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बुधवार, 14 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख--पोस्ट दो---डा श्याम गुप्त

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख--पोस्ट दो---डा श्याम गुप्त---
===========आगे पोस्ट दो------समाधान ६ से १० तक---
- कथन -६-
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अब हम इसी क्रम में भारत के सबसे प्रमुख धर्म हिन्दू धर्म को देखते हैं। यहाँ एक किताब एक पैगंबर और एक भगवान् का सिद्धांत काम नही करता।
---------एक ही हिन्दू परिवार में कोई योगी हो सकता है कोई तांत्रिक हो सकता है और कोई नास्तिक भी हो सकता है। यहाँ तक कि परिवार के भीतर ही दो विपरीत विश्वासों वाले लोग भी हो सकते हैं।-
------- एक अर्थ में यह बहुत प्रगतिशील घटना नजर आती है। कि भारतीय हिन्दू धर्म विश्वास और कर्मकांड के प्रति बहुत सेक्युलर या लिबरल हैं और इसी अर्थ में हिन्दू धर्म के प्रशंसक इसे सबसे अधिक सहिष्णु और समावेशी धर्म बतलाते आये हैं।
---------लेकिन यह इतिहास के हज़ारों साल के विस्तार में निर्मित हुई विराट तस्वीर का एक छोटा सा पहलू भर है। इसके अन्य छुपे हुए पहलू भी हैं जो भारत में स्वयं को हिन्दू न मानने वाले लोगों की तरफ से उठ रहे तर्कों और तथ्यों के प्रकाश में अब हमें हिन्दू धर्म के पूरे इतिहास और इसके सम्प्रदायों सहित इसके विराट मिथक शास्त्र पर बहुत तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टि से पुनर्विचार करना होगा।
समाधान -६ –
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वास्तव में सत्य तो यही है, जो कथन स्वयं बयान कर रहा है | हम पहले ही कह आये हैं की
--------हिन्दू धर्म किसी किताब, व्यक्ति या एक विचार से बंधा नहीं है इसीलिये वह प्रगतिशील व खुले विचारों वाला सबसे अधिक सहिष्णु और समावेशी धर्म है|
---------लेखक को हिन्दू धर्म की एतिहासिकता का ज्ञान नहीं है यह कुछ हज़ार सालों का नहीं अपितु करोड़ों वर्षों की तस्वीर है जिसके कारण यह मानवता का सर्वप्रथम धर्म है जो आजतक नित्य-नवीन है | |
-------- निश्चय ही हिन्दू धर्म को समझने के लिए एक समुचित वैज्ञानिक दृष्टि आवश्यक है |
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कथन ७-
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अब तक उपेक्षित और तिरस्कृत समाजों की जीवनधारा में बहता आया धर्म और उनकी अपनी संस्कृति के प्रवाह से बहुत कुछ ऐसा उपलब्ध हो रहा है जो एक नये ही नेरेटिव को उभार रहा है। यह भारत के मूल निवासियों और बहुजनों का मूल नेरेटिव है। नए तथ्यों के प्रकाश में प्राचीन मान्यताओं और मिथकों पर पुनर्विचार ने एक नया ही जगत खोल दिया है।
समाधान-७-
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उपेक्षित व तिरस्कृत समाजों ने अभी तक ये कदम क्यों नहीं उठाये, क्या उनमें विज्ञजन नही हुए;
-------क्योंकि उनकी जीवन धारा में भी वही हिन्दू धर्म बहता आया है जिसमें सभी समान भाव से रहते आये है अपने अपने कर्म-स्वभाव के अनुसार |
--------यहाँ यह प्रश्न पहले सुलझा लेना चाहिए की मूल निवासी कौन हैं एवं क्या हम व एवं स्वयं को तथाकथित आदि-मूलनिवासी कहने वाले, युगों के मानव विकास को उलटकर अपने उसी आदिवासी जगत में पुनः जाना चाहते हैं |
