से आने वाले विद्वानों और धार्मिक नेताओं से भी यही सूत्र प्राप्त होता है। इनमें एक नया और महत्वपूर्ण नाम है डॉ. मोतिरावण कंगाली (1949-2015) का जो गोंड समाज की धार्मिक परम्पराओं और भाषाओं के विद्वान थे।
    भारत के अनेकों राज्यों में एक समान समाज मनोवैज्ञानिक आशय लिए हुए सैकड़ों दन्त कथाएं हैं जिनमें  देवों  और असुरों के संघर्ष का जिक्र आता है। ये संघर्ष असल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का संघर्ष रहा है (Ambedkar,1970)
    स्वयं ऋग्वेद की अनेकों रिचाओं में स्पष्ट संकेत हैं कि आर्य युद्धखोर और मदिरासेवी लोग थे (Ross, 2008) । इन आर्यों के लिए भारत की जलवायु बहुत सुखद और सहायक सिद्ध हुई और वे यहीं रूककर अपना विस्तार करने लगे। स्वाभाविक रूप से अपने साथ अपने पशु हथियार और परम्पराओं के साथ अपनी मान्यताएं और मिथक भी लाये थे (Keith,1925)। इन परम्पराओं और मिथकों ने स्थानीय परम्पराओं और मिथकों के साथ मिलकर बहुत ही चकरा देने वाला कथानक रचा है, जिसे समझ पाना अब संभव हो पा रहा है।
     धर्म दर्शन, साहित्य, इतिहास, मिथक और पुरातत्व सहित भाषा विज्ञान से अब जो सूत्र मिल रहे हैं। वे किसी एक साझे संश्लेषण की तरफ इशारा करते हैं। वह संश्लेषण इस अर्थ में है कि अगर भारतीय राज्यों में अलग-अलग फ़ैली दंतकथाओं लोककथाओं और वाचिक परम्पराओं में फैले सूत्रों को ठीक से देखा जाए तो उनमे एक जैसी प्रवृत्तियाँ हैं। समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में रची गयी वर्जनाओं और पुरस्कारों सहित उनके प्रस्थान बिंदु और उनके लक्ष्य एक जैसे हैं. ---       ये समानता कोयवंशी गोंडों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नायक संभूशेकसहित बाद में असुरों और बौद्धों के खिलाफ रचे गए मिथकों में एकदम साफ़ नजर आती है।
समाधान २१—जो रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं। ----इससे इस संस्कृति के लोग आततायी कैसे हुए अपितु निश्चय ही यह एक समन्वित उच्च संस्कृति की ओर इशारा करते हैं जो भारत भर में फ़ैली हुई थी सभी धर्म दर्शन, पंथ , सम्प्रदाय उसी संस्कृति के अंग थे जिसका वर्णन समाधान २० में किया गया है | पहले ही स्पष्ट होचुका है कि गोंडों के तथाकथित नायक शम्भूसेक स्वयं ही महादेव शिव हैं जो स्वयं वेदों के निर्माता हैं | 

चित्र---१. गोंडों के जुन्नार देव का त्रिशूल----अर्थात शिव के पूर्व रूप के त्रिशूल...
चित्र-२.--कथित गोंड राज्य चिन्ह ---कोणार्क--हाथी पर सवार शेर---अर्थात दुर्गा की सवारी ..

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----------क्रमश पोस्ट ६ आगे----

बुधवार, 14 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट तीन- ---डा श्याम गुप्त ---

