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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--सप्तम --डा श्याम गुप्त








                                 

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--सप्तम  --डा श्याम गुप्त
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----पूर्वा पर ----
                        आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
-----------------विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट सप्तम---- कथन २७ से ३० तक---

कथन २७-- 
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        अगर हम यह कहें कि बुद्ध पारी कुपार लिंगो की ही तरह भौतिकवादी दर्शन पर अपने दर्शन की नीव रख रहे हैं तो यह बात तर्कपूर्ण लगती है। जिस तरह से पारलौकिक और अतिभौतिक को पारी कुपार लिंगो ने अधिक महत्व नही दिया है उसी तरह बुद्ध भी इहलोकवादी दर्शन का प्रस्ताव कर रहे हैं, इसी कारण गौतम बुद्ध पंचमहाभूतों पर अपने विचार के परिणाम में इस निष्कर्ष तक आते हैं कि आकाश तत्व आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसे पाखंडों का आधार बन जाता है इसीलिये वे पञ्च महाभूतों की बजाय चार महाभूतों की प्रस्तावना करते हैं। यह सही है कि हमारे पास लिंगो के दर्शन का विस्तारित रूप और उपलब्ध नहीं है लेकिन उनके द्वारा दिए गए मौलिक सूत्रों और मान्यताओं का बुद्ध की मान्यताओं से साम्य नजर आता है और यह भी प्रतीत होता है कि बुद्ध स्वयं भी कुपार लिंगो के दर्शन के तार्किक प्रवाह में हैं। इसीलिये बुद्ध ने बहुत विचारपूर्वक अपने चार महाभूतों में आकाश तत्व को शामिल ही नहीं किया है। 
              दर्शन के विद्यार्थी जानते हैं कि आकाश तत्व के आधार पर ही आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म और इन सबसे जुड़े कर्मकांड पैदा होते हैं। इसलिए श्रमण परम्परा के बौद्ध धर्म सहित आरंभिक लोकायत और चार्वाक भी आकाश तत्व को अपने विचार में सम्मिलित नही करते हैं। प्राचीन लोकायतिक विचार जिस प्रकार से इह-लोकवादी चिंतन पर खड़ा है उसी तरह गोंडी पूनम विचार भी प्रकृति की शक्तियों को सर्वाधिक महत्वा देते हुए पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा के नकार पर खड़ा है।
समाधान २७.--
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        परन्तु जैसा स्वयं कथन २६ में स्वीकार किया गया है कि शिक्षित गोंड तो पञ्च महाभूत को मानते हैं, गगन या आकाश तत्व पांचवा महाभूत है, तभी तो भगवान शब्द पूर्ण होता है | 
       वस्तुतः पाश्चात्य दर्शन में भी चार ही तत्व होते हैं वे भी गगन को तत्व नहीं मानते अतः यह स्थिति अपूर्ण ज्ञान व दर्शन की और इशारा करती है, इसीलिये इन किसी भी दर्शनों का आगे उन्नयन नहीं हुआ अपितु समाप्त होगये | ये चार तत्व की अवधारणा अवैज्ञानिक भी है |
          आज वैज्ञानिक युग में आकाश तत्व में ही सारे अति-उन्नत क्रियाकलाप होते हैं|
         