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कथन-८- भारत में इतिहास की बजाय मिथकीय पुराण क्यों लिखा गया :
इतिहास बोध न केवल संस्कृति बोध है बल्कि उससे भी आगे बढ़कर यह किसी संस्कृति या समाज का नैतिकता बोध या स्वयं न्याय बोध भी है। ----इसीलिये हर संस्कृति ने चाहे वह कितनी भी विकसित रही हो – उसने अपनी विशिष्ट नैतिकता को बहुत स्पष्ट अर्थों में परिभाषित किया है और उसी के आधार पर शुभ अशुभ की परिभाषा की है और उसी के आधार पर इतिहास लिखा है।
------इसीलिये उनका इतिहास बोध और न्याय बोध बहुत स्पष्ट है। उसमे घालमेल या मिथकीय धुंध नहीं है।
-----लेकिन क्या भारत में ऐसा है? क्या भारत ने इतिहास लिखा है? या क्या भारत के मिथकीय इतिहास में उन्नत नैतिकता बोध और न्याय बोध जैसा कुछ है?
समाधान ८----
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लिखा हुआ इतिहास कभी सत्य नहीं होता अपितु सामयिक शासन, सत्ता के हाथों की कठपुतली होता है | इसीलिये तो समय समय पर आधुनिक लिखे हुए इतिहास की असत्यता परिलक्षित व उद्घाटित होती रहती है | नए शासन,-सत्ता आते ही उसी के अनुसार इतिहास लिख दिया जाता है और इसका सामान्य-जनता के हाथ में कुछ नहीं होता | इसका न्यायबोध या नैतिकता सामयिक सत्ता के अनुसार होता है जो अधिकाँश सत्य नहीं होता |
-------- साथ ही अन्य धर्म बहुत नवीन धर्म हैं , वस्तुतः वे धर्म हैं ही नहीं अपितु संगठन हैं और अपने अपने संगठन के नियमों पर चलते हैं, वास्तविक मानवीय नियमों पर नहीं, जो धर्म का अर्थ है |
------- इसीलिये वे स्पष्ट शुभ-अशुभ व विशिष्ट नैतिकता एवं उसका इतिहास लिखते हैं ताकि मनुष्य को कुछ सामान्य मनुष्यों के ही बनाए गए कठोर नियमों, कानूनों पर बलपूर्वक उसी लीक पर चलाया जा सके|
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हिन्दू धर्म सनातन धर्म है सबसे प्राचीन, कालातीत, इस लिखित इतिहास से परे, मानवीय आदर्श जीवन पद्धति | जब मानव लिखना भी नहीं जानता था, इतिहास का अर्थ भी नहीं |
-------पुराणों आदि को ध्यान से समझने पर ज्ञात होगा कि वाचिक, श्रुति परम्परा से ही उनमें घटनाएँ, कथ्य, कथाएं इस प्रकार बाराम्बारिता व संदर्भिता भाव से पिरोई जाती हैं उनमें व्यजनार्थों से ही एवं संदर्भित कथ्यों से ही मूल अर्थ निकल पाए, ताकि कोइ उनका दुरुपयोग, अर्थ-अनर्थ, असत्य-मिलावट न कर पाए, उन्हें बदला न जा सके |
------- इसीलिये ये पौराणिक कथ्य व तथ्य आज युगों बाद भी वही हैं | उस समय ग्रहों व नक्षत्रों की स्थितियों से काल-स्थापना की जाती थी, तारीख या दिनांक से नहीं, ताकि उन्हें बदला न जा सके |
-------हम इन्हें पौराणिक कहते हैं मिथकीय नहीं | यह मिथक शब्द अंग्रेज़ी का शब्द है हमारा नहीं, जिसका अर्थ है सत्य है भी या नहीं अर्थात अज्ञानता, अविश्वास और असत्य ; क्योंकि उन्हें पुराण शब्द का ज्ञान ही नहीं | ईसा से उनकी तारीख प्रारम्भ होती है |
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कथन ९-
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यह देखकर आश्चर्य और दुःख होता है कि इस देश में इतिहास कभी नही लिखा गया है, बल्कि उसकी जगह मिथकों और कल्पनाओं से भरे पुराण लिखे गए हैं।