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- डा श्याम गुप्त ---
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----- एक धारावाहिक क्रमिक आलेख--पोस्ट तीन ------
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आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है |
-------- जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
--------- भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं
---------यहाँ विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ***** ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में *****प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा ----
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आगे ---पोस्ट तीन --- कथन/समाधान ११ से १४ तक--
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कथन ११---
==इस विषय में आचार्य रजनीश नामक एक विवादास्पद भारतीय धर्मगुरु ने कहा है कि---भारतीय कालगणना रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय है इसलिए समय भी अनंत है और जीवन सहित समाज मे घटित होने वाली घटनाएँ भी अनंत हैं इसीलिये इनका लेखन व्यर्थ है।
--------उनके अनुसार मिथक असल में इतिहास का नहीं बल्कि समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में महत्वपूर्ण शिक्षाओं और प्रवृत्तियों का संकलन है। --- उनका यह कहना बहुत सूचक है।
---------भारत का हर परलोकवादी धर्मगुरु इसी भाषा में बात करता है। यह वक्तव्य देते हुए वे बिलकुल परम्परागत धर्मगुरुओं की तरह बात कर रहे हैं और असल में इस एक वक्तव्य से समाज में बदलाव की संभावना का सूत्र बन सकने वाले इतिहास बोध की ह्त्या भी कर रहे हैं। यही काम उनकी श्रेणी के हर धर्मगुरु ने बार बार किया है।
-----------इसीलिये रजनीश जैसे इतने बड़े दार्शनिक और रहस्यवादी इस समाज में पैदा होते रहने के बावजूद इस देश के मौलिक विभाजक और भेद भाव मूलक चरित्र में कभी बुनियादी बदलाव या क्रान्ति नहीं हुई।– बल्कि इसके विपरीत रहस्यवाद और परलोक की प्रशंसा में छुपाकर समाज की जमीनी मांगों को छुपाया गया है।
----------इस प्रकार न सिर्फ इतिहास बोध से वृहत्तर न्यायबोध की ह्त्या होती है बल्कि इसी के सहारे सभी क्रांतियों की संभावना भी नष्ट हो जाती है।
समाधान११---
==और यही तो आवश्यक तत्व है किसी धर्म, समाज या देश, संस्कृति के इतिहास, उसकी सत्यता एवं इतिहास बोध का, बुनियादी बदलाव व क्रांतियाँ ----अवैज्ञानिक, अनुभवहीन, संवेदना-सत्यता हीन अस्थिर. कच्ची नींव वाले समाज व देशों में हुआ करती हैं, स्थिर व सुसंस्कृत समाज-राष्ट्रों में नहीं | इसीलिये तो इस समाज-देश में इतने बड़े दार्शनिक धर्म गुरु पैदा होते रहे हैं जो अन्य देशों-समाज में न के बराबर हैं|
-------यहाँ भारत में समाज की जमीनी मांगें सदैव ही राज्य द्वारा पूरी होती रहीं, पौराणिक व आधुनिक इतिहास गवाह है कि जन जन संतुष्टि की भावना सहित न्यायपूर्ण खुशहाली जीवन जीते थे अतः किसी न्यायबोध व क्रान्ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ी |
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कथन १२-
==सामान्य रहस्यवादी परम्पराओं या हवा हवाई बातें करने वाले धर्मगुरु और धर्म भीरुओं की तरफ से आने वाली ऐसी प्रशंसाओं के प्रभाव में हम अगर मिथक को देखेंगे तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा।
-----ब्राह्मणी धर्म से प्रभावित विद्वान् और उनके विमर्श की दिशा को सम्मान देने वाले लोगों की मानकर चलेंगे तो हम मिथक और इतिहास के इस द्वंद्व में से कोई भी सार्थक बात नहीं निकाल सकेंगे।
------लेकिन अगर हम आर्य आक्रमण थ्योरी और जन्मना वर्ण व्यवस्था सहित जन्मना जाति व्यवस्था को स्वीकार करते हैं, तभी हम इस रहस्य को सुलझा सकते हैं अन्यथा हम इसे नहीं सुलझा सकते। --
समाधान १२-
== स्वदेशी विद्वानों व तथ्यों की अपेक्षा विदेशी तथ्यों पर आधारित बातों को मानने पर क्या हमें राष्ट्र-संस्कृति द्रोह की गंध नहीं आती |
--------आज आर्य आक्रमण थ्योरी मान्य नहीं रही है अपितु आर्यों का मूल देश भारत थ्योरी मान्य होचली है | आपके द्वारा ही विवादास्पद व महान कहे जाने वाले धर्म गुरुओं की बाते हवा हवाई क्यों होंगीं और नए नए ज्ञान प्राप्त विदेशियों की बात सत्य क्यों होगी , क्या यह मानसिक दिवालियापन नहीं है |
------ वर्ण व्यवस्था भी जन्मना कहाँ है इस समाज में आप केवल कुछ सौ वर्षों की बात क्यों करते हैं जब विदेशियों के षडयंत्रों से आप सब प्रभावित थे व हैं|
-------मूल भारतीय धर्म में जातिप्रथा जन्मना कहाँ है ‘ चातुर्वर्ण्य मया सृष्टा गुणकर्म विभागश;...को आप नहीं समझ पाते हैं क्या |
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कथन १३-
==डॉ. अंबेडकर (1970)की रिसर्च भी जिस तरफ इशारा करती है वह यही बतलाती है कि इस देश की मूल परम्परा और मूल शासकों को धीरे धीरे शिक्षा और व्यापार से वंचित करके समाज के सबसे निचले स्तर पर धकेला गया है।
------सामान्य सा तर्क है कि अगर इतिहास में एक संस्कृति और एक ही दर्शन का सातत्य है तो फिर इतिहास लिखना न केवल आसान होगा बल्कि जरुरी भी होगा। -
------लेकिन अगर ये इतिहास किसी एक संस्कृति का नहीं बल्कि आप में लड़ रही अनेकों संस्कृतियों का बिखरा इतिहास है तो इस इतिहास का लेखन बहुत सेलेक्टिव ढंग से होगा। अगर इमानदारी से और सैनिक बल से विजय प्राप्त करके पराजित संस्कृति को नष्ट किया गया है तो उस विजय को अपनी गाथाओं में ज़िंदा रखा जाएगा।
