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शनिवार, 16 नवंबर 2013

                     बेबस ---निर्मला सिंह गौर की कविता

मैंने बोया आम उसने बो दिया पीपल तभी
आम तो ऊगा नहीं पीपल महावट बन गया
लोग आकर उस पे फल औए पुष्प चढाने लगे
और श्रद्धा भक्ति से उसके भजन गाने लगे |

आम भी ऊगा मगर, पीपल के साये में रहा
उसका जो व्यक्तित्व था वो था डरा सहमा हुआ
फिर भी उसने वक्त से पहले मधुर फल दे दिए
राहगीरों के लिए ठहराव शीतल दे दिए |

लोग उसको पत्थरों की चोट नहलाने लगे
और उसके फलों को बेवक्त ही पाने लगे
है अजब यह रीत जो इस जगत में सज्जन बने
उस पर ही दुनिया ने निरअपराध  ही पाहन हने|

है यही दस्तूर दुनिया का सभी लोगो सुनो
देवता की पूंछ पकड़ो और पीपल से पूजो
मैंने देखा कितने पीपल पा रहे हैं यश यहाँ
और कितने आम हैं मेरी तरह बेबस यहाँ |

डा श्याम गुप्त के पद.......



ब्रज की भूमि भई है निहाल |
सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल |
आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल |
बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती,  झूमि  बजावैं  थाल |
आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ||


कन्हैया उझकि उझकि निरखे |
स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै |
जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै |
पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं |
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके |
तीन  लोक दरसन कौं तरसें,  सो दरसन तरसै |
ये तो नैना बंद किये हैं,  कान्हा  बैननि परखे |
अचरज एक भयो ताही छिन,  बरसानौ सरसे |
खोली दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे| 
दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे|
बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ||

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण--निर्मलासिंह गौर की कविता

                 ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण 

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण, तुमने देखा है युग दर्पण
तुमने देखी है ज्योत्सना, तुमने देखा है चन्द्र ग्रहण
                                   ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण|
तुमने देखे हैं जन्मोत्सव, तुमने देखे हैं दाहकर्म
तुमने देखी है लूटमार, तुमने देखा है दानधर्म
तुमने देखी है बाढ़ कभी, देखा तुमने सूखा, अकाल
तुमने देखा है अनुद्धत, तुमने  ही देखा है धमाल
कैसे होता है नियम भंग, कैसे होता है अनुशासन
                                  ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
कैसे निर्धन का धन लेकर, इठलाते हैं उद्दोग पति
कैसे निर्बल शोषित होते, कैसे फलती है राजनीति
तुमने देखा है समझौता, तुमने देखा है आन्दोलन
धनवान सभी हैं लाभान्वित, निर्धन होते जाते निर्धन
कैसे मरता आयुष्यमान, कैसे जीता है  मरणासन्न
                                     ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
और अब देखो  कुछ रंग बदले नव अंकुर आये हैं बाहर
जो  हवा चली है पश्चिम की, नवकोंपल पर है चढ़ा असर
क्या पता ये अंकुर अब तरु को किस ओर हांक ले जायेंगे
तुम तो एक दिन झर जाओगे फल कैसे कैसे आयेंगे
पहचान न अपनी खो बैठे,  भगवान बचाये ये मधुबन
                                     ओ ! पतझर के अंतिम त्रण ।






बुधवार, 13 नवंबर 2013

तुम्हारी हार के पीछे ---निर्मला सिहं गौर की कविता

                    तुम्हारी हार के पीछे

तुम्हारी हार के पीछे  वजह शायद यही होगी
कि तुमने बात सच्ची, झूठे लोगों से कही होगी
सभी को एक निष्ठा का सबक सिखला दिया होगा
व्यवस्था को बदलने की पहल तुमने ही की होगी |