-------- भारत के इतिहास लेखन के संबंध में अक्सर यह कहा जाता है कि भारत के पास अतीत तो है लेकिन इतिहास नहीं है।
-----इसी कारण, चूँकि यहाँ इतिहास नहीं है तो भारत की बहुसंख्य जनसंख्या अपने इस वर्तमान को भी समझ नहीं पाती कि यह किस प्रवाह में यहाँ तक पहुंचा है। और यही कारण है कि इतनी सदियों बाद भी इस विराट और दिशाहीन जनसंख्या में एक साझे भविष्य का स्पष्ट नक्शा या दर्शन भी आकार नहीं ले पा रहा है। यही इसकी ऐतिहासिक रूप से लंबी और शर्मनाक गुलामी का भी कारण है।
समाधान ९---
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अक्सर कौन ऐसा कहता है, किसने कहा यह स्पष्ट नहीं है अर्थात केवल एक मिथ्या प्रस्तुतीकरण है |
------- भारत का सभी जन जन, अनपढ़ से विद्वान तक जानता है कि कैसे सृष्टि हुई और मानवीय प्रवाह की दशा व दिशा रूप में मानव की उत्पत्ति व विकास कैसे-कैसे हुआ, मानव का उद्भव , समाज का विकास, संस्थाओं का विकास कैसे हुआ |
------उसके वेद, उपनिषद् पुराण, व अन्य शास्त्रों, ग्रंथों, आख्यानों, बोध कथाओं आदि में सब बिना भ्रम के स्पष्ट है | -
------इसके लिए पुनः पाश्चात्य ढंग पर इतिहास लिखने की आवश्यकता नहीं | बहुसंख्य जनता यह भी जानती है उसके भविष्य की दिशा उसकी समुन्नत सांस्कृतिक व सार्वभौम वैदिक ज्ञान-विज्ञान ही है, जो सदैव रही है और जिसका लोहा आज विश्व पुनः मान रहा है |
--------- भारत की एतिहासिक गुलामी का मूल कारण ऐसे ही अल्पसंख्यक व्यक्ति, विचार व संस्थाएं व मज़हबी–आतंकबाद हैं जो आज यह प्रश्न उठा रहे हैं जैसे समय समय पर उठाते रहे हैं, जिसने देश-संस्कृति-सभ्यता की एकता-अखण्डता को सदा चोट पहुंचाई है, भितरघात के द्वारा |
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कथन १०-
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भारत में हज़ारों धर्मग्रन्थ और एक बहुत बड़ा दार्शनिक साहित्य है। सैकड़ों ज्ञात राजवंशों और कबीलों सहित अज्ञात परम्पराओं के संकेत व प्रमाण मिलते हैं। साथ ही अन्य देशों के यात्रियों ने यहाँ एक बड़ी ही विस्तृत और प्राचीन सभ्यता की बात कही है।
-------- ये सब बातें बतलाती हैं कि इस देश में इतिहास जरुर घटित हुआ है, लेकिन उसका लेखन नहीं हुआ है। अब ये लेखन क्यों नहीं हुआ है इसके पीछे बहुत गहरे कारण रहे हैं जिन्हें बहुत ही चालाकी से छुपाकर रखा गया है।
------यह नहीं माना जा सकता कि इस देश में लेखन कला या इतिहास बोध ही नहीं जन्म सका था।
------- असल में यहाँ इतिहास बोध को नष्ट करने वाला मिथक बोध बहुत प्रभावी रहा है। ये मिथक क्यों और कैसे जन्मते हैं इसमें गहराई से देखना होगा।
समाधान १०-
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भारत के ग्रन्थ, दार्शनिक साहित्य, राजवंशों की श्रुत परम्पराओं व विस्तृत संस्कृति सदा रही है इसमें कोइ दो राय हो ही नहीं सकतीं, जैसा स्वयं इस कथन में स्पष्ट है |
-------- इतिहास बोध तो सदा से ही था जो जाने कितनी कथाएं, शिष्य-गुरुवार्ताएं आदि से परिलक्षित है |
--------परन्तु लेखन नहीं हुआ, यह मूर्खता की बात है, आदि दृश्य व श्रुति परंपरा के बाद भोजपत्रों, ताड़ के पत्रों, पाषाण शिलाओं कपड़ों आदि पर लेखन मौजूद है, यही तो इतिहास लेखन है |

------क्रमश ----आगे पोस्ट तीन----

चित्र-----सरस्वती घाटी सभ्यता की सील व लिपि ......कुरुक्षेत्र युद्ध .....वैदिक संस्कृत में आलेख


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रविवार, 11 मार्च 2018

सहधर्मिणी – सह्कर्मिणी---कहानी ..--डा श्याम गुप्त....



                


सहधर्मिणी – सह्कर्मिणी---कहानी ..
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                और आजकल क्या नए नए विचार प्रश्रय पा रहे हैं, नवीन काव्य-रचना हेतु....मैं स्वयं तो बहुत समय से विचार मंथन कर रहा हूँ कि आखिर श्रीकृष्ण लौटकर गोकुल क्यों नहीं आये | राधा से विवाह क्यों नहीं किया ! श्री ने कहा, फिर कहने लगा ‘अच्छा बताओ गिरीश कि तुमने सुमि से विवाह क्यों नहीं किया?’
       ‘मैं जब तक अपने पैरों पर खडा होता, उसका विवाह होचुका था |’ मैंने कहा |
       पर तुम्हारे पास समय था, तुम सक्षम थे, पीजी कर रहे थे | उससे कुछ रुकने को कह सकते थे | एक बार कहते तो रुकने को | क्या कभी कहा तुमने, श्री बोला |
    नहीं कह सका |
     क्यों ?
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            पर तुम इतने समय बाद, इस तरह यह सब क्यों पूछ रहे हो ?
           मैं यह जानना चाह रहा हूँ, रहस्य...आखिर श्रीकृष्ण ने राधा से विवाह क्यों नहीं किया| दोनों कहानियां लगभग समान ही हैं और भी एसी कहानियां होंगीं संसार में, समाज में | मुझे लगता है कि कृष्ण भी गोकुल जाकर राधा से कह सकते थे, रुकने को, गुरुकुल से लौटकर विवाह कर सकते थे | पर वे गए ही नहीं लौटकर क्यों ? कितनी दूर है मथुरा से गोकुल | श्री ने कहा |
           तुम भी नहीं जापाये, सिर्फ एक नदी के उस पार ..क्यों...श्री कहता गया| मैं समझता हूँ कि विश्व-विद्यालय मैं आने के पश्चात, सुमि की शिक्षा आदि व कालिज के अन्य आकर्षणों का तुलनात्मक भ्रम व भ्रान्ति कि वह तुम्हारे योग्य है भी या नहीं |
            -शायद यही भाव कृष्ण का भी रहा हो ! महानगरीय व्यवस्था, रहन-सहन, राजनैतिक दायित्वों व कर्तव्यों के अनुपालन एवं अन्य विभिन्न दबाव, इच्छित न कर पाने, न कर पा सकने का तनाव ..टूटन...बिखराव | कृष्ण एक बार मिलते तो राधा से, कहते तो सही अपनी मजबूरियां, दायित्व की, कर्तव्य की ..| शायद यशोधरा की भांति राधा भी कहती होगी ..’सखि! वे मुझसे कह कर जाते | या हो सकता है यह कहती....

जाओ जाओ हे गिरिधारी |
रोकूँगी तो भी न रुकोगे छलिया छल-बल धारी |
तेरी बतियाँ प्रीति-रीति की, नीति जगत व्यौहारी|
तुमको बाँध प्रीति बंधन में, मैं आपुनि ही हारी |
जाओ देश समाज राष्ट्र हित, कान्हा भव भय हारी |
बंधन मुक्त करूँ नहिं छूटे, प्रेम-डोर यह न्यारी |
राह की बाधा बनूँ न, चाहे सूखे मन-फुलवारी |
श्याम, न मोहन, मोहनि-मन्त्र, न मोह, न मोहनि-हारी |

            वाह ! वाह ! क्या बात है श्री, पर क्या पता वे मिले हों राधा से और राधा ने यही कहा हो |
          अच्छा पकड़ा, श्री कहने लगा, पर वे तो गए ही नहीं थे मथुरा से, मिले ही नहीं राधा से | शायद उन्हें यह भय था कि एक बार मिलने पर वे किचित स्वयं ही कर्तव्य-पथ से च्युत होजायं, राधा को छोड़ ही न पायं |
         -क्या तुम मेरे लिए भी यही कहना चाह रहे हो ? मैंने पूछा |
          शायद ! श्री हंसने लगा | यह शंसय, असमंजस की किन्कर्तव्यविमूढ़ स्थिति ही स्पष्टतया कुछ तय न कर पाने का कारण रही हो और फिर बहुत देर हो चुकी थी, तीर का कमान से निकल जाना |
          सही कहा श्री, आखिर हम पत्नी को सहधर्मिणी क्यों कहते हैं ?
         ‘ये बात को कहाँ से कहाँ ले जारहे हो !’ श्री ने आश्चर्य से कहा |
          पत्नी को सहकर्मिणी नहीं कहा गया, क्यों ? मैं कहने लगा...स्त्री- सखी, प्रेमिका सहकर्मिणी हो सकती
मैं कहता गया, स्त्री माया रूप है, शक्ति-रूप, ऊर्जा-रूप वह अक्रिय-क्रियाशील ( सामान्य-पेसिव ) पात्र - रोल अदा करे तभी उन्नति होती है, जैसे वैदिक-पौराणिक काल में हुई | पत्नी सह-धर्मिणी है, सिर्फ सहकर्मिणी नहीं | हाँ, पुरुष के कार्य में यथासमय, यथासंभव, यथाशक्ति सहकर्म-धर्म निभा सकती है |

