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शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

पञ्च दिवसीय पर्व समूह दीपावली व उसका महत्त्व ..डा श्याम गुप्त...



                     पञ्च दिवसीय पर्व समूह दीपावली व उसका महत्त्व 

 

नरकासुर




गोवर्धन पूजा
          

             भारतीय पर्वों की विशेषता है कि इनके दार्शनिक व तात्विक महत्त्व के साथ-साथ व्यवहारिक महत्त्व के प्रतिपादन हेतु विभिन्न सम्बंधित कथ्य-सूत्रों को जोड़ा गया है जो सिर्फ एक न होकर सदैव विविध सूत्रीय होते हैं | दीपावली मात्र एक पर्व या त्यौहार ही नहीं अपितु धनतेरस, नरक चतुर्दशी, मुख्य दिवाली-लक्ष्मीपूजन, गोवर्धन पूजन एवं यम द्वितीया या भाई दूज आदि का .....पञ्च-दिवसीय पर्व-समूह है जो स्वयं में एक जीवन-दर्शन का प्रतिपादन है |
१.धन तेरस  या धन्वन्तरी त्रियोदशी ... मानव जीवन के मूल-मन्त्र का प्रथम दर्शन व शर्त ..निरोगी काया अर्थात शारीरिक स्वास्थ्य सर्वप्रथम ...का तात्विक प्रतिपादन है | यह प्रथम वैद्य धन्वन्तरि की पूजा का पर्व है | इस दिवस पर नवीन वर्तन या चांदी सोने की वस्तुएं भी खरीदने का रिवाज़ है |
२.नरक चतुर्दशी...नरकासुर का नाश एवं महाकाली पूजा..अर्थात अज्ञान, अनाचार, अत्याचार, सामाजिक, मानवीय व मानसिक हीनता, दुर्वलता आदि प्रत्येक प्रकार की नकारात्मकता, दुष्टता, अहंकार का विनाश.......अर्थात मानसिक स्वास्थ्य व सामाजिक स्वास्थ्य की प्रतिष्ठा एवं शक्ति के पूजा का पर्व |
              इस दिवस पर महाकाली की पूजा अर्थात महाकाली द्वारा आदि काल में अज्ञानान्धकार रूपी नरकासुर का विनाश किया गया था| महाकाली वस्तुतः आदि-मूल शक्ति हैं | ( वैदिक नीला सूक्त के अनुसार ) आदि-ब्रह्म रूप महाविष्णु  की तीन पत्नियां ..भूदेवी, श्रीदेवी एवं नीला देवी हैं | भूमि एवं समस्त प्रकृति रूप...श्री, ऐश्वर्य, धन-धान्य, समृद्धि ,ऋद्धि-सिद्धि-प्रसिद्धि, यश-कीर्ति रूपी मूलतः दृश्य रूप हैं ..एवं नीला देवी आदि मूल शक्ति जो अदृश्य रूप ही हैं जो कभी योगमाया, कभी भगवती, कभी सहचरी-सखी आदि विविध रूप में प्रकट होती हैं |....महाकाली ही आदि-मूल शक्ति हैं जिनकी राम – रावण वध हेतु पूजा करते हैं....कृष्ण द्वारा राधा रूप में सदैव स्मरित-पूजित हैं एवं आदि रूप में वे महा-भगवती हैं जिनके वर्णन में स्वयं त्रिदेव भी समर्थ नहीं हैं |
सतयुग में बलि–वामन की घटना भी इसी दिवस पर हुई कही जाती है जिससे वामन रूप विष्णु द्वारा तीन पग में पृथ्वी नाप कर असुर राज महादानी बलि के अहं का विनाश किया गया | 
त्रेता युग में उत्पन्न नरकासुर या भौम्यासुर का वध भी इसी दिन श्रीकृष्ण ने पत्नी सत्यभामा की सहायता से किया था एवं बंधक बनाई हुई १६००० स्त्रियों को मुक्त कराया था जो विश्व मानव इतिहास में नारी-उद्धार का सर्वप्रथम उदाहरण था ...जिन्हें समाज द्वारा न स्वीकारे जाने की स्थिति में श्रीकृष्ण ने सम्मान सहित अपनी ही रानियों के समान स्थान दिया |

