यह ब्लॉग खोजें
मंगलवार, 29 अगस्त 2023
मेरे द्वारा की गयी पुस्तक समीक्षा--डॉ.श्याम गुप्त
मेरे द्वारा की गयी
पुस्तक समीक्षा--
============
मेरे गीत-संकलन गीत बन कर ढल रहा हूं की डा श्याम बाबू गुप्त जी लखनऊ द्वारा समीक्षा आज उत्तर प्रदेशके प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र जनवाणी के रविवारीय परिशिष्ठ में प्रकाशित हुई ।--डॉ. ब्रजेश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
फ़ॉलोअर
श्याम अगीतिका - मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक --ओन लाइन ---डॉ. श्याम गुप्त
कुण्डलिया छंद : अरुण कुमार निगम
निर्मम दुनियाँ से सदा , चाहा था वैराग्य पत्थर सहराने लगा , हँसकर अपना भाग्य हँस कर अपना भाग्य , समुंदर की गहराई ...
राष्ट्रीय ग्रन्थ --डा श्याम गुप्त.....
राष्ट्रीय ग्रन्थ हम कितने मूर्ख हैं जो विश्व की धरोहर महात्मा गांधी को भारत का राष्ट्रपिता बनाकर सीमित किये दे रहे हैं, बिना मतलब के ...
छंद कुण्डलिया : मिलें गहरे में मोती
हलचल होती देह से, मन से होता ध्यान लहरों को माया समझ, गहराई को ज्ञान गहराई को ज्ञान , मिलें गहरे में मोती सीधी-सच्ची बा...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें