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गुरुवार, 29 मार्च 2018

डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित, ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह )


                     

 डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित,  ई बुक ,,,काव्य-काँकरियाँ ...(.गीति व अगीत....तुकांत व अतुकांत लघुकाओं का संग्रह ) 
----- वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा प्रकाशित ------



       काव्य-काँकरियाँ: काव्य संग्रह
डॉ श्यामगुप्त  26 मार्च 2018
वर्जिन साहित्यपीठ
  कंकड़ फैंकना एक सहज मानवी प्रवृत्ति है। कभी यूंही खेल खेल में अपनों पर या दूसरों पर। बचपन में पोखर-तालावों में, मेंढ़कों, पक्षियों, कुत्ते-बिल्लियों पर, पेड़ों पर फलों को तोड़ने हेतु ढेले फैंकना किसे नहीं सुहाया। बालिकाओं के आदि-खेल कंकड़गुटके और बालकों के रंग-बिरंगे कंचों का खेल कौन नहीं जानता।


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Description: Prime exclusive deals
Literature & Fiction
1 result for Books : Literature & Fiction :
·          
25 March 2018---by Dr Shyam Gupt

2008
by Harivanshrai Bachchan

15 March 2018---by सिल्वा बैरोस, विलियम
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27 February 2018----by सिंह, जगमोहन

14 March 2018
by सिल्वा बैरोस, विलियम
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रविवार, 25 मार्च 2018

रामनवमी पर विशेष --- -----राम की राजनीति--- डा श्याम गुप्त...



                       