3.लक्ष्मी पूजन ..दिवाली ...दीपोत्सव ..दीपावली   जो मुख्य पर्व का दिवस है | दोनों प्रकार की स्वस्थता प्राप्त होने पर ही ज्ञान के प्रकाश द्वारा धन-धान्य, यश-कीर्ति, सिद्धि-श्री प्राप्ति की आशा की जा सकती है | यह वस्तुतः ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा पालन का पर्व है। इस दिन धनधान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी जी, धनपति कुबेर, विघ्न-विनाशक गणेश जी और विद्या एवं कला की देवी मातेश्वरी  सरस्वती की पूजा-आराधना की जाती है।
      भारतीय पद्धति के अनुसार प्रत्येक आराधना, उपासना व अर्चना में आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है। इस मान्यतानुसार इस उत्सव में भी सोने, चांदी व सिक्के आदि के रूप में आधिभौतिक लक्ष्मी का आधिदैविक लक्ष्मी से संबंध स्वीकार करके पूजन किया जाता हैं। घरों को दीपमाला आदि से अलंकृत करना इत्यादि कार्य लक्ष्मी के आध्यात्मिक स्वरूप की शोभा को आविर्भूत करने के लिए किए जाते हैं। इस तरह इस उत्सव में उपरोक्त तीनों प्रकार से लक्ष्मी की उपासना हो जाती है।
     इस अमावस्या से पितरों की रात आरम्भ होती है। कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए उनके लिए  प्रकाश की व्यवस्था इस रूप में की जाती है।
     इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात क्षीरसागर से लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए और लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को अपना पति स्वीकार किया था। पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था |'
     कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इंद्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी। लक्ष्मीजी व समस्त देवी-देवताओं के साथ राजा बलि के यहाँ बंधक थीं। आज ही के दिन भगवान विष्णु ने उन सबको बंधनमुक्त किया था।
     इसी दिन जब श्री रामचंद्र लंका से वापस आए तो उनका राज्यारोहण किया गया था। इस ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने घरों में दीपक जलाए थे।
४.गोवर्धन पूजन ... दीपावली से अगले दिन किया जाता है | इस दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते हुए ब्रज व ब्रजवासियों को बचाया था। अतः इस दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं। इस प्रकार धन-धान्य व विकास के साथ-साथ प्रकृति के मूल तत्वों- पशु-पराने पालन, वन सभ्यता एवं कृसही व्यवस्था के महत्त्व का पर्व भी है |

५.यम द्वितीया, भाई दूज .... सामाजिक सौहार्द ...अर्थात सामाजिक स्वास्थ्य, समष्टि-भाव, परमार्थ भाव अंतिम सोपान है जीवन के मूल लक्ष्य ..मोक्ष.. प्राप्ति का..अतः भाई-बहन का पर्व जिसमें बहन –भाई को मंगल टीका करके वे एक दूसरे से परस्पर स्नेह वृद्धि की कामना करते है | मृत्यु पर विजय प्राप्ति रूप में यम द्वितीया का पर्व कहा जाता है |
इसी दिन यम की बहन यमुना ( या यमी) ने यम से वरदान माँगा था की जो भाई-बहन इस दिन यमुना में साथ-साथ स्नान करेंगे वे यमलोक नहीं जायेंगे | यमराज का लेखाजोखा रखने वाले चित्रगुप्त की जयन्ती भी इस दिन मनाई जाती है | व्यापारी लोग अपने खातों के लेखा-जोखा का भी नवीनीकरण करते हैं |












 चित्र----गूगल व निर्विकार साभार ...
 

