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शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’—हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य पथदीप--- एक पुनरावलोकन ---डा श्याम गुप्त...



                    
 डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’—हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य पथदीप--- एक पुनरावलोकन

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                            काँधे पर झोला डाले, आँखों पर काला चश्मा, मुखमंडल पर विद्वतापूर्ण ओजस्वी एवं तेजपूर्ण आभा के साथ सरल भोलापन लिए हुए, सबकी सुनते हुए, सबसे सहज व कपटहीन भाव से मिलते हुए, अगणित युवा, प्रौढ़ व वरिष्ठ कवि, कवयित्रियों, साहित्यकारों, विद्वानों द्वारा गुरूजी, सत्यजी, डा सत्य संबोधन के साथ अभिवादन को सहेज़ते हुए काव्य व मंच संचालन में व्यस्त-अभ्यस्त व्यक्तित्व, जो काव्य गोष्ठियों व मंचों से प्रत्येक उपस्थित कवि को उनके नाम से पहचान कर बुलाते हैं, कविता पाठ किये बिना जाने नहीं देते, हर युवा कवि के प्रेरणास्रोत, वरिष्ठ कवियों के सहयोगी साथी सहायक प्रेरक कविवर डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में एवं हिन्दी साहित्याकाश में एक अप्रतिम व निराले व्यक्तित्व हैं|
                              स्वतन्त्रता पश्चात एवं परवर्ती निराला युग में जब कविता का क्षेत्र असमंजस, भ्रम, कुंठा, हताशा, वर्ग संघर्ष, पौर्वात्य व पाश्चात्य समीकरणों के मिश्रत्व के विभ्रम से गुजर रहा था तथा अधिकाँश साहित्यकार समाज को दिशा देने की अपेक्षा समाज से दिशा ले रहे थे तथा उसी प्रकार का साहित्य-सृजन कर रहे थे जो तात्कालिक लाभ व लोभ की पूर्ति तो करता था परन्तु दीर्घकालीन श्रेष्ठता संवर्धक एवं अत्यावश्यक आचरण संवर्धन की दिशा-प्रदायक नहीं था |
                ऐसे समय में हिन्दी साहित्याकाश में एक नये युगप्रवर्तक का उद्भव हुआ जो अतुकांत कविता की एक नवीन विधा ‘अगीत’ के सूत्रपात के साथ ही एक नए रूप में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अग्रगण्य बनकर उभरे | वे डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ के नाम से हिन्दी जगत में जाने जाते हैं|
                   इस संक्रांति-काल में सभी प्रकार की कविता व साहित्य की सभी विधाओं में समर्थ व सक्षम होते हुए भी डा रंगनाथ मिश्र ने काव्य को गति व दिशा प्रदान करने हेतु सरलता, संक्षिप्तता की अधुना आवश्यकता के साथ सर्वग्राहिता, जन-जन सम्प्रेषणीयता सरल भाषा के साथ काव्य में सामजिक सरोकारों की भारतीय भाव-भूमि प्रदायक काव्य हेतु “अगीत कविता “ का उद्घोष किया | इन शब्दों के साथ ....
“ मैं भटकते हुओं का सहारा बनूँ,
डूबते साथियों का किनारा बनूँ |
दे सकूं मैं प्रगति साधना से भरी,
जागरण-ज्योति का ही इशारा बनूँ |” 

