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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

चिकित्सक दिवस परचिकित्सक, समाज व रोगी का त्रिपक्षीय विमर्श ...डा श्याम गुप्त ...


                           
  चिकित्सक दिवस परचिकित्सक, समाज व रोगी का त्रिपक्षीय विमर्श .....



                                “आँख मूँद कर डाक्टर को फोलो न करें रोगी “---
                         कुछ समय पहले चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्वयं ही चिकित्सा –सेवा में फैले हुए बौद्धिक भ्रष्टाचार का संज्ञान लिया था, जो स्वयं चिकित्सा सेवा में भ्रष्टाचार का जनक तो होता है ही अपितु सारे समाज में भी भ्रष्टाचार की जड़ें मज़बूत करने व शाखाएं फैलाने में भी लिप्त रहता है| निश्चय ही अन्य विशेषज्ञ –संस्थाओं, संस्थानों द्वारा भी ऐसे कदम उठाना चाहिए | सामान्य जन की अपेक्षा बौद्धिक वर्ग, सम्माननीय जनों व उनकी संस्थाओं का सदा ही अधिक दायित्व होता है|
                          एम्स के एपीडेमियोलोजी के यूनिट हेड ड़ा कामेश्वर प्रसाद ने चिकित्सा सेवा व चिकित्सक वर्ग में व्याप्त विशेषज्ञता- सेवा-भ्रष्टाचार के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए –अनावश्यक टेस्ट कराना, एक्सपायरी की दवा देना, विशेष कम्पनी के ही दवाएं लिखना व खरीदवाना, गैर आवश्यक दवाओं का प्रयोग व  अनावश्यक शल्य-क्रियाएँ आदि पर ध्यान दिलाया था |
चिकित्सा केम्प