रविवार, 8 नवंबर 2015

कितने दीपक ........कारण, कार्य व प्रभाव गीत...डा श्याम गुप्त


--------सभी विज्ञ जनों को पञ्च दिवसीय दीपावली पर्व की शुभकामनाओं सहित------

गीत--कारण, कार्य व प्रभाव गीत --कितने दीपक--मेरे द्वारा नव-सृजित गीत जिसमें --प्रायः पहली दो पंक्तियों में विषय का कारण दिया जाता है ---आगे की चार पंक्तियों में उसका कार्य एवं प्रभाव प्रदर्शित किया जाता है ---विभिन्न भाव सहित कई बंद लिखे जा सकते हैं ---
( यथा--कारण--पर्व, कार्य--पूजन, प्रभाव--प्रकाश दीप जलना, ज्ञान का प्रकाश ....इसी प्रकार प्रत्येक पद में)

कारण, कार्य व प्रभाव गीत --कितने दीपक....
( यथा--कारण--पर्व, कार्य--पूजन, प्रभाव--प्रकाश दीप जलना....इसी प्रकार प्रत्येक पद में)

अन्धकार पर प्रकाश की जय,
दीपावलि का पर्व सुहाए।


धन, संमृद्धि, सौभाग्य बृद्धि हित ,
घर घर लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस हटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.


मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नवजीवन मुखरित कर देता।


आशा औ आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ २.


दीपशिखा सम छबि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच बस जाती।


मधुर मिलन के स्वप्निल की,
रेखा सी मन में खिंच जाती।
नयनों में सुंदर सपनों के,
कितने दीपक जल उते हैं॥ ३.


अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आंख गढाने लगता।


वीरों के नयनों में दीपित ,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन मन गण में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.


जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।
नये-नये ,विज्ञान ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.
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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

