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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --डा श्याम गुप्त ---


                   

----------बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --------

------------------लय साधने हेतु गीतों व छंदों में तुकांत का प्रयोग सनातन परम्परा से प्रारम्भ हुआ जो हिन्दी में तुकांत वर्णिक व मात्रिक छंदों युत गीतों का प्रयोग महाकाव्यों की लम्बी कवितायें एवं शास्त्रीय काव्य में ही रहा | लोकगीतों में तुकांत की अनिवार्यता कभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुई अपितु केवल लय ही गीतों का मूलतत्व बना रहा | जो महादेवी, प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त आदि तक गीतों के रूप में चलती रही |

----------------- वास्तव में छायावाद के पश्चात के युग में अर्थात सत्तर के दशक में समाज की भांति साहित्य भी ठिठका हुआ था | स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य में अंग्रेज़ी साहित्य एवं अन्य विदेशी साहित्य के प्रभाववश एवं समाज में स्वतंत्र चेतना की उत्पत्ति हुई परन्तु विशिष्ट साहित्यिक दिशा के बिना साहित्य भी समाज की भांति दिशाहीन था ? 

------अतः महादेवी-प्रसाद-पन्त के संक्षिप्त भावसौन्दर्य प्रधान छायावादी गीतों के बाद, निराला के अतुकांत छंदों व गीतों की क्रान्ति के समय तक गीतों की महत्ता व उपादेयता स्पष्ट दिखाई देती रही | 

------छायावादोत्तर युग में बच्चन, नीरज आदि के विलंवित लम्बे लम्बे गीतों के काल में, खुले मंच पर कविता व कवि सम्मेलनों के प्रादुर्भाव के कारण जिनमें लम्बे गीतों को सुनने का किसी के पास समय नहीं था अपितु मंच हेतु हलके-फुल्के काव्य, हास्य-कविता आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही विभिन्न सामयिक वस्तु-विषयों का कविता में प्रवेश के कारण गीतों का प्रभाव कम हुआ|

------गीतों का लंबा होना एक दुर्गुण है इसमें भाव एक नहीं रह पाते और श्रोता भावों की भूलभुलैया में खोजाता है और भूल जाता है की वह क्या सुन रहा था | यही कारण है कि रूढ़ गीत इस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ

-----परन्तु यह गीत की गतिशीलता एवं मृत्युंजय रूप ही है कि वह पारंपरिक रूप बनाए रहते हुए --अतुकांत गीतविधा ‘अगीत’ एवं तुकांत गीतविधा नवगीत के नए रूप में प्रतिष्ठित होकर भी आज अपने मूल रूप में जीवित है |
-------------------------------- इन सभी कारणों से कविता जगत में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का प्रवेश हुआ जो अकविता, नयी कविता, गद्यगीत, अतुकांत गीत एवं उसका संक्षिप्त रूप अगीत तथा तुकांत-गीत के संक्षिप्त रूप नवगीत का अवतरण हुआ |

-----ग़ज़ल विधा के लोकप्रिय होने से भी गीतों की चमक पर प्रभाव पड़ा और यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गीत मर गया’ परन्तु इस सब के बाबजूद भी हिन्दी में लोक व पारंपरिक गीत परम्परा की अजस्र धारा निरंतर प्रवहमान रही और आज भी प्रवहमान है |

------परम्परा से हटकर तुकांत व अतुकांत गीतों की एवं कविता की नवीन धाराओं के रूप में अतुकांत गीत की धारा अगीत एवं तुकांत गीत की धारा नवगीत ही आज जीवित हैं | अन्य सभी धाराएं काल के गाल में समा चुकी हैं|
--------------अगीत - अतुकांत गीत का संक्षिप्त रूप है जो गीत की मुख्य शर्त लय पर ही आधारित सामायिक आवश्यकता – संक्षिप्तता एवं तीब्र भाव-सम्प्रेषण के आधार दोहे व शेर की तर्ज़ पर रचा गया है |
-----अगीत का एक सुनिश्चित छंद विधान “ अगीत साहित्य दर्पण “ ( लेखक- डा श्यामगुप्त, प्रकाशक-सुषमा प्रकाशन एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ..प्रकाशन –जनवरी २०१२ ई.) प्रकाशित होचुका है
-----एवं तुकांत गीति विधा के भांति ही इसके विभिन्न प्रकार के विविध छंद भी सृजित किये जाचुके हैं | आज यह गीत की एक सुस्थापित विधा है |
--------------नवगीत - वास्तव में मूल रूप से गीत ही है गीत के पारंपरिक रूप का पुनर्नवीनीकरण | गीत और नवगीत में काव्यरूपात्मक अंतर नहीं है। यह कोई नवीन विधानात्मक तथ्य भी नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही मोड़-तोड़ कर लिख दिया जाता है |
----इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है |
----मेरे विचार से इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है | इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता तथा प्रायः कवि अपने निजी (ज़्यादातर काल्पनिक) अवसाद-आल्हाद को ऐकान्तिक भाव में गाता दिखाई देता है |
-----वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | ----उदाहरणार्थ---- एक नवगीत का अंश है—
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे     १६
मन के मनके
दर्द हरा है      १६ = ३२
धीरे-धीरे
ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है?     ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..

----सीधा -सीधा ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ...