कथन २८---
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        पुरुष व प्रकृति के मिलन से विश्व की उत्पत्ति को तन्त्र में नर व मादा तत्व के मिलन के रूप में दिखाया गया है। पारी कुपार लिंगों के गोंडी पुनेम दर्शन में भी प्रकृति (एक अर्थ में संसार चक्र) सल्लां और गांगरा नाम के दो तत्वों के मिलने से बनता है।
     यहा सल्लां  पूना (धन तत्व) है और गांगरा ऊना (ऋण तत्व) है, इन्ही के संयोग से प्रकृति की उत्पत्ति होती है (Kangali, 2011) पुरुष प्रकृति के मिलन का यही संकेत नर्मदा नदी को दिए गये भिन्न नाम से भी जाहिर होता है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में गोंडों की लोककथाओं के अनुसार नर्मदा नदी असल में नर-मादानदी है। वे आज भी इसी तर्क और इसी प्रतीकवाद का इस्तेमाल करते हैं।
समाधान २८-----
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       यह पुरुष व प्रकृति के मिलन तत्व दर्शन प्राणी उत्पत्ति के बहुत बाद का है | इससे पहले पुरुष स्वयं ही अपनी प्रतिकृतियाँ तैयार करता है जिसे वैदिक दृष्टि में अमैथुनी --मानसिक व स्पर्श से प्राणी उत्पत्ति कहते हैं यथा ब्रह्मा, चार कुमार, सप्तर्षि, नारद आदि की उत्पत्ति और -----विज्ञान में भी पहले एक अमैथुनी उत्पत्ति कहा जाता है, बिना नर-नारी तत्व के मिलन के--यथा अमीवा, जीवाणु आदि निम्न वर्ग के प्राणी व वनस्पति आदि, आगे बाद में एकलिंगी प्राणी व मैथुनी सृष्टि उत्पत्ति होती है | अतः सल्लां और गांगरा दर्शन बहुत बाद का अल्पज्ञान वाला दर्शन है |
      हाँ यह सत्य ही है सर्वप्रथम मानव इसी नर्मदा नदी के किनारे उद्भूत हुआ था | जब भारतीय प्रायद्वीप अफ्रीका के गोंडवाना लेंड से जुड़ा हुआ था और नर्मदा नदी आज की विक्टोरिया झील में गिरती थी भारतीय भूखंड के टूटकर द्वीप रूप में उत्तर की ओर प्रवाह में आने पर नर्मदा सागर में गिरने लगी | और आदि प्राणी भी इसी नदी के किनारे भारतीय भूमि पर उद्भूत हुआ |
 कथन २९-- 
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            गोंडी पुनेम दर्शन और गोंडों की अन्य मान्यतायें उनके जुन्नार देव के मंदिर आदि  सुदूर अतीत में खोई किसी असुर या लोकायतिक परम्परा के चिन्ह हैं। यही परम्परा आगे चलकर श्रमण परम्परा के रूप में बुद्ध के साथ अपने शिखर पर पहुँचती है तो आत्मा और परमात्मा दोनों को नकारकर चार महाभूतों पर आधारित दर्शन का निर्माण करती है। यह उल्लेखनीय है कि बौद्ध दर्शन भी अंत में परमात्मा और आत्मा के निषेध का वेद विरोधी या अनात्मवादी दर्शन है। इसे निरीश्वरवादी और नास्तिक दर्शन माना गया है। इसी तरह सांख्य दर्शन भी आरंभ से ही इश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता और पुरुष व प्रकृति के सिद्धांत पर अपने पूरे दर्शनशास्त्र सहित विश्वोत्पत्ति विज्ञान का भी निर्माण करता है।
       आगे चलकर भगवत गीता में हम देखते हैं कि कृष्ण स्वयं योग को सांख्य के निकट लाते हैं और यह निरूपित करते हैं कि योग और सांख्य एक ही परिणाम (ज्ञान या मुक्ति) उत्पन्न करते हैं। इसीलिये स्वयं कृष्ण के जमाने से सांख्य और योग में एक युति निर्मित कर दी गयी थी जिसे सांख्य योगकहा गया है। 
       यहाँ उल्लेखनीय यह भी है कि डॉ. आंबेडकर की खोज बतलाती है कि भगवत गीता असल में बौद्ध धर्म के खिलाफ प्रतिक्रान्ति को संगठित करने के उद्देश्य से लिखी गयी है।  ---इस उदाहरण से भी यह देखा जा सकता है कि ब्राह्मणवादी परम्परा मूल सांख्य की मान्यताओं को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास में कृष्ण और गीता को इस्तेमाल कर रही है।
समाधान-२९-- ---
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        परन्तु यह खोज एक मूर्खतापूर्ण तथ्य है क्योंकि संसार जानता है कि गीता तो बौद्ध धर्म से बहुत पहले की है | वस्तुतः बुद्ध, लोकायत व अन्य सभी अनीश्वरवादी गीता के सांख्य व योग का अर्थ समझने में असफल रहे हैं |
      गीता में भगवान श्रीकृष्ण जब कहते हैं--सांख्ययोगौ प्रथग्बाला प्रवदन्ति न पंडिता.... |---गीता ५ /४ ..तो गीता का सांख्य व योग, भारतीय षडदर्शन का सांख्यदर्शन व योगदर्शन नहीं है, अपितु वह कर्मसंन्यास व कर्मयोग है अर्थात ज्ञानयोग व कर्मयोग, जिसका फल एक ही बताया गया है परन्तु कर्मयोग की महिमा अधिक कही गयी है |
कथन-३०--
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गोंडी पुनेम दर्शन और गोंडों की अन्य मान्यताओं पर गहन शोध से निर्मित ग्रन्थ पारी कुपार लिंगो गोंडी पूनेम दर्शन ,को थोड़ा विस्तार में जानना जरुरी है। यह दर्शन गोंडी धर्म के प्रथम दार्शनिक और आदिगुरू पारी कुपार लिंगो द्वारा रचा गया है और जिसे डॉ. कंगाली ने पहली बार व्यवस्थित दर्शन के रूप में संकलित किया है  
        यह आर्य असुर या आर्य मूलनिवासी संघर्ष का एक अन्य और सबसे प्राचीन नेरेटिव प्रस्तुत करता है, ये नेरेटिव असुर आर्य संघर्ष से भी पुराना है। संभवतः यह पहले से ज्ञात अन्य नेरेटिव्स से अधिक विस्तृत है और अन्यों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय प्रमाणों पर आधारित है। यह नेरेटिव कोयवंशी गोंड जनजातीय समाज में फैले मिथकों और लोककथाओं सहित उनकी धार्मिक मान्यताओं में आज भी ज़िंदा हैं। उनकी वाचिक परम्परा में इसे आज भी देखा जा सकता है
समाधान ३०---
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     एक तरफ तो आप पौराणिक मिथकों वाचिक परम्पराओं पर उंगली उठाते हैं दूसरी तरफ अपने मिथकों धार्मिक मान्यताओं की बात करते हैं --- अतः वस्तुतः ये सभी पूरी तरह से भ्रमित एवं विरोधी भावों से ग्रसित हैं |
    ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक आदि इतिहास के ज्ञान के एक दम कोरे हैं, आर्य व असुर संघर्ष या आर्य-मूल निवासी संघर्ष का तो कहीं इतिहास में नाम ही नहीं है | ये सुर-असुर युद्ध थे, उस समय तो आर्य नाम की कोई परिकल्पना ही नहीं थी |