रामनवमी पर विशेष ---
-------------------------
राम की राजनीति---

===============
---- आज राम राजनीति के केंद्र तो हैं परन्तु राम की राजनीति राजनैतिक केंद्र से दूर है | राम का चरित्र, उनकी कार्यशैली व कृतित्व, चाहे वे राजमहल में हों या वनवास में, ही उनकी राजनीति है |
------दृढ़ निश्चय, गुरुजनों से मंत्रणा, समाज के जन जन ..बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक का दुःख हरण, उचित क्रियाशैली व नीति निर्धारण , सभी का उचित सहयोग ,कठोर परिश्रम जन जन का उत्थान व शिक्षा ही रामराज्य की नींव है---
--------मेरे काव्य उपन्यास, शूर्पणखा खंडकाव्य से राम की राजनीति के कुछ दृश्य प्रस्तुत हैं ----
सर्ग-४.मंत्रणा
===========
९-
ऋषि-मुनि गण एवं वनचारी,
सबको प्रभु ने आश्वस्त किया|
अत्याचार न होगा कोई,
जो अब तक होता आया है |
कोई मख विध्वंस न होगा,
कुटिया का भी ध्वंस न होगा३ ||
१०-
धनुष वाण है हाथ राम के,
परम वीर सौमित्र यहाँ हैं |
आ न सकेंगे इधर ,निशाचर,
करें सभी निर्भय होकर के;
यज्ञादिक शुभ कर्म सभी फिर,
उठे सुवासित धूम गगन में४ ||
११-
ऋषि-प्रणीत जीवन धारा की५ ,
सुरसरि फिर से बहे, धरा पर |
निशाचरी माया नगरी की,
हवा नहीं इस ओर बढ़ेगी |
मर्यादा की मलयज शीतल ,
बहे समीर पुनः हर ओर ||
सर्ग ५...पंचवटी
===============
३-
मुनि अगस्त्य से बोले रघुवर,
तात ! आपका ज्ञान व अनुभव;
एवं कठिन कर्म और ब्रत का,
सारे जग में यश फैला है |
यह भूभाग आपके कारण,
ज्ञान-वान, समृद्ध हुआ है ||
४-
उचित मन्त्र दें, वही करूँ में ,
जिससे प्रिय हो आप सभी का |
हो उद्देश्य पूर्ण, मेरा भी,
नाश करूँ सब दैत्य वंश का |
लक्ष्मण समझ रहे थे अब कुछ,
नमन किया प्रभु की लीला को ||
५-
ऋषिवर, इस दक्षिण अंचल के,
कण कण का है ज्ञान आपको;
रहना उचित कहाँ पर होगा ?
पाप घड़ा भर चुका दैत्य का,
अब विलम्ब का काम नहीं है;
यह संधान कहाँ से होगा ||
६-
१२-
पंचवटी अति सुन्दर पावन,
धाम है, 'दंडक-वन'३ में रघुवर |
रहें वहां पर पर्णकुटी४ कर,
मिट जाएँ कलुष-दोष वन के |
दंडक वन होजाए पावन ,
ऋषि-मुनि विचरें निर्भय होकर ||
१३-
अधिग्रहण किया जो दैत्यों ने,
वह जनस्थान५ भी निकट रहे |
आते-जाते निशिचर, दुष्टों,
की बातों का भी पता चले |
उस रावण के अधिकृत प्रदेश-
से, दुष्ट-दैत्य, आते रहते ||
१४-
सूचना व अवसर पाने का,
है उचित क्षेत्र यह दंडक वन |
थर्राया है जो, असुरों के -
अति अत्याचारी कृत्यों से |
रह पंचवटी६ में राम, करो-
तुम दुष्टों का अब शीघ्र दलन ||
१५-
दिव्यास्त्र अनेक दिए ऋषि ने,
फिर बोले-तुम तो राम स्वयं ,
हो संचालन संधान कुशल |
जाने कितने ही दिव्य अस्त्र,
प्रभु तरकश में शोभायमान ;
है शस्त्रों की शोभा तुमसे ||
१६-
अस्त्रों से सिर्फ नहीं कोइ,
मानव शोभा पाजाता है |
शस्त्रों को रख निज साथ नहीं,
वह परमवीर बन जाता है |
मिल जाएँ यदि अपात्र को तो,
इन की महिमा घट जाती है ||
१७-
दृढ -इच्छा, साहस, कर्मठता,
नैतिक बल, अस्त्र है बीरों का|
तुम ग्रहण करो हे राम! बढे,
इन शस्त्रों की शोभा तुमसे |
सह न सकेगा रिपु कोई,
वर्षा अब राम के तीरों की || ----
१९-
दंडक वन में पहुंचे रघुवर,
मिले जटायू गृद्धराज वर |
मित्र, पिता दशरथ के थे,प्रिय,
सादर वंदन किया सभी ने |
कुशलक्षेम कौशलपति की वे,
लगे पूछने,भाव-विह्वल हो ||
२१-
फिर विस्तार सहित घटनाक्रम,
कारण अपने विपिन-वास का;
रघुवर ने उनको बतलाया |
किया निवेदन, तात ! आप भी,
बनें सहायक धर्म कार्य हित;
उचित मंत्रणा दें हम सबको ||
२२-
आशीर्वाद सदा है मेरा,
राम,बनो तुम खलु-दल भंजक|
मेरा मेरे दल-बल१ का भी,
सदा पूर्ण सहयोग रहेगा |
पूरा हो उद्देश्य राम का,
पापमुक्त हो अब यह अंचल ||
२३-
वनचर, बनवासी अरण्य के ,
हैं अति त्रस्त अनाचारों से |
ज्ञान-धर्म,जन-नीति सभी कुछ,
कलुषित हैं; दूषित भावों के -
अति प्रचार एवं प्रसार से २ ,
है प्रमाद ने किया बसेरा ||
२४-
अकर्मण्यता, प्रमाद व लिप्सा,
भोग-भाव औ असत कर्म से ;
ध्वस्त हो गईं रीति-नीति सब,
ध्वस्त हुई है अर्थव्यवस्था |
दीन-हीन हो पिछड़े सबसे,
भोग रहे निज कर्मों का फल ||
२५-
यदि हो साथ राम का पौरुष,
भक्ति-शक्ति सौमित्र के जैसी;
सीता सी प्रभु प्रीति-रीति हो,
सोने में होजाय सुहागा |
बिना भक्ति और ईश कृपा के,
किसको भला विवेक हुआ है ||
२६-
युग-शिक्षा नव ज्ञान-रश्मि से,
नव-प्रकाश फैलाना होगा |
कला शिल्प साहित्य आदि का,
जन मन भाव जगाना होगा |
स्वतंत्रता स्व -भाव आदि भी,
जगें, सभी के अंतर्मन में ||
२७-
हर, प्रमाद अज्ञान अयोग्यता ,
सब विधि योग्य बनाएं सबको |
नहीं योग्यता की कोई भी,
कमी किसी में भी रह जाए |
ज्ञान कुशलता और योग्यता,
से न करें कोई समझौता ३ ||
२८-
स्त्री-शिक्षा पर सब विधि से,
कुछ ध्यान अधिक देना होगा |
शिक्षित नारी ही है राघव!
उन्नायक अगली पीढी की |
सक्षम है वही रोकने में,
जाने से असत मार्ग नर को ||
२९-
विदुषी, शिक्षित और साक्षर,
नारी ही आधार है सदा ;
हर समाज की, नर जीवन की |
वही समय पड़ने पर , नर से-
कदम मिलाकर चल सकती है४ |
जीवन करती सुन्दर -समतल ||
३०-
चाहे जितनी भीड़ साथ हो,
यदि अयोग्य हो, काम न आये |
पूर्ण योग्यता ज्ञान के बिना ,
कोई कार्य पूर्ण कब होता |
तप संयम कठोर अनुशासन,
से ही पूर्ण योग्यता मिलती ||
३१-
पिछड़े दीन-हीन या ज्ञानी,
सबको साथ लिए चलना है |
अस्त्र-शस्त्र निर्माण कर्म और -
लड़ने योग्य बनाएं सबको |
आतातायी के विरोध का,
स्वर, जन जन में उठे ज्वार बन ||
३२-
नए नए अस्त्रों शस्त्रों का,
संचालन भी सिखलाना है |
जन-जन, मन से महायज्ञ में,
दे सहयोग, बताना है यह |
हर घर में हे राम! ज्ञान का,
एक-एक दीपक जल जाए ||
३३-
अक्रियता अज्ञान और भय,
हट जाए जन जन में मन से |
अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था,
से यह वन समृद्ध बन सके |
कर्म-चेतना से यह अंचल,
सक्रिय सबल, संबल बन जाए ||
३४-
जन जन का बल, युद्ध काल में,
सबसे बड़ा शस्त्र५ होता है |
राघव ! सब से बड़ी सुरक्षा-
शक्ति, योग्य जन-बल होता है |
उचित समय पर दंडक वन क्या-
जन स्थान भी साथ खडा हो ||-----सर्ग ५...पंचवटी
१८-
देश की रक्षा, संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ;
