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विनीता अग्निहोत्री की कविता
अगस्त पाँच को दीवाली है मनने वाली
फिर से भूमि अयोध्या की है सजने वाली
खूब बजेंगे शंख-ढोल, मंजीरे-थाली
चातक मोर-पपीहा धुन गायेंगे मतवाली
झूम उठेगी फिर सरयू के तट हरियाली
अब शुभ वेला की तारीख न जाये टाली
गाओ नाचों और बजाओ दिल से ताली
दीप जलेंगे खुशियों के तो हो जायेगी दीवाली
साधू-सन्त मिटा देंगे अब रजनी काली
बोलो जय श्रीराम पियो मधु रस की प्याली
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- विनीता अग्निहोत्री
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रविवार, 2 अगस्त 2020
अगस्त पाँच को दीवाली मनने वाली (विनीता अग्निहोत्री)
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020
हम्मीर हठ (ऐतिहासिक उपन्यास) - सुधीर मौर्य
हम्मीर हठ Hammir Hath
शीघ्र प्रकाश्य ऐतहासिक उपन्यास #हम्मीर_हठ से
‘मरहठ्ठी बेगम तुम क्या खुशनसीबी और वक़्त की फेर की बात कर रही हो जबकि सच तो ये है कि आज सारी ज़मीन पर कहीं भी कोई भी तलवारे अलाई का मुकाबला करने की हिम्मत और हिक़ामत नहीं कर सकता।’
कह कर सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी हंस पड़ा। दम्भी और वहशी हंसी। देवी छिताई कुछ क्षण उसकी वाहिशयानी हंसी देखती रही और पैतरा बदल के वही ज़मीन पर दोनों घुटने मोड़ के उन पर अपने स्थूल नितम्बो के सहारे बैठते हुए किसी बिफरी हुई शेरनी की भांति दहाड़ते हुए बोली ‘हाँ सुलतान ये तुम्हारी और तुम्हारी तलवारे अलाई दोनों की खुशकिस्मती है और वक़्त का फेर है कि तुम्हारा सामना चन्द्रगुप्त मौर्य से नहीं हुआ। जब उनके सामने वास्तविक सिकंदर न टिक सका तो खुद को सिकंदर सानी नाम से तसल्ली देने वाले तुम कैसे टिक पाते।’
‘अच्छा हुआ सुल्ताने हिन्द तुम्हारा सामना समय की चाल के सौभाग्य से ‘समुद्रगुप्त और १६ वर्ष की आयु में हुणों को खदेड़ने वाले स्कंदगुप्त से नहीं हुआ। सच तुम्हारी किस्मत बाबुलंद है जो विक्रमादित्य, हर्षवर्धन और पुलिकेशन दवतीय से तुम्हारा सामना नहीं हुआ नहीं तो तुम्हारी तलवारे अलाई को चूर्ण में परिवर्तित कर दिया गया होता। तुम्हारी किस्मत का सच में रोशन हे मेरे पतिदेव जो तुम्हारे सामने बाप्पा रावल और नागभट्ट नहीं आये नहीं तो….।’
–सुधीर मौर्य
कह कर सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी हंस पड़ा। दम्भी और वहशी हंसी। देवी छिताई कुछ क्षण उसकी वाहिशयानी हंसी देखती रही और पैतरा बदल के वही ज़मीन पर दोनों घुटने मोड़ के उन पर अपने स्थूल नितम्बो के सहारे बैठते हुए किसी बिफरी हुई शेरनी की भांति दहाड़ते हुए बोली ‘हाँ सुलतान ये तुम्हारी और तुम्हारी तलवारे अलाई दोनों की खुशकिस्मती है और वक़्त का फेर है कि तुम्हारा सामना चन्द्रगुप्त मौर्य से नहीं हुआ। जब उनके सामने वास्तविक सिकंदर न टिक सका तो खुद को सिकंदर सानी नाम से तसल्ली देने वाले तुम कैसे टिक पाते।’
‘अच्छा हुआ सुल्ताने हिन्द तुम्हारा सामना समय की चाल के सौभाग्य से ‘समुद्रगुप्त और १६ वर्ष की आयु में हुणों को खदेड़ने वाले स्कंदगुप्त से नहीं हुआ। सच तुम्हारी किस्मत बाबुलंद है जो विक्रमादित्य, हर्षवर्धन और पुलिकेशन दवतीय से तुम्हारा सामना नहीं हुआ नहीं तो तुम्हारी तलवारे अलाई को चूर्ण में परिवर्तित कर दिया गया होता। तुम्हारी किस्मत का सच में रोशन हे मेरे पतिदेव जो तुम्हारे सामने बाप्पा रावल और नागभट्ट नहीं आये नहीं तो….।’
–सुधीर मौर्य