तापक्रम जांच --स्नेहिल स्पर्श के साथ

पल्स पोलियो


                         डा प्रसाद ने यह भी कहा था कि  “आँख मूँद कर डाक्टर को फोलो न करें रोगी “--- परन्तु मेरे विचार से यह बात सर्वथा अनुचित है वह भी एक चिकित्सा–व्यक्तित्व विशेषज्ञ द्वारा | क्या वे यह समझते हैं कि रोगी या रोगी के साथी पर इतना समय होता है एवं वे चिकित्सा-तकनीक से इतने भिज्ञ हैं कि चिकित्सक की बात समझ सकें | उन्हें कुछ भी कह कर समझाया जा सकता है | सभी विशेषज्ञ–सेवाओं में ऐसा होता है जबकि चिकित्सा तो अति-विशिष्ट विषय है|  यह परामर्श एक ऐसे दुधारे अस्त्र की भांति है जो दोनों पक्षों के लिए हानिकर भी है और स्वयं चिकित्सा–संस्था के लिए दुविधा की असहज स्थिति  प्रदान करने वाली एवं समाज के लिए विषाणु समान तथा  जन आचरण के विपरीत | बिना खुली लंबी बहस, वाद-विवाद, जन-संपर्क व जन अभियान के ऐसा परामर्श एकांगी सोच ही कही जायगी | ड़ा प्रसाद एपीडेमिओलोजिस्ट थे शायद चिकित्सकीय- क्लिनीशियन नहीं अतः रोगी व चिकित्सक के अन्तःसम्बन्ध  की उन्हें कितनी जानकारी हो सकती है यह विचारणीय है ?
            जहां डाक्टर को भगवान मानने की बात की जाती थी वहाँ एसी सोच भगवान के बाद अब धरती के भगवान के प्रति भी असम्मान व अविश्वास की उत्पत्ति से अंततः रोगी का ही अहित होगा | जब तक रोगी को चिकित्सक पर पूर्ण विश्वास नहीं होगा त्वरित व उचित इलाज़ संभव नहीं | चिकित्सक अत्यधिक अविश्वास व रोक-टोक के कारण त्वरित व समुचित चिकित्सा से विरत होने लगेंगे | सब कुछ एक मशीन की भांति चलने लगेगा| रोगी-चिकित्सक सौहार्द समाप्त होने से सेवा भी मशीनी होजायगी| क्या पेड़ में रोग लगने पर पेड़ को ही काट दिया जाना चाहिए बजाय उसकी चिकित्सा के| समाज में, चिकित्सकों में व्याप्त भ्रष्ट आचरण से कठोरता से निपटा जाय ..न कि समष्टि में वैर, विद्वेष, अविश्वास व असंतोष की उत्पत्ति का परामर्श दिया जाय |
                            साथ ही हमें यह भी सोचना होगा कि इस सब की नौबत आई ही क्यों | चिकित्सकों व चिकित्सा जगत में भ्रष्टाचार आद्योपांत फैला हुआ है इसमें कोई शक नहीं है | जब तक स्वयं चिकित्सा जगत अपने अंदर व्याप्त..लालच, लोभ, धन-लोलुपता, का अंत नहीं करता ये परिस्थियां आती ही रहेंगी | उन्हें अपने आचरण, चिकित्सा-आचरण-नियम, शिक्षा प्राप्ति व समाप्ति के समय लिए गए अत्रि-शपथ या हिप्पोक्रेटिक शपथ को ध्यान में रखना होगा ताकि रोगी व समाज को आप पर, तथाकथित धरती के भगवान पर  विश्वास स्थापित हो |साथ ही बड़ी बड़ी कंपनियों द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा-सुविधाओं की लोलुपता से उपभोक्ता वर्ग अनावश्यक ही अत्यधिक सुविधाओं जिनका रोगी की सेवा से कोई सम्बन्ध नहीं होता व फाइव-स्टार सुविधा वाले चिकित्सालयों का उपभोग का लालच नहीं छोड़ेंगे यह समस्या प्रगति ही करेगी |
                                 हमारी सारी  चिकित्सा-पद्धति ...विदेशी एवं अंग्रेज़ी में होने के कारण भी भ्रष्टाचार का एक कारण बनती है |सिर्फ २% प्रतिशत जनता ही अंग्रेज़ी जानती है और भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसती है| अतः स्वदेशी चिकित्सा-पद्धतियों का प्रसार महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है|
            वास्तव में वैज्ञानिक, सामाजिक, साहित्यिक, मनो-वैज्ञानिक, प्रशासनिक व चिकित्सा-जगत .. आदि समाज के लगभग सभी मन्चों व सरोकारों से विचार मन्थित यह विषय उतना ही प्राचीन है जितनी मानव सभ्यता। आज के आपाधापी के युग में मानव-मूल्यों की महान क्षति हुई है; भौतिकता की अन्धी दौढ से चिकित्सा -जगत भी अछूता नहीं रहा है। अतः यह विषय समाज व चिकित्सा जगत के लिये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज जहां चिकित्सक वर्ग में व्यबसायीकरण व समाज़ के अति-आर्थिकीकरण के कारण तमाम भ्रष्टाचरण व कदाचरणों का दौर प्रारम्भ हुआ है वहीं समाज़ में भी मानव-मूल्यों के ह्रास के कारण, सर्वदा सम्मानित वर्गों के प्रति, ईर्ष्या, असम्मान, लापरवाही व पैसे के बल पर खरीद लेने की प्रव्रत्ति बढी है, जो समाज, मनुष्य, रोगी व चिकित्सक के मधुर सम्बंधों में विष की भांति पैठ कर गई है। विभिन्न क्षेत्रों में चिकित्सकों की लापरवाही,धन व पद लिप्सा ,चिकित्सा का अधिक व्यवसायीकरण की घटनायें यत्र-तत्र समाचार बनतीं रहती हैं। वहीं चिकित्सकों के प्रति असम्मानजनक भाव, झूठे कदाचरण आरोप,मुकदमे आदि के समाचार भी कम नहीं हैं। यहां तक कि न्यायालयों को भी लापरवाही की व्याख्या करनी पढी। अतःजहां चिकित्सक-रोगी सम्बन्धों की व्याख्या समाज़ व चिकित्सक जगत के पारस्परिक तादाम्य, प्रत्येक युग की आवश्यकता है, साथ ही निरोगी जीवन व स्वस्थ्य समाज की भी। आज आवश्यकता इस बात की है कि चिकित्सक-जगत, समाज व रोगी सम्बन्धों की पुनर्व्याख्या की जाय, इसमें तादाम्य बैठाकर इस पावन परम्परा को पुनर्जीवन दिया जाय ताकि समाज को गति के साथ-साथ द्रढता व मधुरता मिले।
       संस्कृति व समाज़ में काल के प्रभावानुसार उत्पन्न जडता, गतिहीनता व दिशाहीनता को मिटाने के लिये समय-समय पर इतिहास के व काल-प्रमाणित महान विचारों, संरक्षित कलापों को वर्तमान से तादाम्य की आवश्यकता होती है।  
          विश्व के प्राचीनतम व सार्व-कालीन श्रेष्ठ साहित्य, वैदिक-साहित्य में रोगी -चिकित्सक सम्बन्धों का विशद वर्णन है, जिसका पुनःरीक्षण करके हम समाज़ को नई गति प्र्दान कर सकते हैं।
चिकित्सक की परिभाषा
        ऋग्वेद -(१०/५७/६) मे क्थन है--"यस्तैषधीः सममत राजानाःसमिता विव ।
                                                           विप्र स उच्यते भि्षगुक्षोहामीव चातनः ॥"--जिसके समीप व चारों ओर औषधिया ऐसे रहतीं हैं जैसे राजा के समीप जनता,  विद्वान लोग उसे भैषजज्ञ या चिकित्सक कहते हैं। वही रोगी व रोग का उचित निदान कर सकता है।.... अर्थात एक चिकित्सक को चिकित्सा की प्रत्येक फ़ेकल्टी (विषय व क्षेत्र),  क्रिया-कलापों, व्यवहार व मानवीय सरोकारों में निष्णात होना चाहिये।
रोगी व समाज का चिकित्सकों के प्रति कर्तव्य--देव वैद्य अश्विनी कुमारों को ऋग्वेद में "धीजवना नासत्या" कहागया है... अर्थात जो अपनी स्वयम की बुद्धि एवं स्थापित सत्य की भांति सब को देखते एवं सबके प्रति व्यवहार करते हैं|  अतः रोगी व समाज़ को चिकित्सक के परामर्श व कथन को अपनी स्वयम की बुद्धि व अन्तिम सत्य की तरह विश्वसनीय स्वीकार करना चाहिये। ऋग्वेद के श्लोक १०/९७/४ के अनुसार
                        -"औषधीरिति मातरस्तद्वो देवी रूप ब्रुवे ।
                           सनेयाश्वं गां वास आत्मानाम तव पूरुष ॥"------औषधियां माता की भांति  अप्रतिम शक्ति से ओत-प्रोत होतीं हैं....हे चिकित्सक! हम आपको, गाय, घोडे, वस्त्र, ग्रह एवम स्वयं अपने आप को भी प्रदान करते हैं।.....अर्थात चिकित्सकीय सेवा का ऋण किसी भी मूल्य से नहीं चुकाया जा सकता। समाज व व्यक्ति को उसका सदैव आभारी रहना चाहिये।
चिकित्सकों के कर्तव्य व दायित्व---
१. रोगी चिकित्सा व आपात चिकित्सा- ऋचा ८/२२/६५१२-ऋग्वेद के अनुसार—
              "साभिर्नो मक्षू तूयमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरं ।"-- अर्थात हे अश्विनी कुमारो! (चिकित्सको) आप समाज़ की सुरक्षा, देख-रेख, पूर्ति, वितरण में जितने निष्णात हैं, उसी कुशलता व तीव्र गति से रोगी व पीढित व्यक्ति को आपातस्थिति में सहायता करें। अर्थात चिकित्सा व अन्य विभागीय कार्यों के साथ-साथ आपातस्थिति रोगी की सहायता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

२. जन कल्याण- ऋचा ८/२२/६५०६ के अनुसार—
      " युवो रथस्य परि चक्रमीयत इमान्य द्वामिष्ण्यति ।
       अस्मा अच्छा सुभतिर्वा शुभस्पती आधेनुरिव धावति ॥"--हे अश्वनी कुमारो!  आपके दिव्य रथ ( स्वास्थ्य-सेवा चक्र) का एक पहिया आपके पास है एक संसार में। आपकी बुद्धि गाय की तरह है।  --चिकित्सक की बुद्धि व मन्तव्य गाय की भांति जन कल्याण्कारी होना चाहिये।उसे समाज व जन-जन की समस्याओं से भली-भांति अवगत रहना चाहिये एवम सदैव सेवा व समादान हेतु तत्पर।
३. रोगी के आवास पर परामर्शऋग्वेद-८/५/६१००-कहता है-
चिकित्सकों का सामाजिक दायित्व---पल्स पोलियो अभियान
       "महिष्ठां वाजसात्मेष्यंता शुभस्पती गन्तारा दाषुषो ग्रहम ॥"--गणमान्य, शुभ, सुविज्ञ, योग्य एवम रोगी की आवश्यकतानुसार आप ( अश्वनी कुमार-चिकित्सक)  स्वयं ही उनके यहां पहुंचकर उनका कल्याण करते हैं।
४.-स्वयं सहायता( सेल्फ़ विजिट)ऋचा ८/१५/६११७-में कहा है—
समाज का चिकित्सा प्रति दायित्व ---अस्पताल में खाद्य पदार्थ वितरण
      "कदां वां तोग्रयो विधित्समुद्रो जहितो नरा। यद्वा रथो विभिथ्तात ॥"--हे अश्विनी कुमारो! आपने समुद्र (रोग -शोक के ) में डूबते हुए भुज्यु ( एक राजा) को स्वयं ही जाकर बचाया था, उसने आपको सहायता के लिये भी नहीं पुकारा था। अर्थात चिकित्सक को संकटग्रस्त, रोगग्रस्त स्थित ज्ञात होने पर स्वयं ही, विना बुलाये भी पीडित की सहायता करनी चाहिये।
         यदि आज का  चिकित्सा जगत, रोगी, तीमारदार, समाज, शासन  सभी इन तथ्यों को आत्मसात करें, व्यवहार में लायें, तो आज के दुष्कर युग में भी आपसी मधुरता व युक्त-युक्त रोगी-चिकित्सक सम्बन्धों को जिया जासकता है, यह कोई कठिन कार्य नहीं,  आवश्यकता है सभी को आत्म-मंथन करके तादाम्य स्थापित करने की।