अधर्मियों से विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता ,
वही नृपति अच्छा शासक है ||
१९-
पर जो शासक निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता |
अधर्म-मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता |
अप विचार, अपकर्म भाव में,
जन जन पाप-लिप्त हो जाता ||
२०-
हिंसा चोरी अनृत भावना,
नर-नारी को भाने लगती|
अश्लील कृत्यों से नारी,
अपने को कृत-कृत्य समझती |
लूट अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते ||
२१-
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्यपान आदिक विषयों रत;
कपट झूठ छल और दुष्टता,
के भावों को प्रश्रय देते |
भ्रष्टाचार, आतंकवाद में,
राष्ट्र, समाज लिप्त हो जाता ||
२२-
पाप, अधर्म-नीति कृत्यों से,
प्रकृति माता विचलित होती |
अनावृष्टि अतिवृष्टि आदि से,
धरती की उर्वरता घटती |
कमी धान्य-धन की होने से,
बनती है अकाल की स्थिति ||
२४-
लक्ष्मण,तुम अब जान चुके हो,
मूल उद्देश्य, वनागमन का |
नाश राक्षसों का करना है ,
स्थिर करना है फिर हमको;
शास्त्र धर्म शुचि मर्यादाएं ,
ऋषि प्रणीत जीवन शैली की ||
२५-
इस अंचल के पिछड़े पन को,
हमको दूर हटाना होगा |
शिक्षा देकर के जन जन का,
जीवन सुलभ बनाना होगा |
विविध शिल्प औ शस्त्र कला का,
उन्हें कराना होगा ज्ञान ||
२६-
दुखी असंगठित एवं पिछड़ी,
प्रजा रहे, वह राजा ही क्या |
एसे किसी राज्य का लक्ष्मण,
राजा बन कर भी क्या करना |
शिक्षित सुखी संतुष्ट प्रजा ही,
उन्नत सिर हैं राजाओं के ||
२७-
शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित,
बनें क्रान्ति में स्वयं सहायक ;
लक्ष्मण सदा सफल होती वह |
पर असंयमित हो जाती है,
भीड़ अशिक्षित हो, असंगठित;
भय विघटन,प्रति-क्रान्ति का रहता ||
२८-
आताताई के विरोध में,
जन संकुल को लाना होगा |
जन जन ज्वार समर्थन से ही ,
मिल पायेगी विजय युद्ध में |
बड़ी बड़ी सेनाओं से भी,
नहीं कार्य यह सध पाता है ||
२९-
यदि मैं सेना लेकर आता,
प्रतिपग मग पर विरोध होता |
राज्य प्रसार लालसा का भी,
कौशल पर आक्षेप ठहरता |
सतर्क होजाते राक्षस -कुल,
पूरी तैयारी से पहले ||
३०-
लक्ष्मण हमको इसी भूमि की ,
मिट्टी से हैं वीर उगाने |
आतंक और अन्याय भाव से,
लड़ने के हैं भाव जगाने |
ताकि लौटने पर हम सबके,
वे हों स्वयं कुशल निजहित में ||
३१-
शीश नवा कर लक्ष्मण बोले-
राम नाम की महिमा से प्रभु,
मिट्टी भी सोना होजाती |
इच्छा है जब स्वयं राम की,
सोती धरती जाग उठेगी ;
आज्ञा दें अब क्या करना है ||
३२-
सभा, प्रबंधन और निरीक्षण ,
ऋषि-मुनियों संग विविधि गोष्ठियों ;
के आयोजन, कार्यान्वन का,
सारा भार लिया रघुवर ने |
नारी-वालक शिक्षा का और-
जन जागरण१ भार सीता ने ||
३३-
गृह निर्माण व युद्ध कला में-
विशेषग्य ,सौमित्र को मिला ;
भार प्रोद्योगिकी -शिक्षा एवं-
आयुध की निर्माण कला का |
एवं संचालन -कौशल को ,
जन जन में प्रसार करने का ||
३४-
लिखना पढ़ना व सद-आचरण,
महिलाओं बच्चों को, सबको;
अपनी कुटिया के कुंजों की,
छाया में वे जनक-नंदिनी;
आदर प्रेम से सिखलाती थीं,
दीप, दीप से जलता जाता२ ||
३५-
लक्ष्मण लगे सिखाने सब को,
धनुष बनाना, वाण चलाना |
शस्त्रों के निर्माण-ज्ञान सब,
शर-संधान व उचित निशाना |
धनुष-वाण, तरकश सब आयुध,
बनने लगे, हर कुटी वन में ||
३६-
सुन्दर सुद्रिड और सुरक्षित,
कुटिया-गृह निर्माण शिल्प का;
ज्ञान कराते थे रामानुज |
विविध शिल्प व श्रम की महत्ता -
उपयोगिता, दिखाते रहते;
हो स्वतंत्र निज अर्थ-व्यवस्था३ ||
३७-
ईश्वर महिमा, भजन-साधना,
लोक-कला, साहित्य-भावना;
चित्रकला, संगीत ज्ञान, सब-
बाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुषों को ,
सिय-रामानुज लगे सिखाने ;
यह अंचल अब जाग रहा था ||
३८-
वन संपदा का रक्षण-वितरण,
विविधि भाँति फल-फूल उगाना |
नव-पद्दतियां, कृषि कर्मों४ की ,
सिखलाई जातीं कुटियों में |
वन व ग्राम की कला-कथाएं ,
सीखते व सुनते सिय-लक्ष्मण ||
३९-
योग भक्ति अध्यात्म ज्ञान का,
विविधि भांति की नीति-कथाओं ;
के ,कहने सुनने समझाने,
का क्रम स्वयं राम करते थे |
प्रातः सायं , प्रार्थना सभा में,
ऋषि-मुनियों का प्रवचन होता ||
४०-
रक्षा में, सौमित्र -गुणाकर,
किये नियोजित थे रघुवर ने |
पंचवटी का आसमान था,
यज्ञ -धूम से हुआ सुवासित |
कर्मठता से रामानुज की,
वन-उपांत५ थे अभय होगये ||
सप्तम सर्ग -संदेश
==============
२८-
नारी, केंद्र-बिंदु है भ्राता !
व्यष्टि,समष्टि,राष्ट्र की,जग की |
इसीलिये तो वह अवध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी |
लेकिन वह भी तो मानव है,
नियम-निषेध मानने होंगे ||
२९-
नारी के निषेध-नियमन ही,
पावनता के संचारण की;
उचित निरंतरता समाज में,
सदा बनाए रखते, लक्ष्मण !
अवमानना, रेख-उल्लंघन,
कारण बनते, दुराचरण का ||
३०-
राजा जनता या प्रबुद्ध जन,
जब अपने दायित्व भूलकर;
उचित दंड यदि नहीं देते |
अनाचार को प्रश्रय देकर,
पाप-कर्म में भागी बनते;
नियम से नहीं ऊपर कोई ||
३३-
विविध कारणों से यदि नारी,
मर्यादा उल्लंघन करती |
दुष्ट भाव, स्वच्छंद आचरण,
से समाज दूषित होजाता |
कई पीढ़ियों तक फिर लक्ष्मण,
यह दुष्चक्र चलता रहता है ||
३४-
जब उद्दंड, रूप-ज्वाला युत,
और दुर्दम्य काम-पिपासा-
युक्त ताड़का१ से कौशिक का ;
तेज, तपस्या-बल गलता था ,
अत्याचार, अनीति मिटाने;
उसका भी बध किया गया था ||
३५-
शूर्पणखा का दंड हे अनुज !
सिर्फ व्यक्ति को दंड नहीं है |
चारित्रिक धर्मोपदेश है,
नारी व सम्पूर्ण राष्ट्र को |
चेतावनि है दुष्ट जनों को ,
कुकर्म-रत नारी-पुरुषों को ||
४२-
परम प्रिया राजा दशरथ की,
राज्यकर्म और राजनीति पर;
उचित मंत्रणा देने वाली |
देव कार्य, इस महायज्ञ में,
वही आहुती दे सकती थी ;
अपने प्रेम,त्याग, महिमा की ||
४३-
विश्वामित्र-वशिष्ठ योजना४ ,
निशिचर-हीन मही करने की ;
कैकयि माँ ही केंद्र बिंदु है |
शिव की भाँति, गरल पी डाला,
सहमत कब थे राजा दशरथ ||
४४-
सेना से यह कार्य न होता५ ,
कोइ अन्य उपाय कहाँ था |
राक्षस-अपसंस्कृति विनाश का ,
ध्वजा धर्म की फहराने का |
जन जन हित में,विज्ञ जनों को,
सदा गरल यह पीना होगा || ----सप्तम सर्ग -संदेश