------ लेकिन अगर प्रतियोगी या मूलनिवासी संस्कृति को छल से और कपटपूर्वक मनोवैज्ञानिक उपायों से नष्ट किया गया है तो उसका इमानदार इतिहास लिखना बहुत मुश्किल होगा। ये इतिहास लेखन असल में विजेताओं ही को दुष्ट और धूर्त साबित करेगा।
-------इसलिए ऐसे विजेताओं ने भारत में कभी इतिहास लिखा ही नही और जो मूलनिवासी जनों का इतिहास किसी अर्थ में उपलब्ध था उसे भी मिथकीय आख्यानों की बाढ़ में बहाकर गायब कर दिया।
समाधान १३---
== भारतीय संस्कृति एक उत्तरोत्तर विकासमान संस्कृति है कोई एक ही दर्शन (या पुस्तक या मनुष्य, देवदूत आदि ) से सातत्य कठपुतली संस्कृति नहीं है |
-----यह विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय से उत्तरोत्तर प्रगतिमान संस्कृति है, जिसमें युद्ध भी हुए हैं एवं शांतिपूर्ण समायोजन भी | पुरा ( = या पराजित ) संस्कृति की अपेक्षा नवीन ( =या विजेता ) संस्कृति यदि अधिक वैज्ञानिक, नवोन्मेष युत, विक्सित होगी तो संस्कृतियों का अवश्य ही विलय ( ------समायोजन –दोनों संस्कृतियों की अच्छी बातें का विलय ) होगा एवं तलवार के बल या छल-बल के आवश्यकता नहीं होगी |
------यदि दोनों संस्कृतियाँ विक्सित होती हैं तो अवश्य ही समन्वय होगा जैसा भारतीय विभिन्न संस्कृतियों में हुआ |
\
लिखा हुआ इतिहास कभी सत्य नहीं होता अपितु सामयिक शासन, सत्ता के हाथों की कठपुतली होता है | गाथाएँ सामान्य जन जन द्वारा रचित व घटना आधारित इतिहास होती हैं, क्योंकि सामान्य जन राजनीति में भाग नहीं लेते अतः वे ईमानदार होती हैं और भविष्य को प्रेरित करती हैं।
----- इसीलिये भारतीय पौराणिक इतिहास-गाथाओं में इंद्र, राम, कृष्ण आदि की विजय गाथाएँ समस्त विश्व व भारत के कोने कोने में सदैव ज़िंदा हैं और भविष्य की प्रेरणाएं हैं | क्योंकि वहां समन्वय था छल की कोई संभावना ही नही थी |
-------तभी तो आज भी भारत के कोने कोने में विभिन्नता होते हुए भी व्यवहारिक सभ्यता व संस्कृति एक ही है, एक ही रीति रिवाज़, त्यौहार, धर्म-कर्म, एक ही ईश्वर, देवी-देवता, रहन सहन के तरीके |
------------------------------------
कथन -१४-
==भारत में जिन आततायी लोगों और संस्कृति ने मूलनिवासी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया है वह उन्होंने मनोवैज्ञानिक और धार्मिक षड्यंत्रों द्वारा नष्ट किया है (Keer, Malase and Phadake (eds.), 2006) | और अपने मिथकों में इस बात के संकेत जरुर छोड़े हैं कि वे कितने अन्यायी, धूर्त और कपटी थे।
---- मूलनिवासी शूरवीरों के खिलाफ अपनी सुन्दर कन्याओं और स्त्रियों का कपटपूर्वक इस्तेमाल किया । इस तरह उन्होंने न केवल मूलनिवासियों के प्रति घृणित व कायरतापूर्ण षड्यंत्र रचे हैं बल्कि अपनी स्त्रियों सहित अन्य स्त्रियों की उनकी दृष्टि में क्या उपयोगिता रही है इसे भी बार-बार स्पष्ट किया है।
------विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करके देवों और असुरों की साझी मेहनत से उपजे अमृत को किस तरह असुरों से छीनकर देवों को पिला दिया गया था यह आर्यों के मिथक साहित्य में बहुत सामान्य बात है (Williams, 2003) ।
----- इसी तरह इंद्र हर बार किसी तेजस्वी तपस्वी से भयभीत होकर उसके तप को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है। इंद्र पहले अन्य सब तरह के उपाय करके थक जाने पर अप्सराओं या स्त्रियों को इस्तेमाल करता है। इस तरह देखें तो स्त्रियाँ ही इंद्र का या आर्यों का ब्रह्मास्त्र रही हैं। देवताओं के राजा इंद्र द्वारा अहिल्या के छलपूर्वक शीलभंग की भी कथा है|
समाधान १४------
==यही तो पुराणों द्वारा भारतीय इतिहास को सत्यता से लिखे जाने का तथ्य उजागर करता है कि भारतीयों ने अपने किसी भी नेता, देवता या विशिष्ट व्यक्ति की नैतिक कमियों को कभी नहीं छुपाया, उसके सत्परिणाम या दुष्परिणामों को भी स्पष्ट किया ताकि आगे वाली पीढियां सबक लें व सामाजिक परिवर्धन, विकास व गतिशीलता का सातत्य बना रहे | इंद्र को दंड मिला, सभी जानते हैं इसी न्याय के लिए जानी जाती है यह संस्कृति |
------ झूठ प्रस्तोता ये विदेशी ज्ञान रत, अज्ञानी लोग यह भूल जाते हैं कि ये सभी देवता थे आर्य नहीं थे , स्वर्ग आदि में आर्य नहीं अपितु देवता रहते थे जो आर्य, अनार्य असुर सभी के देवता थे,
------इंद्र आर्यों का राजा नहीं अपितु देवराज था तथा देवता व असुर भाई भाई थे तो फिर केवल असुर मूल निवासी कैसे हुए और
----- यह इतिहास आज के भारत या आर्यावर्त या हिन्दुस्थान व हिन्दू का नहीं है अपितु उस समय का है जब यह वृहद् भारत या जम्बू द्वीप था, जिसमें पूर्वी गोलार्ध समस्त पुरानी दुनिया के समस्त क्षेत्र / देश/ प्रदेश हिमालय, हिमालय पार यूरेशिया के देश सम्मिलित थे |
------ शठे शाठ्यं समाचरेत----नीति गत तथ्य है, दुष्टता का निराकरण किसी भी प्रकार करना चाहिए खासकर यदि दुष्ट शत्रु आतातायी व बलशाली हो, शत्रु को बलशाली न बनने देना महत्वपूर्ण नीति है|
-------सती, पार्वती , सरमा, सीता, द्रोपदी आदि की वीरता, परामर्श व युद्द्ध कौशल आदि के आख्यान ये दर्शाते हैं की उस काल में स्त्रियाँ बल व बुद्धि में पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती थीं | स्त्री-पुरुष में कोइ अंतर नहीं था |
--------------क्रमश: पोस्ट चार----आगे---
चित्र -महिसासुर मर्दिनी----
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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