पेशावर वाली माँ

पेशावर वाली माँ एक महीना हो गया अब चली जाओ तुम मुझे आजाद कर दो अपनी क़ैद से तुम जीती जागती भला कैसे रूह बन कर मुझ पर साया हो सकती हो तुम भूत नहीं हो|
वो तो तुम्हारे बच्चे नहीं नहीं नहीं वो नाजुक नाजुक से बच्चे भूत नहीं बन गए  वो तो फ़रिश्ते हैं
फ़रिश्ते हैं या थे ? फ़रिश्ते होते हैं या मरने के बाद बन जाते हैं ? फ़रिश्ते होते हैं तो मर क्यूँ जाते हैं ?
नहीं वो मार दिए जाते हैं शैतान मार देते हैं ?
जो भी हो तुम चली जाओ मुझसे और नहीं सहा जाता तुम्हारा साथ | आजकल ठण्ड भी कितनी हैं तुम्हारे हाँ भी होगी ?
पापा का हर तीसरे दिन फ़ोन आ जाता है बहुत ठण्ड है आज बच्चो को अच्छे से कपडे पहना कर रखना | पेशावर वाली माँ तुम्हारे बच्चो को भी ठण्ड लगती होगी ना उफ़ इतनी सर्द रातो में तुम खुद से कोसो दूर सीली मिटटी में कैसे छोड़ सकती हो भला अपने बच्चो को ?अरे कैसी माँ हो तुम? हाथ और छोटी छोटी उँगलियाँ भी अकड़ गयी होगी ठण्ड में उन नाजुकबदन बालको की |अरे रहम करो उन बच्चो पर निकाल लाओ उन्हें | क्या टीस नहीं उठती सीने  में देखा ही नहीं तुमने जिगर के टुकडों को एक महीने से |  क्या छाती में कुछ कुलबुलाता नहीं जब स्कूल से वापस आते ही गले से लग कर तुम में फिर से पनाह पाने की कोशिश  याद आती है थके हारे बच्चों की ?
अरे जालिम माँ जा ले आ अपने बच्चे को बैठा दे उसे गरम कम्बल में लपेट कर और खजूर बादाम का गरम गरम दूध अपने हाथों से पिला |
जा चली जा एक तो तेरे मुझ में होने का बोझ, दूसरा तू हर वक़्त जो ये सवाल करती हैं, मैं इनके जवाब कंहा से दूँ ? जब से तू आई है मैंने दौड़ दौड़ कर बात बे बात अपनी बेटियो को गले लगाया है और जितनी बार उन्हें गले लगाती हूँ तू बांहे फैला लेती है, क्यूँ पूछती है मुझ से ?
मैं कैसे बताऊँ, क्या बताऊँ कि तू किसे बांहों में भरेगी अब, तू किस के बालो चेहरे को बोसो से ढक देगी मुझे क्या मालूम तू अब किस को छाती से चिपका कर सोएगी ?
किस की एक छोटी सी पुकार पर तू आई बेटा  कह कर रसोई से दौड़ी जाएगी ।
किस की पेंटिंग्स,प्रोजेक्ट्स देख कर तू अरे वाह शाबाश बोलेगी ।
और सुनो ये जो तुम पागलों की तरह अपलक देखती हो न, जब में नन्ही सी बेटी को उस पर अनायास उमड़ आए प्यार पर बांहों में छुपा कर 'मेरा नोना बाबू 'कहती हूँ ,ये मुझे बहुत डराता है मेरी पकड़ ढीली हो जाती है बिटिया पर |तुम से डर  कर मैं चुपचाप रसोई में जाकर बिना काम के काम निकाल लेती हूँ ।
ख़बरदार जो ये सोचा कि तुम सी होकर दिखाती हूँ तुम्हें ।नहीं नहीं मैं तुम सी नहीं
मेरे बच्चे,मेरे ज़िगर के टुकड़े साथ हैं मेरे।कोई बुरी निगाह उनका कुछ बिगड़ना क्या ऐसा सोच भी नहीं सकती ।
मैं हूँ ना ..उनकी माँ .....जब मैं हूँ,जब माँ हैं तो ,तो किसी बच्चे का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता .....ये बात सब जानते हैं मैं भी, तुम भी,दुनिया भी ।
फिर उस दिन तुमने अपने बच्चों को जाकर बचाया क्यूँ नहीं पेशावर वाली माँ ?
माँ के होते किसी को कुछ नहीं हो सकता इस विश्वास के सबसे बड़े विश्वास करने वाले बच्चे ही तो होते हैं । ओ निर्मोही जरा सोच तो उस आख़िरी वक़्त तक भी उन नन्ही जानों को भरोसा होगा के उनकी माँ बचा लेगी उन्हें ?जरा सोच तो बारूद का दर्द ज्यादा हुआ होगा ,मरने का या उस आख़िरी घड़ी पर भी जब तू बचाने नहीं पहुंची तो उनके टूटे विश्वास से टूटे दिल का ?
पता नहीं गोलियों के सितम से या तेरे न आने के सदमे में आँखे खुली की खुली रह गयी बेचारे की।
वो आख़िरी घड़ियाँ क्या क़यामत झेल चल निकले वो बहादुर शूरमा बच्चे ?
देख अब तू  और न सता, इम्तिहान आने वाले हैं बच्चो के ,अब मुझे फुरसत नहीं तू भी जा अरे अपने बच्चों का ख्याल कर, क्या कॉफ़ी नहीं देनी देर रात तक जागकर पढ़ते बच्चे को?
सुबह उनका फरमाईशी लंच बॉक्स भी बनाना होगा?
और क्या अरे आजकल बच्चों की खाने की आदते कितनी अजीब हो गयी है न मेरी बेटी को तो हर रोज कुछ नया और टेस्टी चाहिए अब हम माओं की जो हालत होती है रोज नई नई रेसिपी खोजने में क्या तेरे बच्चे को भी पास्ता और ब्रेड पिज़्ज़ा पसंद है मेरी बेटी को तो है।