मंगलवार, 28 जून 2016

पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी -- डा श्याम गुप्त...

पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी -- डा श्याम गुप्त...

पुरुषार्थ ...विश्व सत्यं शिवं सुन्दरं क्यों...... कहानी 

             आधुनिक विज्ञान, दर्शन, अद्यात्म व अनुभव किसी समारोह हेतु सभा-स्थल पर एकत्र हुए तो परिचय प्रारम्भ हुआ |

                                 युवा ऊर्जा एवं ज्ञान से दीप्त विज्ञान ने बताया- मैं विज्ञान हूँ, प्रत्येक वस्तु व तथ्य के बारे में प्रयोगों पर विश्वास रखता हूँ, विस्तृत प्रयोगों के पश्चात ही प्रतिशत प्रतिफल के आधार पर निश्चित परिणाम के ज्ञान के पश्चात् ही सिद्धांत बनाता हूँ... मानव के उन्नत व प्रगति के कृतित्व हेतु |

             ललाट पर दीर्घ कालीन व्यवहारिक ज्ञान से अनुप्राणित अनुभव ने कहा- मैं तो जीवन के लम्बे अनुभव के बाद नियम बनाता हूँ तत्पश्चात सिद्धांत एवं प्राणी को ज्ञान प्रदान कर उन पर चलने की प्रेरणा देता हूँ |

            सुदर्शन व्यक्तित्व एवं शास्त्रीय ज्ञान से तेजस्वित दर्शन बोला- मैं तर्क व अनुभवों को शास्त्रीय तथ्यों की तुला पर तौल कर प्राणी को परमार्थ हित व सत्य के दर्शन कराता हूँ ताकि वह उच्च नैतिक आचरण एवं सत्य पर चले |

            धीर-गंभीर वाणी में अद्यात्म ने कहा – मैं परहित व परमार्थ कर्म को ईश्वर प्रेरणा व ईश्वर- प्रणनिधान द्वारा जीव को सत्य व कल्याण पर चलने को प्रेरित करता हूँ |

              वे वाद-विवाद व तर्क-वितर्क द्वारा स्वयं को अन्य से श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे थे कि लगे कि एक सुन्दर एवं तेजस्वी युगल ने प्रवेश किया |

अपना परिचय दें श्रीमान, सभी ने कहा |

             मैं कला हूँ – प्रत्येक वस्तु, तथ्य व कृतित्व को समुचित रूप से कैसे किया जाय इसका ज्ञान कराती हूँ ताकि वह सुन्दरतम हो | मैं ही श्रेष्ठ हूँ |
           मैं ज्ञान हूँ उसका साथी कहने लगा – और मैं ही तो आप सब में अनुप्राणित हूँ, यदि मैं ही न रहूँ तो विज्ञान, अनुभव, अद्यात्म, दर्शन, कला..... सत्य का ज्ञान कैसे कर पायेंगे एवं अपने को कैसे व्यक्त करेंगे | मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ |

              वे आपस में पुनः तर्क-वितर्क में उलझ गए | तभी कर्मठता से हृष्ट-पुष्ट काया वाले एक अन्य व्यक्ति ने प्रवेश किया एवं झगड़े का कारण जानकर हँसते हुए, बोला –
‘मैं ही आप सबको, संसार को व प्राणी को कृतित्व में प्रवृत्त करता हूँ मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ |’

 सबने साश्चर्य पूछा, आप कौन है श्रेष्ठ्वर ?
‘मैं कर्म हूँ |’

             तभी सौम्य वेशधारी, ललाट पर चन्दन-लेप की शीतलता धारण किये हुए धर्म अवतरित हुआ और कर्म को लक्ष्य करके कहने लगा, ‘ परन्तु मित्र, तुम भी मेरे आधार पर चले बिना प्राणी को परमार्थ भाव पर उन्मुख नहीं कर सकते| अतः मैं श्रेष्ठतम हूँ |

           एक ओर चुपचाप बैठे ‘प्राण’ ने वाद-विवाद में भाग लेते हुए कहा, मैं ही महानतम हूँ, जिस जीव के हेतु आप हैं, मैं ही तो उसमें समाहित रहता हूँ, तभी वह जीव अनुप्राणित होता है ...जीव कहलाता है |

              उसी समय प्रतिभा से जगमगाते हुए आनन से महिमा मंडित एक अति तेजस्वी व्यक्तित्व ने प्रवेश किया, जिसके साथ-साथ ही एक छाया पुरुष भी चल रहा था | दोनों ही अश्विनी बन्धुओं की भाँति एक ही रूप थे ...रूप, रंग, आकार व तेज में एक समान थे |
           एक कहने लगा,’ आप सब महान हैं परन्तु आप सबका अपना स्वयं का अस्तित्व ही क्या है अतः झगडे का कोई आधार ही नहीं |

‘ इसका क्या अर्थ ?’ सभी ने एक साथ पूछा |

                ‘मैं ही आप सबमें समाहित होकर एवं स्वयं में आप सबको समाहित करके सृष्टि के प्रत्येक कृतित्व में प्रवृत्त होता हूँ तभी विश्व एवं विश्व का प्रत्येक कृतित्व आकार लेता है एवं सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है |’

सुन्दरम..सुन्दरं.... आप कौन हैं श्रेष्ठ्वर, सभी एक साथ कहने लगे |

मैं पुरुषार्थ, अपने साथी की आत्मा हूँ न...यह मानव है यह मेरा शरीर है |

साधुवाद...साधुवाद....श्रेष्ठ है ..सत्य है ...यह कहते हुए वे सब उनमें प्रविष्ट होगये |

सोमवार, 20 जून 2016

जलचक्र ---- कविता ...डा श्याम गुप्त .....


                       


कविता-----जलचक्र -पानी की बूँद.....

Drshyam Gupta's photo. में हूँ पानी की वही बूँद ,
इतिहास मेरा देखा भाला |
मैं शाश्वत, विविध रूप मेरे,
सागर घन वर्षा हिम नाला। 1


धरती इक आग का गोला थी,
जब मार्तंड से विलग हुई।
शीतल हो अणु परमाणु बने,
बहु विधि तत्वों की सृष्टि हुई । 2

आकाश व धरती मध्य बना,
जल वाष्प रूप में छाया था।
शीतल होने पर पुनः वही,
बन प्रथम बूँद इठलाया था । 3

जग का हर कण कण मेरी इस ,
शीतलता का था मतवाला ।
मैं पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला।। 4

'मैं वही बूँद हूँ पानी की' फिर युगों युगों तक वर्षा बन,
मैं रही उतरती धरती पर ।
तन मन पृथ्वी का शीतल कर,
मैं निखरी सप्तसिन्धु बनकर। 5

पहली मछली जिसमें तैरी,
मैं उस पानी का हिस्सा हूँ।
अतिकाय जंतु से मानव तक,
की प्यास बुझाता किस्सा हूँ। 6

रवि ने ज्वाला से वाष्पित कर,
फिर बादल मुझे बना डाला।
मैं हूँ पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 7

मैं वही बूँद जो पृथ्वी पर,
पहला बादल बनकर बरसी।
नदिया नाला बनकर बहती,
झीलों तालों को थी भरती। 8