 -----चित्र में विभिन्न गोंड-मिथक---

लकड़ी के मूल जुन्नार देव = शिव लिंग


गोंडी मूर्तियों के मिथक पार्वती और महिषासुर के संकेत
छिंदवाडा के एक गाँव में मिला जंगो दाई का आशीर्वाद में उठा हाथ और चन्द्र सूर्य

      क्रमश आगे पोस्ट आठ-----


 

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

who is guilty?

कसूरवार कौन ? 


बात तब की है जब मै सिर्फ १२ साल का था | मै अपने जन्म स्थान, उत्तरप्रदेश के भदोही जिले में अपने माता-पिता के साथ रहता था | वही भदोही जो अपने कालीन निर्यात के लिए विश्व विख्यात है | मेरा परिवार एक संयुक्त परिवार है, जहाँ मेरे दादाजी अपने दो भाइयों और उनके पुरे परिवार के साथ रहते है | और मै खुद को इसीलिए सौभाग्यशाली समझता हूँ, और पुरे परिवार के साथ बिताये गए वो पल मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और ताउम्र यादगार रहने वाले पल थे | मेरे दादाजी मुझसे बहुत स्नेह करते थे और एक वही थे जिनसे मै हठ करके अपनी बात मनवा लेता था | वे मुझे प्यार से ''बऊ'' बुलाते थे | मै हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभी जिद करके साईकिल से बाजार जाकर घर के लिए कुछ सामान ला लेता था | लेकिन उसके पीछे मेरा एक स्वार्थ छुपा हुआ था, जिस रहस्य को मै और मेरे दादाजी के सिवाय कोई नहीं जानता था, जब मै सामान लेन की जिद करता तो पहले तो दादाजी मनाकर देते लेकिन मेरे बालहठ के आगे वे भी कितने देर टिक पाते, और अंत में मुस्कुराते हुए मुझे पैसे देते हुए प्यार से कहते  - '' ठीक है चले जाओ, लेकिन संभल के जाना |''
और जब मै पैसे देखता तो उसमे सामान की तुलना में ज्यादा पैसे हुआ करते थे |

