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शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

‘‘मेरा बस्ता कितना भारी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।

मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।

पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।

रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।
कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।

थोड़ी कॉपीपेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।

कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

इतने से चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

त्रिपदा अगीत...डा श्याम गुप्त



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त्रिपदा अगीत--१६-१६ मात्राओं के तीन पदों वाला अतुकान्त गीत है जो अगीत कविता का एक छंद है---
 

 ..
 अंधेरों की परवाह कोई,
 
करे, दीप जलाता जाए;
 
राह भूले को जो दिखाए |
     
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सिद्धि प्रसिद्धि सफलताएं हैं,
जीवन में लाती हैं खुशियाँ;
पर सच्चा सुख यही नहीं है|
     
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चमचों के मजे देख हमने ,
आस्था को किनारे रखदिया ;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला|
    
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जग में खुशियाँ उनसे ही हैं,
हसीन चेहरे खिलते फूल;
हंसते रहते गुलशन गुलशन |
     
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मस्त हैं सब अपने ही घरों में ,
कौन गलियों की पुकार सुने;
दीप मंदिर में जले कैसे ?
६.
तुमसे मिलने की खुशी भी है ,
मिल पाने का गम भी;
कितने गम हैं जमाने में।
7.
खडे सडक इस पार रहे हम,
खडे सडक उस पार रहे तुम;
बीच में दुनिया रही भागती।
 ८.
कहके वफ़ा करेंगे सदा,
वो ज़फ़ा करते रहे यारो;
ये कैसा सिला है बहारो।


शनिवार, 8 नवंबर 2014

एक दिन तुम मेरी दुल्हन बनोगी,





तमन्ना है दीदार करूँ, मुस्कुराता चेहरा तेरा  
देख तनी भृकुटी तेरी, होश उड़ जाता है मेरा |
गर थोडा हँसकर बोल दे,क्या बिगड़ेगा तेरा
बहार आएगी ,गुल खिलेगा चमन में मेरा !
नकली ही सही,दो लफ्ज मीठे बोलकर देखो
 तुम पर जिंदगी कुर्बान , यकीं करो मेरा !
एकबार हाथ, मेरे हाथ में देकर तो देखो
नहीं छूटेगा जिंदगी भर ,यह वादा है मेरा !
छोड़ संकोच,नाराजगी तुम, कदम बढ़ा के देखो
एक दिन तुम मेरी दुल्हन बनोगी,यकीं है मेरा |

कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

ग़ज़ल....अंदाज़े-वयां ज़िंदगी का.... डा श्याम गुप्त ...



           अंदाज़े-वयां ज़िंदगी का....


जरूरी नहीं ज़िंदगी को घुट-घुट के जिया जाए |
चलो आज ज़िंदगी का अंदाज़े-वयां लिया जाए |

खुशी पाते हैं जो अपनी शर्तों पे जिया करते हैं ..
शर्त  यही   कि  सदा परमार्थ  हित  जिया जाए ..|

यूं तो पीने के कितने बहाने  हैं  ज़माने में,
लुत्फ़ है जब जाम से जाम टकरा के पिया जाए |

मरते हैं हज़ारों लोग दुनिया में यूं तो लेकिन,
मौत वही यारो जब देश पे कुर्वां  हुआ जाए |

जन्म लेते हैं, जीते हैं प्रतिदिन जाने कितने,
जीना वही जब राष्ट्र का सिर गर्वोन्नत किया जाए |

लिखी जाती हैं कितनी किताबें, कविता-कहानियां,
साहित्य वही  कुछ सामाजिक सरोकार दिया जाए |

ग़ज़ल कह तो रहा है हर खासो-आम यहाँ, लेकिन 
ग़ज़ल वही  जब अंदाज़े-वयां श्याम का जिया जाए |

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