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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

बात ग़ज़ल की ----डा श्याम गुप्त ....



        -----बात ग़ज़ल की -----



. ( -----कविता व शायरी ---- कविता, काव्य या साहित्य किसी विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता होगा |
------आदिदेव शिव के डमरू से निसृत ध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ|
-----देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा.... ‘उर्वशी–पुरुरवा’ ....की है |

------कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी।
-------प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशी …गंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गई और पुरूरवा उसके विरह में छाती पीटता रोता रहा, विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेद के मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ।

------अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । ------शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
-------शायरी अरबी, फारसी व उर्दू जुबान की काव्य-कला है | इसमें गज़ल, नज़्म, रुबाई, कते व शे’र आदि विविध छंद व काव्य-विधाएं प्रयोग होती हैं, जिनमें गज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय हुई |
------गज़ल मूलतः शे’रों (अशार या अशआर) की मालिका होती है और प्रायः इसका प्रत्येक शे’र विषय–भाव में स्वतंत्र होता है |----

----- यहाँ हम ग़ज़ल के मूल रूप-भावों के बाते में बात करेंगे ....)



                     गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल खुशनुमां अंदाज़ है | इसका शिल्प भी अनूठा है | नज़्म  रुबाइयों, छंदों, गीतों  से जुदा | इसीलिये विश्व भर में जन-सामान्य में प्रचलित हुई | हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती | परन्तु हाँ, घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) एवं सवैया छंद  का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता। मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये......निम्न घनाक्षरी में रहीरदीफ़ है एवं शरमा व हरषा...आदि काफिया हैं.....
गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,
कोंपलें लजाईं कली कली शरमा रही
झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही“ --- डा श्याम गुप्त

   इसी प्रकार  गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरी देखें --- जिसमें पदांत स्वयं सुजानी ...पुरानी आदि काफिया है।

थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी
सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी
बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,
धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी
शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,
मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी” ---डा श्याम गुप्त

सवैया छंद के प्रारूप भी देखें----
 -----बा रदीफ़ प्रारूप....
 पीने वाला यही चाहता गली गली मधुशाला हो |
 हर नुक्कड़ हर मोड़ जो मिले मदिरा पीने वाला हो |
अपनी अपनी सोच सभी की मन गोरा या काला हो |
सभी चाहते उनकी दुनिया में हर ओर उजाला हो ||     ---डा श्याम गुप्त

------गैर रदीफ़ प्रारूप देखें----
बैन वही जो उचारे सदा वही गोविन्द नाम भजे जग सारो |
रसना वही रसधार बहाय भजे जेहि गोविन्द नाम पियारो |
भक्ति वही गज़राज करी परे दुःख: में गोविन्द काज संवारो |
श्याम वही नर गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द नाम उचारो ||      --डा श्याम गुप्त


          मैं कोई शायरी गज़ल का विशेषज्ञ ज्ञाता नहीं हूँ | परन्तु हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की सुविधा हेतु गज़ल नज़्म आदि को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है-यथा…. साहिर लुधियानवी की प्रसिद्द हिन्दी ग़ज़ल...

संसार से भागे फिरते हो संसार को तुम क्या पाओगे।
इस लोक को भी अपना सके उस लोक में भी पछताओगे।

हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएंगे तुम जन्म गँवाकर जाओगे।

       छंदों गीतों के साथ-साथ दोहा अगीत-छंद लिखते हुए गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे भी संक्षिप्तता सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ...अतः लिखा जा सकता है, और नज्में तो तुकांत-अतुकांत गीत के भांति ही हैं, और गज़लोंनज्मों का सिलसिला चलने लगा |

       गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में कसीदा अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें औरतों औरतों के बारे में गुफ्तगू एक मूल विषय-भाग भी होता था | कसीदा के उसी भाग ताशिब को पृथक करके गज़ल का रूप नाम दिया गया

     गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ग़ज़ल (ghazal या guzal ) कहा जाता है | इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी | अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे | अतः अरब-कला प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग,  दर्द का प्रतिमान गज़ल के नाम से प्रचलित हुआ | जैसे भारतीय काव्य-गीतों में वीणासारंग का पीड़ात्मक-भावुक प्रसंग |  

       शायर फिराक गोरखपुरी के अनुसार  जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते-भागते झाड़ी में फंस जाता है और निकल नहीं पाता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है, उसी करूण स्वर को गजल कहते हैं. इसलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है |
      यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थात इश्के-मजाज़ी - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है| मानव इतिहास की सर्वप्रथम प्रणय-विरह गाथा उत्तरापथ-उज्बेकिस्तान की अप्सरा उर्वशी एवं भरतखंड के नृपति पुरुरवा की है| उर्वशी के चले जाने पर पुरुरवा के विरह वेदनात्मक गीत ऋग्वेद में वर्णित हैं| यहीं से साहित्य व काव्य का प्रादुर्भाव हुआ | अरबी-फारसी कवियों ने इसी पर रुबाइयां लिखीं जो शायरी कहलाई एवं उसकी एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल के नाम से परवान चढी | इसीलिये ग़ज़ल में शमा-परवाना, दीपक-शलभ, गुल-बुलबुल, कलिका-भ्रमर आदि प्रसंग प्रभावी हुए |  अरबी गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई | यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की  एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...
             Where are you now? Who lies beneath your spell tonight.                                                  
             Whom else rapture’s road you  expel  tonight ?

             My rivals, for your love, you have invited them all.
             This is mere insult, this is no farewell to night.

           गज़ल का मूल छंद शे या शेअर है | शेर वास्तव में दोहा का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है | आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद, मेरे द्वारा सृजित..अगीत, नव-अगीत त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसे दोहा ही कहा जाता है अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( quasida mono rhyme)|  अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे भी लिख सकता है..गज़ल भी | शेरों की मालिका ही गज़ल है | ग़ज़लों के ऐसे संग्रह को जिसमें हर हर्फ से कम से कम एक ग़ज़ल अवश्य हो दीवान कहते हैं।

       तुकांतता के अनुसार ग़ज़लें मुअद्दस या मुकफ्फा होती है| मुअद्दस गज़ल में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है इसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल  भी कहते हैं .. यथा ....