         सह्कर्मिणी होने पर पुरुष भटकता है और सभ्यता अवनति की ओर | अतः पत्नी को सहकर्म नहीं सहजीवन व्यतीत करना है – सहधर्म | स्त्री-पुरुष के साथ साथ काम करने से उच्च विचार प्रश्रय नहीं पाते, व्यक्ति स्वतंत्र नहीं सोच पाता, विचारों को केंद्रित नहीं कर पाता |
        ‘यार ! क्या उल-जुलूल बोले चले जारहे हो, घर से लड़कर आये हो क्या ? श्री झल्लाया |
       ‘तभी तो, मै कहता गया, ‘पति-पत्नी सदा पृथक-पृथक शयन किया करते थे | राजा-रानियों के पृथक-पृथक महल व कक्ष हुआ करते थे | सिर्फ मिलने की इच्छा होने पर ही वे एक दूसरे के महल या कमरे में जाया करते थे | माया की नज़दीकी व्यक्ति को भरमाती है उच्च, विचारों से दूर करती है |
         ‘क्या विचित्र बात कह रहे हो, कथन–कहावत तो यही है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे नारी होती है |’
         ‘निश्चय ही, पर ये क्यों नहीं कहा गया कि सफल नारी के पीछे पुरुष होता है|  नारी की तपस्या, त्याग, प्रेम, धैर्य, धरित्री जैसे महान गुणों व व्यक्तित्व की महानता के कारण ही तो पुरुष महान बनते हैं, सदा बने हैं | ‘
         ‘कुछ समझ में नहीं आया, तुम कहाँ भटक-भटका रहे हो | यह विषयान्तर है |’ श्री अधीरता से बोला |
        “अति सर्वत्र वर्ज्ययेत”, मैंने कहा, अति प्रेम की भी बुरी होती है | मेरे विचार से इसी को स्थापित करने हेतु श्रीकृष्ण दोबारा गोकुल नहीं गए | राधा से नहीं मिले या विवाह नहीं किया |
           प्रेम का भरण-पोषण या सहजीवन से कोई सम्बन्ध नहीं | प्रेम का सम्बन्ध कामेक्षा से है अथवा उच्चतम आत्मिक लगाव से, तदनुरूपता से | विवाह एक अनुबंध है कि हम तुम्हारे भरण-पोषण का बचन लेते हैं, तुम हमारे भरण-पोषण, लालन-पालन का | इसीलिये पति भर्तार है पत्नी भार्या |
         मूल रूप में अत्यावश्यक मज़बूरी से अन्यथा स्त्रियों को सेवा या व्यवसाय आदि के बंधन में नहीं बंधना चाहिए | बस पुरुष व संतान का पालन-पोषण ही उनका कार्य होना चाहिए | जिसे स्वयं नारी ने ही मानव-इतिहास के प्रथम श्रम-विभाजन से समय स्वीकार किया था |’
        -प्रेम उच्चतम अवस्था में, भावातिरेक अवस्था में भक्ति में परिवर्तित होजाता है और अगले सोपान... निर्विकल्प-भक्ति पर द्वैत का अद्वैत में लय होकर प्रिय के साथ तदनुरूपता में | ...
         ” जब में था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं |” .....
          फिर संयोग..वियोग...योग..भोग..सुख-दुःख, मोह-शोक का कोई अर्थ..कोई द्वंद्व नहीं रह जाता | यही प्रेम का गोपी-भाव है....राधा-भाव है...|
          राम, कृष्ण, लक्ष्मण आदि के निर्मोही होने का यही अर्थ है; अन्यथा गीता, भ्रमर-गीत, विप्रलंभ-काव्य, संयोग-श्रृंगार की महान कृतियाँ, महान कथाएं कैसे बनतीं |
         राधा, माया है...महामाया...आदि-शक्ति...वह अनन्यतम है श्रीकृष्ण से ...जगत-माया है ...हलादिनी शक्ति है..चिच्छितशक्ति है ..सह्कर्मिणी है....ब्रह्म की| वह लौकिक पत्नी नहीं हो सकती ...उसे बिछुडना ही होता है ...ब्रह्म से...कृष्ण से ...गोलोक के नियमन हेतु

