सवैया..... छलके
छलके सत-शुचि जो विचार रहें, तिनकी भाषा कर्मनि छलके,
छलके शुभ-कर्म की आभा से, आत्मा की शुचिता मन छलके |
छलके तन से भाषा मन की, आनन पै तन-मन दुति छलके |
छलके उर में प्रभु भक्ति की धार, औ नयनन आनंद-रस छलके ||
कुंडली छंद .....छंद
गति जाने नहीं छंद की, छंद छंद चिल्लाय,
अनुशासन युत कथ्य जो, कविता वही कहाय |
कविता वही कहाय, भिन्न हो गद्य भाव से,
हो अतुकांत -तुकांत, सजे हों भाव काव्य के |
बस तुकांत ही छंद, भाव यह अल्प-ज्ञान मति,
छान छंद चिल्लाय, छंद की नहीं जाने गति ||