राजा संतों की राहों को,
मुझसे ही सींचा जाता था।
मीठा ठंडा और शुद्ध नीर,
कुओं से खींचा जाता था। 9

बन कुए सरोवर नद झीलें ,
मैंने सब धरती को पाला।
मैं वही बूँद हूँ पानी की ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 10

ऊँचे ऊँचे गिरि- पर्वत पर,
शीतल होकर जम जाती हूँ।
हिमवानों की गोदी में पल,
हिमनद बनकर इठलाती हूँ। 11

सविता के शौर्य रूप से मैं,
हो द्रवित भाव जब बहती हूँ।
प्रेयसि सा नदिया रूप लिए,
सागर में पुनः सिमटती हूँ। 12

मैं उस हिमनद का हिस्सा हूँ,
निकला पहला नदिया नाला।
मैं हूँ पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 13

तब से अब तक मैं वही बूँद,
तन मन मेरा यह शाश्वत है।
वाष्पन संघनन व द्रवणन से ,
मेरा यह जीवन नियमित है। 14

मैं वही पुरातन जल कण हूँ ,
शाश्वत हैं नष्ट न होते हैं ।
यह मेरी शाश्वत यात्रा है,
जलचक्र इसी को कहते हैं। 15

सूरज सागर नभ महि गिरि ने,
मिलकर मुझको पाला ढाला।
मैं ही पानी बादल वर्षा,
ओला हिमपात ओस पाला। 16

मेरे कारण ही तो अब तक,
नश्वर जीवन भी शाश्वत है।
अति सुख-अभिलाषा से नर की,
अब जल थल वायु प्रदूषित है ।१७.

सागर सर नदी कूप पर्वत,
मानव कृत्यों से प्रदूषित हैं।
इनसे ही पोषित होता यह,
मानव तन मन भी दूषित है। 18

प्रकृति का नर ने स्वार्थ हेतु,
है भीषण शोषण कर डाला।
मैं हूँ पानी की वही बूँद ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 19
'जलचक्र'
कर रहा प्रदूषण तप्त सभी,
धरती आकाश वायु जल को।
अपने अपने सुख मस्त मनुज,
है नहीं सोचता उस पल को। 20

पर्वतों ध्रुवों की हिम पिघले,
सारा पानी बन जायेगी।
भीषण गर्मी से बादल बन,
उस महावृष्टि को लायेगी। 21

आयेगी महा जलप्रलय जब,
उमड़े सागर हो मतवाला।
मैं वही बूँद हूँ पानी की ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ २२.

रविवार, 29 मई 2016

दोहे !


बारिश बिन धरती फटी, सुखे नदीतल ताल
धरणी जल दरिया सुखी, झरणा इक-सी हाल |

बादल जल सब पी गया, धरा का बुरा हाल
कण भर जल नल में नही, तृषित है बेहाल |

श्याम मेघ बरसो यहाँ, धरती से क्या बैर
अटल सत्य मानो इसे, हम तुमकु किये प्यार |

कहीं बाड़ें कहीं सुखा, सोचो मुक्ति उपाय
कम से कम जल वापरे, इ है उत्तम उपाय |

अतिशय गरमी आज है, चरम छोर पर ताप
खाली नल में मुहँ लगा, प्यासा करे संताप |

रवि है आग की भट्टी, बरस रहा है आग
झुलस रहा है आसमाँ, जलता जंगल बाग़  |

नहा कर वर्षा नीर से, फलता वृक्ष फलदार
फूल के हार से धरा, करती है श्रृंगार |

जल है तो सब जान है, जल बिन सब है मृत
मरने वालों की दवा, नीर ही है अमृत |


© कालीपद ‘प्रसाद”

बुधवार, 25 मई 2016

भारतीय साहित्य में स्त्री-पुरुष के परस्पर व्यवहार का संतुलित रूप --डा श्याम गुप्त ..



भारतीय साहित्य में स्त्री-पुरुष के परस्पर व्यवहार का संतुलित रूप 
          भारतीय संस्कृति व प्रज्ञातंत्र में तथा तदनुरूप भारतीय साहित्य में, स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी के आपसी व्यवहार के संतुलन का अत्यधिक महत्व रखा गया है | आज भी यह भाव परिलक्षित करती हुईं ‘किस्सा तोता-मैना’ की कथाएं स्त्री-पुरुष के आचार-व्यवहार की समता व समानता की कहानियां ही हैं जिनमें दोनों के ही अनुचित आचरणों का विविध रूप से वर्णन किया गया है | यदि पुरुष प्रधान समाज में यह अपेक्षा थी कि महिलायें पुरुष की महत्ता को पहचानें व मानें एवं यहाँ तक कि वे पति की चिता पर सती भी होजायं, तो पुरुष से भी यही अपेक्षा की जाती थी कि वे महिला के अधिकार व सम्मान सर्वाधिक ध्यान रखें |



         यद्यपि विभिन्न कथाओं आख्यानों में पति या प्रेमी के लिए बिछोह सहने वाली महिलाओं की जितनी कथाएं हैं उतनी पुरुषों की नहीं, जबकि पुरुषों के भी स्त्री के प्रति बिछोह दुःख व पीढा की भी उतनी ही घटनाएँ उपलब्ध हैं | क्या कोई आज यह मानने को तैयार होगा कि किसी पुरुष ने भी इसलिए अपने प्राण त्याग दिए कि वह पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता था |


          दैव-सभ्यता अथवा मानव सभ्यता के आदिकाल में स्वयं शिव, सती का शरीर लेकर समस्त ब्रह्माण्ड में घूमते रहे, यह किसी भी पुरुष का स्त्री के प्रति सर्व-सम्पूर्ण समर्पण था| पुरुरवा का उर्वशी के विरह में समस्त उत्तराखंड में घूमते रहना, महाराजा अज द्वारा पत्नी महारानी इंदुमती की मृत्यु पश्चात सदमे से कुछ समय उपरांत ही देह त्याग देना, दुष्यंत की शकुन्तला के लिये व्याकुलता से खोज, मेघदूतम के यक्ष का प्रेमिका को बादल द्वारा भेजा गया सन्देश, भृंगदूतं काव्य में राम का सीता की खोज हेतु भ्रमर को भेजना,  दशरथ का कैकेयी के कारण प्राण त्याग, स्वयं राम का सीता के अपहरण के समय राम रोते हुए समस्त वन-पेड़ पौधों, पशु-पक्षियों से विरह-व्यथा कहते हुए विक्षिप्त की भाँति घूमते रहे | सीता के लिए सागर सेतु निर्माण, महासमर, सीता वनगमन के वियोग में दूसरा विवाह न करना एवं सीता के धरती में समा जाने के उपरांत सरयू में जल समाधि लेना, कि वे पत्नी के बिना नहीं रह सकते थे, श्री कृष्ण का वन में राधे राधे रटते हुए घूमते रहना, राधा व गोपियों हेतु उद्धव को भेजना आदि घटनाएँ इस तथ्य की साक्षी हैं कि पुरुषों/पतियों ने भी इतिहास में स्त्री/पत्नी के लिए उतने ही, कष्ट सहे हैं एवं उत्सर्ग किया है जितना स्त्रियों ने |  



         वस्तुतः परवर्ती काल में एवं भक्ति साहित्य में पुरुष का नारी के प्रति इस प्रकार का प्रेम नहीं दिखलाया गया है, जहां महिला-भक्त का भगवान् के प्रति भक्त-प्रेम दर्शित है वहीं पुरुष-भक्त का देवी के प्रति पुत्रवत वात्सल्य प्रेम दर्शाया गया है | इस प्रकार कालान्तर में पुरुषों के समर्पण एवं पत्नी-स्त्री के लिए त्याग की कथाएं भुला दी गयीं | पुरुष प्रधान समाज में नारी की महत्ता व महत्त्व की सदैव प्रधानता बनी रहे एवं नारी,  समाज व पुरुष का प्रेरणा-श्रोत बनी रहे अतः नारी के त्याग की कथाएं प्रमुखता पाती रहीं |




'दशरथ-कैकेयी'
दशरथ-कैकेयी
'पुरुरवा--उर्वशी विरह रत'
पुरुरवा -उर्वशी की याद में ...
'हे खग मृग हे मधुकर सैनी तुम देखी सीता मृगनयनी ...विरह रत राम ..'
राम--हे मधुकर हे खग मृग सेनी , तुम देखी सीता मृगनयनी ..
'शिव --सती के शव सहित ---'
शिव-सती
'पुरुरवा --उर्वशी विरह में समस्त उत्तराखंड (जम्बू-द्वीप) में वन वन घूमते हुए ....'
पुरुरवा--वन वन भ्रमण --उर्वशी विरह में

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