जहाँ पर आचरण, विश्वास और ईमान बिकते हों
सयाने भी जहाँ सच बात कहने में झिझकते हों
जहाँ पर दौड़ हो ऊंचाई पर जल्दी पहुंचने की
जहाँ सिद्दांतवादी लोग पैरों में कुचलते हों
तुम्हारी हार के पीछे वजह शायद यही होगी
तुम्हारी दौड़ में गिरते सवारों पर नजर होगी |

शहर के लोगों के सीने में जब दिल ही नहीं धडकें
उन्हें फिर प्रेम और संवेदना की क्या ज़रूरत है
तड़पता हो कोई या राह में मूर्छित पड़ा कोई
नज़र भर देखने तक की किसी को कहाँ फ़ुर्सत है
तुम्हारी हार के पीछे वजह शायद यही होगी
कि तुमने आंसुओं की अनकही भाषा पढ़ी होगी |

हवायें किस तरह लहरों को उंगली पर नचाती हैं
वही लहरें तो नन्हीं किश्ती को आखें दिखाती हैं
यही दस्तूरे-दुनिया देखते आये हैं सदियों से
कि जो कमज़ोर है उसको ही तो दुनिया सताती है
तुम्हारी हार के पीछे वजह शायद यही होगी
चिरागों की हिफाज़त तुमने तूफ़ानो की होगी |

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

बेटियाँ ----- निर्मला सिहं गौर की कविता

बेटियाँ
















बेटियाँ मिट्टी के दियों की तरह होतीं हैं
कहीं लेती हैं जन्म और कहीं जलती हैं
कुम्हार कैसे करीने से दिया गढ़ता है
आग में रखता है तब  उसमे रंग चढ़ता है
कोई ले जाता है मन्दिर में जलाने  के लिए
और कोई तो उसे सोने से भी  मढ़वाता  है
चार पल दुसरे के घर की रौशनी के लिए 
ये दिया आग को माथे पे सजा लेता है |                                  

बेटियाँ बाग के फूलों की तरह होतीं हैं
कहीं खिलतीं हैं और खुशबू कहीं देती हैं
माली कैसे निहारता है कलि का खिलना
सींचना,धूप,आँधियों से बचा कर रखना
कोई ले जाता है मन्दिर में चढाने  के लिए
कोई अर्थी पे  चढ़ाता है ,कुचल देता है
एक छोटी सी उम्र और एक अंजान सफ़र
फूल कुछ लम्हों में ही उम्र को जी लेता है |

बेटियाँ बर्फ की घाटी की तरह होतीं हैं
जब पिघलतीं हैं तो वो जाने कहाँ होतीं हैं
उम्र भर जंगलों और पत्थरों से टकरा कर
आप ही अपने मुकद्दर से लड़ा करतीं हैं
कितनी ही बस्तियां बसतीं हैं किनारे उनके
कितने खेतों को सींचती हुई बह जातीं हैं
उनका अपना वुज़ूद रहता तभी तक कायम
जब तलक वो ना समुन्दर में समाजातीं हैं

बेटियाँ काली घटाओं की तरह होतीं हैं
जब बरसतीं हैं तो धरती को हरा करतीं हैं
आसमाँ  देर तक उनको नहीं रख पाता है
धूम से बिजलियाँ चमका के विदा करता है
धरती पलकें बिछाए करती है स्वागत उनका
और मौसम भी खुश गवार सा हो जाता है
एक दिन ये घटायें कहीं खो जातीं हैं
कहीं होती हैं जवां, कहीं फना होतीं हैं

बेटियाँ दीप हैं, कलियाँ हैं, बर्फ, बादल हैं,
आपके हाथ से टूटें ना, बहुत कोमल हैं
इनकी किस्मत में कल कहाँ का सफ़र तय होगा,
ये कुछ दिनों के लिए आपकी धरोहर हैं |

सोमवार, 11 नवंबर 2013

गुड डॉक्टर या पोपुलर डॉक्टर....... ड़ा श्याम गुप्त की लघु कथा...