रविवार, 16 फ़रवरी 2020
निमंत्रण पत्र ...लोकार्पण समारोह----- अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' -----डा श्याम गुप्त
निमंत्रण पत्र ...लोकार्पण समारोह----- अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' -----डा श्याम गुप्त
लोकार्पण समारोह----- अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' -----डा श्याम गुप्त
अखिल भारतीय अगीत परिषद् एवं नव सृजन सांस्कृतिक संस्था लखनऊ द्वारा प्रकाशित डा श्याम गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' एवं डा श्याम गुप्त की तीन कृतियों --तुम तुम और तुम --प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह ...पीर ज़माने की ---ग़ज़ल संग्रह एवं ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ,....का
---------लोकार्पण समारोह दिनांक २२ फरवरी २०२० शनिवार को यू पी प्रेस क्लब हज़रत गंज लखनऊ में सायं ४ बजे | सभी आमंत्रित हैं......
बुधवार, 20 नवंबर 2019
Mujhe Yaad aaoge - Hindi Kavita Manch
मुझे याद आओगे
कभी तो भूल पाऊँगा तुमको,
मुश्क़िल तो है|
लेकिन,
मंज़िल अब वहीं है||
पहले तुम्हारी एक झलक को,
कायल रहता था|
लेकिन अगर तुम अब मिले,
तों भूलना मुश्किल होगा||
सोमवार, 8 जुलाई 2019
गीत
गीत लिखूँ प्रीत में मनमीत के लिखूँ
भावना में बज रहे संगीत के लिखूँ।।
मन्त्रमुग्ध ही रहा हूँ मोहपाश में
दृष्टिपथ निहार रहीं पलकें साथ में
गर्मीयों की बात करूँ शीत के लिखूँ
भावना में बज रहे संगीत के लिखूँ।।
विभीषिका कठिन वसी हृदय के ओक में
श्वासें भी साथ छोड़ती हैं शोक - शोक में
वर्तमान की लिखूँ व्यतीत के लिखूँ
भावना में बज रहे संगीत के लिखूँ।।
संयोग सुमन सौरभित सुवास जो दिये
सोंधी सुगंध सच में वरसात की लिये
जो भाव बाँध लेते उस रीत के लिखूँ
भावना में बज रहे संगीत के लिखूँ।।
आभाव में स्वभाव से ही भाव ही किया
अलकों की सघन छाँव में नित आसरा दिया
हार की लिखूँ या अपने जीत के लिखूँ
भावना में बज रहे संगीत के लिखूँ।।
मनुहार विप्रलम्भ में भी भूलता नहीं
संयोग विना मन - मधुप भी झूलता नहीं
अंतरंग के उसी अतीत के लिखूँ।।
https://jaiprakashchaturvedi.blogspot.com/2019/07/blog-post.html
शुक्रवार, 31 मई 2019
भारत देश, राष्ट्र, व कांग्रेस ---- और कांग्रेस की गलतियां --डा श्याम गुप्त..
भारत देश, राष्ट्र, व कांग्रेस ---- और कांग्रेस की गलतियां --डा श्याम गुप्त..
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भारत देश तो १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों की सत्ता से आजाद होगया था परन्तु भारत राष्ट्र उसी समय पुनः उसी सत्ता का वैचारिक गुलाम होगया था जब भारतीय जनमत द्वारा सर्व मत से सरदार बल्लभ भाई पटेल को अपना राष्ट्रीय नेता चुना परन्तु महात्मा गांधी जी ने उनकी की बजाय पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधान मंत्री बनाया |
------भारत राष्ट्र उसी समय अभारतीय विचारधारा के पराधीन --- होगया था जब महात्मा गांधी के कहने के बावजूद कांग्रेस पार्टी को उसी समय समाप्त नहीं किया गया |
----- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का पतन ----तो उसी समय प्रारंभ होगया था जब इंदिरा कांग्रेस का गठन हुआ --
------वर्त्तमान कांग्रेस पार्टी का पतन---- तो उसी समय प्रारम्भ होगया था जब तमाम वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए भी सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया .....