बहुत उदासी होती है माहौल मे जब धूप मे मेरे पास आ बैठती है तू,और बताने लगती है किस्से अपने लाडले के, सुन वो उस दिन क्या बता रही थी तुम कि तुम्हारा बेटा कल्पना चावला को अपना आइडल मानता है वो भी नासा जाना चाहता है एस्ट्रोनाटॅ बनना चाहता है। सही है बच्चे अपना एम आजकल बहुत अच्छी तरह जानते है उनके फण्डे बडे साफ होते है जिन्दगी के बारे मे ,तू सोच वरना हमें कहाँ पता था क्या बनना है इतनी उम्र के थे जब हम। बन जाएगा, बन जाएगा ,पर.......
जानती हूँ अब कुछ नहीं होगा हर आने वाले को जाना है पर इत्ती सी उम्र मे और इस तरह जाना? ना ना पेशावर वाली माँ ऐसी मौत तो दुश्मन को भी ना आए। दुश्मन ही तो हो तुम हमारी पर यकीन कर ऐसी दुआ नहीं की थी कभी तेरे लिए ।मेरे भगवान तेरे अल्लाह की कसम ।और दुश्मन है तू तो पगली मेरे पास रोज क्यूँ आ बैठती है,क्यूँ तेरे दुख के आँसू मेरी पलकों पर आ कर जम जाते हैं । माँ हिन्दू, मुसलमान नही होती, माँ मजहब से क्या वास्ता ,वो बस अपने बच्चों की माँ होती है । कौन सा भगवान कहता है कि माँ को उसकी औलाद से ही जुदा कर दो,और अगर भगवान एक ही है तो फिर काहें का झगडा?
हमारे यहाँ भी खूब हुआ री ऐसा हमारे यहाँ क्या पूरी दुनिया मे हुआ जर्मनी,जापान,रुस मे हुआ। कुछ मिला था क्या मारने वालो को? फिर भी कुछ नही सीखा,इन्सान जानवर से तो बहुत बदतर है।
जलियांवाला बाग हुआ था तुझे याद तो होगा। उफ........
अब क्या करेगी तू, जिसकी जितनी लिखी है उतनी ही जीता है,हाँ ये तो तू सच कहती है ऐसे कोई नहीं जाता। हमारे यहाँ हर चोट का मरहम है, हमारे यहाँ अभिमन्यु भी ऐसे ही चला गया था पर उसका इलाज हमने कर लिया हमे दिल को बहलावे देने खूब आते हैं।ये कह कर कि वो किसी राक्षस की आत्मा थी,हमने दिल फुसला लिया,अभिमन्यु की  माँ सुभद्रा जब गर्भवती थी तब उसने  गलती से वो बोतल खोल ली थी जिसमे उसके भाई श्री कृष्ण ने उस आत्मा को कैद कर रखा था। और वो आत्मा गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु के शरीर मे प्रवेश कर गई थी।
पर तुम खुद को क्या समझाओगी पेशावर वाली माँ। हम अगले जन्म की आस लगा लेते हैं तुम तो वो भी नहीं मानती । तुम खुद को कैसे सम्भालोगी। जिओगी ही कैसे अब, जब दिल की नस नस तडफेगी वो दरिंदगी याद कर के जो तेरे बच्चों पर कहर बरपा हुई तो तू खुद को कैसे माफ कर पाएगी कि तू कहाँ थी उस घडी,कि तू कुछ भी ना कर पाई अपने  नन्हें से चाँद के लिए, कि तू जिन्दा ही क्यूँ है? तू जिन्दा ही रह कर क्या करेगी पेशावर वाली माँ। इन्सानियत का तकाजा है इन्सान इन्सान के काम आए मै कुछ कर सकती तो जरूर करती तेरे नौनिहाल के लिए, जान लडा देती उसे बचाने के लिए। तू तो चली आई पर मै तो कभी तुझे बताने आ भी नही सकती कि मै तेरे गम मे अपने पति से छुप छुप कर रोज रात को रोती हूँ, कि जब तू सूजी हुई दर्द से बेहाल आँखे कुदरत  के कानून के आगे और खोले नही रह पाती और सो जाती है या बेहोस हो जाती है, क्या पता ,तो मै तुझे कम्बल उढा आती हूँ तेरे माथे पर हाथ फिरा देती हूँ, पर ये दुनिया माँ को नही समझती और माँ को दुनियादारी समझ नही आती ।तेरे गम मे शरीक हूँ पर तुझे बता  भी नहीं सकती ।
जब भी सांस आए समझना मैंने याद किया जब भी कभी बादे सबा जानी पहचानी सी लगे सोचना मैने दुआ की तेरे लिए, पर अब तू चली जा पेशावर वाली माँ मुझे अपने बच्चे पालने है,और तू तो जानती है माँ अपने बच्चो के लिए बहुत खुदगर्ज होती है वो बस अपने बच्चों के लिए सोचती है पहले। मै तेरे साथ हूँ पर तू दुश्मन देश की माँ ठहरी तेरे लिए क्यूँ रोऊं । पर है तो माँ ही री,आ गले लग जा आखिरी बार,कभी छुप कर फिर मिलेंगे अब जा चली जा पेशावर वाली माँ ।
  शामिल हूँ तेरे गम मे बहुत शर्मसार भी
लाचार हूँ खडा हूँ तमाशाईयों के साथ ।
  पारुल

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