----इसे ऐसे लिखिए --
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२

--------------------कहने का अर्थ है कि गीत आज भी जीवित है, अपने पारंपरिक रूप में भी एवं विविध नवीन रूपों में भी | वर्तमान में अनेकों गीतकार अपने गीतों से सरस्वती का भण्डार भर रहे हैं|
------भविष्य में या साहित्य के इतिहास में जब कभी सुरुचिपूर्ण गेय साहित्य या कविता की बात होगी तो गीतों-लोकगीतों-प्रेमगीतों का नाम सर्वोपरि रहेगा एवं गीत के दोनों नवीन रूपों अगीत एवं नवगीत का भी महत्वपूर्ण उल्लेख अवश्य किया जाएगा |
-----सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहे हैं, अतः पारम्परिक गीतों से गीत के इन नये स्वरूपों की समन्वित पहचान बनी |
-----यही कारण है, कि गीत के मर जाने की घोषणा का गीत के नये प्रारूपों, अगीत व नवगीत, दोनों विधाओं ने न केवल प्रतिकार किया अपितु स्वयं को सक्षम व प्रभावशाली रूप में साहित्य व समाज के सम्मुख विस्तृत रूप में प्रस्तुत भी किया |

-----क्रमशः---भाग चार ( अंतिम किश्त )-----

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य का एक नवगीत----- डा श्याम गुप्त ....

साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य का एक नवगीत----- 


बरस रहे मचल मचल यादों के घन |

कंपती है भादों की रात,
बतियाँ उर में शूल गयीं |
टेर उठी कान्हा की वंशी
सखियाँ सुध बुध भूल गयीं |


बहक रहा निश्वांसों का पागलपन ||

मोती ढरते आँखों से
चमकीली किरणों जैसे |
टूट गया मन का कंगन
आऊँ पास भला कैसे |

कंचनी फुहारों में परस गया तन ||

गुलाबांसों के फूल खिले,
फटा पड़ रहा नील कपास |
राग रागिनी तरुओं की
मंडराती कलियों के पास |

साँसों के घेरे में डूब गया मन |
बरस रहे मचल मचल यादों के घन ||

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

दो नवगीत ..ब्रज बांसुरी" से......डा श्याम गुप्त ...

ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ .......डा श्याम गुप्त ...
              

                     मेरे नवीनतम प्रकाशित  ब्रजभाषा काव्य संग्रह ..." ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ  गीत, ग़ज़ल, पद, दोहे, घनाक्षरी, सवैया, श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि  मेरे  ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में प्रकाशित की जायंगी ... .... 
        कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का संग्रह )
         रचयिता ---डा श्याम गुप्त 
                     ---   सुषमा गुप्ता 
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन ..सत्रह...नवगीत ....


१.कविता कविता खेलें

                      आऔ हम सब मिलिकैं ,
                      कविता कविता खेलें ||

 छंद औ अलंकार में भूलें
  विषय व्याकरन भाव |
लच्छनि बारी भासा होय तौ
का अनुभाव-विभाव |

भाँति भांति के उपमा रूपक,
गढ़िकें ऐसे लावैं |
जन जन की कहा बात,
नामधारी न समुझि पावैं |

                  नए नए बिम्बनि कौं ढूंढें ,
                  मिलिकैं पापड़ बेलें ||

आदि मध्य औ अंत में-
ना होय कोऊ लाग-लपेट |
छत्तीस व्यंजन ठूँसि कै बस-
भरिदें कविता कौ पेट |

ये दुनिया है संत्रासनि की ,
रोनौ-गानौ गायौ |
कवि तौ सुकवि औ समरथ है ,
कहा सुन्दर गीत सुनायौ |

                   का सारथकता, सामाजिकता,
                   सास्तर ज्ञान कौं पेलें ||

कम्प्युटर जुग में सब्दन के,
नए निकारें अर्थ |
कोऊ पूछै बतलाय डारें ,
सबके अर्थ -अनर्थ |

सुनें चुटकियाँ आज ,
हंसें रोवें घर जायकें |
जासौं पूछें अरथ,
 वोही रहि जावै झल्लाय कें |

                         घर जायकें सब्दावलि ढूंढें ,
                          सब्दकोस कौं झेलें ||

काऊ बड़े मठाधारी कौं
चलौ पटाय डारें |
पूजा अरचन करें,
आरती करें मनाय डारें |

काऊ तरह औ कैसे हूँ ,
बस जुगति-जुगाड़ करें |
पुरस्कार मिलि जावै ,
औ सब जै जैकार करें |

                       काऊ तरह ते छपवाय डारें ,
                       बाजारनि में ठेलें ||


२.भरी उमस में...


                आऔ आजु लगावैं घावनि पै
                गीतनि के मरहम |

मन में है तेज़ाब भरौ
पर गीतनि  कौ हू  डेरौ |
मेरे गीतनि में ठसकी है,
दोस नांहि है मेरौ |

मेरौ अपनौ काव्य-बोधु है,
आपुनि ठनी ठसक है |
मेरी आपुनि ताल औ धुनि  है,
आपुनि सोच-समुझि है |

                   भरी उमस में कैसें गावें
                    प्रेम प्रीति प्रीतम ||

जो कछु देखौ सोई कहतु हौं
झूठौ भाव है नाहीं |
जो कछु मिलौ सोई लौटाऊँ
कछु हू नयौ  है नाहीं |

हमकों थी उम्मीद
खिलेंगे इन बगियन में फूल |
पर हर ठौर ही उगे भये हैं
कांटे और बबूल |

                    टूटि चुके हैं आजु समय की
                     सांसनि के दम-ख़म |

                    आओं आजु लगावैं घावनि पै
                    गीतनि के मरहम ||

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