                    उनसे मिले तो मीना सागर लिए हुए, 
                      
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
 
                     लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे गई
                    
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए |... - (जमील हापुडी)
एवं मुकफ्फा ग़ज़ल में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है इसे  ग़ैर मुरद्दफ़  या गैर रदीफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं|  जैसे...
         जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे |
         साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |

         खाई है कसम न जाने की मयखाने 
         श्याम यादों की मय पीना न भुलायेंगे |   ...डा श्याम गुप्त  

             ग़ज़ल में  ग़ज़ल का प्रत्येक शे' अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे' में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है एवं प्रत्येक शेर में एक ही मूल भाव को क्रमिक भी रख सकता है | जब किसी ग़ज़ल के सभी शेर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को क्रमिक, जारी अर्थात मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं| यदि ग़ज़ल के प्रत्येक शे' अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं

          वस्तुतः  काव्य के मूल भाव के अनुरूप  ग़ज़ल में भी तकनीक की अपेक्षा भाव, प्रभावोत्पादकता प्रवाह ही अच्छी ग़ज़ल की पहचान है जिसमें मौलिकता हो, जिससे गीत कविता की ही भांति पढ़ने वाला समझे कि यह उस की स्वयं की दिल की  बातों का वर्णन है | प्रायः सुरूचिपूर्ण  जाने-पहचाने और सरल शब्दों का ही प्रयोग होना चाहिए | क्लिष्ट शब्द प्रवाह, गति, सम्प्रेषणता  एवं काव्यानंद में अवरोध उत्पन्न करते हैं | भाव चाहे कितना भी उच्च हो, छंद चाहे कितना ही उपयुक्त सुंदर हो लेकिन कथ्य की अस्पष्टता तथ्य की अवास्तविकता एवं उचित शब्दचयन भाषा व्याकरणीय शब्दक्रम आदि के होने से ग़ज़ल या कविता प्रभावहीन हो  जाती है। यह प्रायः काफिया या रदीफ़ को पूर्वोक्त से समान करने के क्रम में होता है, इसीलिये तो ग़ज़ल कहना आसान नहीं है | अस्पष्ट भाव, कथ्य एवं तथ्य  के बारे में एक प्रसिद्द शेर है-

           मगस को यूं बाग में जाने दीजिये
            महज़ परवाने बर्बाद होजाएंगे |

     शेर लाजवाब है लेकिन उसका अर्थ  समझ के परे है।  व्याख्या है कि - माली तू मगस (मधुमक्खी) को बाग में न जाने दे| वह गुलों का रस चूस कर पेड़ पर शहद का छत्ता बनायेगी, उस से मोम निकलेगा, उससे शमा बनेगी | जब शमा जलेगी तो बेचारा परवाना उस पर मंडराएगा और बिना वजह जल कर राख हो जाएगा।
            शब्द क्रम भी हिन्दी में अत्यंत महत्त्व रखता है | ग़ज़ल में शब्द क्रम का ख्याल न रहने से अर्थ-अनर्थ होजाता है देखिये ...
       नर्म होकर रुई सी लगी
      वो जो लड़की थी सख्त वारिश में | ...सूर्यभानु गुप्त, दै. जा.

शायद कवि कहना चाहता है कि जो लड़की सख्त थी वो भी वारिश में भीग कर नर्म होगई, परन्तु असम्बद्ध स्थान पर वारिश शब्द रखने से लगता है कि लड़की वारिश में सख्त थी |  तथा----

      कहाँ खो गई उसकी चीखें हवा में
    हुआ जो परिंदा ज़िबह ढूँढता है- ---संजय मासूम

शायद कवि कहना चाहता है कि 'ज़िबह' (कत्ल) हुआ पंछी हवा में खो गई अपनी 'चीखें' ढूँढ रहा है। लेकिन 'ज़िबह' ल़फ़्ज़ गलत जगह पर आने से अर्थ यही निकलता है कि वह ज़िबह की तलाश में है।

           भारत में शायरी गज़ल फारसी के साथ सूफी-संतों के प्रभाववश प्रचलित हुई जिसके छंद संस्कृत छंदों के समनुरूप होते हैं | फारसी में गज़ल के विषय रूप में सूफी प्रभाव से शब्द इश्के-मजाज़ी के होते हुए भी अर्थ रूप में इश्के हकीकी अर्थात ईश्वर-प्रेम, भक्ति, अध्यात्म, दर्शन आदि सम्मिलित होगये | प्रेमी को साधक और प्रेमिका को ब्रह्म का दर्जा मिल गया। सूफी साधना  विरह प्रधान साधना है। इसलिए फ़ारसी ग़ज़लों में भी  संयोग के बजाय वियोग पक्ष को ही प्रधानता मिली।
      फारसी से भारत में उर्दू में आने पर सामयिक राजभाषा के कारण विविध सामयिक विषय भारतीय प्रतीक कथ्य आने लगे | प्रारंभिक दौर में उर्दू गज़ल में श्रंगार के दोनों पक्षों संयोग-वियोग का ही वर्णन रहता था लेकिन बाद में उसमें परिवर्तन आया। उसमें उपदेश, नीति, चिंतन और देश-प्रेम की बातों का ज़िक्र किया जाने लगा यथा---

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में हैं

वक्त आने दे बताएंगे तुझे आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। - --रामप्रसाद बिस्मिल

       उर्दू से हिन्दुस्तानी हिन्दी में आने पर गज़ल में वर्ण्य-विषयों का एक विराट संसार निर्मित हुआ और हर भारतीय भाषा में गज़ल कही जाने लगी | तदपि साकी, मीना सागर इश्के-मजाज़ी गजल का सदैव ही प्रिय विषय बना रहा | बकौल मिर्जा गालिव....

                    बनती नहीं है वादा सागर कहे बगैर |  

             यूं तो हिन्दी में ग़ज़ल कबीरदास जी द्वारा भी कही गयी बताई जाती है जिसे
  कतिपय विद्वानों द्वारा हिन्दी की सर्वप्रथम ग़ज़ल कहा जाता है, यथा....

              हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
               रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

               कबीरा इश्क का मारा, दुई को दूर कर दिल से,
               जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सर बोझ भारी क्या ?  .

            परन्तु मेरे विचार से इस ग़ज़ल की भाषा कबीर की भाषा से मेल नहीं खाती | हो सकता है यह प्रक्षिप्त हो एवं कबीर नाम के किसी और गज़लकार ने इसे कहा हो, एक शायर शाहिद कबीर भी हुए हैं |

          वास्तव में तो  हिन्दी में गज़ल का प्राम्म्भ आगरा में जन्मे पले शायर अमीर खुसरो (१२-१३ वीं शताब्दी)  से हुआ जिसने सबसे पहले इस भाषा को हिन्दवी कहा और वही आगे चलकर हिन्दी  कहलाई | खुसरो अपने ग़ज़लों के मिसरे का पहला भाग फारसी या उर्दू में दूसरा भाग हिन्दवी में कहते थे | उदाहरणार्थ... 
 
