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रविवार, 13 जनवरी 2019

शीत ऋतु-----डा श्याम गुप्त





-------हेमन्त ऋतु की आहट हो चली  है , रात्रि- समारोहों आदि में ठिठुरन से बचने के लिए  अलाव जलाए जाने  का क्रम प्रारम्भ हो चला है | प्रस्तुत है एक ठिठुरती हुई रचना .....
                         १.
(
श्याम घनाक्षरी --३० वर्ण , १६-१४, अंत दो गुरु -यगण)
 
थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि ,
उर मांहि उमंगाये,  पीर  वो  पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर,  धूप बैठे  तापि रहे ,
धूप भी है कुछ, खोई सोई अलसानी |
शीत की लहर, तीर भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की, वो लहर अजानी ||

                        
     २.
( श्याम घनाक्षरी -३० वर्ण ,१६-१४, अंत दो गुरु - मगण)
 
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग- विरंगी ओढे, धरती रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम ,मेहंदी रंग,
घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं लता, चहुँ और मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||

                          
   ३.
( मनहरण घनाक्षरी -३१ वर्ण ,१६-१५,अंत लघु-गुरु -रगण )
 
ठंडी ठंडी भूमि नंगे पाँव लगे हिमशिला ,
जल छुए लगे छुआ बिजली का तार है |
कठिन नहाना नल लगे जैसे सांप कोई,
काँप रहा तन चढ़ा जूडी का बुखार है |
शीत में तुषार से है मंद रवि प्रभा हुई,
पत्तियों पै बहे ओस जैसे अश्रु धार है |
घर बाग़ वन जला आग बैठे लोग जैसे,
ऋषि मुनि करें यज्ञ विविधि प्रकार हैं ||


गुरुवार, 10 जनवरी 2019

महिलायें, घर में और बाहर - डा श्याम गुप्त

महिलायें, घर में और बाहर -----देखें चित्र में --- 


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यह विचार #गलत है कि -----
स्त्री-पुरुष के मध्य कामों का बंटवारा महज़ एक परम्परा है और लिंग के मुकाबले काम की बजाय उसे काम का चुनाव करने दिया जाय| 
-------वस्तुतः यह महज़ एक परम्परा ही नहीं अपितु एक सोची समझी हुई सुदृढ़ परम्परा है| 
------ जव मानव समाज उन्नत होकर घुमंतू से स्थिर हुआ तो स्त्री-पुरुष दोनों ही भोजन की खोज में घर से बाहर जाया करते थे और आज के पशु पक्षियों के बच्चों की भांति उनकी संतान भी असुरक्षित रह जाती थी, अतः किसी एक को निवास स्थान पर रुकने की आवश्यकता उत्पन्न हुई |
------ स्त्री शारीरिक बल में कमजोर व गर्भधारण के समय अक्रिय परन्तु #आपत्तिकाल में सदा #प्रत्युत्पन्नमति एवं #तात्कालिक प्रयासों में #तेज होने के कारण उसने स्वयं ही गृह व संतति सुरक्षा का कार्य स्वीकार किया |
------- यह मानव इतिहास का #सर्वप्रथमकार्यविभाजन था, समाज व संतति की सुरक्षा हेतु | पुरुष का कार्य व दायित्व गृह, संतति व स्त्री का पालन पोषण स्थिर हुआ | 
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यह सही है कि----
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“हम कर सकते हैं “ --महिलायें सब कुछ कर सकती हैं--- 
-------कब नहीं कर सकती थीं, परन्तु #आपत्तिकालमें क्योंकि “आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति” | प्रथम कार्य-विभाजन का मूल अस्तित्व ही इस तथ्य पर था |
------ प्रत्येक ऐसे काल में जब पुरुष वर्ग असहाय हुआ है स्त्री ने ही समाज को संरक्षित करने की कमान सम्हालने का महत कार्य किया है |
------- चाहे सरमा-सरस्वती के रूप में या दुर्गा-पार्वती-काली के रूप में, घोषा, भारती, इडा, कैकेयी, सीता, राधा, सावित्री, मदालसा, या सत्यभामा व लक्ष्मीबाई, जीजाबाई मुगलों की सेना व आतातायी विधर्मियों से लोहा लेने वाली वीरांगनायें हों| 
------परन्तु सामान्य काल में उन्हें अपने स्वाभाविक कार्यों से विमुख होकर यह कृत्य करने के क्या आवश्यकता | 
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यह भी उचित विचार-कथ्य नहीं है ---
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कि एक महिला कमाएगी तो परिवार की स्थिति सुधरेगी और देश समाज की भी |
------- घर, पत्नी व संतान का पालन-पोषण ==दायित्व पुरुष का है== उसे क्यों इस कार्य से छुटकारा दिया जाय, नाकारा बनाया जाय | स्त्री क्यों इस कार्य को अपने हाथ में ले | 
-------फिर संतान, घर व समाज की देखभाल कौन करेगा जो अधिक महत्वपूर्ण है, पुरुष निश्चय ही इसमें उतना सक्षम नहीं है| 
------#माँ व #सेविका में अंतर होता है यह सभी जानते हैं गुणवान व सक्षम माँ से पलने वाले संतान का पालन अक्षम व बाहरी तत्व, अनपढ़ या कम गुणों वाली स्त्री से होना उसका ही नहीं ==देश-समाज का भी दुर्भाग्य ==है | ----------------#संततिवर्धन के दायित्व में कमी होना देश-समाज-राष्ट्र व मानवता की सबसे बड़ी क्षति है, जो आज युवाओं व बालकों के कृतित्वों से परिलक्षित हो रही है | 
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सोचिये कि क्यों आखिर महिलाओं को इतने लम्बे समय से सेवा एवं कार्य करने के इतने प्रगतिशील फैसलों के पूर्ण रूप से लागू होने के बाद भी अभी तक उनको ==पुरुषों के बराबर भुगतान नहीं किया जा रहा==है, क्यों सभी देशों में पुरुषों को उनसे बेहतर माना जाता है |
------- यह केवल नकारात्मक मानसिकता नहीं अपितु आर्थिक फैसले हैं जिनके अनुसार महिलायें कम प्रोडक्शन-लाभ देती हैं | एवं यह सत्य ही है |