 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट-पांच--डा श्याम गुप्त





भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण 



           आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट पांच----कथन-समाधान १८ से २१ त१क-----


कथन-१८--- पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाली एक जनजाति के लोग दुर्गापूजा के दौरान मातम मनाते हैं। इस दौरान वे न तो नए कपड़े पहनते हैं और न ही घरों से बाहर निकलते हैं, ये लोग असुर हैं और महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं (BBC HINDI, 2015)उनकी अपनी मान्यताओं में महिषासुर एक नायक हैं और दुर्गा खलनायिका हैं। इसी वजह से पूरा राज्य जब खुशियां मनाने में डूबा होता है तब ये लोग मातम मनाते रहते हैं। इस जनजाति के बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनमें से किसी के कंधे पर सिर नहीं होता। बच्चे शेरों की गर्दन मरोड़ देते हैं। यह दुर्गा की सवारी जो है। कुछ विद्वान तो आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर यह भी सिद्ध करते हैं कि आर्यों का दुर्गा का मिथक भी असल में सुमेरियन/मेसोपोटामियन मिथकों से लिया गया है। सुमेरियन लोगों में इनन्नानामक युद्ध और उर्वरता की देवी की मान्यता थी और यह देवी भी सिंह पर सवारी करती थी।--- इसी देवी के मिथक ने इरान, सिन्धु सभ्यता और बाद में अन्य भारतीय महाद्वीप के मिथकों को आकार दिया (Wolpert, 2006)|
समाधान-१८.---परन्तु गोंड साम्राज्य का राज्य चिन्ह हाथी पर सवार शेर का क्या करेंगे, उसकी गर्दन कौन मरोडेगा | वास्तव में उलटा सोच जा रहा है .....ये कथाएं एवं मिथक यहीं से सारे विश्व में गयीं हैं | जब भारतीयों ने महासमन्वय ( शिव, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा के नतृत्व में हुआ मानव इतिहास का सर्वप्रथम व सबसे बड़ा समन्वय जिसके बारे में आगे यथास्थान बताया जायगा)  के पश्चात समस्त विश्व पर राज्य किया | हो सकता है कि महिषासुर के कुछ वंशज बचे हों, इससे महिषासुर अच्छा व्यक्ति थोड़े ही होजाता है, वंशज तो आज रावण के भी हैं |
कथन -१९- डॉ. अंबेडकर ने अपनी रिसर्च में ये सवाल खड़े किये हैं कि भारत में देवियों और मातृदेवियों का उभार एक गहन पहेली है जिसके आधार पर इस देश के धर्म-दर्शन के उद्विकास के बहुत सारे पहलू उजागर किये जा सकते हैं।
----इस अर्थ में चट्टोपाध्याय और डॉ. अंबेडकर दोनों ही मातृसत्तात्मक परिवार और समाज व्यवस्था सहित ब्राह्मणी धर्म में देवियों की भूमिका के साथ प्राचीन भारतीय भौतिकवादी परम्पराओं को रखकर देखने का आग्रह कर रहे हैं। चट्टोपाध्याय अपनी अकादमिक रिसर्च से वहां पहुँच रहे हैं और डॉ. अंबेडकर अपनी धर्म-दर्शन और धर्म के समाजशास्त्र को आधार बनाकर उस निष्कर्ष तक आ रहे हैं। बालाघाट के लांजी नामक स्थान में नेताम गोंडी वंश के दुर्ग की खुदाई में भगवान् महावीर,  गणेश और बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं जिनका सीधा संबंध श्रमण या लोकायत परम्परा से है |
समाधान १९- अर्थात लोकायत परम्परा व प्राचीन आर्य वैदिक परम्परा का मिश्रण-समन्वय  हुआ है क्योंकि श्रमण संस्था भी वैदिक कालीन संस्था है जो वैदिक ऋषि अपनाते थे | गणेश जैन व बौद्ध धर्म के समय की लोकायत या श्रमण संस्था के नहीं हैं, जो इन संस्थाओं ने वैदिक धर्म से अपनाई, अपितु उनसे बहुत अधिक प्राचीन हैं वे वैदिक देव हैं |.. और यह मूर्तियाँ मिलना कोइ पुराकाल का तथ्य नहीं है अपितु नवीन जैन या बौद्ध काल का तथ्य है | अति पुराकाल में मूर्तिकला कहाँ थी |
      कथन २०- गोंडों सहित बैगा, मारिया, भील, ओराव, हलवा आदि जनजातियों में भूमि, वन, जल, पर्वत सहित धरती और स्त्री की उर्वरा शक्ति को सम्मान देने की परम्पराएं एक जैसी हैं। ये लोग अपनी विशेष जीवन शैली लिए जंगलों में सिमटते रहे हैं या सिमटने को मजबूर हुए हैं और इनके परितः शहरी या नागर समाज में भिन्न किस्म की या पित्रसत्तात्मक संस्कृति ने सत्ता स्थापित की है। इस तरह देखें तो दो ही संभावनाएं हैं पहली यह कि या तो मूलनिवासी जनजातियों ने कभी भी नगर नहीं बसाए और खेती नहीं की है और सदैव ही वनवासी जीवन व्यतीत किया है और दूसरी यह कि उन्होंने नागर सभ्यता भी पैदा की लेकिन किसी कारण से कालान्तर में उनकी सभ्यता जंगलों में सिकुड़ते जाने को विवश हो गयी।
     भौतिकवादी, श्रमण, नास्तिक, वेदविरोधी, मूलनिवासी, स्त्रीवादी और अंबेडकरवादी विचारक सब के सब अपने-अपने और अलग-अलग प्रस्थान बिन्दुओं से यात्रा करते हुए भी एक साझे निष्कर्ष तक चले आ रहे हैं। वे सब के सब अनिवार्य रूप से ब्राह्मणवाद को मूल भारतीय भौतिकवादी और मातृसत्तात्मक संस्कृति के खिलाफ खड़ी की गयी प्रतिसंस्कृतिनिरूपित करते हैं।