एक दिन मै सुबह उठा तो हल्की-हल्की  ठंढ लग रही थी, और मै घर के दरवाजे के पास बैठा था कि अचानक हल्के स्वर में पीछे से दादाजी की आवाज सुनायी दी - '' बऊ ! ''
मै अंदर गया तो अपने कमरे में लेते हुए थे | अंदर जाते ही उन्होंने मुझे पैसे देते हुए कहा - ''बाजार जाकर मेरा बिस्कुट लेकर आओ |''

मैंने पैसे लिए और जाने की लिए मुड़ा ही था की हमेशा की तरह उन्होंने हिदायत देते हुए कहा - ''आराम से जाना, और जल्दी वापस आ जाना |''

मैंने भी बिना उनकी तरफ देखे स्वीकृति से अपना सर हिला दिया | और सायकिल पर सवार होकर बाजार कि तरफ निकल पड़ा.

मैने बाजार पहूचकर जल्दी-जल्दी सामान लिया और वापस लौटने के लिए साइकिल उठायी ही थी की अचानक ही मेरा ध्यान सड़क के किनारे खड़ी एक महिला पर पड़ी, पास जाकर देखा तो अरे ये क्या यह तो रुक्मिणी बुआ है| इनकी हमारे गाँव मे एक छोटी सी दुकान है, और वे हमेशा पैदल ही बाजार जाकर समान लाती थी| लगता है आज उनका सामान का थैला कुछ ज़्यादा वज़नदार हो गया था जिसकी वजह से वे उसे नही ले जा पा रही थी| मैंने देखा तो वे मुझे ही देख रही थी, और वे मुझसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन कह नहीं पा रही थी । मुझे जल्दी थी, लेकिन मै खुद को रोक नहीं सका, और पास जाकर पूछा - '' क्या हुआ बुआ ?''

उन्होंने सकुचाते हुए कहा - ''नहीं....... कु........ कुछ नहीं ।''

लेकिन मेरे जोर देने पर उन्होंने बताया - '' सामान लेने आयी थी, लेकिन वजन ज्यादा होने के कारण नहीं ले जा पा रही हूँ ।''

तो मैंने कहा - ''ठीक है, मै लिए चलता हूँ ।''

तो वह मना करने लगी, लेकिन इससे पहले की वह कुछ बोल पाती मैंने उनका झोला (बैग) अपने केरियर (सायकिल का पिछला हिस्सा, जो वजनी सामान ढोने के काम में आता है) पर रख लिया। तो वह भी मान गयी और हम दोनों पैदल ही घर की तरफ चल दिये। हमारे घर से बाजार की दूरी तकरीबन दो किलोमीटर थी, इसीलिए पहुचने में लगभग एक घंटे का समय लग गया। और इस चक्कर में मै यह भूल गया की मुझे घर जल्दी जाना था। हम घर के करीब ही थे की सामने से छोटे चाचाजी आते दिखाई दिए।
और पास आकर उन्होंने पूछा - '' इतनी देर कैसे हो गयी ?, और पैदल क्यों आ रहे हो ?''

इससे पहले की मै कुछ बोल पाता, उन्होंने फिर क्रोधित होते हुए पूछा - ''यह सामान किसका है ? '' 

तो मैंने बताया की सामान तो रुक्मिणी बुआ का है और मेरे कुछ और बोलने से पहले ही वह बुआ पर बिफर पड़े। उन्होंने कहा - ''तुम्हे इतनी भी समझ नहीं है, इस छोटे से बच्चे के ऊपर इतना सामान लाद दिया है ।''