        ‘मान गए गुरु, क्या दूर की कौड़ी लाये हो |’ श्री द्विविधा-भाव में सोचता हुआ बोला |





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गुरुवार, 8 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख--- पोस्ट एक --डा श्याम गुप्त

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख-----डा श्याम गुप्त

                         




            भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख-----डा श्याम गुप्त
        भावसृष्टि सृजन के समय ब्रह्मा जी को नींद आगई, असावधानीवश आसुरी सृष्टि का सृजन होगया अतः बुराई का जन्म हुआ और बुरे भावों व लोगों की सृष्टि | एक तात्विक विचार यह भी है कि जीवधारियों-प्राणियों-मनुष्यों को अच्छाई का ज्ञान निरंतर होता रहे, इसके लिए तुलना रूप में बुराई का प्रादुर्भाव, ब्रह्म की ही इच्छा थी | अतः सृष्टि में अच्छाई व बुराई का एक सतत युद्ध चलता रहता है | 
          भारतीय धर्म संस्कृति के विरुद्ध सदैव समय समय पर आवाजें उठती रहती हैं | चूंकि यह एक गहन तात्विक एवं मानव सद-आचरण आधारित उच्च संस्कृति है अतः यह स्वाभाविक है, चाहे वह पूर्व वैदिककाल में शुक्राचार्य का विरोध एवं आसुरी विचार धारा हो या वैदिककाल में विश्वामित्र की नव-विचारधारा या पौराणिक काल में ऋषि जाबालि की नास्तिक एवं रावण की रक्ष संस्कृति, तत्पश्चात  कंस, जैन, बौद्ध, ईसाई , इस्लामिक एवं आम्बेडकर आदि की नवबौद्ध विचार धाराएं आदि |
        आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा | 
प्रस्तुत है पोस्ट १--
कथन १-----जहां-जहां धर्म को एक अनिवार्य जोड़ने वाली विचारधारा या जीवन शैली की तरह देखा जाता है वहां-वहां धर्म स्वयं की एक स्पष्ट परिभाषा रखता है और अपने अनुयायियों को भी उतनी ही स्पष्टता से परिभाषित करते हुए आपस में जोड़ता  है। क्या यह बात भारतीय धर्म के बारे में और भारत में बसने वाले समुदायों के बारे में सही हैयह मात्र एक प्रश्न ही नहीं है बल्कि स्वयं में कई अन्य प्रश्नों का उत्तर भी है, और हजारों अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने वाला सूत्र उपलब्ध करवाता है। इसके सहारे हम न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के दार्शनिक, धार्मिक, भाषायिक और ऐतिहासिक क्रमविकास को जान सकते हैं बल्कि यह भी जान सकते हैं कि एक ही धर्म में होने के बावजूद इस हिन्दू कहे जाने वाले समुदाय में इतना भेदभाव और अलगाव क्यों है।
           इस सन्दर्भ में डॉ. अंबेडकर अपनी महत्वपूर्ण रचना  रिडल्स इन हिन्दुइज्म   में विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों की पहचान पर एक तार्किक सवाल उठाते हैं। कि कोई पारसी खुद को पारसी क्यों कहता है या कोई इसाई खुद को इसाई कहता है। इस सवाल के लिए उसके पास एक स्पष्ट उत्तर होता है। यही सवाल आप किसी हिन्दू से पूछिए कि वो हिन्दू क्यों है? वह यह नहीं बता सकेगा कि हिन्दू होने का क्या अर्थ होता है और किस चीज में विश्वास रखने पर कोई हिन्दू बनता है|
समाधान-१ ---क्या यह शीर्षक वे हिन्दी में या अपनी मातृभाषा मराठी में नहीं लिखा जा सकता था, अपने दलित, अनपढ़ लोगों के लिए, नहीं.. ताकि उन्हें कुछ समझ न आये और उन्हें उल्लू बनाता रहा जाये ---क्या अपने अँगरेज़ आकाओं के लिए लिखा गया यह |
     वस्तुतः आंबेडकर को यथार्थ नहीं ज्ञात था, एक ईसाई भंगी भी जानता होगा की हमारी एक किताब है बाइबल हम उसे मानते हैं, चाहे उसने पढी न हो, यही उत्तर एक पादरी का भी होगा जो रोज बाइबल पढ़ता होगा |  हिन्दू का निम्न तबका भी रामायण से उदाहरण दे सकता है और यह हमारा धर्मग्रन्थ है एवं हम हिन्दुस्थान के आदिमूल वासी होने से हिन्दू हैं,हम भिन्न भिन्न विचारों को स्वीकार करते हैं, कह सकता है परन्तु यदि किसी हिन्दू विद्वान् से पूछेंगे तो वह पूर्णरूप से व्याख्या सहित बताएगा कि हम हिन्दू क्यों हैं । 
