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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण --- ----अंतिम -क़िस्त--- राधा ....डा श्याम गुप्त...


                             



ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण --- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----अंतिम -क़िस्त--- राधा .....
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३.राधा
                        एक प्रतिभावान, संपन्न व प्रियदर्शी पुरुष जिसके लिए विश्व की किसी भी महिला को वशीभूत कर लेना असंभव न हो, उसके लिए जो उसके सम्मुख प्रतिद्वंद्विता प्रस्तुत करे, मान करे, वह उसके लिए अधिक आकर्षक होगी अपेक्षाकृत जो सरलता से प्राप्य हो |
-------यद्यपि राधा का मान केवल प्राप्ति की इच्छा के लिए एक खेल नहीं है अपितु साथ में एक वात्सल्य भाव भी है क्योंकि वह जानती है कि कृष्ण के लिए क्या सबसे अच्छा है| वह कृष्ण के प्रति कोई भी अनपेक्षित अनावश्यक अन्यथा कृतित्व स्वीकार नहीं करती जो उनके लिए उत्तम नहीं है और जिससे श्रीकृष्ण को प्रसन्नता नहीं होगी |
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वृषभानु अपने साथी पडौसी राजा नंदराय व उनकी पत्नी यशोदा से मिलने होली के अवसर पर गोकुल गए वहीं पर कृष्ण व राधा की प्रथम मुलाक़ात हुई |
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------ जयदेव के अनुसार, जब श्री कृष्ण अन्य गोपियों को छोड़कर राधा के पीछे भागते हैं तो इसलिए कि राधा उस डोरी को थामे हुए रहती है जो उन्हें संसार / इच्छाओं के बंधन में बांधे रखती है |
-------- राधा कृष्ण से कहती है कि वे अपने आप को ईश्वर समझना छोड़ दें और स्वीकार करें कि उन्हें राधा की आवश्यकता है और वे उसके बिना नहीं रह सकते | यदि वे अपनी आत्मा की गहराई तक प्रेम में डूबना चाहते हैं तो उन्हें समर्पण करना ही चाहिए | भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आराधित होने के कारण उनका नाम 'राधिका'पडा |
------- चन्द्रावली स्वयं को समर्पित तो कर सकती है परन्तु उसमें उस सम्पूर्ण समर्पण भावतत्व की कमी है जो स्वयं पर आत्म-विश्वास से उत्पन्न होता है जिससे वह श्रीकृष्ण को भी स्वयं के सम्मुख झुका सके |
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                        कृष्ण जी के हाथों बछडा बन कर आये हुए असुर का वध होने की वजह से कान्हा पर गौहत्या का पाप लग गया, उसके प्रायश्चित के लिए राधा ने श्रीकृष्ण को मजबूर किया कि हम जब तक नहीं मिल सकते जब तक आप प्रायश्चित नहीं करोगे | इस पाप के प्रायश्चित के तौर पर श्रीकृष्ण ने अपनी बांसूरी से कुंड बनवाया और तीर्थ स्थानों के जल को वहां एकत्रित किया। \
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एक बार श्रीकृष्ण ने चन्द्रावली सखी से कहा कि आज अपने सम्पूर्ण श्रृंगार से मुझे सजा दो | चन्द्रावली सखी ने उनको सखी के रूप में सजा दिया| श्री कृष्ण सखी का रूप धारण करके राधाजी के पास पहुंचे|
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                                       वस्तुतः अन्य सभी सखियाँ तो विवाहिता थीं अतः एक सीमा थी, बंधन था | राधा ही अविवाहित थी, बंधनमुक्त, स्वतंत्र, महाराज वृषभानु की पुत्री, एक राजकुमारी, सर्वगुण संपन्न |
-------बृन्दावन-अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रज में, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ।
------- राधा अपनी माता के देहांत के बाद ननिहाल में रही, उसके पिता अपनी दूसरी पत्नी के साथ वृन्दावन आगये | राधा युवावस्था में आई और स्वच्छंदता से घूमती थी| संयोग से कृष्ण भी वृन्दावन आगये | अतः यह संयोग ही था कि राधा युवावस्था में वृन्दावन आई और सब पर छागई, वह इस तरह कृष्ण की ओर खिची कि कृष्ण का मन भी मोहित होगया|
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ब्रह्म संहिता के अनुसार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति हैं| राधा को कहीं कहीं कृष्ण की पत्नी भी बताया गया है | ब्रह्मा ने बाल्यावस्था में ही भांडीर वन में दोनों का विवाह करा दिया था |
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                               एक कथा के अनुसार विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा। राधा, जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठलोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई।
------ जब राधाजी से कृष्णजी ने पूछा कि लोक-साहित्य में तुम्हारी क्या भूमिका होगी। तो राधाजी ने कहा मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए मैं तो आपके पीछे हूं। इसलिए कहा गया कि कृष्ण देह हैं तो राधा आत्मा हैं।
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भागवत महापुराण के प्रारंभ में व्यासजी ने लिखा है " श्रीकृष्णाय वयं नमः " अकेले कृष्ण को नहीं, श्री कृष्ण को वंदन किया गया है ।
-------सनातन धर्म में शक्ति-विशिष्ट ब्रह्म की पूजा है । निराकार ब्रह्म की पूजा नहीं हो सकती । वह मारता भी नहीं, तारता भी नहीं । वह कृपा नहीं कर सकता है । वही ब्रह्म जब शक्ति विशिष्ट बनता है, तब कृपा कर सकता है और तभी उसकी पूजा हो सकती है । 'श्री' का अर्थ है राधाजी । जगत का आधार कृष्ण हैं और कृष्ण का आधार राधा हैं |
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------- नारद पंचरात्र में आदि शक्ति राधा का एक नाम हरा या हारा भी है जिससे महामंत्र –
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
|   -----का आविर्भाव हुआ |
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            यह भी किम्बदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली। शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं |


कन्हैया उझकि उझकि निरखे |
स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै |
जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै |
पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं |
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके |
तीन  लोक दरसन कौं तरसें,  सो दरसन तरसै |
ये तो नैना बंद किये हैं,  कान्हा  बैननि परखे |
अचरज एक भयो ताही छिन,  बरसानौ सरसे |
खोली दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे| 
दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे|
बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ||----पद डा श्याम गुप्त 


 
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------- रुक्मिणी व राधा ----- इसके साथ यह भी कथा है कि विदर्भ देश में भीष्मक की कुण्डिनपुर राजधानी थी। जब उनकी पुत्री रुक्मिणी का जन्म हुआजो लक्ष्मी का अवतार थी | शिशु अवस्था में ही पूतना उसे मारना चाहती थी अतः चील के रूप में उसे लेकर उड़ गयी, तो रुक्मिणी ने अपना भार अत्यधिक बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया, और भार न सह पाने के कारण वह उसकी पकड़ से छूट गयीं| उस समय चील बरसाना के ऊपर उडी रही थी और रुक्मिणी नीचे तालाब के किनारे कमल पर गिरीं जिसे राजा वृषभानु लेकर आये और राधा के नाम से पालन किया | श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के उपरांत रुक्मिणी के पिता भीष्मक को यह तथ्य ज्ञात हुआ तो वे राधा को अपने देश में ले आये, और रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ |
------ रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने ---मत्स्य पुराण -१३ 