दुर्गा देवी रहस्य ...डा श्याम गुप्त

      दुर्गा देवी रहस्य ...

महादेवी दुर्गा को तीन महा-शक्तियों --महाकाली, शक्ति की देवी...महालक्ष्मी
,धन-संमृद्धि की देवी तथा महासरस्वती, विद्या व ज्ञान की देवी ....का सम्मिलित अवतार कहा जाता है |
महादेवी दुर्गा समस्त दानवों, असुरों व दुष्टों व दुष्टता के विनाश का कारण बनती हैं...| इस तथ्य का तात्विक अर्थ है कि जब जब समाज में फैले अनाचार, असुरता आदि के विनाश की आवश्यकता होती है तो वे सभी व्यक्ति व विद्वान् जिनके पास धन बल है...शक्ति है एवं वुद्धि व ज्ञान का बल है सभी को समाज से बुराई को दूर करने हेतु संगठित होकर कार्य करना चाहिए |
भगवान राम ने रावण पर विजय से पूर्व इसी महाशक्ति की आराधना की थी | इसका तत्वार्थ है कि सर्व-शक्तिमान भी जब तक प्रकृति -शक्ति से नहीं जुड़ते ..विजयश्री उन्हें प्राप्त नहीं होती |

विश्व की हर सभ्यता व देश में --सिंह वाहिनी देवी की उपस्थिति है--- चित्र -गूगल साभार ---चित्र विवरण के लिए चित्र पर क्लिक करें --बड़े आकार के साथ देखें ---
अतार्गिस--सीरिया

सिबेल्ला-पोम्पेयी


अशीराह---योरोप--हिब्रू

ताजकिस्तान

अल्लत -सीरिया

ग्रीक---देवी जीयससे लड़ते हुए 

स्केमेट- मिश्र  की युद्ध देवी

इन्नाना--सुमेरिया

जेनेट--रूस

आर्ट---लायन गोडेस --कनाडा

मोहन जोदारो


'दुर्गा --भारत'




'सीरिया -अतार्गिस ..'
'वेंशू --चाइनीज़-तिब्बत'
'सेबेल्ला -पोम्पेयी'
'सिंह वाहिनी---चेल्दियांस'
Drshyam Gupta's photo.
ईस्टर--मेसोपोटामिया
Drshyam Gupta's photo.
सिबेले--रोम की ग्रेट मदर
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श्रीलंका
Drshyam Gupta's photo.
वेंस्हू ---तिब्बत-चीन

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