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कथन-२ वे (डा.आम्बेडकर ) यह स्थापित करना चाहते हैं कि धर्म विशेष से संबद्ध होने के लिए किन्ही विशेष विश्वासों मान्यताओं अभ्यासों और कर्मकांडों की आवश्यकता होती है,एक ही धर्म के मानने वालों में इन आधारों पर साम्य होना चाहिए। एक दूसरे से भिन्न या विपरीत विश्वासों और व्यवहारों वाले लोगों को एक धर्म का अनुयायी नहीं माना जा सकता।
समाधान -२  इसका अर्थ है कि आंबेडकर को धर्म क्या है इसका ज्ञान नहीं था, वे मज़हब व कर्मकांडों को धर्म समझते थे, जो हिन्दू धर्म के विविध रूप व अंग व जीवन पद्दतियां है और हिन्दू धर्म के अतिरिक्त विश्व के सभी धर्म, मज़हब हैं धर्म नहीं | वे किसी एक किताब या व्यक्ति विशेष के अनुयायी हैं, मानवता दर्शन के नहीं |
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कथन -३-वर्त्तमान शिवलिंग को ब्राह्मणी धर्म ने, कुपार लिंगो के गोंडी धर्म और दर्शन और गोंडी धर्म से लिया है |  
समाधान ३-ये भूल जाते हैं कि ब्राहमणी धर्म नामक कोइ धर्म ही नहीं है, ब्राहमण-क्षत्री आदि कोई आदि-वर्गीकरण भी नहीं है | आदिवासियों के काल में वर्गीकरण कब था वह तो मानव के और विक्सित होने के बाद हुआ है | निश्चय ही शिव आदि देवता हैं, वर्गीकरण के पश्चात भी वे ब्राह्मणों के ही नहीं अपितु सभी विश्व व सभी वर्गों के देवता हैं, आज भी | पाषाण युगीय आदि गोंडी काल में तो धर्म या दर्शन की अवधारणा ही नहीं थी |   
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कथन ४-सेमेटिक मूल के तीन मुख्य धर्मों यहूदी, इसाइयत और इस्लाम में आंतरिक भेद कितने ही हों, लेकिन उनकी दुनिया भर में फ़ैली आबादी स्वयं को यहूदी इसाई या मुस्लिम साबित करने के लिए बहुत ही ठोस और सर्वमान्य आधारों की तरफ संकेत कर पाती है। ये संकेत उनकी एक किताब, एक पैगम्बर या एक ईश्वर को लेकर है।
समाधान-४- यही तो मूल अंतर है हिदू धर्म व अन्य धर्मों में ---अन्य सभी धर्मों में आंतरिक भेद तमाम होंगे, लेकिन उनकी दुनिया भर में फ़ैली आबादी स्वयं को उस धर्म का बतायेगी, यह धार्मिक अज्ञानता है एवं केवल दिखावा है,; ये धर्म नहीं अपितु मज़हब हैं, संगठन हैं, वर्ग-संस्थाएं हैं ;  वहीं हिन्दू धर्म मानने वालों में ऊपरी विभिन्नता कितनी भी हो परन्तु आतंरिक मूल रूप में एकरूपता पाई जाती है जिसे विविधता में एकता  कहा जाता है जो हिन्दू धर्म की विशेष विशिष्टता है | जो इस धर्म को अनंतकालिकता देती है, अनित्यता, अखण्डता |
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 कथन-५- दो महत्वपूर्ण धर्मों बौद्ध और जैन धर्म में भी यह सुविधा है। जैन तो खैर भारत में ही सिमट गए हैं, लेकिन बौद्धों की विश्व भर में फ़ैली आबादी कुछ बहुत महत्वपूर्ण विश्वासों के आधार पर हमेशा से एकता के सूत्र में बंधी रहती आई है। ये विश्वास असल में बुद्ध, धम्मपद, त्रिशरण मन्त्र और त्रिपिटकों में विश्वास है जो उन सबको एकसूत्र में बांधता है। साथ ही ईश्वर और अनश्वर आत्मा के निषेध सहित क्षणवाद और शून्य के दर्शन के प्रति निष्ठा भी उनकी एकता को सिद्ध करता है। ठीक उसी तरह जैसे विश्व भर के मुस्लिमों की बिना शर्त निष्ठा एक अल्लाह एक कुरआन और एक मुहम्मद में है।
समाधान-५----यह पशुओं की भांति पशुभाव एनीमल इंस्टिंक्ट’, झुण्डभाव-मानसिकता है, क्राउड मेंटालिटी जो एक ही विचार भाव से हांके जाने के समान है | उच्च विक्सित स्वानुभूत स्वतंत्र मानव वैचारिकता भाव नहीं, जो हिदू धर्म में है, कोइ किसी भी देवता, विचार या कर्मकांड को माने पर वह मानवीय व्यवहारगत हिन्दू ही है |