     तथा “
हिन्दी हिन्दवासियों की
चेतना का मूल मन्त्र, 

सब मिल देवनागरी
 को अपनाइए | “
                          काव्य हो या संस्था, समाज, मानवता सभी को प्रगतिवादी दृष्टिकोणयुत एवं अग्रगामी होना चाहिए| गतिमयता ही जीवन है | परिवर्तन प्रकृति का नियम है, प्रवाह है, निरंतरता है | अगीत कविता उसी प्रवाह, निरंतरता, नवीनता की ललक लिए हुए अवतरित हुई डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ नाम के उत्साही व समर्थ कवि साहित्यकार के मनो-गगनांगन से | आज एक वटवृक्ष की भांति विविध छंदों, स्वरूपों,काव्यों, महाकाव्यों,आलेखों, शोधों, शोधग्रंथों तथा अगणित कवियों, साहित्यकारों, साहित्याचार्यों रूपी शाखाओं के साथ स्थापित है, हिन्दी साहित्य के आकाश में |
                     “चलना ही नियति हमारी है ...” के मंत्रदाता डा सत्यजी यहीं नहीं रुके अपितु हिन्दी साहित्य की प्रत्येक विधा को गति प्रदान करने के अंदाज़ में आपने १९७५ ई. में ‘संतुलित कहानी’ एवं १९९५ ई. में ‘संघात्मक समीक्षा पद्धति ‘ को जन्म दिया | इसके साथ ही ‘अगीतायन’ पत्रिका का सम्पादन , अपने स्वगृह का नाम ‘अगीतायन’ रखना एवं माह के प्रत्येक अंतिम रविवार को अपने आवास पर काव्य-गोष्ठी आयोजित करना उन्होंने अपनी नियति ही बनाली |
                १९६६ से आजतक इस गोष्ठी की क्रमिकता भंग नहीं हुई, किसी भी स्थिति में | इस गोष्ठी में कोइ भी सम्मिलित होसकता है बिना किसी आमंत्रण के | उनकी इस सर्व-समर्थता एवं सबको साथ लेकर चलने की क्षमता के कारण ही आज लखनऊ, प्रदेश व देश में अगीत साहित्य परिषद् के अगणित सदस्य, कवि, शिष्य-शिष्याओं का समूह अगीत साहित्य के साथ-साथ साहित्य की प्रत्येक विधा गदय-पद्य, गीत-अगीत में रचनारत हैं| उनके लिए कोइ भी विधा अछूत नहीं है | वे अगीत के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ की ही भांति गीत, छंद, कहानी, उपन्यास, समीक्षा ग़ज़ल, हाइकू आदि सभी में पारंगत हैं|
                         ऐसे युगप्रवर्तक, हिन्दी साहित्य के प्रकाश-स्तम्भ डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ जो अपने साहित्यिक कार्यकाल में अब तक लगभग ५ हज़ार काव्य-गोष्ठियों, मंचों, सम्मेलनों से सम्बंधित रहे हैं | उनके व उनकी संस्था अखिल भारतीय अगीत परिषद् के तत्वावधान में, संयोजन में जाने कितनी संस्थाएं समारोह आयोजन कराने को तत्पर रहती हैं | यह एक मानक है रिकार्ड है | आज भी ७४ वर्ष की आयु में वे युवा जोश के साथ साहित्य को नयी-नयी ऊचाइयों पर लेजाने हेतु क्रियाशील हैं| वे निश्चय ही हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा के अग्रगण्य साहित्यकार हैं| आशा है वे एक लम्बे समय तक हिन्दी साहित्य के पथदीप बने रहेंगे |

                                                                                             ---डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८ ,                                                    , एम् बी बी एस, एम् एस (सर्जन)
आशियाना लखनऊ २२६०१२.                                        . साहित्याचार्य, साहित्यविभूषण
मो.-९४१५१५६४६४ .

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

हिन्दी एवं साहित्य जगत के लिए गौरव के अनमोल क्षण ---प. रघुनन्दन मिश्र मार्ग 'का लोकार्पण ---डा श्याम गुप्त



          .


हिन्दी एवं साहित्य जगत के लिए गौरव के अनमोल क्षण ---
\\
                    साहित्यमूर्ति, साहित्यभूषण लखनऊ कवि समाज में गुरूजी के नाम से जाने जाने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार कविवर डा रंगनाथ मिश्र सत्य के परम पूज्य पिताजी, प्रखर समाज सेवी प.रघुनन्दन प्रसाद मिश्र के नाम से -ई ब्लोक टेम्पो स्टेंड , राजाजी पुरम , लखनऊ में एक सड़क मार्ग प. रघुनन्दन मिश्र मार्ग 'का लोकार्पण मा. विधायक श्री सुरेश कुमार श्रीवास्तव एवं मा. पार्षद श्री शिवपाल सिंह सांवरिया के कर कमलों द्वारा हुआ |
\
                         यह लखनऊ एवं देश के सभी साहित्यकारों एवं हिन्दी जगत के लिए गौरव की बात है | समस्त साहित्य जगत की ओर से डा रंगनाथ मिश्र सत्य जी को बधाई एवं सत्ता व शासन को साहित्य व काव्य जगत के प्रति समादर प्रदर्शन हेतु धन्यवाद व आभार .....

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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----डा श्याम गुप्त..


           
अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण
डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


भाग चार--- डा सत्य के अगीत यहाँ प्रस्तुत हैं ..