                       गुड डॉक्टर या पोपुलर डॉक्टर

       ‘श्री ! यार, कोई अच्छा पीडियाट्रीशियन डाक्टर बताओ |’  फोन पर दीपक को अपने एक मित्र  श्रीनिवास से बात करते हुए सुनकर मैंने पूछा  –‘क्या डाक्टर भी अच्छे –बुरे होते हैं ? अरे डाक्टर तो डाक्टर होते हैं, मैंने कहा |

         तो फिर सब पोपुलर डाक्टर के पास ही क्यों जाना चाहते हैं ? दीपक कहने लगा, ‘जब हम पैसा खर्च कर सकते हैं तो पोपुलर डाक्टर व बडे हास्पीटल क्यों न जायं |

         क्या गारंटी है कि पोपुलर डाक्टर अच्छा ही होगा ? मैंने प्रश्न किया |

         ‘क्या मतलब, जो अच्छा होगा वही तो पोपुलर होगा; बड़ी व पोपुलर संस्थाएं ही तो सेवाओं में अधिक ध्यान देती हैं | पोपूलारिटी ही तो अच्छे विशेषज्ञ  होने की निशानी है|’

         मैंने हंसकर कहा,’ डाक्टर कोई जड़ संस्था थोड़े ही है, हर एक डाक्टर स्वयं में एक संस्था होता है | मैं सोचने लगा, क्या वास्तव में पोपुलारिटी अच्छे डाक्टर होने की गारंटी  है |  बचपन में हम किसी भी नज़दीकी डाक्टर जो कालोनी में होता था उसी के पास चले जाते थे और ठीक भी होजाते थे| यदि आवश्यक होता तो डाक्टर स्वयं ही अस्पताल या अन्य विशेषज्ञ के यहाँ भेज देते थे |  सभी चिकित्सक समाज, मोहल्ले, नगर की पोपुलर शख्शियत हुआ करते थे, जन जीवन से जुड़े |  अच्छे डाक्टर व विशेषज्ञ कभी विज्ञापन या पोपूलेरिटी के फेर में नहीं पड़ते थे |  आज भौतिकता व महत्वाकांक्षा व धन की महत्ता से उत्पन्न अनास्था व अश्रद्धा के युग में विज्ञापन आवश्यक व पॉपुलेरिटी महत्वपूर्ण होगई है | जब भगवानों के, मंदिरों के विज्ञापन होने लगे हैं और देवस्थानों के प्रसाद भी डाक से मिलने लगे हैं तो  भगवान नंबर दो –चिकित्सक भी बचे कैसे रह सकते हैं |

          आज विज्ञापन, इंटरनेट पर सन्दर्भ लिखवाकर, राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठाकर बडे बड़े नर्सिंग होम खोलकर अच्छी अच्छी सुविधाएँ टीवी, टेलीफोन, फ्रिज, एसी युक्त शानदार ५ स्टार की सुविधाओं वाले रूम्स देकर ( जिनका उपचार व चिकित्सा-सुविधाओं-विशेषताओं से कोई खास लेना-देना नहीं है ) पोप्युलर होजाना एक आम बात होगई है | तमाम हेल्थ-साइट्स, वाणिज्य-विपणन दृष्टिकोण उग आये हैं | पूरा धंधा होगया है | कमीशन पर दुनिया के किसी भी भाग में, शहर में चिकित्सा करा लीजिये | रोगी “उपभोक्ता” और  चिकित्सक व चिकित्सा प्रदायक ”सेवा दाता” होगया है| इलाज़ महंगे से महँगा व सुविधापूर्ण हो..खर्चे की चिंता नहीं | प्रत्येक संस्थान में चिकित्सा भत्ता, खर्चा, रीइम्बर्समेंट, चिकित्सा बीमा आदि सुविधाएँ अधिकाधिक खर्च करने व अनावश्यक रूप से बड़े बड़े से अस्पताल, चिकित्सक पर इलाज़ कराने को लालायित करती हैं | | अब इलाज़ भी स्टेटस-सिम्बल होगया है |   