------- राधा का विवाह कंस के एक सांसद रायाण से सुनिश्चित हुआ था परन्तु राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया | कृष्ण की अनुपस्थिति में उनके प्रेमभाव में और वृद्धि हुई |

कृष्ण राधा को कभी नहीं भूले ..आदि पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

त्रिलोक्ये पृथ्वी धन्या यत्र वृंदावनम पुरी ,
तत्रापि गोपिकाः पार्थ तत्र राधाभिधा मम |

--------हे अर्जुन !तीन लोक में वृन्दावन पुरी धन्य है, जहां गोपिकाएं रहती हैं और --जहां मेरी अभिन्न प्रिया राधा रहती है |
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दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर हुआ जहां द्वारिका से कृष्ण व वृन्दावन से नन्द यसोदा व राधा गए थे| रूक्मिणी जी ने राधा जी का स्वागत सत्कार किया।
-------जब रूक्मिणी जी श्रीकृष्ण के पैर दबा रही थीं तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में छाले हैं। रुक्मणी जी ने विचार किया की प्रभु तो पैदल भी नहीं चलते। फिर छाला कैसे हो गया? जब रुक्मणी जी ने इस बात पर प्रभु से बहुत अनुनय-विनय किया तब श्रीकृष्ण ने बताया कि उनके चरण-कमल राधाजी के ह्रदय में विराजते हैं। रूक्मिणी जी ने राधा जी को पीने के लिए अधिक गर्म दूध दे दिया था जिसके कारण श्रीकृष्ण के पैरों में फफोले पड गए।
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                               एक बार श्री कृष्ण रुग्ण होगये तो उन्होंने नारद से कहा की यदि कोइ उन्हें अपने चरणों की धूलि दे तो वे स्वस्थ्य होजायंगे | रुक्मिणी सहित सभी रानियों, देवों, नारद , मुनियों सभी ने श्रीकृष्ण को अपनी चरण धूलि देकर यह महापाप उठाने से मना करा दिया|
--------जब नारद ने राधा को यह बताया तो उसने तुरंत ही अपनी चरणधूलि भिजवा दी, नारद के पूछने पर कि उन्हें महापातक का भय नहीं है, राधा का कथन था की यदि श्रीकृष्ण की कुशलता हेतु उसे हज़ार जन्मों तक भी कुम्भीपाक नरक में रहना पड़े तो स्वीकार है |
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            राधा के तोते भी कृष्ण कृष्ण कहते थे  | नारद जी ने श्रीकृष्ण से कहा कि जहाँ भी मैं जाता हूँ वहीं पूरे ब्रज मै हरे कृष्ण हरे कृष्ण कि गूँज सुनाई देती है । इस पर श्रीकृष्ण बोले पर मुझे तो राधे राधे नाम प्रिय है | यह सुनकर राधाजी कि आँखों से अश्रु –धारा बहने लगी, उन्होंने अपने तोतों से हरे कृष्ण कि जगह राधे राधे कहलाना शुरू कर दिया । जब सखियों ने कहा लोग तुम्हे अभिमानी कहेंगे कि तुम अपने नाम की जय बुलवाना चाहती हो । इस पर श्री जी ने कहा कि अगर मेरे प्रियतम को यही नाम पसंद है तो मैं तो यही नाम लूंगी चाहें लोग कुछ भी कहें ।
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------तो ऐसी थी राधा |--------
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कृष्ण राधा से कहते हैं कि हे सुन्दरी राधा! मैं मथुरा चला जाऊंगा, आपके भाई श्रीदामा के श्राप के कारण हमें १०० वर्षों तक बिछुड़ना होगा किन्तु हम स्वपनों में बार बार मिलेंगे | मैं यह समय द्वारिका में बिताऊंगा |
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कृष्ण के मथुरा जाने के बाद सभी थे उदास थे | उधर कृष्ण को राधा की चिंता सताने लगी, वे सोचने लगे कि जाने से पहले एक बार राधा से मिल लें इसलिए मौका पाते ही वे छिपकर वहां से निकल गए।
-------राधा-कृष्ण के इस मिलन की कहानी अद्भुत है। दोनों ना तो कुछ बोल रहे थे, ना कुछ महसूस कर रहे थे, बस चुप थे। राधा कृष्ण को ना केवल जानती थी, वरन् मन और मस्तिष्क से समझती भी थीं। कृष्ण के मन में क्या चल रहा है, वे पहले से ही भांप लेती, इसलिए शायद दोनों को उस समय कुछ भी बोलने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी। अंतत: कृष्ण राधा को अलविदा कह वहां से लौट आए और आकर गोपियों को भी वृंदावन से उन्हें जाने की अनुमति देने के लिए मना लिया।
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अखिरकार वृंदावन कृष्ण के बिना सूना-सूना हो गया, ना कोई चहल-पहल थी और ना ही कृष्ण की लीलाओं की कोई झलक। बस सभी कृष्ण के जाने के ग़म में डूबे हुए थे।
-------परंतु दूसरी ओर राधा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था,क्योंकि उनकी दृष्टि में कृष्ण कभी उनसे अलग हुए ही नहीं थे।
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समस्त भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली। यहाँ तक की वृन्दावन में कृष्ण से अधिक राधा रानी की महत्ता है | राधाजी कृष्ण की गोलोक की अर्धांगिनी राधारानी हैं वे ईश्वरीय तत्व मी मूल आदि-शक्ति हैं |
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                           यद्यपि ललिता कहती है कि -------राधा को ज्ञात नहीं कि कृष्ण यहाँ से जाने वाले हैं, वे ललिता को बताते हैं राधा को नहीं कह पाते,
                    परन्तु ललिता नहीं जानती कि राधिका, राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति हैं, वे मातृ-शक्ति हैं, भगवान श्रीकृष्ण के साथ सदा-सर्वदा संलग्न, उपस्थित, अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति;
--------उन्हें सब ज्ञात है यह सब तो इस लीलाभूमि पर दोनों परमात्म तत्वों, लीला-युगल की लीला है जिसे सामान्य मनुष्य नहीं जान सकता |
         श्रीकृष्ण राधा की अनुमति व जानकारी में ही मथुरा गए, अन्यथा क्या यमुना पार से वे कभी एक बार वृन्दावन नहीं आ सकते थे, आना ही नहीं था | लीला युगल की लीला !
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यस्या रेणुं पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त :--(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद )
----राधा वह शख्शियत है जिसके कमलवत चरणों की रज श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक अपने माथे पे लगाते हैं।
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-आदि शक्ति,नीला देवी, अदिति - राधा ---नाप्पिंनई -----
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--------तमिल साहित्य के अनुसार ऋग्वेद की तैत्रीय संहिता में .....
----- नीला देवी सूक्त ( अदिति सूक्त ) के अनुसार --विष्णु की तीन पत्नियां श्रीदेवी, भूदेवी व नीला देवी हैं |
--------अदृश्य रूप में रहने वाली नीला देवी ही आदि-शक्ति राधा हैं जिन्हें अदिति भी कहा जाता है | नीला देवी का अवतार ही राधा हैं, जिन्हें दक्षिण में नप्पिनई पुकारा जाता है, जिसे श्रीकृष्ण ने सात बैलों को हराकर जीता था | यह एक अन्य कहानी है जो केवल तमिल साहित्य में ही वर्णित है|