      इसका सीधा अर्थ ये है कि वर्तमान में जो दलित, मूलनिवासी या स्त्रीवादी आन्दोलन हैं वे जिस संस्कृति का नक्शा बना रहे हैं या खोज कर रहे हैं वही असल में इस देश की प्राचीन और प्रगतिशील संस्कृति थी जिसके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक ब्राह्मणवादी और भाववादी दर्शन पर आधारित प्रतिसंस्कृति खड़ी की गयी थी।
समाधान २०---ये सभी जातियां निश्चय ही हमारी पुरा आदि निवासी जातियां हैं जो सदैव से ही भारत के वनांचल सभ्यता रही हैं | यही सभ्यताएं समय समय पर नागरी सभ्यता में परिवर्तित होती रही हैं | यह ऐसा ही है जैसे आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्र व नागरी क्षेत्र भिन्न भिन्न है उनके रहन-सहन भिन्न भिन्न हैं और समय समय पर ग्रामीण परिवार नगर में आकर बसते रहते हैं तथा दोनों के क्रियाकलाप व्यवहार आदि का मिश्रण-समन्वय होता रहता है |
     निश्चय ही प्रतिसंस्कृति किसी उन्नत संस्कृति के प्रति ही खडी की जाती है, जिसे विनष्ट नहीं किया जा सकता | यह इस देश का, किसी भी देश का इतिहास रहा है, बुरी संस्कृति को तो विनष्ट किया जाता है चाहे वह कितनी भी वलशाली हो, जैसा दैत्यों, असुरों, रावण, कंस, दुर्योधनों आदि शक्तिशाली अप-संस्कृतियों का किया गया |
     इस देश में सदा से ही प्रगतिशील, भाववादी संस्कृति रही है | कथन में वर्णित आन्दोलन जिस संस्कृति की खोज का नक्शा बनारहे हैं यह वही संस्कृति है जो देश की सनातन आदि संस्कृति है जो सदा से वनांचल संस्कृति, ग्रामीण संस्कृति व नागरी संस्कृति का समन्वित रूप है और आज भी वही संस्कृति बहुरंगी रूप में भारत के कोने कोने गाँव गाँव नगर नगर में मौजूद है | जो हमारे त्यौहार, ऋतुएँ, पर्व, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक व्यवहार की सर्वत्र समानताओं से परिलक्षित होता है जिसे अनेकता में एकता कहा जाता है ,जिसे तोड़ने के असफल प्रयत्न किये जारहे हैं|
कथन २१- देवअसुर संग्राम,  ब्राह्मणक्षत्रिय या ब्राह्मणबौद्ध संघर्ष  ----
     प्राचीन कोयवंशीय गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन के हिस्से के रूप में देखना न केवल तर्कपूर्ण है बल्कि अब आवश्यक भी हुआ जा रहा है। प्राचीन संहिताएँ और मिथक जिन संघर्षों का उल्लेख करते हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं।....इनसे जुड़े रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं।
         यह समानता यह सिद्ध करती है कि एक आततायी संस्कृति ने किसी प्राचीन संस्कृति के वाहकों  को एक जैसे समाज मनोवैज्ञानिक उपाय से छलपूर्वक नष्ट किया था।
     इस बात का स्पष्ट उल्लेख न सिर्फ महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के चिन्तन में मिलता है, बल्कि जनजातीय समाज से आने वाले विद्वानों और धार्मिक नेताओं से भी यही सूत्र प्राप्त होता है। इनमें एक नया और महत्वपूर्ण नाम है डॉ. मोतिरावण कंगाली (1949-2015) का जो गोंड समाज की धार्मिक परम्पराओं और भाषाओं के विद्वान थे।
    भारत के अनेकों राज्यों में एक समान समाज मनोवैज्ञानिक आशय लिए हुए सैकड़ों दन्त कथाएं हैं जिनमें  देवों  और असुरों के संघर्ष का जिक्र आता है। ये संघर्ष असल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का संघर्ष रहा है (Ambedkar,1970)
    स्वयं ऋग्वेद की अनेकों रिचाओं में स्पष्ट संकेत हैं कि आर्य युद्धखोर और मदिरासेवी लोग थे (Ross, 2008) । इन आर्यों के लिए भारत की जलवायु बहुत सुखद और सहायक सिद्ध हुई और वे यहीं रूककर अपना विस्तार करने लगे। स्वाभाविक रूप से अपने साथ अपने पशु हथियार और परम्पराओं के साथ अपनी मान्यताएं और मिथक भी लाये थे (Keith,1925)। इन परम्पराओं और मिथकों ने स्थानीय परम्पराओं और मिथकों के साथ मिलकर बहुत ही चकरा देने वाला कथानक रचा है, जिसे समझ पाना अब संभव हो पा रहा है।
     धर्म दर्शन, साहित्य, इतिहास, मिथक और पुरातत्व सहित भाषा विज्ञान से अब जो सूत्र मिल रहे हैं। वे किसी एक साझे संश्लेषण की तरफ इशारा करते हैं। वह संश्लेषण इस अर्थ में है कि अगर भारतीय राज्यों में अलग-अलग फ़ैली दंतकथाओं लोककथाओं और वाचिक परम्पराओं में फैले सूत्रों को ठीक से देखा जाए तो उनमे एक जैसी प्रवृत्तियाँ हैं। समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में रची गयी वर्जनाओं और पुरस्कारों सहित उनके प्रस्थान बिंदु और उनके लक्ष्य एक जैसे हैं. ---       ये समानता कोयवंशी गोंडों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नायक संभूशेकसहित बाद में असुरों और बौद्धों के खिलाफ रचे गए मिथकों में एकदम साफ़ नजर आती है।
समाधान २१—जो रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं। ----इससे इस संस्कृति के लोग आततायी कैसे हुए अपितु निश्चय ही यह एक समन्वित उच्च संस्कृति की ओर इशारा करते हैं जो भारत भर में फ़ैली हुई थी सभी धर्म दर्शन, पंथ , सम्प्रदाय उसी संस्कृति के अंग थे जिसका वर्णन समाधान २० में किया गया है | पहले ही स्पष्ट होचुका है कि गोंडों के तथाकथित नायक शम्भूसेक स्वयं ही महादेव शिव हैं जो स्वयं वेदों के निर्माता हैं | 