और इतना कहकर उन्होंने रुक्मिणी बुआ का सारा सामान निचे फेक दिया, जो पुरे सड़क पर बिखर गया। मैंने चाचाजी को समझाने और रोकने की पूरी कोशिस की लेकिन उन्होंने मुझे डाँटकर चुप करा दिया, चुपचाप घर जाने के लिए कहा। मैंने एक असहाय सी नजरो से रुक्मिणी बुआ की तरफ देखा तो उनकी आखे सजल हो चुकी थे और कभी भी अश्रुधारा बह सकती है। वे नजरे झुकाये सड़क के किनारे खड़ी थी। चाचाजी ने न जाने उन्हें कितना बुरा-भला कहा, लेकिन वह सब चुपचाप सब सुनती-सहती गयी। और अंत में चाचाजी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर चल दिए, लेकिन रुक्मिणी बुआ तो अब भी वही खम्भे के सामान अविचलित सी खड़ी है। मेरी आँखे निरंतर उनको ही देखती रही, और खुद से काफी जद्दोजहद के बाद उनकी आँखों से आंसू निढाल हो गए। और धीरे-धीरे वो मेरी आँखों से ओझल हो चुकी थी। मै खुद उस समय समझ नहीं पाया की कसूरवार कौन है ? - मै, बुआ, चाचाजी या कोई कसूरवार है भी की नहीं ?

इस घटना को आज तकरीबन आठ साल बीत चुके है, और शायद वह भी इस घटना को भूल चुकी थी, लेकिन आज भी जब-जब रुक्मिणी बुआ मेरे सामने आती है, तो मेरी नजरो के सामने वो मंजर चलचित्र की भाँती चल पड़ती है। उन्हें मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही और ना ही उन्होंने किसी से इस घटना का जिक्र किया शायद इसीलिए मेरा अपराध बोध बढ़ जाता है। उस घटना के बाद मै उनसे ठीक से आँखे मिलाकर बात भी नहीं कर पाता हूँ। जब आज मै यह सच्ची घटना से आप सब को रूबरू कराने जा रहा हूँ, खुद से यही सवाल कर रहा हूँ की कसूरवार कौन ?

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....डा श्याम गुप्त


                             