 चित्र गूगल-----

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चित्र--१-राधा
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चित्र-२-कृष्ण राधा की सेवा करते हुए    
चित्र--१-राधा
चित्र-२-कृष्ण राधा की सेवा करते हुए
चित्र-३- मथुरा गमन से पहले अंतिम मुलाकात
चित्र -४-----राधा हैं या श्याम है या राधाजू के श्याम हैं या श्याम जू की राधा हैं

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

-ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण --- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----चन्द्रावली सखी----डा श्याम गुप्त

-ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----
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--- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----
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------आगे-------चन्द्रावली सखी----
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२.चन्द्रावली
करेह्ला गाँव में रहती थी | गोवर्धन मल्ल की पत्नी थी, जो चन्द्रावली के साथ कभी सखीथरा (सखी स्थल) में कभी गोवर्धन निकट रहते थे |
------- चन्द्रावली वृषभानु महाराज के भाई चंद्रभानु गोप महाराज की लाड़ली पुत्री थी, जो रीठौरा गाँव के राजा थे | अतः वह राधा की चचेरी बड़ी बहन थी| ये श्रीकृष्ण की अनन्य प्रिया सखी थीं| ललिता जी का जन्म स्थान भी करेहला है| ललिता, पद्मा अदि सखियाँ यहाँ चन्द्रावली से श्रीकृष्ण का मिलन कराने हेतु प्रयत्न करती थीं |
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राधा के वृन्दावन आने से पहले चन्द्रावली श्रीकृष्ण की युवावस्था की प्रेमिका व सखी थी, तत्पश्चात खंडिका नायिका |
------भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक चन्द्रावली में ललिता व चन्द्रावली के संवाद इस प्रकार हैं—
नारद- चन्द्रावली के प्रेम की चर्चा आजकल ब्रज की डगर डगर फ़ैली हुई है| उधर श्रीमती ( राधा जी ) जी का भी भय है तथापि श्रीकृष्ण से जल में दूध की भाँति मिल रही हैं किसी न किसी उपाय से श्रीकृष्ण से मिल ही रहती हैं।
ललिता- ब्रज में रहकर इससे वही बची होगी जो ईंट-पत्थर की होगी|
चन्द्रावली—किससे ..
ललिता- जिसके पीछे तेरी यह दशा है |
चन्द्रावली- किसके पीछे मेरी यह दशा है |
ललिता- सखी, तू फिर वही बात कहे जाती है मेरी रानी, ये आँखें ऐसी बुरी हैं की जब किसी से लगती हैं तो कितना भी छिपाओ नहीं छिपती, मेरी तो यह विपद भोगी हुई है |
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वृन्दावन के श्री रूप गोस्वामी महाराज की कृति राधा-माधव के अनुसार गोपियों में जो श्रीकृष्ण को प्रिय हैं, राधा और चन्द्रावली सर्वश्रेष्ठ हैं| दोनों में राधा जी श्रेष्ठ हैं वे माधव की कायारूपा हैं एवं सभी गुणों में सर्वश्रेष्ठ हैं|
------- रूप गोस्वामी जी के कुछ अन्य कृतियों, गोपाल विजय, के अनुसार ही चन्द्रावली राधा का ही अन्य नाम है | वस्तुतः सभी गोपियाँ राधा के ही विभिन्न भाव-नाम हैं| वे सभी राधा में ही निहित हैं|
------राधा मूल स्वरुप-शक्ति,महाभाव –वामा-हैं तो चन्द्रावली– दक्षिण अर्थात उनकी पूर्तिरूप भाव हैं|
------- यद्यपि चन्द्रावली सदैव ही राधा से कृष्ण प्रेम की प्रतियोगिता में क्रमश पीछे ही रह जाने वाली थी परन्तु फिर भी वह संतुष्ट थी |
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वृंदा कहती है कि चन्द्रावली व श्री कृष्ण के प्रेम महिमा कौन जान पाया है कि, जिनका प्रेम कभी कम नहीं होता, यद्यपि राधा के सौन्दर्य व गुणों में दिन प्रतिदिन वृद्धि के साथ कृष्ण में भी वृद्धि होते जाने पर चन्द्रावली के महत्त्व में कमी होने की संभावना है |
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श्रीकृष्ण के चले जाने पर गोवर्धन में एक ताल में राधा अपनी प्रतिच्छाया देख कर उसे चन्द्रावली समझती है, और कहने लगती है, अरे चन्द्रावली ! मैं तुझे देखकर कितनी भाग्यवान हूँ, आज भाग्यशाली दिवस है| श्रीकृष्ण ने कितनी बार तुम्हें अपनी भुजाओं में कस कर जकड़ा होगा, जल्दी आओ और अपनी भुजायें मेरे गले में डालकर मेरी प्यासी आत्मा को जल प्रदान करो क्योंकि उनमें अभी भी श्रीकृष्ण के कर्णफूलों की प्रिय सुगंध बसी हुई है |

---क्रमश ---राधा---अगली पोस्ट में....
चित्र---चन्द्रावली ...

सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—विश्व भर में पूज्य -देवाधिदेव शिव--डा श्याम गुप्त


                                 



        सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—विश्व भर में 
पूज्य -देवाधिदेव शिव 

        प्राणी व मानव कुल एवं मानवता के मूल समन्वयक त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने समस्त प्राणी जगत ( देव, दनुज, मानव, गंधर्व आदि सभी का आपस में सामाजिक संयोजन करके एक विश्व-मानवकुल की नींव रखी | शिव, जो वस्तुतः निरपेक्ष, सबको साथ लेकर चलने वाले महान समन्वयवादी थे, ने ब्रह्मा, विष्णु के सहयोग से इंद्र आदि देव एवं अन्य असुर आदि सभी कुलों को आपस में समन्वित किया और एक महान मानव समूह को जन्म दिया जो वैदिक-सभ्यता हुई एवं तत्पश्चात देव –असुर सभ्यता कहलाई तथा महाजलप्रलय के पश्चात पुनः उद्भव पर ‘आर्य-सभ्यता |

          यह उस समय की बात है जब भारतीय भूखंड एक द्वीप के रूप में अफ्रीका ( गोंडवाना लेंड) से टूट कर उत्तर में एशिया की ओर बढ़ रहा था | मूल गोंडवानालेंड में विक्सित जीव व आदि-मानव पृथक हुए भारतीय भूखंड के नर्मदा नदी क्षेत्र गोंडवाना प्रदेश में डेनीसोवंस( अर्धविकसित) एवं नियंडर्थल्स (अविकसित) मानव में विक्सित हो रहे थे एवं सभ्यता व संकृति का विकास होरहा था| ये मानव यहाँ विक्सित हुए एवं समूहों व दलों में भारत में उत्तर की ओर बढ़ते हुए, भारतीय प्रायद्वीप के एशियन छोर से मिल जाने पर बने मार्ग से उत्तर भारत होते हुए सुदूर उत्तर-मध्य एशिया क्षेत्र -सुमेरु क्षेत्र व मानसरोवर-कैलाश क्षेत्र पहुंचे एवं पश्चिमी एशिया-योरोप से आये अन्य अविकसित/ अर्धबिकसित मानवों से मिलकर विक्सित मानव, होमो सेपियंस में विक्सित हुए| इसीलिये सुमेरु क्षेत्र को भारतीय पौराणिक साहित्य में ब्रह्म-लोक कहा जाता है, जहां ब्रह्मा ने मानव की व सृष्टि की रचना की| सुमेरु के आस-पास के क्षेत्र ही देवलोक, इन्द्रलोक, विष्णु लोक, स्वर्ग आदि कहलाये जहाँ विभिन्न उन्नत प्राणियों मानवों ने सर्वप्रथम बसेरा किया | 