  -----क्रमश पोस्ट २ ---आगे .. 




 

महिला सशक्तीकरण------तब अब ---कुछ झलकियाँ---- भाग एक-----डा श्याम गुप्त ....

महिला सशक्तीकरण------तब अब ---कुछ झलकियाँ---- भाग एक-----




















चित्र-गूगल साभार ---

महिला दिवस पर--कहानी हमारी -तुम्हारी ---डा श्याम गुप्त ...



महिला दिवस पर--कहानी हमारी -तुम्हारी ---डा श्याम गुप्त ...

                

महिला दिवस पर---
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कहानी हमारी -तुम्हारी
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ये दुनिया हमारी सुहानी न होती ,
कहानी ये अपनी कहानी न होती ।
ज़मीं चाँद -तारे सुहाने न होते ,
जो प्रिय तुम न होते, अगर तुम न होते।

न ये प्यार होता, ये इकरार होता ,
न साजन की गलियाँ, न सुखसार होता।
ये रस्में न क़समें, कहानी न होतीं ,
ज़माने की सारी रवानी न होती ।

हमारी सफलता की सारी कहानी ,
तेरे प्रेम की नीति की सब निशानी ।
ये सुंदर कथाएं फ़साने न होते,
सजनि! तुम न होते,जो सखि!तुम न होते ।

तुम्हारी प्रशस्ति जो जग ने बखानी,
कि तुम प्यार-ममता की मूरत,निशानी ।
ये अहसान तेरा सारे जहाँ पर ,
तेरे त्याग -दृढता की सारी कहानी ।

ज़रा सोचलो कैसे परवान चढ़ते,
हमीं जब न होते, जो यदि हम न होते।
हमीं हैं तो तुम हो सारा जहाँ है ,
जो तुम हो तो हम है, सारा जहाँ है।

अगर हम न लिखते, अगर हम न कहते ,
भला गीत कैसे तुम्हारे ये बनते।
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम ,
ये इसरार इनकार, तुम कैसे करते ।

कहानी हमारी -तुम्हारी न होती ,
न ये गीत होते, न संगीत होता।
सुमुखि ! तुम अगर जो हमारे न होते
सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते॥

रविवार, 4 मार्च 2018

साहित्यकार दिवस-२०१८ --श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता पुरस्कर२०१८ ...डा श्याम गुप्त ....


साहित्यकार दिवस-२०१८ --श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता पुरस्कर२०१८ ...डा श्याम गुप्त ....

                       

                       डा रंगनाथ मिश्र सत्य के ७७ वें जन्म दिवस एक मार्च २०१८ के उपलक्ष में पर अखिल भारतीय अगीत परिषद् के तत्वावधान में साहित्यकार दिवस मनाया गया | पुस्तकों के लोकार्पण, साहित्यकारों का सम्मान एवं कवि गोष्ठी आयोजित की गयी | 
          डा श्याम गुप्त द्वाराअपने पूज्य पिताजी की स्मृति में प्रतिवर्ष प्रदत्त श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्त स्मृति पुरस्कार २०१८, कविवर श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर को प्रदान किया गया |

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