१.
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान | "

" घर घर में खुशहाली लाएं ,
जीवन साकार करें ;
नवयुग निर्माण करें ,
सबको निज गले लगाएं | "
३.
" दलितों के प्रति मत करो अन्याय
उन्हें भी दो समानता से-
जीने का अधिकार , अन्यथा-
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी, और-
लेगी प्रतिकार ;अतः --
ओ समाज के ठेकेदारो !
उंच-नीच की खाई पाटो ,
दो शोषितों को ही न्याय | "
४.
" बूँद बूँद बीज ये कपास के,
खिल-खिल कर पड रही दरार;
सडी-गली मछली के संग,
ढूँढ रहा विस्मय विस्तार,
डूब गए कपटी विश्वास के | "
५.
दिशाहीन नहीं हूँ अभी-
पाई है केवल बदनामी,
खोज रहे हैं मुझको,
मेरे प्रेरक सपने
मिलनातुर हैं मुझसे
मेरे सारे अपने,
क्रियाहीन नहीं हूँ अभी
यह तो है जग की नादानी |
६.
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है |"

७.
"" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें
८.
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "
९.
" नवयुग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "

१०.
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा |
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "
११.
" आओ हम अंधकार दूर करें ,
रात और दिन खुशी-खुशी बीते;
सारा संसार शान्ति पाए ,
अपना यह राष्ट्र प्रगतिगामी हो ;
वैज्ञानिक उन्नति से ,
इसको भरपूर बनाएँ | "
१२.
"टूट रहा मन का विश्वास ,
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं|
रोक रहीं मुझको
गहरी बाधाएं |
अंधकार और बढ़ रहा ,
उलट रहा सारा इतिहास | "
१३.
"कवि चिथड़े पहने
चखता संकेतों का रस,
रचता -रस, छंद, अलंकार
ऐसे कवि के क्या कहने |"
१४.
" स्तम्भन एक और ....
संबंधी भीड़-भाड
ध्वंस की कतारों में ;
मक्षिका नहा रही-
दूध के पिटारों में |
ढला ढला लगता सब ओर...
अपने में स्नेह-सिक्त,
तिरछा भूगोल |"
१५.
"देव नागरी को अपनाएं
हिन्दी है जन जन की भाषा ,
भारत माता की अभिलाषा |
बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,
सब बहनों की बड़ी बहन है
हिन्दी सबका मान बढाती ,
हिन्दी का अभियान चलायें|"
१६.
"आओ ! हम राष्ट्र को जगाएं
आजादी का जश्न मनाना,
हमारी मजबूरी नहीं-
अपितु कर्तव्य है |
आओ हम सब मिलकर
विश्व-बंधुत्व अपनाएं,
स्वराष्ट्र को प्रगति पथ पर -
आगे बढाएं |"
१७.
"इधर उधर जाने से
क्या होगा ;
मोड़ मोड़ पर जमी हुईं हैं ,
परेशानियां |
शब्द -शब्द अर्थ सहित
कह रहीं कहानियां
मन को बहलाने से
क्या होगा |"
१८.
सबका सम्मान करो
सब भारत मां की हैं संतानें
उनमें मतभेद मत करो |
उंच-नीच का जो
भ्रमजाल आज फैला है,
मिलजुलकर उसको भी दूर करो |
१९.
आशाएं साथ हैं हमारे
कभी कभी द्वार पर टेरती उदासी
तनहाई में मुझको
घेरती उदासी ,
बिछुडन भी होरही उदास
बाधाएं साथ हैं हमारे |
२०.
जीवन तो तुझको है अर्पण
ध्यान मग्न बैठा हूँ मैं
देख रहा तेरा श्रृंगार,
साहस को फिर बटोरकर
आया हूँ फिर तेरे द्वार
शेष सभी तुझको समर्पण |
२१.
नवल प्रात: आया है आज यहाँ
धीरे धीरे रात चली गयी,
ऊषा ने जब प्रभात फैलाया |
सूरज भी चलने को आतुर है,
लाजवंती शाम ढल गयी,
अन्धकार गहराया आज यहाँ |
२२.
आँखों को चित्र भागया
कैसे मैं छोडूं यह महानगर
बाधाएं दो नहीं हज़ारों,
आशाएं कर रहीं श्रृंगार
पार्कों में बैठे कुछ लोग
जीवन का दर्द रहे बाँट
अपने में डूब गया सत्य
देख रहा गोमती डगर |
२३.
धीरज को बाँध नहीं पाता...|
जीवन में छागई उदासी,
मन को समझाता हूँ बार बार,
वह भी तो साथ नहें देता |
कैसे मैं व्यक्त करूँ
अंतर-पीडाओं को
इसका भी ध्यान नहीं आता|