चित्र---१. गोंडों के जुन्नार देव का त्रिशूल----अर्थात शिव के पूर्व रूप के त्रिशूल...
चित्र-२.--कथित गोंड राज्य चिन्ह ---कोणार्क--हाथी पर सवार शेर---अर्थात दुर्गा की सवारी ..

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----------क्रमश पोस्ट ६ आगे----

बुधवार, 21 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --पोस्ट चार----- डा श्याम गुप्त ---

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --पोस्ट चार----- डा श्याम गुप्त ---
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----- एक धारावाहिक क्रमिक आलेख--पोस्ट चार ------
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--------आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है |
-------- जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
--------- भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं
---------यहाँ विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ***** ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में *****प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा ----
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आगे ---पोस्ट चार --- कथन/समाधान १५ से १७ तक--
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कथन १५-
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------सामान्य बुद्धि भी यह बतलाती है कि ऐसा इतिहास लिखकर आर्य अपने वंशजों की नजर में महान नहीं बन सकते थे। इसीलिये उन्होंने ऐसा इतिहास न लिखने का निर्णय लिया और इस इतिहास की बजाय मिथक रचे जिनमें न तर्क था न कोई न्यायबोध था न नैतिकता ही थी।
-------इससे यह स्पष्ट होता है कि आततायी आर्य अविकसित और बर्बर थे, बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि मूलनिवासी असुर अधिक नैतिक थे प्रकृति, जीवन, बहुलता, सृजन और स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे, वे अधिक सभ्य और विकसित थे।
------आक्रामक और युद्धखोर घुमक्कड़ आर्यों के विपरीत वे खेतिहर समाज थे। उनका दर्शन भी प्रकृति और प्राकृतिक शक्तियों का दर्शन था जो कि बहुत हद तक भौतिकवादी दर्शन था।
समाधान -१५--
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निश्चय ही असुरों, अनार्यों का भौतिकवादी दर्शन था, यथा आज भी पाश्चात्य संस्कृति का है, जिसे शिव-विष्णु समन्वय संधि द्वारा उच्चतम संस्कृति संस्थापन के साथ अध्यात्मिक धरातल पर लाया गया जो आज भी कायम है |
------जैसे जैसे मानव समाज सांस्कृतिक रूप से उन्नत होता है भौतिकवाद से दूर होता जाता है एवं अध्यात्मवाद, न्यायबोध, नियम, नैतिकता, मनोविज्ञान, धर्म, दर्शन, ईश्वर की ओर उसका झुकाव होता जाता है जो आज भी व सदा से भारतीय जनमानस का दर्शन है |
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भारतीयों ने महान बनने हेतु नहीं अपितु मानवता के सांस्कृतिक विकास हेतु ही सारे कार्य किये, इसीलिये उन्होंने कभी अपने नाम से इतिहास नहीं लिखा अपितु मानव के सांस्कृतिक विकास के इतिहास की कहानियां लिखीं जो पुराणों आदि में वर्णित हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि वाले भौतिकवादी नहीं समझ सकते |
-------यदि आर्य बर्बर होते तो आज भारत में नाग, असुर आदि जातियों का नामो-निशाँ नहीं होता | नैतिकता भारतीय मिट्टी की ख़ास बात है अतः समन्वय के उपरांत सुर असुर आर्य अनार्य सभी नैतिकता को मानते थे और त्रिदेवों को पूज्य |
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कथन १६-
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मूलनिवासी असुरों और आदिवासियों की समाज रचना बहुत हद तक मातृसत्तात्मक थी और उनके विश्वास प्रकृति पूजकों के विश्वास थे। वे इश्वर जैसी किसी सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्ति में भरोसा करते थे और वे स्त्री की उर्वरता और प्रकृति या भूमि की उर्वरता में एक सीधा संबंध देखते थे।
------इसीलिये उनके अधिकाँश त्यौहार स्त्री केन्द्रित थे और परिवार व्यवस्था में स्त्री को पुरुषों से अधिक अधिकार प्राप्त थे (Chattopadhyaya,1992)। आज भी अधिकाँश जनजातीय समाजों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था के अवशेष देखे जा सकते हैं। मध्य प्रदेश के बलाघाट, छिंदवाडा, बेतुल, मालवा निमाड़ सहित अन्य अनेक जिलों में गोंड, कोरकू, भील, बैगा जैसे आदिवासियों में विवाह और परिवार की व्यवस्था में स्त्रियों को अधिक अधिकार प्राप्त हैं।
--------देश के अन्य राज्यों में भी जनजातीय समाजों में वधुमूल्य की प्रथा है, जबकि आर्य अर्थात ब्राह्मण धर्म को मानने वाले समाजों में इसके विपरीत दहेज़ की प्रथा है।
समाधान १६-
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केवल असुर यहाँ के मूल निवासी कैसे हुए जबकि देवता व दैत्य भाई भाई थे, अतः सिद्ध होता है कि तथाकथित आर्य भी मूल रूप से भारत के ही निवासी थे, बाहरी आक्रमणकारी नहीं |
--------- विश्व भर में सभी प्रारम्भिक प्राचीन समाजों में रचना मातृसत्तात्मक व प्रकृति पूजक थी, आज भी भारत में यह प्रथा अवशेष रूप में है जिसका अर्थ है कि व्यवहार में वे क्षेत्र विकास में पिछड़ते रहे |
------ प्रकृति पूजा तो वेदों में भी वर्णित है और आज भी भारत भर में प्रत्येक जाती, धर्म व वर्ण में मौजूद है | यही तो भारतीय समन्वित समाज की व्यवस्था की परिचायक है |
-------सारे भारत में सभी त्यौहार आज भी स्त्री केन्द्रित ही हैं लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली, होलिका आदि स्त्रियाँ ही सभी त्यौहारों की अधिष्ठात्री हैं और स्त्रियाँ ही मनाने वाली प्रमुख कर्त्री |
--------बधू मूल्य एक गर्हित प्रथा है और यह प्रथा आर्यों में भी विशिष्ट परिस्थितयों में प्रचलित थी—यथा माधवी की कथा, जिसमें उसे एक विशिष्ट कार्य संधान हेतु विक्रय किया गया था जिसे कभी सराहा नहीं गया | विकास के साथ यह प्रथा समाप्त होगई |
-------दहेज़ की कुप्रथा मुस्लिम काल में आई जो समस्त भारत में फ़ैली जिसे अब मिटा दिया गया है |
------- लेखक को धर्म, समाज आदि का पूर्ण ज्ञान नहीं है आर्य केवल ब्राह्मण नहीं अपितु मूलतः छत्रिय होते थे---आर्य एक समाज था जिसमें सभी वर्ग के (चारों वर्ण ) मनुष्य थे | ब्राह्मण भी कोइ धर्म नहीं है अपितु हिन्दू धर्म का एक वर्ग/वर्ण है |
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कथन-१७.-
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आदिवासी समाजों में तलाक और पुनर्विवाह के बहुत सरल नियम हैं जिनमे स्त्रियों और पुरुषों दोनों को सुविधा प्राप्त है, और महिलाओं को बहुत अलग तरह से अधिकार देती हैं। आर्यों की भांति इनके समाजों में विवाह एक जन्म-जन्म का दुर्निवार बंधन नहीं माना जाता जिसे कि तोड़ा ही नहीं जा सकता हो।
------ बस्तर के आदिवासियों में घोटुल नामक संस्था के उल्लेख भी पाए जाते हैं। यह व्यवस्था असल में स्त्री पुरुष दोनों को जीवन साथी चुनने के समान अधिकार देती है। घोटुल नामक व्यवस्था कई समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय अर्थों में बस्तर के मुरियाओं, गोंडों, बैगाओं और उत्तर पूर्व के नागाओं सहित बिहार के मुंडाओं को आपस में जोडती है (Von Fürer et all, 1982)।
----- प्राचीन जनजातीय समाजों में बहुपति व्यवस्था भी पाई जाती थी जिसमे पुनः स्त्री को केन्द्रीय स्थान प्राप्त था। इस प्रकार विस्तार में देखा जाए तो मातृसत्तात्मक परिवार, वधुमूल्य, घोटुल, विवाह, पुनर्विवाह और तलाक में स्त्री अधिकारों का होना और सबसे प्रमुख स्त्री की उर्वरा शक्ति को प्रकृति की उर्वरा शक्ति से जोड़कर देखना एक बहुत प्राचीन भारतीय भौतिकवादी दर्शन की तरफ इशारा करता है।
------ इसे लोकायत दर्शन कहा गया है और इसकी परिभाषा “लोकेषु आयतः” के रूप में की गयी है, अर्थात इस लोक का दर्शन जिंसमे प्रकृति और उसकी शक्तियों को सर्वोपरि माना जाता है |
------ शंकराचार्य ने भी लोकायत को “प्राकृत जनाः” का दर्शन माना है और इसे हीन दर्शन या भौतिकवादियों का दर्शन बताया है |(Chattopadhyaya,1992) ।
-------इस दर्शन में कृषि से जुड़े कर्मकांडों में स्त्री की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी गयी थी। इसीलिये प्राचीन जनजातियों में ग्राम देवियों सहित वन देवियों की मान्यता बहुत अधिक पायी जाती हैं।
समाधान-१७-
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पुराकाल में समस्त भारत में, आर्यों के समय भी, स्त्रियाँ स्वतंत्र थीं चाहे जिस पुरुष को वरने हेतु एवं चाहे जब तक किसी के साथ रहने हेतु|
-------इन प्रथाओं के शारीरिक व सामाजिक दुष्परिणाम देखकर महर्षि उद्दालक के शिष्य श्वेतकेतु के समय विवाह संस्था अस्तित्व में आई, एवं विवाह जन्म जन्म के बंधन के रूप में प्रचलित हुआ |
-------मानव इतिहास में सर्वप्रथम प्रेम, प्रेमविवाह व विवाह भगवान् शिव का ही उद्धृरित है जो दक्षिण भारतीय देवता थे, समस्त देव, दानव, असुर, नाग मानव आदि के मान्य देवता महादेव एवं समस्त भारतीय मानव समन्वय के सबसे बड़े नेतृत्व थे |
-------बहुपति व्यवस्था भी मातृसत्तात्मक समाज के दोषों के कारण समय के साथ समाप्त होगई | घोटुल व्यवस्था भी आदि वनवासी समाज की व्यवस्था है जो विकास में पिछड़े रह गए |
------यह सब वनसभ्यता के समय की बातें हैं जब केवल खाना पीना सोना ही उद्देश्य था मानव का, एवं संसार की सभी सभ्यता-संस्कृतियों में यही सब बातें थीं, मानव विकास के साथ इस दर्शन को अधूरा मानकर समाप्त अमान्य कर दिया गया |
---------- आज भी पथवारी देवी, गोवर्धन पूजा, वट सावित्री, पीपल वृक्ष पूजा आदि विभिन्न नामों से संस्कृति के ये सभी चिन्ह सम्पूर्ण देश की सभी संस्कृतियों, जातियों में पाए जाते हैं, केवल आदिवासी जगत में ही नहीं | -------अर्थात लोकायत भौतिकवादी दर्शन जीवन के समन्वयवादी वैदिक-आध्यात्मिक-भौतिकवाद दर्शन में आत्मसात होगया |
------- यही विशेषता है हिन्दू वैदिक धर्म की –जिससे धर्म की जड़ सदा हरी रहती है

---क्रमश --पोस्ट पांच -----

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

दोहे श्याम के----डा श्याम गुप्त

दोहे श्याम के----

ईश्वर अल्ला कब मिले , हमें झगड़ते यार ,
फिर मानव क्यों व्यर्थ ही करता है तकरार |

काली करी कमाई, अरबों लिए कमाय,
क्यों घबराये चित्त में, मंदिर दे बनवाय |

चाहे पद पूजन करो,या साष्टांग प्रणाम,
काम तभी बन पायगा, चढ़े चढ़ावा दाम |

नाग मोर मृग सिंह मिले, पद कुर्सी की नीति ,
श्याम' सभा भई तपोवन, बनी दुश्मनी प्रीति |

अपनी लाज लुटा रही, द्रुपुद सुता बाज़ार,
इन चीरों का क्या करूं, कृष्ण खड़े लाचार |

दानवता से लड़ रहे सज्जन अजहुं तमाम,
श्याम आज भी चल रहा देवासुर संग्राम |

श्याम गर्व मत कीजिये, कहते सकल प्रवीन,
दान भोग और नाश हैं, धन की गतियाँ तीन |

काव्य जो अपना हो लिखा, माला निज गुँथ पाय |
चन्दन जो खुद ही घिसा, ये अति शोभा पायं |

अपने अपने धर्म रत, कर्म करे जो नित्य,
वही नागरिक धन्य है, मिले परम पद मुक्ति |

सत्य जानकर क्यों भला ज्ञानी चुप रह जाय,
सत्य मौन से श्रेष्ठ है, कहदें भुजा उठाय | .

बुधवार, 14 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट तीन- ---डा श्याम गुप्त ---

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- डा श्याम गुप्त ---
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----- एक धारावाहिक क्रमिक आलेख--पोस्ट तीन ------
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आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है |
-------- जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
--------- भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं
---------यहाँ विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ***** ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में *****प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा ----
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आगे ---पोस्ट तीन --- कथन/समाधान ११ से १४ तक--
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कथन ११---
==इस विषय में आचार्य रजनीश नामक एक विवादास्पद भारतीय धर्मगुरु ने कहा है कि---भारतीय कालगणना रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय है इसलिए समय भी अनंत है और जीवन सहित समाज मे घटित होने वाली घटनाएँ भी अनंत हैं इसीलिये इनका लेखन व्यर्थ है।
--------उनके अनुसार मिथक असल में इतिहास का नहीं बल्कि समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में महत्वपूर्ण शिक्षाओं और प्रवृत्तियों का संकलन है। --- उनका यह कहना बहुत सूचक है।
---------भारत का हर परलोकवादी धर्मगुरु इसी भाषा में बात करता है। यह वक्तव्य देते हुए वे बिलकुल परम्परागत धर्मगुरुओं की तरह बात कर रहे हैं और असल में इस एक वक्तव्य से समाज में बदलाव की संभावना का सूत्र बन सकने वाले इतिहास बोध की ह्त्या भी कर रहे हैं। यही काम उनकी श्रेणी के हर धर्मगुरु ने बार बार किया है।
-----------इसीलिये रजनीश जैसे इतने बड़े दार्शनिक और रहस्यवादी इस समाज में पैदा होते रहने के बावजूद इस देश के मौलिक विभाजक और भेद भाव मूलक चरित्र में कभी बुनियादी बदलाव या क्रान्ति नहीं हुई।– बल्कि इसके विपरीत रहस्यवाद और परलोक की प्रशंसा में छुपाकर समाज की जमीनी मांगों को छुपाया गया है।
----------इस प्रकार न सिर्फ इतिहास बोध से वृहत्तर न्यायबोध की ह्त्या होती है बल्कि इसी के सहारे सभी क्रांतियों की संभावना भी नष्ट हो जाती है।
समाधान११---
==और यही तो आवश्यक तत्व है किसी धर्म, समाज या देश, संस्कृति के इतिहास, उसकी सत्यता एवं इतिहास बोध का, बुनियादी बदलाव व क्रांतियाँ ----अवैज्ञानिक, अनुभवहीन, संवेदना-सत्यता हीन अस्थिर. कच्ची नींव वाले समाज व देशों में हुआ करती हैं, स्थिर व सुसंस्कृत समाज-राष्ट्रों में नहीं | इसीलिये तो इस समाज-देश में इतने बड़े दार्शनिक धर्म गुरु पैदा होते रहे हैं जो अन्य देशों-समाज में न के बराबर हैं|
-------यहाँ भारत में समाज की जमीनी मांगें सदैव ही राज्य द्वारा पूरी होती रहीं, पौराणिक व आधुनिक इतिहास गवाह है कि जन जन संतुष्टि की भावना सहित न्यायपूर्ण खुशहाली जीवन जीते थे अतः किसी न्यायबोध व क्रान्ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ी |
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कथन १२-
==सामान्य रहस्यवादी परम्पराओं या हवा हवाई बातें करने वाले धर्मगुरु और धर्म भीरुओं की तरफ से आने वाली ऐसी प्रशंसाओं के प्रभाव में हम अगर मिथक को देखेंगे तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा।
-----ब्राह्मणी धर्म से प्रभावित विद्वान् और उनके विमर्श की दिशा को सम्मान देने वाले लोगों की मानकर चलेंगे तो हम मिथक और इतिहास के इस द्वंद्व में से कोई भी सार्थक बात नहीं निकाल सकेंगे।
------लेकिन अगर हम आर्य आक्रमण थ्योरी और जन्मना वर्ण व्यवस्था सहित जन्मना जाति व्यवस्था को स्वीकार करते हैं, तभी हम इस रहस्य को सुलझा सकते हैं अन्यथा हम इसे नहीं सुलझा सकते। --
समाधान १२-
== स्वदेशी विद्वानों व तथ्यों की अपेक्षा विदेशी तथ्यों पर आधारित बातों को मानने पर क्या हमें राष्ट्र-संस्कृति द्रोह की गंध नहीं आती |
--------आज आर्य आक्रमण थ्योरी मान्य नहीं रही है अपितु आर्यों का मूल देश भारत थ्योरी मान्य होचली है | आपके द्वारा ही विवादास्पद व महान कहे जाने वाले धर्म गुरुओं की बाते हवा हवाई क्यों होंगीं और नए नए ज्ञान प्राप्त विदेशियों की बात सत्य क्यों होगी , क्या यह मानसिक दिवालियापन नहीं है |
------ वर्ण व्यवस्था भी जन्मना कहाँ है इस समाज में आप केवल कुछ सौ वर्षों की बात क्यों करते हैं जब विदेशियों के षडयंत्रों से आप सब प्रभावित थे व हैं|
-------मूल भारतीय धर्म में जातिप्रथा जन्मना कहाँ है ‘ चातुर्वर्ण्य मया सृष्टा गुणकर्म विभागश;...को आप नहीं समझ पाते हैं क्या |
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कथन १३-
==डॉ. अंबेडकर (1970)की रिसर्च भी जिस तरफ इशारा करती है वह यही बतलाती है कि इस देश की मूल परम्परा और मूल शासकों को धीरे धीरे शिक्षा और व्यापार से वंचित करके समाज के सबसे निचले स्तर पर धकेला गया है।
------सामान्य सा तर्क है कि अगर इतिहास में एक संस्कृति और एक ही दर्शन का सातत्य है तो फिर इतिहास लिखना न केवल आसान होगा बल्कि जरुरी भी होगा। -
------लेकिन अगर ये इतिहास किसी एक संस्कृति का नहीं बल्कि आप में लड़ रही अनेकों संस्कृतियों का बिखरा इतिहास है तो इस इतिहास का लेखन बहुत सेलेक्टिव ढंग से होगा। अगर इमानदारी से और सैनिक बल से विजय प्राप्त करके पराजित संस्कृति को नष्ट किया गया है तो उस विजय को अपनी गाथाओं में ज़िंदा रखा जाएगा।
------ लेकिन अगर प्रतियोगी या मूलनिवासी संस्कृति को छल से और कपटपूर्वक मनोवैज्ञानिक उपायों से नष्ट किया गया है तो उसका इमानदार इतिहास लिखना बहुत मुश्किल होगा। ये इतिहास लेखन असल में विजेताओं ही को दुष्ट और धूर्त साबित करेगा।
-------इसलिए ऐसे विजेताओं ने भारत में कभी इतिहास लिखा ही नही और जो मूलनिवासी जनों का इतिहास किसी अर्थ में उपलब्ध था उसे भी मिथकीय आख्यानों की बाढ़ में बहाकर गायब कर दिया।
समाधान १३---
== भारतीय संस्कृति एक उत्तरोत्तर विकासमान संस्कृति है कोई एक ही दर्शन (या पुस्तक या मनुष्य, देवदूत आदि ) से सातत्य कठपुतली संस्कृति नहीं है |
-----यह विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय से उत्तरोत्तर प्रगतिमान संस्कृति है, जिसमें युद्ध भी हुए हैं एवं शांतिपूर्ण समायोजन भी | पुरा ( = या पराजित ) संस्कृति की अपेक्षा नवीन ( =या विजेता ) संस्कृति यदि अधिक वैज्ञानिक, नवोन्मेष युत, विक्सित होगी तो संस्कृतियों का अवश्य ही विलय ( ------समायोजन –दोनों संस्कृतियों की अच्छी बातें का विलय ) होगा एवं तलवार के बल या छल-बल के आवश्यकता नहीं होगी |
------यदि दोनों संस्कृतियाँ विक्सित होती हैं तो अवश्य ही समन्वय होगा जैसा भारतीय विभिन्न संस्कृतियों में हुआ |
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लिखा हुआ इतिहास कभी सत्य नहीं होता अपितु सामयिक शासन, सत्ता के हाथों की कठपुतली होता है | गाथाएँ सामान्य जन जन द्वारा रचित व घटना आधारित इतिहास होती हैं, क्योंकि सामान्य जन राजनीति में भाग नहीं लेते अतः वे ईमानदार होती हैं और भविष्य को प्रेरित करती हैं।
----- इसीलिये भारतीय पौराणिक इतिहास-गाथाओं में इंद्र, राम, कृष्ण आदि की विजय गाथाएँ समस्त विश्व व भारत के कोने कोने में सदैव ज़िंदा हैं और भविष्य की प्रेरणाएं हैं | क्योंकि वहां समन्वय था छल की कोई संभावना ही नही थी |
-------तभी तो आज भी भारत के कोने कोने में विभिन्नता होते हुए भी व्यवहारिक सभ्यता व संस्कृति एक ही है, एक ही रीति रिवाज़, त्यौहार, धर्म-कर्म, एक ही ईश्वर, देवी-देवता, रहन सहन के तरीके |
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कथन -१४-
==भारत में जिन आततायी लोगों और संस्कृति ने मूलनिवासी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया है वह उन्होंने मनोवैज्ञानिक और धार्मिक षड्यंत्रों द्वारा नष्ट किया है (Keer, Malase and Phadake (eds.), 2006) | और अपने मिथकों में इस बात के संकेत जरुर छोड़े हैं कि वे कितने अन्यायी, धूर्त और कपटी थे।
---- मूलनिवासी शूरवीरों के खिलाफ अपनी सुन्दर कन्याओं और स्त्रियों का कपटपूर्वक इस्तेमाल किया । इस तरह उन्होंने न केवल मूलनिवासियों के प्रति घृणित व कायरतापूर्ण षड्यंत्र रचे हैं बल्कि अपनी स्त्रियों सहित अन्य स्त्रियों की उनकी दृष्टि में क्या उपयोगिता रही है इसे भी बार-बार स्पष्ट किया है।
------विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करके देवों और असुरों की साझी मेहनत से उपजे अमृत को किस तरह असुरों से छीनकर देवों को पिला दिया गया था यह आर्यों के मिथक साहित्य में बहुत सामान्य बात है (Williams, 2003) ।
----- इसी तरह इंद्र हर बार किसी तेजस्वी तपस्वी से भयभीत होकर उसके तप को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है। इंद्र पहले अन्य सब तरह के उपाय करके थक जाने पर अप्सराओं या स्त्रियों को इस्तेमाल करता है। इस तरह देखें तो स्त्रियाँ ही इंद्र का या आर्यों का ब्रह्मास्त्र रही हैं। देवताओं के राजा इंद्र द्वारा अहिल्या के छलपूर्वक शीलभंग की भी कथा है|
समाधान १४------
==यही तो पुराणों द्वारा भारतीय इतिहास को सत्यता से लिखे जाने का तथ्य उजागर करता है कि भारतीयों ने अपने किसी भी नेता, देवता या विशिष्ट व्यक्ति की नैतिक कमियों को कभी नहीं छुपाया, उसके सत्परिणाम या दुष्परिणामों को भी स्पष्ट किया ताकि आगे वाली पीढियां सबक लें व सामाजिक परिवर्धन, विकास व गतिशीलता का सातत्य बना रहे | इंद्र को दंड मिला, सभी जानते हैं इसी न्याय के लिए जानी जाती है यह संस्कृति |
------ झूठ प्रस्तोता ये विदेशी ज्ञान रत, अज्ञानी लोग यह भूल जाते हैं कि ये सभी देवता थे आर्य नहीं थे , स्वर्ग आदि में आर्य नहीं अपितु देवता रहते थे जो आर्य, अनार्य असुर सभी के देवता थे,
------इंद्र आर्यों का राजा नहीं अपितु देवराज था तथा देवता व असुर भाई भाई थे तो फिर केवल असुर मूल निवासी कैसे हुए और
----- यह इतिहास आज के भारत या आर्यावर्त या हिन्दुस्थान व हिन्दू का नहीं है अपितु उस समय का है जब यह वृहद् भारत या जम्बू द्वीप था, जिसमें पूर्वी गोलार्ध समस्त पुरानी दुनिया के समस्त क्षेत्र / देश/ प्रदेश हिमालय, हिमालय पार यूरेशिया के देश सम्मिलित थे |
------ शठे शाठ्यं समाचरेत----नीति गत तथ्य है, दुष्टता का निराकरण किसी भी प्रकार करना चाहिए खासकर यदि दुष्ट शत्रु आतातायी व बलशाली हो, शत्रु को बलशाली न बनने देना महत्वपूर्ण नीति है|
-------सती, पार्वती , सरमा, सीता, द्रोपदी आदि की वीरता, परामर्श व युद्द्ध कौशल आदि के आख्यान ये दर्शाते हैं की उस काल में स्त्रियाँ बल व बुद्धि में पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती थीं | स्त्री-पुरुष में कोइ अंतर नहीं था |
--------------क्रमश: पोस्ट चार----आगे---
चित्र -महिसासुर मर्दिनी----
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