           मुझे याद आता है कि मेरे एक चिकित्सक मित्र जो सरकारी सेवा में थे, बताया करते थे कि उनके कुछ अन्य साथी घर पर अनधिकृत प्राइवेट प्रेक्टिस किया करते थे और उन पर तमाम रोगी जाया भी करते थे, वे पोपुलर भी थे; जबकि उनकी योग्यता व अनुभव सामान्य एवं  अस्पताल व आफिस में रोगी के साथ व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं होता था | जब यह बात वे अपने चिकित्सा अधीक्षक इंचार्ज ड़ा शर्मा को बताते तो डॉ शर्मा कहा करते थे, डॉक्टर ! डोंट वरी, यू आर ए गुड डाक्टर, यूं आर गेटिंग योर फुल एंड सफीशिएंट सेलेरी, गेटिंग आल द प्रोमोशन्स इन टाइम, योर पेशेंट्स प्रेज यू, दे हेव नो कम्प्लेंट्स | इस दिस नोट योर पापूलेरिटी एंड इनकम ? ( डाक्टर चिंता क्या, तुम्हें अच्छी पगार मिल रही है, सारे प्रोमोशन होते हैं, रोगी आपकी प्रशंसा ही करते हैं , कोई शिकायत नहीं करता, यही आपकी पोपूलेरिटी व कमाई हुई पूंजी  है) अच्छे चिकित्सक या विशेषज्ञ  न रोगियों के, न प्रभावशाली तीमारदारों के  कहे पर चलते हैं न समझौता करते हैं, न रोगी के व पैसे के पीछे भागते हैं | वे प्राय: तथाकथित पापूलर नहीं होते | पोप्यूलेरिटी बहुत से हथकंडों से आती है व बहुत से समझौते भी करने पड़ते हैं | “यूं वांट टू बी ए पोपुलर डाक्टर और गुड डाक्टर”;  आप अच्छे डाक्टर बनाना चाहते हैं या पापूलर डाक्टर |'
            

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

प्रीति का एक दीपक जलाओ सखे !......डा श्याम गुप्त ....


                                             


प्रीति का एक दीपक जलाओ सखे !.



 प्रीति  का एक दीपक जलाओ सखे !
देहरी का सभी तम सिमट जायगा | 
प्रीति का गीत इक गुनुगुनाओ सखे !
ये ह्रदय दीप फिर जगमगा जायगा ||

 
द्वेष क्या, द्वंद्व क्या ,
प्रीति निश्वांस सी |
एक लौ जल उठे ,
मन में विश्वास की |

आस का दीप ज्यों ही जले श्वांस में ,
जिंदगी का अन्धेरा भी कट जायगा |   .------प्रीति का एक दीपक ....||

 
ये अन्धेराहै क्यों,
विश्व में छा रहा ?
 साया आतंक का ,
कौन बिखरा रहा !

राष्ट्र के भाव अंतस सजाओ सखे !
ये कुहांसा तिमिर का भी छंट जायगा |   ----प्रीति का एक दीपक .......||


नेह से, प्रीति से,
प्रीति की रीति का |
एक दीपक जले,
नीति की प्रीति का |

नेह-नय के दिए जगमगाओ सखे !
 हर ह्रदय का अन्धेरा सिमट जायगा |   -----प्रीति का एक दीपक ......||

 
मन में छाया हो ,
अज्ञान ऊपी तिमिर |
सूझता सत् असत -
भाव कुछ भी नहीं |

ज्ञान का दीप तो इक जलाओ सखे !
बाल-रवि से छितिज जगमगा जायगा |
प्रीति का एक दीपक जलाओ सखे !
देहरी का सभी तम सिमट जायगा ||      ...प्रीति का एक दीपक ......||

                                                                              चित्र गूगल साभार.....

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