               जेहाले  मिस्कीं  मकुल तगाफुल,
                दुराये नैना बनाए बतियाँ |

              कि ताब--हिजां, न दारम--जाँ,                                                                                                                            
             लेहु काहे लगाय छतियाँ |”   

                            १७ वीं सदी में उर्दू के पहले शायर वली  ने भी हिन्दी को अपनाया देवनागरी लिपि का प्रयोग किया | ..यथा....                                       
         सजन सुख सेती  खोलो  नकाब आहिस्ता-आहिस्ता,
        कि ज्यों गुल से निकलता है गुलाव आहिस्ता-आहिस्ता |

               भारत में आने पर फारसी ग़ज़ल में हिन्दी के शब्दों को आत्मसात किया जाने लगा  एवं शमसुद्दीन वली औरन्गावादी, क़ुतुबशाह, चंद्रभान बरहमन  आदि  द्वारा दक्षिण भारत में लिखी –कही गयी जो दक्खिनी हिन्दी (१४-१५ वीं सदी) की ग़ज़ल थी,  जिसमें मराठी, कन्नड़, तेलगू का मिश्रण भी था| वली ने दिल्ली आने पर दक्खिनी हिन्दी की बजाय जवान ए मोअल्ला -उर्दू में लिखना प्रारम्भ किया | इस प्रकार वली ( १६६३-१७४०) सर्वप्रथम उर्दू में ग़ज़ल लिखने वाले हुए उन्होंने हिन्दी को भी अपनाया और दरबारी भाषा होने के कारण उर्दू ग़ज़ल का प्रचलन हुआ |  
 
                  सदियों तक गज़ल राजा-नबावों के दरबारों में सिर्फ इश्किया मानसिक विचार बनी रही जिसे उच्च कोटि की कला माना जाता रहा | परन्तु १८ वीं  सदी में आगरा के नजीर अकबरावादी  ने शायरी को सामान्य जन से जोड़ा और हिन्दी गज़लें लिखी एवं १९ वीं सदी के प्रारम्भ में मिर्ज़ा गालिव ने मानवीय जीवन के गीतों से | उदाहरणार्थ..... 

         जब फागुन रंग झलकते हों, तब देख बहारें होली की |
          परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की |” - ---नज़ीर अकबरावादी ---   तथा.... 

                 गालिव बुरा मान जो वाइज़ बुरा कहे ,
                 ऐसा भी है कोई कि सब अच्छा कहें जिसे |.......गालिव
                    १८ वीं सदी में गज़लकार इंसा अल्ला खां, के अलावा हिन्दी में गज़ल की पहल में भारतेंदु हरिश्चंद्र,  निराला,  जयशंकर प्रसाद  आदि ने सरोकारों की अभिव्यक्ति लोक-चेतना के स्वर दिए..यथा निराला ने कहा...
                 लोक में बंट जाय जो पूंजी तुम्हारे दिल में है   
       उन्हें अवकाश मिलता ही कहाँ है मुझसे मिलने का
       किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं|   ...जयशंकर प्रसाद 

        तत्पश्चात गालिव, जोक, मोमिन, दाग, अकबर इलाहाबादी, चकबस्त, इक़बाल. फिराक, जिगर मुरादाबादी आदि उर्दू ग़ज़लकारों के साथ साथ वाजिद अली शाह, बहादुरशाह ज़फर अदि ने भी हिन्दी का प्रयोग किया..
दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है | ---बहादुर शाह ज़फर

तुम मेरे पास होते हो
गोया कोइ दूसरा नहीं होता |  ...मोमिन
         त्रिलोचन, शमशेर, बलबीर सिंह रंग ने भी हिन्दी ग़ज़लों को आयाम दिए |


     परन्तु आधुनिक खड़ी बोली में हिन्दी-गज़ल के प्रारम्भ का श्रेय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है जिन्होंने हिन्दी भाषा में गज़लें लिख कर गज़ल के विषय भावों को राजनैतिक, संवेदना, व्यवस्था, सामाजिक चेतना आदि के नए नए आयाम दिए |... दुष्यंत कुमार की एक गज़ल देखिये....  
  
                         कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
                        कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए ।

 इस प्रकार फारसी ग़ज़ल, फारसी से हिन्दवी, दक्खिनी हिन्दी में आई तत्पश्चात उर्दू में आई एवं पुनः उर्दू से हिन्दी व हिन्दी की समस्त बोलियों के साथ खड़ी बोली एवं सभी भारतीय देशज भाषाओं में प्रचलित हुई |  

              वस्तुतः हिन्दी भाषा ने अपने उदारचेता स्वभाववश उर्दू-फारसी के तमाम शब्दों को भी अपने में समाहित किया, अतः आज के अद्यतन समय में हिन्दी कवियों ने भी ग़ज़ल को अपनाया  समृद्ध किया है| हिन्दी गजल के पास अपनी विराट शब्द-संपदा है, मिथक हैं, मुहावरे, बिम्ब, प्रतीक, रदीफ-काफिये हैं। आज  हिन्दी-गजल में पारम्परिक गजल की काव्य-रूढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास है तथा नए शिल्प और विषय के उत्तरोत्तर विकास का भी|  फलस्वरूप आज गज़ल हिन्दी-गज़ल में विषयों ग़ज़लकारों का एक विराट रचना संसार है जो प्रकाशित पुस्तकों, पत्रिकाओं, रचनाओं एवं अंतर्जाल( इंटरनेट) पर प्रकाशन द्वारा समस्त विश्व में फैला हुआ है तथा जो उर्दू गज़ल, हिन्दी ग़ज़ल, शुद्ध खड़ी-बोली, हिन्दी एवं हिन्दी की सह-बोलियों के शुद्ध मिश्रित रूपों से समस्त शायरी-विधा ग़ज़ल को समर्थ व समृद्ध कर रहे  है  तथा दिन दिन ग़ज़ल में गीतिका, नई ग़ज़ल, त्रिपदा-अगीत ग़ज़ल  आदि नाम से नए-नए प्रयोग भी होरहे हैं|
               
           मेरे विचार से हिन्दी ग़ज़ल के लिए एक जरूरी बात यह है कि हिन्दी व्याकरण की परिधि में शब्दों का विभाजन हो और मात्रा की गणना भी, ताकि ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य में तारतम्य रह सके | उर्दू ज़बान का हिन्दी गज़ल पर हावी होना उसके स्वरूप के निखार में बाधक है। हिन्दी की अनेक गज़लें तो लगती हैं जैसे वे उर्दू की हैं उनमें हिन्दी की वह अपनी सोंधी-सोंधी सुगंध है ही नहीं एवं वह अरबी-फारसी के लफ्जों से दब कर रह गई है। हिन्दी की एक शुद्ध ग़ज़ल का हिस्सा देखिये...