     शेष अफ्रीकी भूखंड से उत्तर-पश्चिम की ओर चलते हुए आदिमानव अन्य समूहों में योरोप-एशिया पहुंचता रहा, नियंडरथल्स में विक्सित होता रहा परन्तु उत्तर-पश्चिम की अनिश्चित शीतल जलवायु व मौसम से बार बार विनष्ट होता रहा, बचे-खुचे मानव पूर्व-मध्य एशिया के सुमेरु–कैलाश क्षेत्र में उपस्थित विक्सित मानवों से मिल गए|

       जनसंख्या बढ़ने पर, ब्रह्मा द्वारा मानव के पृथ्वी पर निवास की आज्ञा से, मानव सर्वत्र चहुँ ओर फ़ैलने लगे | पूर्वोत्तर की ओर चलकर बेयरिंग स्ट्रेट पार करके ये पैलिओ-इंडियन अमेरिका पहुंचे व सर्वत्र फ़ैल गए| पूर्व की ओर चाइना, जापान, पूर्वी द्वीप समूह आस्ट्रेलिया तक| दक्षिण में समस्त भारतीय भूमि पर फैलते हुए ये मानव सरस्वती घाटी ( मानसरोवर से पंजाब तक) में; जहां दक्षिणी भारत की नर्मदा घाटी में पूर्व में रह गए मानव समूह  उन्नति करते हुए पहुंचे मानवों (जिन्होंने हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास किया|) से इनकी भेंट हुई और दोनों सभ्यताओं ने मिलकर अति-उन्नत सरस्वती घाटी सभ्यता की नींव रखी| 

       यह वह समय था जब सुर-असुर द्वंद्व हुआ करते थे | शिव जो एक निरपेक्ष देव थे सुर, असुर, मानव व अन्य सभी प्राणियों, वनस्पतियों आदि के लिए समान द्रष्टिभाव रखते थे, सभी की सहायता करते थे | उन्हें पशुपतिनाथ व भोलेनाथ भी कहा जाने लगा |

१.शिव ने ही समुद्र मंथन से निकला कालकूट विषपान करके समस्त सृष्टि को बचाया| 
२.शिव ने ही देवताओं को अमृत प्राप्ति पर दोनों ओर बल-संतुलन हेतु असुरों को संजीवनी विद्या प्रदान की | 
३. शिव ने ही मानसरोवर से सरस्वती किनारे आये हुए इंद्र-विष्णु पूजक मानवों एवं दक्षिण से हरप्पा आदि में विक्सित स्वयं संभु सेक शिव के समर्थकों मानवों के दोनों समूहों, के मध्य मानव इतिहास का प्रथम समन्वय कराया, जिसके हेतु वे स्वयं दक्षिण छोड़कर कैलाश पर बस गए पहले दक्ष पुत्री सती से प्रेम विवाह पुनः हिमवान की पुत्री उत्तर-भारतीय पार्वती से विवाह किया तथा अनेकों असुरों का भी संहार किया, और महादेव, देवाधिदेव कहलाये | 

        हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास करने वाले भारतीय मानव ( गोंडवाना प्रदेश के मूल मानव ) जो अपने देवता शम्भू-सेक के पूजक थे अपनी संस्कृति विकसित करते हुए उत्तर तक पहुंचे थे | हरप्पा में प्राप्त शिवलिंग, पशुपति की मोहर आदि इसके प्रमाण हैं| अर्थात शिव मूल रूप से भारत के दक्षिण क्षेत्र के देवता थे |

      यही दोनों समूह मिलकर एक अति-उन्नत सभ्यता के वाहक हुए जो सरस्वती सभ्यता, या वैदिक सभ्यता कहलायी एवं कालान्तर में यही लोग ‘आर्य’ कहलाये अर्थात सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मानव | जो विकासमान हिमालय की नीची श्रेणियों को पार करके देवलोकों व समस्त विश्व में आया जाया करते थे| जनसंख्या व अन्य विकास की विभिन्न सीढ़ियों के कारण पुनः यही मानव समस्त विश्व में फैले और समस्त यूरेशिया, जम्बू द्वीप या वृहद् भारत कहलाया | आज समस्त विश्व में यही भारतीय मानव एवं उनकी पीढियां निवास करती हैं| 
     विश्व के प्रत्येक कोने में प्राप्त शिवलिंग एवं शिव मंदिर उनके सर्वेश्वर एवं देवाधिदेव, महादेव होने के प्रमाण हैं| अर्थात यह  द्योतक है इसका कि वैदिक सभ्यता व देवता भारत से समस्त विश्व में फैले पश्चिम में चलते गए उनके नाम व स्वरुप बदलते गए |


महादेव—शिव
 ------ चीनी ड्रेगन एवं बौने मानव के साथ शिव-पार्वती  – बादामी कर्नाटक
                        
  
----अफ्रीका में ६००० वर्ष प्राचीन शिवलिंग
 
--------ओसीरिस मिस्र
 
----रोम में बेबीलोन, मेसोपोटामिया एवं समस्त योरोप में लिंग को प्रायेपस कहाजाता है, |
-----मक्का के काबा में काले ग्रेनाईट का अंडाकार पत्थर शिवलिंग ही है जो शुक्राचार्य ( उशना काव्य, काबा गुरु) द्वारा स्थापित शिव मंदिर है | इसीलिये मुस्लिम शुक्रवार को पवित्र दिन मानते हैं
मक्का स्थित शिवलिंग ---जब यह बिना ढके पूजा जाता था
|
--काला पत्थर जिसे चूमा जाता है शिव लिंग का शेष भाग ...
 
 
---टाइटन्स( जिन्हें असुर कहा जाता था ) वे महान शिव भक्त थे रावण की भाँति |
--आयरलेंड में हिल ऑफ़ तारा पर प्राचीन शिवलिंग स्थित है | ब्रोंज(कांसा) बनाने की शक्ति वाला देवता लेकर आया था जो देवी दनु के पुत्र थे | अर्थात कश्यप की पत्नी दनु( दक्ष पुत्री ) के पुत्र जो सारी आयरलेंड में राज्य करते थी एवं डेन्यूब नदी (दनु नदी )के किनारे किनारे सारे योरोप में
आयरलेंड में प्राचीन शिवलिंग
 
तारा पर्वत
 
----दनु के पुत्र दानव –समस्त योरोप में डेन्यूब नदी के किनारे किनारे बसे | डेन्यूब नदी योरोप के विभिन्न देशों में दुनाज़,दूना,दुनेव,दुनारिया,आदि नामों से जानी जाती है | यह योरोप की सबसे बड़ी नदी है वोल्गा के बाद |
--वियतनाम में प्राचीन शिवलिंग
---वेटिकन सिटी रोम में शिवलिंग –इट्रूस्कन म्यूज़ियम में | प्राचीन इटली का नाम इट्रूरिया था| इटली में भी ऐसे लिंग मिले हैं | ये  ईसापूर्व दूसरी से सातवीं सदी के हैं|
 
हरप्पा में मिले तीन शिवलिंग
 
द.अफ्रीका के सुद्वारा में ६००० हज़ार वर्ष प्राचीन कठोर ग्रेनाईट के शिवलिंग
 
नंदी की मूर्ती—इंडोनेशिया
 
रोमन देवता-नेपच्यून की शिव से समानता----हाथ में त्रिशूल शिव का मूल स्वरुप है |
उसके खड़े होने की स्थिति, माया से अप्रभावित शिव की ‘स्थित-‘से मेल खाती है |
वार्सीलोना
 
नेपच्यून का फुहारा ---न्यूरेमबर्ग जर्मनी में
 
नेपच्यून (शिव) –पोलेंड –
 
ग्रीक देवता –पोसीडोंन (शिव)
 
रोम - एमफीट्राईट- –पार्वती-शिव

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कृष्ण और -----ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----१.ललिता- डा श्याम गुप्त...