२४.
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
सारा विश्वास तुम्हीं हो,
मेरा आकाश तुम्हीं हो,
सारे संसार में अकेले,
मेरा मधुमास तुम्हीं हो
तुमको तज और कहाँ जाऊं |
१३.
आतप ने सांकल खटकाई जब
बिरहन की पीड़ा दोगुनी हुई |
जोर जोर चलती हैं, विष भरी हवाएं
तन मन में आग लगी
कौन आ बुझाए|
भेजी जब प्रियतम ने पाती परदेश से
सीने पर रखने से
पीड़ा कुछ कम हुई |
२६.
चलना ही नियति हमारी है
घूम घूम कर करता रहता आभास
धरती के साथ साथ
सोया आकाश ,
लक्ष्यों तक जाने को
निश्चित स्वर पाने को
संसृति को होता विश्वास,
चलना ही प्रगति हमारी है |
२७.
संघर्षों से कभी न ऊबें |
जो भी हम आज जीरहे
उसका तो अंत सत्य है,
कर्मों को करते जाएँ हम
अपने कर्तब्यों में बार बार डूबें |

२८.
"ओ बसंत ! फिर आना
सिहरन के साथ |
तेरे आने की आहट मिल जाती है;
पाहुन से मिलने की,
इच्छा तडपाती है ;
ओ बसंत ! फिर आना ,
मनसिज के साथ | "
२९.
आओ हम सृजन को जियें |
सत्य और संयम, मन में उत्साह भरें
जीवन आशान्वित हो
शान्ति के सहारे |
हिंसा का त्याग करें
सबको सुख दे करके
हम गरल पियें|
३०.
जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों ही मिलते रहते |
जिन्दगी का सत्य क्या रहा
जीवन का तथ्य क्या रहा,
जिन्दगी में शूल यदि मिले
तो फूल भी कभी कभी खिले ,
जिन्दगी में हृदयों के दीप जलते रहते...|
.......क्रमश---भाग पांच----









शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

डा रंगनाथ मिश्र सत्य के हाइकू....



 डा रंगनाथ मिश्र सत्य के हाइकू....


मैं जानता हूँ
तुम्हारी हर चाल
पहचानता हूँ |

कहता नहीं
लेकिन कहना भी
नहीं चाहता |

हंसीं उड़ाते हैं
मेरी सहजता की
वे लगातार

सहजता ही
मनुष्य की होती है
सहज मित्र

 बढजाती है
मनुष्य की आयु भी
प्राणायाम से

जीवन जियो
सच्चाई के साथ ही
सुखी रहोगे

त्याग तपस्या
बेकार न समझें
कभी भी मित्र

चलते रहें
कर्म के पथ पर
सुख मिलेगा

 योग करिए
जीवन सुधारिए
स्वस्थ रहिये 



बुधवार, 5 अगस्त 2015

अगीत कविता विधा के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार ड़ा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' को उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा "साहित्य-भूषण" सम्मान-2014 देने की घोषणा --ड़ा श्याम गुप्त

        ड़ा रंगनाथ मिश्र सत्य


                       साहित्य में अगीत कविता विधा के स्थापक   "सृजन" संस्था के संरक्षक व अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक-अध्यक्ष देश के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रंगनाथ मिश्र 'सत्य' जी को उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने "साहित्य-भूषण" सम्मान-2014 देने की घोषणा की।



 जीवन परिचय....
      साठोत्तरी कविता जगत में कविता की नवीन विधा अगीत के संस्थापक साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र सत्य का जन्म १ मार्च १९४२ को जनपद रायबरेली ( उ.प्र.) के ग्राम कुर्री सुदौली के एक संभ्रांत कान्यकुब्ज परिवार में हुआ | आपके पिता का नाम श्री रघुनन्दन प्रसाद एवं माता श्रीमती शिवानाथा देवी मिश्रा था| धार्मिक वातावरण में जन्मे डा सत्य जी अपने भाइयों में सबसे छोटे थे | अल्पायु में ही पिता का निधन होने पर प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही बड़े भाइयों के संरक्षण में हुई|
        आपने कानपुर श्रमिक शिक्षा केंद्र से श्रमिक-शिक्षक का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया आगे की उच्च शिक्षा शिक्षा लखनऊ के विद्यांत डिग्री कालेज से प्राप्त की | इन्टरमीडिएट की परीक्षा के उपरांत  उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में अपनी सेवायें अर्पित कीं एवं साथ-साथ ही उच्च शिक्षा भी प्राप्त करते रहे | हिन्दी-साहित्य में परास्नातक की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से करने के उपरांत डा उषा गुप्ता के निर्देशन में ‘नए हिन्दी काव्य में कतिपय प्रमुख वाद‘ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की | आप सन 2000 ई में उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में केंद्र प्रभारी पद से सेवानिवृत्त हुए| वे हिन्दी साहित्य परिषद् के महामंत्री तथा लखनऊ वि वि के हिन्दी विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष भी रहे |
       आपका विवाह कालूखेडा उन्नाव के स्व. गंगाचरण शुक्ल की पुत्री श्रीमती कल्याणी देवी से हुआ| आपके दो पुत्र अनुराग मिश्र व आशुतोष मिश्र एवं दो पुत्रियाँ मधु व सीमा हैं| 