छटा का कौन आकर्षण तिमिर में खींच लाया है
क्षितिज से व्योम में कोइ तरल तारा निकलता है |  ...त्रिलोचन शास्त्री

साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चाहिए ,
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए |

ललित भाषा ललित कथ्य न सत्य तथ्य परे रहे ,
व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य समर्थ होना चाहिए |.. ...डा श्याम गुप्त


     यदि हिन्दुस्तानी भाषा के अनुरूप हिन्दी में घुलमिल गए उर्दू के लफ्ज़ों का इस्तेमाल हो जो सहज ही आजायें तो सौन्दर्य, प्रभाव व सम्प्रेषण की स्पष्टता बढ़ सकती है | यथा एक ग़ज़ल देखें ....

वो हारते ही कब हें जो सजदे में झुक लिए
यूं फख्र से जियो यूंही चलती रहे ये ज़िंदगी |   ---डा श्याम गुप्त

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             चूँकि गज़ल मूलतः उर्दू से हिन्दी में आई है इसलिए यह मान लेना कि उसमें उर्दू के कुछ लफ्ज़ अवश्य हों उचित नहीं। अतः मेरे विचार में फ़ारसी, और उर्दू के क्लिष्ट शब्दों से परहेज़ करना ही उचित है | उदाहरणार्थ ऐसे उर्दू /फारसी शब्दों के प्रयोग का क्या लाभ जिसे हिन्दी वाले तो क्या उर्दू भाषी भी न समझ पायें.---..उदाहरणार्थ......

तहज़ीबो तमद्दुन है फ़कत नाम के लिए
गुम हो गई शाइस्तगी दुनिया की भीड़ में ---- कुँवर कुसुमेश

       आजकल  देखा जा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल में उर्दू शब्दों व व्याकरण का दबदवा बढाने व कायम रखने के प्रयास किये जारहे हैं, तर्क उस्ताद-परम्परा, ग़ज़ल-ज्ञान, उर्दू-परम्परा आदि के दिए जारहे हैं| वास्तव में आज के कुछ कवि शायर जिनका भाषा व वैयाकरण ज्ञान अल्प है, विषय आदि पर अपना कुछ मौलिक ज्ञान भी नहीं है उर्दू उस्तादों का तौर-तरीका व उन्हीं की नक़ल की लीक पर चलकर आगे बढ़ना चाहते हैं| यह हिन्दी ग़ज़ल के लिए एवं स्वयं ग़ज़ल के विकास व निखार में बाधक है अतः हिन्दी ग़ज़ल के पैरोकार उर्दू-फारसी ग़ज़ल या उस्तादी परम्परा, या उर्दू भाषा व शब्दों आदि को अधिक तवज्जो न देकर आचार्य भामह के स्व-अनुभव के कथ्यांकन पर चलते हुए आगे बढ़ रहे हैं| आखिर हिन्दी ग़ज़ल क्यों उर्दू के नियम कायदों पर ही चले | हिन्दी की अपनी स्वयं की मर्यादा है, मिजाज़ है, नीति-नियम है, विशिष्टता है, गति है, कला व भाव का अपना स्वरुप अर्थवत्ता व प्रभामंडल है |  तुलसी ने जब संस्कृत की बजाय भाखा ( हिन्दी ) में रामचरित मानस रची तब भी काशी के पंडितों ने तमाम सवाल उठाये थे |

        शायर ज़हीर कुरैशी (डा आज़म की पुस्तक --आसान अरूज़ की समीक्षा में) का विचार है कि बुनियादी कायदे क़ानून आवश्यक हैं, आवश्यक नहीं आप अरूज़ के माहिर बन जाएँ | इल्मे अरूज़ अर्थात शेर की बाहरी संरचना का महत्त्व सिर्फ २५% है तथा शेरो की आतंरिक संरचना का ७५%..जिसमें शायर के कथ्यांकन, भाव, विचार, विषय, संवेदना, कल्पनाशीलता, ज्ञान आदि रहते हैं| 

      नचिकेता का मानना है कि "हिन्दी ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़लों की तरह न तो असंबद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी ही है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नही है !"   फैज़ अहमद फैज़ ने तो इतना तक कह डाला है कि "ग़ज़ल को अब हिन्दी वाले ही ज़िंदा रखेंगे, उर्दू वालों ने तो इसका गला घोंट दिया है !" 

          मेरा उर्दू भाषा ज्ञान उतना ही है जितना किसी आम उत्तर-भारतीय हिन्दी भाषी का | मुग़ल साम्राज्य की राजधानी आगरा (.प्र.) मेरा जन्म शिक्षा स्थल रहा है जहां की सरकारी भाषा अभी कुछ समय तक भी उर्दू ही थी | अतः वहाँ की जन-भाषा साहित्य की भाषा भी उर्दू- हिन्दी बृज मिश्रित हिन्दी है | इसी क्षेत्र के अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम उर्दू हिन्दवी में मिश्रित गज़ल-नज्में आदि कहना प्रारम्भ किया | अतः इस कृति में अधिकाँश गज़लें, उर्दू-हिन्दी मिश्रित कहीं-कहीं बृजभाषा मिश्रित हैं | कहीं-कहीं उर्दू गज़लें हिन्दी गज़लें भी हैं |
 
             मुझे गज़ल आदि के शिल्प का भी प्रारंभिक ज्ञान ही है | अरूज़--बहर, वज्न, रुक्न, टुकड़े, सबव, वतद, मज़मूअ, तक्तीअ आदि का ज्ञान नहीं के बराबर ही है |  जब मैंने विभिन्न शायरों की शायरीगज़लें नज्में आदि सुनी-पढीं देखीं विशेषतया गज़ल...जो विविध प्रकार की थीं..बिना काफिया, बिना रदीफ, वज्न आदि का उठना गिरना आदि ...तो मुझे ख्याल आया कि बहरों-नियमों आदि के पीछे भागना व्यर्थ है, बस लय गति से गाते चलिए, गुनगुनाते चलिए गज़ल बनती चली जायगी, जो कभी मुरद्दस गज़ल होगी या मुसल्सल  या हम रदीफ,  कभी मुकद्दस गज़ल होगी या कभी मुकफ्फा गज़ल, कुछ फिसलती गज़लें होंगी कुछ भटकती ग़ज़ल |  हाँ लय गति यति युक्त गेयता भाव-सम्प्रेषणयुक्तता  तथा सामाजिक-सरोकार युक्त होना चाहिए और आपके पास भाषा, भाव, विषय-ज्ञान कथ्य-शक्ति होना  चाहिए |  यह बात गणबद्ध छंदों के लिए भी सच है | जैसा कि स्वयं भामह ने दूसरों की रचना, देखकर-पढ़कर, काव्यज्ञान की उपासना करते हुए काव्य-निर्माण में प्रवृत्त होने का भी विधान किया है| ... तो कुछ शे आदि जेहन में यूं चले आये.....

            मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,
             यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |

           लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,
             वह भी गज़ल है, चाहे  कोई काफिया नहीं | “  

            बस गाते-गुनगुनाते बिगड़ती-संभलती-फिसलती-भटकती जो गज़ले बनतीं गयीं... जिनमें त्रिपदा ग़ज़ल... त्रिपदा -अगीत गज़ल, आदि कुछ नए प्रयोग भी किये गए है.. यहाँ पेश हैं...मुलाहिजा फरमाइए ........

             मुलाहिजा फरमाइए, हो सके तो गुनगुनाइए |
               फूल या पत्थर, जिसपे जो हो, बरसाइये || “
                                                                                                                           
                                                 ------डा श्याम गुप्त     
 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017


श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा -------..डा श्याम गुप्त ...

                       


             

--- मेरी शीघ्र प्रकाश्य --कृति---श्याम स्मृति से ------

                { इस कृति की रचना के मूल में प्रथमबार ब्लॉग बनाते हुए मेरे पुत्र निर्विकार पंकज श्याम द्वारा सुझाए गए ब्लॉग शीर्षक...The world of my thoughts...---- My myriad thoughts, personal interpretations and their relevance....के शब्द व वाक्य ही हैं, जो आज हिन्दी ब्लोग्स जगत में..... श्याम स्मृति The world of my thoughts...श्याम गुप्त का चिट्ठा ----मेरे विचारों की दुनियां -मेरे अपने विचार एवं उन पर मेरा स्वयं का व्याख्या-तत्व तथा उनका समयानुसार महत्व....के नाम से जाना जाता है|

---------हाँ इसकी पृष्ठभूमि में भाई-बहन, सखा-सखी, पत्नी, स्कूल-कालिज के साथी-सहपाठी, चिकित्सा-महाविद्यालय के साथी-सहपाठी, चिकित्सकीय सेवा में वरिष्ठ-जन, कनिष्ठ सहयोगी, वरिष्ठ चिकित्सक गण, सहयोगी कवि-साहित्यकार एवं प्रशंसकगण आदि द्वारा समय-समय पर की गयीं टीका-टिप्पणियाँ ....”...जाने कहाँ कहाँ तक सोचते रहते हो... कब तक यूंही सोचते रहोगे दूसरों के लिए.... यूं तो मुझे भी भूल जाओगे इसी तरह......बड़े विचित्र ख्यालों वाला व्यक्ति है ....जाने क्या-क्या उल-जुलूल सोचते रहते हो यार?....ये बड़े-बड़े विचित्र से विचार कहाँ से आते हैं तुम्हारे खुराफाती दिमाग में......ही इज द मैन ऑफ़ प्रिंसिपल्स....ये तो हमारा काम करेगा ही नहीं.....जाने किन ख्यालों में खोये रहते हो हरदम, समय पर कुछ याद ही नहीं रहता, जरूरी काम भूल जाते हो .... ये तो खाना खाने के बाद यह भी नहीं बता पाता कि नमक था भी या नहीं....तुम सर्जरी मत लेना, तुम भूलते बहुत हो.... आपके लिए तो ‘आउट आफ साईट आउट आफ माइंड’ ही होता है सबकुछ....” जैसे आप कभी किसी का पक्ष नहीं लेते और लोग एसे नहीं होते.... आपके पास कहाँ से ख्याल आते हैं कविता-कहानी-उपन्यास लिखने के लिए...आपकी प्रेरणा कौन है....कौन किसकी प्रेरणा है? ...आदि आदि ...”... भी हैं |

------ और अंत में मनुस्मृति पर अध्ययन-मनन करते हुए एवं ‘आधुनिक-मनुस्मृति’ शीर्षक से कुछ अगीत काव्य-रचनाये ब्लॉग पर प्रकाशित करते हुए, ब्लॉग के उपरोक्त शीर्षक पर ध्यान गया और एक दिन अचानक ही यह विचित्र विचार मन में उद्भूत हुआ कि क्यों न अपने ये विभिन्न विचित्र विचारों के संकलन द्वारा मनुस्मृति की भांति...’आधुनिक-मनुस्मृति’ की रचना की जाय | जो परिवर्ती विचार द्वारा आज ‘श्यामस्मृति’ नाम से आपके सम्मुख प्रस्तुत है |

----- प्रस्तुत कृति ‘श्याम-स्मृति’ ..मेरी स्मृति में आये हुए विविध विषयक विचार, उपरोक्त टिप्पणियों, टीकाओं, समीक्षाओं, आपसी-वार्ताओं, मंचीय-वार्ताओं, कथनों, गोष्ठियों, सभाओं, वक्तव्यों, संभाषणों, साक्षात्कारों आदि में व्यक्त हुए मेरे स्वतंत्र विचारों के साथ ही विभिन्न आलेखों, कथाओं, रचनाओं, कविताओं, ब्लॉग-पोस्टों, स्वयं द्वारा की गयी टिप्पणियों, वाद-विवाद, बहस आदि में व्यक्त किये गए स्वतंत्र विचार, नवीन चिंतनयुक्त स्थापनाओं का संग्रह है | }


श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा .



-----यह भारतीय धरती व वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य, बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी, सदा खड़े-खड़े, भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने-रहने वाले अँगरेज़, महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |

------यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता, इसकी संस्कृति, में रचा-बसा है, इसके जल में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है | प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस है और यहाँ की हर श्वांस प्रेम है |

                  यह पुरुरवा-उर्वशी  का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और ताजमहल का देश है | जहां विश्व में मानव-सृष्टि के सर्वप्रथम काव्य ऋग्वेद में संदेशित है ---

"मा विदिष्वावहै"...किसी से भी विद्वेष न करें ........एवं
"समानी अकूती समानि हृदयानि वा
समामस्तु वो मनो यथा वै सुसहामती|"

.....हम सबके मन, ह्रदय व कृतित्व सहमति व समानता से परिपूर्ण हों|





  

सोमवार, 28 नवंबर 2016

पांच त्रिपदा अगीत छंद - डा श्याम गुप्त

                    पांच त्रिपदा अगीत छंद ---- मेरे द्वारा सृजित , अगीत कविता विधा का एक छंद ----तीन पंक्तियाँ, प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ , अतुकांत ....
१.
जग में खुशियाँ है उनसे ही,
हसीन चेहरे खिलते फूल; .
हंसते रहते गुलशन गुलशन |