                   


            -----कृष्ण और  -----ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----

--- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----



              स्त्रियों के सहयोग के बिना कोई सामाजिक या राजनैतिक कार्य कहाँ संपन्न होपाता है –कृष्ण बचपन से ही ( साम्राज्यवाद व कंस विरोधी धुरी के भावी नायक होने के कारण ) राजनैतिक क्रियाकलापों में संलग्न थे | -------क्योंकि पुरुषों पर सदैव राज्य की गुप्तचर दृष्टि रहती है अतः उन्होंने स्त्रियों को (गोपिकाओं को) अपने दल-बल में सम्मिलित किया एवं विभिन्न सामाजिक क्रिया कलापों ( लीलाओं ) के रूप में मथुरा के विरुद्ध राजनैतिक अभियान का संचालन किया |
-------उन्हें समस्त गोपिकाओं सहित बचपन से ललिता, तत्पश्चात राजा वृषभानु के भाई चंद्रभानु महाराज की पुत्री चन्द्रावली एवं युवावस्था में वृषभानु सुता होने के कारण राधिका, ब्रजेश्वरी राधा; जो अपने पद-स्थिति, समर्पण व सामाजिक कृतित्वों से सब पर छा गयी; इन सबका अपने अपने सखि-यूथों सहित इस कार्य में पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ |
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         वास्तव  में वह काल महिलाओं की स्वतंत्रता व इच्छाओं के दीर्घकालीन शमन से उत्पन्न विरोध-स्वर के उठने का था | श्रीकृष्ण उस सामाजिक उत्थान के नेता बनाकर उभरे एवं तात्कालिक परिस्थिति का राजनैतिक लाभ भी उठाया| ये सारी लीलाएं, क्रियाकलाप उसी का अंग थे|
-------पुरुष-प्रधान समाज में कृष्ण उनके अपने हैं जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों के प्रति जवाब देह हैं, नारी उन्मुक्त ,उत्थान के देवता हैं। 
                    सूरदास ने राधा के अतिरिक्त ललिता का विशेष रूप से उल्लेख किया है और साथ ही चन्द्रावली का भी।
------- ललिता को राधा की परम प्रिय, घनिष्ठ सखियों के रूप में 'मान' और 'खण्डिता' के प्रकरणों में चित्रित किया गया है। 'खण्डिता' प्रकरणों में इन दो के अतिरिक्त सूरदास ने 'शीला', 'सुखमा', 'कामा', 'वृन्दा', 'कुमुदा' और 'प्रमदा' का भी उल्लेख किया है।
--------गोपियों में कृष्ण के प्रेम की अधिकारिणी इन्हें ही माना गया है। परन्तु इनमें से किसी का राधा से ईर्ष्याभाव नहीं था। कृष्ण के प्रेम हेतु ये विभिन्न भाव प्रतिद्वंदिता, आपसी द्वेष आदि उनके लिए सुख व आनंद के स्रोत हैं |.\