साहित्यिक परिचय .
       क्रान्तियुगोत्तर साहित्यकार, अगीत काव्य के प्रणेता, ‘संतुलित कहानी विधा’ के जनक एवं ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ के अगुआ तथा आधुनिक हिन्दी कविता और वर्तमान भारत की भाषायी व सांस्कृतिक गौरव को पहचान दिलाने में समकालीन नव-साहित्यकारों व युवाओं के प्रेरणास्रोत डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ का नाम हिन्दी साहित्य जगत के लिए नया नहीं है| वाल्याकाल से ही आप कविता से जुड़े रहे | आपने तरुण साहित्यकार सम्मलेन एवं कवि कोविद क्लब के मंत्री पद से साहित्य सेवा में अमूल्य योगदान दिया | आपने सं १९६६ में साठोत्तरी कविता जगत में अतुकांत काव्य की एक नयी विधा ‘अगीत कविता’ को जन्म दिया|, १९७५ में ‘संतुलित कहानी; तथा १९९८ में ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ का प्रचलन किया | आपका प्रथम स्वरचित काव्य संग्रह ‘बिछुड़े मीत’ १९६० में प्रकाशित हुआ| ‘कवि सोहनलाल सुबुद्ध एक परिचय’ तथा ‘ महाकवि जगत नारायण पांडे; एक परिचय ‘ आपकी अन्य लोकप्रिय कृतियाँ हैं| आपने ‘अगीत काव्य के चौदह रत्न’, ‘अगीत के इक्कीस स्तम्भ’, ‘अगीत काव्य के अष्टादश पथी’ एवं ‘अगीत के सोलह महारथी’ आदि पुस्तकों का सम्पादन किया| ‘अगीतोत्सव -89’, ‘कश्मीर हमारा है’, ‘जवानो आगे बढ़ो’ ‘पनघट’ आदि काव्य संग्रहों तथा  ‘समीक्षा पद्धति की पुस्तक गुणदोष (पार्थोसेन), लघु उपन्यास ‘सुमि’ निबंध संग्रह ‘स्वयंगंधा’, का भी संपादन किया | १९६६ से आपने लगभग १५ वर्षों तक अगीत-त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तत्पश्चात उनके संरक्षण में ‘अगीतायन साप्ताहिक पत्र’ का लगातार संपादन किया जा रहा है| 
                  आपने दर्ज़नों पुस्तकों की भूमिका लिखी जिनमें महाकाव्य, खंडकाव्य, काव्य संग्रह भी शामिल हैं| जिनमें अगीत विधा खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम अगीत महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर ( ले.श्री जगत नारायण पांडे ) एवं  सृष्टि-अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्यगीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा-अगीत-विधा काव्य-उपन्यास एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण ( ले. ड़ा श्याम गुप्त ) उल्लेखनीय हैं | 



       नियमित रूप से आपके कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होते रहते हैं| आप लगभग साढ़े चार हज़ार से अधिक साहत्यिक व सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन संचालन व अध्यक्षता कुशल पूर्वक कर चुके हैं| प्रथम विश्व हिन्दी सम्मलेन नागपुर एवं हिन्दी सम्मलेन दिल्ली में वे अ.भा. अगीत परिषद् का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं| आपके ऊपर एक लखनऊ विशाविद्यालय द्वारा शोध-प्रबंध ‘ अगीत परिषद् साहित्यिक संस्था, एक अनुशीलन ‘ किया जा चुका है| आपको देश भर के अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से समानित किया जा चुका है|                             


 संपर्क- अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ-१७.,दू.भा. ०५२२-२४१४८१७ ..मो.९३३५९९०४३५ ..                
                    

 

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