2.
चमचों के मज़े देख हमने,
आस्था को किनारे रख दिया;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला |
3.
खुश होकर फूँका उनका घर,
अपना घर भी बचा न पाए ;
चिंगारी उड़कर पहुँची थी |
४.
प्रकृति का सौंदर्य मधुरतम,
पर प्रियतम का वह सुन्दर मुख;
उपमा स्वयं लजा जाती है |
५.
ज़िंदगी की डोर लम्बी है,
थामना भी आना चाहिए;
हंसने का बहाना चाहिए |

शनिवार, 26 नवंबर 2016

युद्ध व मानव तथा दाशराज्ञ-युद्ध --डा श्याम गुप्त


                                      



                          युद्ध व मानव तथा दाशराज्ञ-युद्ध 



        आज सिन्धु सतलुज व्यास व रावी नदी के जल में से पाकिस्तान को जल की एक बूँद भी नहीं देंगे के समाचार पर भारत-आर्यावर्त के इतिहास के एक अति महत्वपूर्ण पुरा कालखंड की, वेदों में प्रमुखता से वर्णित रावी नदी तट पर हुए दाशराज्ञ युद्ध की स्मृतियाँ पुनः मस्तिष्क में जीवंत होने लगती हैं जो आर्यावर्त का प्रथम महायुद्ध था जिसने विश्व इतिहास की दिशा बदल दी जिसका एक प्रमुख कारण जल-बंटवारा ही था |
        आज हम चाहे जितना कहते रहें कि आपसी विवादों, झगड़ों, मसलों, मामलों, विरोधों  का समाधान वार्ताओं से होना चाहिए परन्तु एसा होता नहीं है, न कभी हुआ, न इतिहास में न वर्त्तमान में, न भविष्य में भी एसा होने की संभावना है, क्योंकि आपसी विरोध मूलतः विचारधाराओं का होता है जो वर्चस्व-स्थापना, आर्थिक, धर्म, कभी ‘विनाशाय च दुष्कृताम’ या अन्य विविध कारणों का कारण बनता है | एक विचारधारा कभी दूसरी विचारधारा को मान्यता नहीं देती चाहे वह उससे श्रेष्ठ ही क्यों न हो, इसका कारण है उस विचार वर्ग का अहं | अतः युद्ध अनिवार्य होजाता है | महाभारत युद्ध के अंत में गांधारी के कहने पर कि कृष्ण यदि तू चाहता तो युद्ध रुक सकता था, कृष्ण का यही उत्तर था कि माँ मैं कौन होता हूँ अवश्यंभावी के सम्मुख, युद्ध होते रहेंगे |
            अतः भूमंडल या किसी क्षेत्र व देश की राजनैतिक व सामाजिक दिशा व दशा सदैव युद्धों से ही निर्णीत होती रही है | युद्ध करना अर्थात आपसी संघर्ष मानव का मूल कृतित्व रहा है| यदि संघर्ष के लिए विरोधी समुदाय उपस्थित नहीं है तो भाई-भाई ही युद्धरत होते रहे हैं| युद्धों का मूल अभिप्राय वर्चस्व की स्थापना होता है जिसका कारण आर्थिक एवं विचारधाराओं की स्थापना व प्रसार होता है | मानव इतिहास के बड़े– बड़े युद्ध जिन्होंने भूमंडल की दिशा व दशा को परिवर्तित किया है, प्रायः भाई-भाइयों के मध्य ही हुए हैं | विश्व के सर्वप्रथम युद्ध देवासुर संग्रामों में देव व असुर भी भाई भाई ही थे | यद्यपि ऋग्वेद में युद्ध से मानव के अहित का स्पष्ट उल्लेख है --
यत्रा नरः समयन्ते कृतध्वजों यस्मिन्नाजा भवति किंचन प्रियं |
यत्रा भयन्ते भुवना स्वर्द्द्शस्तत्रा न इन्द्रावरुणाधि बोचतम |----ऋग्वेद मंडल-७ सू.८३ ...
---जहां मनुष्य अपनी अपनी ध्वजाएं उठाये हुए युद्ध मैदान में एकत्र होते हैं, ऐसे युद्धों से मानवों का अहित ही होता है | हे इंद्र व वरुण ! आप सुख शान्ति जैसे स्वर्गीय स्थिति के पक्षधर हम सबके संग्राम में रक्षण प्रदान करें |
       आज भी विश्व में अधिकाँश देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था है परन्तु चुनावों में मत (वोट- अर्थात् अपनी विचार धारा की स्वीकृति ) प्राप्ति हेतु एक ही देश के नागरिक आपस में छल, बल व धन आधारित युद्धरत होते हैं | प्रायः राजनैतिक पार्टिया किसी एक व्यक्ति के बलबूते पर ही आगे चलती हैं |
गणतंत्र व राज्यतंत्र ---गणतंत्र या लोकतंत्र कोई नवीन व्यवस्था नहीं है अपितु इसकी अवधारणा वैदिक काल से ही चली आरही है | वैदिक व्यवस्था में राजा होते हुए भी लोकतांत्रिक व्यवस्था थी ताकि राजा निरंकुश न रहे| परन्तु पूर्णतः राजा विहीन गणतांत्रिक व्यवस्था कभी फल-फूल नहीं पाई, सफल नहीं रही | मूलतः यह देखा गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था सदैव ही राजतन्त्रिक व्यवस्था से परास्त होती रही है, सारा इतिहास साक्षी है | वेदों में प्रमुखता से वर्णित दाशराज्ञ युद्ध जो शायद आर्यावर्त का प्रथम महायुद्ध था, भी लोकतंत्र की पराजय की कहानी है |
           वैदिक काल में भारतीय सभ्यता का विस्तार दुनिया के सभी देशों में था जिसे जम्बूद्वीप कहा जाता है । लोग विभिन्न जातियों, जनजातियों व कबीलों में बंटे थे। उनके प्रमुख राजा कहलाते थे, बीतते समय के साथ-साथ उनमें अपनी सभ्यता व राज्य विस्तार की भावना बढ़ी और उन्होंने युद्ध और मित्रता के माध्यम से खुद का चतुर्दिक विस्तार का प्रयास किया। और इस क्रम में कई जातियां, जनजातियां और कबीलों का लोप सा हो गया। एक नई सभ्यता और संस्कृति का उदय हुआ।
     इस क्रम में भारतीय उपमहाद्वीप का पहला दूरगामी असर डालने वाला युद्ध बना दशराज युद्ध। इस युद्ध ने न सिर्फ आर्यावर्त को बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया बल्कि राजतंत्र के पोषक महर्षि वशिष्ट की लोकतंत्र के पोषक महर्षि विश्वामित्र पर श्रेष्ठता भी साबित कर दी
      उस काल में राजनीतिक व्यवस्था गणतांत्रिक समुदाय से परिवर्तित होकर राजाओं पर केंद्रित  होती जारही थी। दाशराज्ञ युद्ध में भरत कबीला राजा प्रथा आधारित था जबकि उनके विरोध में खड़े कबीले लगभग सभी लोकतांत्रिक थे|
     अधिकाँश हम राम–रावण एवं महाभारत के युद्धों की विभीषिका से ही परिचित हैं, परन्तु इस बात से अनभिज्ञ हैं कि राम-रावण युद्ध से भी पूर्व संभवतः 7200 ईसा पूर्व त्रेतायुग के अंत में एक महायुद्ध हुआ था जिसे दशराज युद्ध (दाशराज्ञ युद्ध ) के नाम से जाना जाता है। यह आर्यावर्त का सर्वप्रथम भीषण युद्ध था जो आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच ही हुआ था। प्रकारांतर से इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं। इस युद्ध के परिणाम स्वरुप ही मानव के विभिन्न कबीले भारत एवं भारतेतर दूरस्थ क्षेत्रों में फैले व फैलते गए |
        ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है। इससे यह भी पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी। इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था। यह एक ऐसा युद्ध था जिसके बाद भारतीय उपमहाद्वीप में धर्म और इतिहास ने करवट बदली जिसका प्रभाव राम-रावण व महाभारत युद्ध जैसा ही था जिसने भारतीय समाज व संस्कृति की दशा व दिशा निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
            उन दिनों पूरा आर्यावर्त कई टुकड़ों में बंटा था और उस पर विभिन्न जातियों व कबीलों का शासन था। भरत जाति के कबीले के राजा सुदास थे। उन्होंने अपने ही कुल के अन्य कबीलों से सहित विभिन्न कबीलों से युद्ध लड़ा था। उनकी लड़ाई सबसे ज्यादा पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्मु, अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन कबीले के लोगों से हुई थी। सबसे बड़ा और निर्णायक युद्ध पुरु और तृत्सु नामक आर्य समुदाय के नेतृत्व में हुआ था। इस युद्ध में जहां एक ओर पुरु नामक आर्य समुदाय के योद्धा थे, तो दूसरी ओर 'तृत्सु' नामक समुदाय के लोग थे। दोनों ही हिंद-आर्यों के 'भरत' नामक समुदाय से संबंध रखते थे।
      'तृत्सु समुदाय का नेतृत्व पंचाल के शासक राजा सुदास ने किया। सुदास दिवोदास के पुत्र थे, जो स्वयं सृंजय के पुत्र थे। सृंजय के पिता का नाम देवव्रत था। सुदास के सलाहकार महर्षि वशिष्ट थे जो राजा शासन तंत्र के समर्थक थे |
       सुदास के विरुद्ध दस राजा (कबीले-जिनमें कुछ अनार्य कबीले भी शामिल थे ) युद्ध लड़ रहे थे जिनका नेतृत्व पुरु कबीला के राजा संवरण कर रहे थे, जिनके सैन्य सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे जो लोकतांत्रिक शासन तंत्र के समर्थक थे। हस्तिनापुर के राजा संवरण भरत के कुल के राजा अजमीढ़ के वंशज थे | पुरु समुदाय ऋग्वेद काल का एक महान परिसंघ था जो सरस्वती नदी के किनारे बसा था | आर्यकाल में यह जम्मू-कश्मीर और हिमालय के क्षेत्र में राज्य करते थे।
     
