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बुधवार, 31 जुलाई 2013

कुण्डली छंद...सपने ...डा श्याम गुप्त ....

सपने का संसार  तो है अद्भुत संसार,
कभी ये सपने टूटते, कभी हुए साकार|
कभी हुए साकार, झूठ सच समझ  न आये ,
व्यर्थ शेखचिल्ली से सपने मन नहीं लाये |
टूटें तो दुःख देयं, स्वप्न  कब होते अपने,
पर देखे बिन श्याम' होयं कब पूरे सपने ||

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