---एवं कांग्रेस के एक मात्र वरिष्ठ व विद्वान् नेता श्री प्रणव मुकर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए मनोनीत किया गया ताकि पार्टी व सत्ता हेतु एक विशिष्ट परिवार के लिए रास्ता साफ़ किया जाय ---
मंगलवार, 28 मई 2019
आज आजाद हुआ भारत ----आज की ग़ज़ल -गज़लोपनिषद ---डा श्याम गुप्त
आज आजाद हुआ भारत ----आज की ग़ज़ल -गज़लोपनिषद ---
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******काशी से नरेंद्र भाई मोदी , प्रधान मंत्री भारत सरकार का आह्वान व उद्घोष -----का मूल मन्त्र ---
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******काशी से नरेंद्र भाई मोदी , प्रधान मंत्री भारत सरकार का आह्वान व उद्घोष -----का मूल मन्त्र ---
१. कार्य में पारदर्शिता व परिश्रम का समन्वय डा श्याम
२.कार्य व कार्यकर्ता , वर्क व वर्कर का एक रूपता भाव
३.सरकार व संगठन का समन्वित रूप व विचार
४.२१ वीं सदी का विज़न ----महान विरासत ---पूजा-पाठ, त्यौहार, शास्त्र व ग्रन्थ के साथ वर्तमान तत्वों का विकास -----अर्थात पुराने को सहेज़कर नवीन की आकांक्षा व वैज्ञानिक विकास के साथ प्रगति ---
\
-----आतंक एवं राजनैतिक छुआछूत सहित हर प्रकार की छुआछूत से मुक्ति-----
**********यही तो भारतीयता का मूल भाव है ----
२.कार्य व कार्यकर्ता , वर्क व वर्कर का एक रूपता भाव
३.सरकार व संगठन का समन्वित रूप व विचार
४.२१ वीं सदी का विज़न ----महान विरासत ---पूजा-पाठ, त्यौहार, शास्त्र व ग्रन्थ के साथ वर्तमान तत्वों का विकास -----अर्थात पुराने को सहेज़कर नवीन की आकांक्षा व वैज्ञानिक विकास के साथ प्रगति ---
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-----आतंक एवं राजनैतिक छुआछूत सहित हर प्रकार की छुआछूत से मुक्ति-----
**********यही तो भारतीयता का मूल भाव है ----
====इसी भाव पर प्रस्तुत है मेरी एक ग़ज़ल-----गज़लोपनिषद----
एक हाथ में गीता हो और एक में त्रिशूल |
यह कर्म-धर्म ही सनातन नियम है अनुकूल |
यह कर्म-धर्म ही सनातन नियम है अनुकूल |
संभूति च असम्भूति च यस्तदवेदोभय सह ,
सार और असार संग संग नहीं कुछ प्रतिकूल |
सार और असार संग संग नहीं कुछ प्रतिकूल |
ज्ञान व संसार- माया, साथ साथ स्वीकारें ,
यही जीवन व्यवहार है संस्कृति का मूल |
यही जीवन व्यवहार है संस्कृति का मूल |
पढ़ें लिखें धन कमायें, परमार्थ हित साथ हो,
ज्ञान दर्शन धर्म श्रृद्धा के खिलाएं फूल |
ज्ञान दर्शन धर्म श्रृद्धा के खिलाएं फूल |
किसी के भी धन व स्वत्व का नहीं करें हरण ,
चंचला कब हुई किसकी, जाएँ नहीं भूल |
चंचला कब हुई किसकी, जाएँ नहीं भूल |
यही सत जीवन का पथ, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति 'श्याम,
जीव ! आनंद परम आनंद के हिंडोले झूल ||
जीव ! आनंद परम आनंद के हिंडोले झूल ||
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