       वस्तुतः यह सत्ता और विचारधारा की लड़ाई थी।   सबसे बड़ा कारण पुरोहिताई और जल बंटवारे का झगड़ा था। प्रारंभ में सुदास के राजपुरोहित विश्वामित्र थे। बाद में मतभेद के बाद सुदास ने विश्वाममित्र को हटाकर वशिष्ठ् को अपना राजपुरोहित नियुक्त कर लिया था। बदला लेने की भावना से विश्वामित्र ने पुरु, यदु, तुर्वश, अनु और द्रुह्मु तथा पांच अन्य छोटे कबीले अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन आदि दस राजाओं के एक कबीलाई संघ का गठन तैयार किया जो ईरान, से लेकर अफगानिस्तान, बोलन दर्रे, गांधार व रावी नदी तक के क्षेत्र में निवास करते थे |
     वास्तव में तो इस युद्ध की पृष्ठभूमि वर्षों पूर्व तैयार हो गई थी। तृत्सु राजा दिवोदास एक बहुत ही शक्तिशाली राजा था जिसने संबर नामक राजा को हराने के बाद उसकी हत्या कर दी थी और उसने इंद्र की सहायता से उसके बसाए 99 शहरों को नष्ट कर दिया। इंद्र ने धरती पर 52 राज्यों का गठन किया था। इंद्र के विरूद्ध भी कई राजा थे जो बाद में धीरे-धीरे वहां छोटे बड़े 10 राज्य बन गए। वे दस राजा एकजुट होकर रहते थे | यही दस कुल या कबीले संवरण के नेतृत्व व विश्वामित्र के परामर्श पर एक जुट होगये |
        एक ओर वेद पर आधारित भेदभाव रहित वर्ण व्यवस्था का विरोध करने वाले विश्वामित्र के सैनिक थे तो दूसरी ओर एकतंत्र और इंद्र की सत्ता को कायम करने वाले गुरु वशिष्ठ की सेना के प्रमुख राजा सुदास थे।
     दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। दसराज युद्ध में इंद्र और उसके समर्थक विश्‍वामित्र का अंत करना चाहते थे। विश्‍वामित्र को भूमिगत होना पड़ा। दोनों ऋषियों का देवों और ऋषियों में सम्मान था,  दोनों में धर्म और वर्चस्व की लड़ाई थी। इस लड़ाई में वशिष्ठ के 100 पुत्रों का वध हुआ। फिर  डर से विश्वामित्र के 50 पुत्र तालजंघों (हैहयों) की शरण में जाकर उनमें मिलकर म्लेच्छ हो गए। तब  हार मानकर विश्वामित्र वशिष्ठ के शरणागत हुए और वशिष्ठ ने उन्हें क्षमादान दिया। वशिष्ठ ने श्राद्धदेव मनु (वैवस्वत) 6379 वि.पू. को परामर्श देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बंटवाकर दिलाया।

      अर्थात यह युद्ध राम-रावण युद्ध से लगभग १००० वर्ष पहले हुआ था क्योंकि राम के काल (लगभग ५११४ वर्ष ईपू ) में दोनों ऋषियों में वैमनस्य के भाव नहीं दिखाई देते तथा भरतवंश के, रघुवंश की पीढी क्रम के अनुसार ५६वीं पीढी में सुदास हुए हैं और ६८ वीं पीढी में राम |