----------यहाँ हम इस प्रेम त्रिकोण के बारे में अपनी बात कहेंगे -----

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ललिता
१.ललिता ---
जब जहां कृष्ण की बात होती है राधा का नाम आता है| सच भी है, राधा-कृष्ण अटूट एकात्मकता, एक ही महाभाव की भाँति एक ही हैं |
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--------परन्तु वस्तुतः श्रीकृष्ण की बचपन की मूल सखी, प्रेमिका, सहयोगी ललिता जी हैं जो राधाजी की प्रतिच्छाया होने के साथ, लोक साहित्य में प्रभावी उपस्थिति के बावजूद जन साहित्य व जन मन से उनकी छाया में गुम होजाती हैं |
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नित्य बिहारी राधा-कृष्ण की ललिता अभिन्न सहचरी हैं। ललिता जी राधाजी की सबसे प्रधान सखी है जो कि सर्वश्रेष्ठ थी । वे राधाजी से २७ दिन बड़ी थीं| ललिता जी की आज्ञा बिना न राधिका जी के स्वपक्ष में, न रास में ही प्रवेश होसकता है| इनके प्रयत्नों से ही राधा-माधव का मिलन हुआ| जब उन्हें पता चलता है भगवान गोवर्धन पर आते है । तो वो राधा जी को वृदांवन से मिलाने के लिए वहाँ लेकर आती है । हर प्रयास करती है ।
-------- ललिता जी के अंग की कांति गौरोचन के समान शुभ्र है, वर्ण लालिमा युक्त पीतवर्ण है | वे मोर के पंख सदृश्य रंग के वस्त्र धारण करती हैं|
--------- ललिता जी का जन्म यावट गाँव मे हुआ उनका निवास स्थान “ऊचा गाँव” है उनके पिता विशोक और माता शारदा है । और भैरव नाम के गोप के साथ उनका विवाह हुआ |
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ललिता जी राधा रानी की सहचरी के अतिरिक्त इनका खंडिका नायिका के रूप में भी चित्रंण होता है मतलब सेविका के रूप मे राधा माधव के साथ आती है और कभी-कभी नायिका बनकर कृष्ण जी के साथ विहार करती है ।
------- ललिता जी एक सफल दुति के अनुरूप, मान रूप, तीक्ष बुद्वि वाली, वाकचातुर्य, आत्मीयता, नायक को रिझाने वाली व्यक्तित्व सौन्दर्य वाली है । बिलकुल राधा रानी के जैसी ही है..... ललिता जी कोई सामान्य सखी नहीं है ये राधा जी कायारूपा है |
--------इनका अन्य नाम अनुराधा भी है | ललिता जी की आठ प्रधान सखी कही गई है - रत्नप्रभा, रतिकला, सुभद्रा, चंद्र्रेखिका, भद्र्रेखिका, सुमुखी, घनिष्ठा, कल्हासी, कलाप्नी |
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जब भगवान शिव महारास में सम्मिलित होने के लिए आए तो ललिता जी ने प्रवेश देने से मना कर दिया कि यहाँ ब्रज में कृष्ण के अलावा कोइ पुरुष नहीं प्रवेश पा सकता | भगवान् शिव ने कहा तो मैं क्या करूं, कृष्ण हमारे आराध्य हैं | ललिता जी ने उन्हें गोपी का श्रृंगार कराया, चोली पहनायी, कानों में कर्णफूल व घूंघट डाला, युगल मन्त्र दिया, तब प्रवेश हुआ | अतः ललिता जी शिव की गुरु होगयीं |
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तब योग के देवता शिव ने ललिता से कहा कि उसकी कृष्ण के प्रति यही एक तरफ़ा साधना उसे वहां तक लेजायगी जहां राधा अभी नहीं पहुँची है | आज जहां ललिता है वहीं एक दिन राधा भी होगी | ललिता विस्मय में रह गयी थी |
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वास्तव में कृष्ण की बचपन की सखी, प्रेमिका व अभिन्न मित्र ललिता थी |
------बिशाखा, चित्रा, चम्पकलता, इन्दुलेखा, तुन्ग्विद्या, रंगदेवी, वासुदेवी सभी ललिता के साथ बड़ी हुईं|
--------सभी एक साथ नंदगांव के कृष्ण के सख्य में बड़ी हुईं, वे गोप कन्या थीं, सभी में गोपी-प्रेम भावना थी, कभी कृष्ण के लिए उनमें अलग आत्मा की सीमा खड़ी नहीं हुई, उनके लिए कृष्ण सभी के हैं, कभी यह भावना नहीं आई की कान्हा केवल मेरे हैं, कान्हा के लिए सुख व वेदना साझी थी उन सबके लिए |
राधा अपनी माता के देहांत के बाद ननिहाल में रही, उसके पिता अपनी दूसरी पत्नी के साथ वृन्दावन आगये | राधा युवावस्था में आई और स्वच्छंदता से घूमती थी| संयोग से कृष्ण भी वृन्दावन आगये |
------- अतः यह संयोग ही था कि राधा युवावस्था में वृन्दावन आई और सब पर छागई, वह इस तरह कृष्ण की ओर खिची कि कृष्ण का मन भी मोहित होगया|
--------ललिता अपनी गति में रह गयी, जब तक उसके भीतर ज्वार उठता, कृष्ण कहीं और बह गए, पर ललिता की गति में एक स्थिरता थी कृष्ण उससे अपनी हर बात कह पाते हैं| वो वृन्दावन छोड़कर जाने वाले हैं यह बात वो राधा से नहीं कह पाते |
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वस्तुतः नन्दगाँव के बाद सबसे अधिक सन्देश ( कंस व मथुरा से संवंधित, राजनैतिक सन्देश-नन्द –वसुदेव - कृष्ण व गोप-गोपियों के कंस विरोधी संवर्ग के लिए ) यहीं ऊंचागाँव में ही आते थे,
-------अतः ललिता कृष्ण की अभिन्न मित्र, साथी, सहकर्मी थी उसको यह आभास था कि कृष्ण को बड़े होकर मथुरा चले जाना है, अपने सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी ललिता जानती थी कि वियोग ही उसका सर्वस्व होने वाला है, अतः वह संयोग के हर पल को जी लेना चाहती है, भले ही कृष्ण राधा के साथ प्रेमपूर्ण क्यों न हों |
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एक बार सखियों ने प्रिया-प्रियतम का श्रृंगार करके ललिता जी के साथ श्री श्यामसुंदर के विवाह का आयोजन भी किया था| ललिता जी के मेहंदी रचे कर कमल जिस शिला पर टिके होने से उनके चिन्ह उस पर बन गए जो आज भी निधि वन में चित्र-विचित्र नामक शिला पर सुन्दर चित्रकारी के रूप में मिलते हैं|
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ललिता-माधव
शरदपूर्णिमा की महारास लीला में, राधा की आठ सखियों के साथ उसे भी सम्पूर्णता का अहसास था, ललिता व् कृष्ण एक ही जगह हैं यह सत्य ही उसे सम्पूर्ण कर रहा था, उसके अनुसार—नज़दीकी व दूरी तो सापेक्ष है, यह तो मन का विकल्प है | सूर्य तो सौर मंडल के प्रत्येक छुद्र से छुद्र गृह के भी साथ है, हम अपने अन्दर एकात्मकता का अनुभव करें न कि द्वैत का ईर्ष्या भाव |
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देवर्षि नारद के कहने पर एक बार ललिता कृष्ण के साथ झूले पर बैठ गयी तो राधा ने मान किया, ललिता सोचती है, किस भावना से यह मान |
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--------- क्या कृष्ण का सौन्दर्य इतना पार्थिव है जो एक के प्यार से सम्पूर्ण होजाए, कृष्ण की मुरली के आगे धरा का क्या सारे मनोजगत का सुख भी फीका पड जाता है, ईश्वर के होने की अनुभूति होजाती है| किसी गहरी सत्ता की अनुगूंज बस जाती है, तन मन में |
-------- प्रेम इस पर टिका नहीं होता है कि दूसरा हमें प्रेम करता है या नहीं | वह तो हमारे अन्दर का सत्य उद्भूत प्रेम है न कि प्यार की संभावना से प्रेरित व्यवहार | यदि स्व को जलाकर भष्म कर देना और शिवत्व का अमृत हमारे भीतर असीम प्रेम, वैराग्य रूप में नहीं आता तो यह असमर्थता हमारी है, दोष दैव का नहीं है |
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राधा को लगता है की वह कृष्ण को सम्पूर्ण रूप से चाहती है तो कृष्ण पर किसी अन्य के प्रेम की छाया न पड़े न कृष्ण किसी और के प्रति झुके |
-----------यदि किसी के सर्वस्व समर्पण होने से प्यार की संभावना खत्म होजाती हो तो महाराज कंस के विश्वस्त सैनिकों के नायक अय्यन से तो उसकी सगाई कब की होचुकी है, फिर उसके ही कृष्ण के प्रति प्रेम का क्या आधार रह पाता है |
--------- राधा के प्रति कृष्ण का प्रेम राधा को यह सब नहीं देखने देता | यदि प्यार न मिले तो तो प्यार की सार्थकता को प्रश्न समझने वाली राधा ये नहीं सोच पाती, कि जब एक दिन कृष्ण चले जायेंगे तो यही प्रश्न सबसे अधिक राधा के सामने खडा होगा | शिव के वचनों का अर्थ अब ललिता समझ रही थी |
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----कृष्ण की मुस्कान के भीतर छुपा विषाद राधा अपने प्रेम-संयोग के उल्लास में नहीं देख पाती, पर ललिता समझती है, कृष्ण एक बार जब अपने हस्त में बने मुद्रा को देखकर जब गंभीर होगये थे तब ललिता ने ही उन्हें हौले से धक्का देकर चेताया था|
-------- राधा का श्रृंगार ललिता जानकर करती थी, कृष्ण को क्या अच्छा लगता है राधा नहीं जानती थी जितना ललिता को कृष्ण के बारे में पता रहता था| कृष्ण अब राधा से अपनी खुशी के लिए प्यार नहीं करते अपितु वे राधा की बड़ी बड़ी आँखों के अश्रुपूर्ण होने से डरते थे |
-------जो बात कृष्ण राधा से नहीं कह पाए वह उन्होंने ललिता को ही कहा| गहरी बात अपने प्यार से नहीं कह पाते वह मित्र से कह देते हैं| कृष्ण भी ललिता से खुले हुए थे, वे उसके बचपन से अनुराग को जानते थे|
------ तुम्हारे होने पर हम सभी जितना प्यार करते हैं, उतना ही हम सब तुम्हें खोने पर भी करेंगे | राधा भी करेगी|........ यह सुनकर कृष्ण ललिता को स्थिर एकटक देखने लगे, कृष्ण इसके अर्थ में ऐसे डूबे जिसने कृष्ण की पूरी जिन्दगी के ही लिए प्यार का अर्थ बदल दिया | दूसरे क्षण ही मुस्कुराते हुए बोले, मेरे जाने के बाद राधा को संभाल लेना, उससे अधिक वे कुछ नहीं कह पाए |
--------श्रीकृष्ण के द्वारिका चले जाने पर ललिता ही राधिका को सम्हालती है | वह अपने विरह-व्यथा की अपेक्षा राधिका के विरह व्यथा का अधिक वर्णन करती है |
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----क्रमश -----अगली पोस्ट में --चन्द्रावली----'

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राधा -ललिता 
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ललिता -राधा
 

सोमवार, 10 जुलाई 2017

बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....


  बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....                            



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                  जीवन व जगत को एक साथ जीने वाले, संवेदनशील, भावुक, कवि हृदय, लखनऊ के वरिष्ठ कवि व साहित्यकार डा श्यामगुप्त एक अनुभवी, प्रतिभावान व सक्षम, वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो विज्ञान के छात्र रहे हैं एवं चिकित्सा विज्ञान व शल्यक्रिया-विशेषज्ञता उनका जीविकोपार्जन | डा श्यामगुप्त भारतीय रेलवे की सेवा में चिकित्सक के रूप में देशभर में कार्यरत रहे अतः समाज के विभिन्न वर्गों, अंगों, धर्मों, व्यक्ति व परिवार व समाज की संरचना एवं अंतर्द्वंद्वों को आपने करीब से देखा, जाना व समझा है | वे एक संवेदनशील, विचारशील, तार्किक के साथ साथ सांसारिक-आध्यात्मिक-धार्मिक व नैतिक समन्वय की अभिरूचि पूर्ण साहित्यकार हैं, उनकी रचनाएं व कृतित्व स्वतःस्फूर्त एवं जीवन से भरपूर हैं|
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                         वे साहित्य के प्रत्येक अनुशासन-गद्य व पद्य की सभी विधाओं में समान रूप से रचनारत हैं, साहित्य में सतत सृजनशील हैं तथा अंतर्जाल ( इंटरनेट) पर हिन्दी, ब्रजभाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं में रचनारत हैं| उनकी अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से पत्र-पत्रिकाओं व अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं|
-------- अब तक आपके द्वारा दस प्रकाशित पुस्तकों के अतिरिक्त लगभग २०० गीत, २५० ग़ज़ल, नज़्म, रुबाइयां, कते, शे’र आदि... ३०० अगीत छंद, ६० कथाएं व २०० से अधिक आलेख, स्त्री-विमर्श, वैज्ञानिक-दार्शनिक, सामाजिक, पौराणिक-एतिहासिक विषयों, हिन्दी व साहित्य आदि विविध विषयों पर लिखे जा चुके हैं एवं आप अनेक निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं आदि भी लिख चुके हैं |
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                           बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त साहित्य की पद्य व गदय की सभी विधाओं उपन्यास, कहानी, समीक्षा, आलेख एवं शास्त्रीय तुकांत छंद, गीत, अतुकांत छंद व गीत तथा अगीत और ग़ज़ल में भी रचनारत हैं| आपने मूलतः खड़ी बोली में साहित्य रचना की है तथा ब्रजभाषा में भी साहित्य रचना करते हैं, अंग्रेज़ी में भी |
----------आपकी कृतियों व रचनाओं से आपके ज्ञान वैविध्य, सतत अध्ययनशीलता, साहित्य में विविधता एवं विषयवस्तु, शैली एवं भाषा में नवीनता के पोषण की ललक परिलक्षित होती है | समाज के सरोकार, जन-जन के उत्थान की ललक, स्व-संस्कृति एवं मानव-सदाचरण के आप पक्षधर हैं जो आपकी प्रत्येक कृति में झलकता है | इसके अतिरिक्त समकालीन परिवेश पर गहन चिंतन-मनन, सूक्ष्म अंतर्दृष्टि तथा व्यष्टि व समष्टि का व्यवहारिक एवं तत्वज्ञान उनकी रचनाओं में समाहित रहता है जो उन्हें एवं उनकी कृतियों को विशिष्टता प्रदान करता है | धर्म, अध्यात्म एवं विविध शास्त्रों के अध्ययन व ज्ञान के झलक भी आपकी सभी रचनाओं में पाई जाती है |
--------- साहित्य में सुस्थापित तत्वों व मानदंडों के साथ-साथ लीक से हटकर कुछ नवीन करते रहना उनका अध्यवसाय है अतः शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है जो उन्हें अन्य कवियों साहित्यकारों से प्रथक एवं विशिष्ट बनाती है |
---------तीन विशिष्ट काव्य-कृतियाँ, ब्रजभाषा में विविध विधा युत काव्यग्रन्थ, खंडकाव्य का नवीन नामकरण ‘काव्य-उपन्यास, नवीन विषयवस्तु युत उपन्यास इन्द्रधनुष लिखकर वे श्रेष्ठ कवि, लेखक व साहित्यकार तो हैं ही, तुकांत एवं अतुकांत अगीत विधा दोनों में ही नए-नए छंदों की रचना तथा गीति-विधा एवं अगीत-विधा दोनों में ही महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की संज्ञा भी प्राप्त कर चुके हैं |
--------काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ, एक काव्य विधा का सम्पूर्ण लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर उन्हें साहित्याचार्य की संज्ञा से भी पुकारा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | वे सतत रचनारत व साधनारत हैं जो उनके शायरी ग्रन्थ, श्याम स्मृति की स्मृतियाँ रूपी विभिन्न विषयों पर स्व-विचारों की लघु-आलेखों की श्रृखला, कहानियाँ, गीत, सामाजिक, एतिहासिक, नारी विमर्श, चिकित्सकीय, साहित्य व भाषा, शास्त्र व स्व-संस्कृति आदि विविध विषयक आलेखों से ज्ञात होता है | अगीत कविता की साहित्य यात्रा एवं उसके छंद विधान का विस्तृत व शोधपूर्ण वर्णन लक्षण ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ में प्रस्तुत होता है |
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                           अगीत काव्यविधा का लक्षण काव्यग्रंथ एवं सफल उपन्यास इन्द्रधनुष, कथाएं एवं विविध विषयों पर लिखे जा चुके अनेकों आलेख, निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं, के आधार पर गद्य-साहित्य की प्रस्तुति में भी डा श्याम गुप्त एक सफल गद्य-साहित्यकार, उपन्यासकार एवं ग्रंथकार के रूप में प्रस्तुत हुए हैं|
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                          उनके साहित्य के प्रिय मूल विषय हैं ... स्त्री-विमर्श –जिसे वे स्त्री-पुरुष विमर्श का नाम देते हैं, पुरा शास्त्रीय ग्रंथों, वेद, पुराण आदि में उपस्थित वैज्ञानिक ज्ञान व तथ्य, दर्शन, सामाजिक व व्यवहारिक जीवन-संसार के ज्ञान को जनभाषा हिन्दी में लेखन द्वारा समाज व विश्व के सामने लाना, मानव आचरण संवर्धन विषयक आलेख व रचनाएँ जो सम-सामयिक मानव अनाचरण से उत्पन्न सामाजिक कठिनाइयों व बुराइयों को पहचानकर उनका निराकरण भी प्रस्तुत करे, जिसका प्रमाण उनके द्वारा रचित कृति ‘ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद‘ के रूप में है |
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              डा श्यामगुप्त की साहित्यिक दृष्टि व काव्य-प्रयोजन मूलतः नवीनता के प्रति ललक एवं रूढ़िवादिता के विरोध की दृष्टि है| साहित्य के मूलगुण-भाव-प्रवणता, सामाजिक सरोकार, जन आचरण संवर्धन हेतु प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण व गति-प्रगति के वे पक्षधर हैं|
------ कविता के मूलगुण -गेयता, लयवद्धता, प्रवाह व गति एवं सहज सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ केवल छंदीय कविता, केवल सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता, अतिवादी रूढ़िवादिता व लीक पर ही चलने के वे हामी नहीं हैं|
-------अपने इसी गुण के कारण वे आज की नवीन व प्रगतिशील काव्य-विधा अगीत-कविता की और आकर्षित हुए एवं स्वयं एक समर्थ गीतकार व छंदीय कविता में पारंगत होते हुए भी तत्कालीन काव्यजगत के छंदीय कविता में रूढिगतिता के ठेके सजाये हुए स्वघोषित स्वपोषित संस्थाओं व उनके अधीक्षकों के अप्रगतिशील क्रियाकलापों एवं तमाम विरोधों के बावजूद अगीत-कविता विधा को प्रश्रय देते रहे एवं उसकी प्रगति हेतु विविध आवश्यक साहित्यिक कदम भी उठाये जो उनके विषद अगीत-साहित्य के कृतित्व के रूप में सम्मुख आया जिसके कारण आज अगीत कविता साहित्य की एक मुख्यधारा बनकर निखरी है |
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               डा.श्यामगुप्त नवीन प्रयोगों, स्थापनाओं को काव्य, साहित्य व समाज की प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं की साहित्य व काव्य के मूल उद्देश्यों से विरत कर दिया जाय, नवीनता के नाम पर मात्राओं, पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडम्बर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी देश, काल व तथ्यों को प्रश्रय दिया जाय, यथा वे कहते हैं कि..
‘साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