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....
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                          काफी समय पश्चात वयोवृद्ध कविवर श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी से मैंने उनके घर पर मुलाक़ात की | मैं भी पर्याप्त समय से नगर के बाहर था एवं विभिन्न कार्यक्रमों में व्यस्त था, वे भी अमेरिका गए हुए थे | सैनी जी वहां के संस्मरण सुनाते रहे| वहां रचित एक कविता भी उन्होंने सुनाई | एक अन्य कविता जो सैनी जी ने डा रामाश्रय सविता के लिए लिखी थी वह भी सुनाई, मेरी प्रतिक्रया एवं साहित्यिक समीक्षात्मक सम्मति भी पूछी | मैंने भी उन्हें अपनी पुस्तक ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ भेंट की एवं उनके अनुरोध पर दो गज़लें भी सुनाईं |
--------यह एक संक्षिप्त द्विपक्षीय गोष्ठी थी | सैनी जी यद्यपि अपने अन्तरंग मित्रों प्रतिष्ठा संस्था के अध्यक्ष श्री स्व. रामाश्रय सविता, वीरेन्द्र अंशुमाली एवं जगत नारायण पांडे के स्वर्गारोहण के पश्चात गोष्ठियों में कम ही आते जाते हैं परन्तु उम्र के इस मुकाम पर भी वे साहित्य सृजन में व्यस्त हैं| पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं|
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श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी आशियाना व आलमबाग क्षेत्र में प्रत्येक गुरूवार को होने वाली साहित्यिक गोष्ठी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं|
-------वर्ष सन २००५ में प्रतिष्ठा संस्था, आलमबाग के महामंत्री (स्व)  श्री वीरेन्द्र प्रकाश गुप्ता’अंशुमाली’ एवं महाकवि( स्व.)प. जगतनारायण पांडे ने विचार-विमर्श के उपरांत एक एसी गोष्ठी-वर्ग बनाने का निश्चय किया जो अनौपचारिक हो एवं संस्थाओं के विविध प्रोटोकोल अध्यक्ष, नियम–कायदे आदि से स्वतंत्र केवल सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का हेतु हो, जिसमें अधिक कवि भी न हों |
--------यह एक अन्तरंग गोष्ठी की परिकल्पना थी जिसमें एक दूसरे की रचनाओं पर पारस्परिक विमर्श एवं कमियों व विशेषताओं पर विचार हो, जिसका मूल उद्देश्य केवल कविता पढ़कर चल देने की अपेक्षा साहित्यक-सामाजिक श्रेष्ठता पर भी ध्यान दिया जाना था|
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दोनों मनीषियों ने श्री प्रेमचन्द्र सैनी को साथ लिया एवं जगत नारायण पांडे जी के घर पर प्रथम गोष्ठी का आयोजन किया एवं मुझे भी सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया गया |
------इस प्रकार यह चार कवियों द्वारा प्रारंभ यह गोष्ठी अपने विशिष्ट साहित्यिक कार्यक्रम के साथ प्रारंभ हुई| तत्पश्चात श्री मधुकर अष्ठाना, रामदेवलाल विभोर को भी शामिल किया गया | --------बारी बारी से सदस्यों के आवास पर आयोजित होने वाली गोष्ठी में बसंत राम दीक्षित, स्व.पंकज श्रीवास्तव, स्व. निर्मला साधना व अन्य कवि भी शामिल होते गए और अपना वर्तमान संस्थागत रूप लेती गयी |
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इस प्रकार लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में यह एक विशिष्ट गोष्ठी के रूप में स्थापित हुई जिसमें न कोइ अध्यक्ष, न अतिथि न संचालक है | न कोइ चन्दा, न मासिक अंशदान इत्यादि | सभी के घर पर बारी बारी से अनवरत रूप से होती रहती है | सभी एक क्रम से अपनी अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करते हैं, उन पर सामाजिक-साहित्यिक रूप से विचार विमर्श भी होता है |
----लखनऊ में प्रायः गोष्ठियां रविवार को ही होती हैं एक या दो को छोड़कर जो शनिवार को या फिर अनियातिकालीन , जो कभी भी होजाती हैं |
-------अतः इस गोष्ठी को प्रत्येक गुरूवार को होना सुनिश्चित किया गया एवं कोइ विशिष्ट औपचारिक नाम न रखकर इसे ***गुरुवासरीय गोष्ठी*** का नाम दिया गया |
----अनौपचारिकता, उच्च कोटि की साहित्यिक प्रगति एवं साहित्य के सामाजिक सरोकार जिसका मुख्य उद्देश्य है |
------- वर्त्तमान में यह गोष्ठी प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, सेक्टर-के , लखनऊ पर होती है |
चित्र में---गुरुवासरीय गोष्ठियों के दृश्य ------
श्री अंशुमाली व जगत नारायण पांडे .....डा रामाश्रय सविता व प्रेम चन्द्र सैनी मेरे आवास पर गोष्ठी में .......प्रेम चन्द्र सैनी --कुछ शायरी की बात होजाए --पढ़ते हुए ........गुरुवासरीय गोष्ठी के विविध दृश्य ..
Image may contain: 5 people, including Kamlesh Narain Srivastava and Ramdeo Lal Vibhor, people sitting, table and indoor









शुक्रवार, 30 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त


                             

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
          भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
          विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
             -------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
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   कथन २२---     
------ यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
 
 समाधान २२ --
------गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी | 
----गलत व अज्ञानी है ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध, जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे जाते रहे | मूर्ख है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण  ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं | 
 
कथन-२३--
-----हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है। यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक, धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
 
 समाधान २३--- 
-------अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव में  अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है | और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |
कथन २४----
 
गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित ठहराया गया हैये दर्शन और ये समाज आत्मा या परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
         आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह (हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
 
समाधान -२४.. 
----------क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |  वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
     सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
      यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर ...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर उन्नत मानव होचुके थे )  तादाम्य करके एक उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |
कथन २५--
----------------डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी दर्शन भी इश्वर को नही मानता, बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
 
समाधान २५---
-----------------निश्चय ही गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी | जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानवमनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का अंग है बौद्ध, जैन, लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं...  |
 
 कथन २६--
-----मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ भूमि, गगन, वायु अ अग्नि और न नीर है।
     यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन में है,  इसमें कोई  अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा डाला।
समाधान २६  ---
यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है, बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही आया है ?
   पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक,  अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है,  बुद्धि-ज्ञान के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर हुआ,  ब्रह्म,  परमात्मा  | भगवान्,  मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |


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चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....

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