        यद्यपि एक मत के अनुसार माना जाता है कि यह युद्ध त्रेता के अंत में राम-रावण

युद्ध के 150 वर्ष बाद हुआ था। क्योंकि हिन्दू काल वर्णन में चौथा काल : राम-वशिष्ठ काल वर्णन के अनुसार रामवंशी लवकुश, बृहद्वल, निमिवंशी शुनक और ययाति वंशी यदु, अनु, पुरु, दुह्यु, तुर्वसु का राज्य महाभारतकाल तक चला और फिर हुई महाभारत।  इन्हीं पांचों से मलेच्छ, यादव, यवन, भरत और पौरवों का जन्म हुआ। इनके काल को ही आर्यों का काल कहा जाता है। आर्यों के काल में जिन वंश का सबसे ज्यादा विकास हुआ, वे हैं- यदु,  तुर्वसु,  द्रुहु,  पुरु और अनु। उक्त पांचों से राजवंशों का निर्माण हुआ। यदु से यादव,  तुर्वसु से यवन,  द्रुहु से भोज,  अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव l

 

        इस युद्ध में सुदास के भरतों की विजय हुई और उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप के आर्यावर्त और आर्यों पर उनका अधिकार स्थापित हो गया। इस देश का नाम भरतखंड एवं इस क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाता था परन्तु इस युद्ध के कारण आगे चलकर पूरे देश का नाम ही आर्यावर्त की जगह 'भारत' पड़ गया।
       यद्यपि कुछ समय बाद ही राजा सुदास के बाद राजा संवरण ने शक्ति बढ़ाकर पंचाल राज्य को अपने अधीन कर लिया परन्तु कुछ समय बाद ही पंचाल पुन: स्वतंत्र हो गया। रामचंद्र के युग के बाद पुन: एक बार फिर यादवों और पौरवों ने अपने पुराने गौरव के अनुरूप आगे बढ़ना शुरू कर दिया। मथुरा से द्वारिका तक यदुकुल फैल गए और अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज उनमें मुख्य हुए। कृष्ण उनके सर्वप्रमुख प्रतिनिधि थे।
     संवरण के कुल के कुरु ने पांचाल पर अधिकार कर लिया | कुरु के नाम से कुरु वंश प्रसिद्ध हुआ,  राजा कुरु के नाम पर ही सरस्वती नदी के निकट का राज्य कुरुक्षेत्र कहा गया।  उस के वंशज कौरव कहलाए और आगे चलकर दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। भाई भाइयों, कौरवों और पांडवों का विख्यात महाभारत युद्ध पुनः एक बार भारतीय इतिहास की विनाशकारी घटना सिद्ध हुआ।
        


मंगलवार, 22 नवंबर 2016

अखिल भारतीय अगीत परिषद् एवं नवसृजन साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था के संयुक्त तत्वावधान में एक सरस काव्य गोष्ठी -डा श्याम गुप्त


अखिल भारतीय अगीत परिषद् एवं नवसृजन साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था के संयुक्त तत्वावधान में एक सरस काव्य गोष्ठी -डा श्याम गुप्त


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                                          साहित्यिक गोष्ठी संपन्न 


                          दि. २०-११-२०१६ रविवार को अखिल भारतीय अगीत परिषद् एवं नवसृजन साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था के संयुक्त तत्वावधान में एक सरस काव्य गोष्ठी सिटी कान्वेंट स्कूल, राजाजीपुरम के सभागार में आयोजित हुई | गोष्ठी की अध्यक्षता अ.भा.अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने की, मुख्य अतिथि डा श्याम गुप्त थे एवं विशिष्ट अतिथि द्वय कुमार तरल व डा सुभाष गुरुदेव थे | संचालन युवाओं की संस्था नवसृजन के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त द्वारा किया गया | वाणी वन्दना श्रीमती कामिनी श्रीवास्तव, कुमार तरल व मुरली मनोहर कपूर द्वारा की गयी | 

                                 गोष्ठी का शुभारम्भ युवा कवि मुकेश द्वारा सरस छंदों से किया गया | फुरकत लखीम पुरी की गज़ल व अरविन्द झा के छंदों, डा योगेश गुप्त की अतुकांत आध्यात्मिक कविताओं, देवेश द्विवेदी देवेश के हास्य व्यंग्य व विशाल मिश्र की श्रृंगार रचनाओं सहित लगभग ३० रचनाकारों ने अपने अपने गीत, ग़ज़ल, काविताएं आदि सामयिक व विविध विषयक रचनाओं से गोष्ठी को सुरम्यता व ऊंचाइयां प्रदान की |
नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष व गोष्ठी के संचालक डा योगेश गुप्त ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हुए गोष्ठी में प्रस्तुत रचनाओं में साहित्य, संस्कृति व सरोकारों की आवश्यक उपस्थिति पर हर्ष व्यक्त किया | विशिष्ट अतिथि द्वय द्वारा भी युवा कवियों की रचनाओं की प्रशंसा की गयी एवं |

                          मुख्य-अतिथि डा श्यामगुप्त ने अपने गीत, छंद व ग़ज़ल प्रस्तुति के साथ ही नवसृजन संस्था व युवा कवियों की श्रेष्ठ रचनाओं की प्रशंसा करते हुए कुछ साहित्य के पुरोधाओं द्वारा प्रचारित इस तथ्य को कि आज युवाओं की रचनाओं में श्रेष्ठता नहीं है को निराधार बताया | डा श्यामगुप्त ने कहा कि यद्यपि फेसबुक, ब्लॉग आदि अभिव्यक्ति की तमाम उपलब्ध सुविधाओं के कारण कुछ साहित्यिक श्रेष्ठता में गिरावट हुई है परन्तु युवाओं द्वारा उत्तम कोटि का श्रेष्ठ साहित्य भी सदा की भांति उपलब्ध है |

                              अध्यक्षीय वक्तव्य में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने गोष्ठी में प्रस्तुत सभी रचनाओं पर विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करते हुए उनकी श्रेष्ठता की प्रशंसा की एवं सुन्दर छंद रचनाएँ प्रस्तुत की |
डा योगेश गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया |

'नवसृजन संस्था की युवा ब्रिगेड ...'
युवा कवि ब्रिगेड

'मुख्य अतिथि , अध्यक्ष व विशिष्ट अतिथि द्वारा माँ सरस्वती को  माल्यार्पण'
माँ सरस्वती को माल्यार्पण



'कवि मुकेश का काव्यपाठ'
मुकेश के छंद
'नव सृजन के महामंत्री देवेश द्विवेदी का काव्य पाठ'
देवेश द्विवेदी का काव्यपाठ


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