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                            इस प्रकार डा श्यामगुप्त के सम्पूर्ण काव्य पर अनुशीलक दृष्टि से बोध होता है कि आप एक प्रतिभा संपन्न श्रेष्ठ कवि एवं लेखक हैं | शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है | नए-नए छंदों की रचना तथा महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की एवं काव्य-शास्त्रीय लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर साहित्याचार्य की संज्ञा के भी योग्य सिद्ध होते हैं| वे सतत सृजनशील हैं और आशा है कि भविष्य में और भी कृतियों के प्रणयन से माँ भारती की भण्डार भरेंगे |

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--- साहित्यभूषण डा.रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’, डी.लिट्.
संस्थापक अध्यक्ष, अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त....

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दि.६-७-१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य , नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, अनिल किशोर शुक्ल ‘निडर’, श्री रामदेव लाल विभोर महामंत्री काव्य कला संगम , प्राची संस्था के अध्यक्ष डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, श्री बिनोद कुमार सिन्हा उपस्थित थे | विशेष अतिथि एवं श्रोता के रूप में रेलवे अस्पताल लखनऊ के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. पुरुषोत्तम सिंह एवं पूर्व रेडियो व टीवी सिंगर श्रीमती पुरुषोत्तम सिंह ने गोष्ठी को शोभायमान किया |
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श्री बिनोद सिन्हा द्वारा अपनी कृति –पांडुलिपि में गणेश वंदना पहले लिखे जाने पर चर्चा हुई | सिन्हा जी का कथन था कि उनके विचार से गणेश भगवान हैं अतः वन्दना पहले की जानी चाहिए | श्याम गुप्त का मत था की गणेश प्रथम पूज्य देव हैं परन्तु भगवान् नहीं हैं | इस प्रकरण में ब्रह्म, भगवान् व ईश्वर पर भी संक्षिप्त चर्चा हुई |
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डा.योगेश के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं, उनकी प्रथम पूजा विभिन्न धार्मिक आदि कार्यों में तो की ही जानी चाहिए परन्तु साहित्यिक कृतियों में वाग्देवी माँ सरस्वती की ही वन्दना पहले होनी चाहिए | डा श्याम गुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि दोनों की वंदना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ‘वन्दे वाणी विनायकौ’ कहा है |
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श्री अनिल किशोर निडर की जिज्ञासा पर डा श्यामगुप्त ने बताया की संयुक्ताक्षर से पूर्व आने वाले लघु अक्षर को मात्रा गणना हेतु दीर्घ माना जाता है |
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बिनोद सिन्हा जी का कथन था की कविता स्वयंभू उद्भूत होती है , यदि सप्रयास लिखा जाय तो ता वह बनावटी कविता ही होती है |
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डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित रचना ;ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद; एवं बिनोद कुमार सिन्हा की शीघ्र प्रकाश्य कृति ‘गीता सारांश, अगीत में’ के तादाम्य में गीता पर ईशोपनिषद का प्रभाव दोनों की विषय समनुरूपता पर डा श्यामगुप्त व सिन्हा जी में चर्चा हुई |
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सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि डा योगेश गुप्त ने अपनी कई दार्शनिक रचनायें प्रस्तुत की, अपने अपने नाम को ढूँढने में व्यस्त हम ---
हम सब मानते थे / हमारा नाम ही
पहचान है ,/ और विडम्बना यह थी कि,
हम स्वयं को भी / अपने नाम से ही पहचानते थे |
--------श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने वर्षा गीत इस प्रकार प्रस्तुत किया---
नभ पर काले बादल छाते,
कभी रंगीले बनकर आते
वसुधा को रसमय कर जाते |
------- श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने महाकवि विद्यापति की शब्दावली निहित तान में गिरधर गोपाल का वर्णन किया---
गले वैजन्ती कनक मोर मुकुट अति भावन
अंग गगन सम कान्ति श्यामल श्यामल
अलक भ्रमर सी तिलक कस्तूरी माल सुहावन,
झलक चन्द्र छवि श्यामल गिरिधर गोवर्धन |
------- डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत, श्रृंगार गीत एवं एक ग़ज़ल यूं पढी –
पुरस्कार की तो थी हमको भी चाहत बहुत
मगर कभी शर्त पूरी हम नहीं कर पाए |
--------श्री रामदेव लाल विभोर ने अपनी रचना प्रस्तुत की ----
मर्ज़ एस दावा बेअसर,
नब्ज़ बोले की मीठा ज़हर है |
------- डा सुरेश प्रकाश शुक्ल ने किसान से तादाम्य बिठाते हुए गाया –
किसना होईगे चतुर किसान / पैदा करत हैं गेहूं धान |
गन्ना आलू बोवें नकदी की आशा मा,
आल्हा बिरहा गावैं झूमें चौमासा मा |
------ श्रीमती सुषमा गुप्ता ने पावस गीत सुनाया ...
आई सावन की बहार
बदरिया घिर घिर आये
---------अगीताचार्य डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने कई रचनाये व गीत प्रस्तुत किये, एक मुक्तक देखिये ....
‘शील से बोझिल झुका हो वह नयन है,
हो न सीमा जिस पटल की वह गगन है |
रोकने पर भी न रुकता हो कभी जो ,
नित्य नूतन पंथ शोधे वह चरण है ||
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डा सत्य द्वारा दो शब्द बोलने के अनुरोध पर विशिष्ट अतिथि व श्रोता डा पी सिंह ने कहा आप लोग विज्ञजनों के सान्निध्य का अवसर मिला, काव्य रस का आनंद मिला | श्रीमती सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे आनंददायक क्षण बताया |
जलपान के उपरांत सुषमा गुप्ता जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |

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