रविवार, 6 जनवरी 2019

सम्हले हिन्दुस्तान, सोचे हिन्दुस्तान----जागें भारत वासी ---डा श्याम गुप्त

सम्हले हिन्दुस्तान, सोचे हिन्दुस्तान,जागें भारत वासी ---निम्न देखें चित्र 
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यही तो होरहा है हमारे देश में , सदा से ---नक़ल की संस्कृति अपनाना------अपने स्वयं के व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कार्य करना, माताएं भी इसमें शामिल हैं------देश समाज के लिए कौन त्याग, तप करता है 
-------अच्छी खासी एक लड़की विज्ञान की छात्रा बनकर न जाने क्या क्या नवीन अनुसन्धान करके देश समाज मानवता के लिए कुछ कर सकती थी-----क्रिकेट जैसे एक व्यर्थ के कार्य में लग गयी ----
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------फिर हमारे युवा, नवजवान, विदेशी चमक से चकाचौन्ध में रत युवा व अंग्रेजीदां वयस्क, वरिष्ठ जन ---कहते हैं कि हमने तो कभी कुछ बनाया ही नहीं,,, हम तो धर्म,जाति अदि के नाम पर , राजनीति के नाम पर लड़ते ही रहते हैं----सब कुछ अमेरिका, चीन में बनता है----चीन जापान ने कितनी तरक्की की है ---हम तो कुछ करते ही नहीं ---
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-------सोचें , कि क्यों है ऐसा -----
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-----------कि हम तो लगे हैं विदेशों की नक़ल करने में -----अपनी संस्कृति, धर्म , समाज जाए भाड में ----
-----हमें तो पैदा होते ही विदेशी शानदार कपडे, जूते, खिलौने, टीवी, मोबाइल , बैक, कारें चाहिए , नगर में शानदार बहुमंजिली इमारत में सर्व सुविधा सहित में भव्य बंगला चाहिए...हज़ार हज़ारों के क्रिकेट बल्ले, बौल, ड्रेसें , एस्ट्रो टर्फचाहिए....पढ़ने लिखने की बजाय नाच-गाने, खेल -कूद , विदेशी गाने,डांस चाहिए --
---बच्चों के लिए विदेशी चमक दमक वाले अंग्रेज़ी स्कूल चाहिए ..
------बड़े बड़े नगर चमचमाती सड़कें , बड़े बड़े माल में विदेशी डिशें, पिज्जा, बर्गर , शराब , नाच-गाने, विडियो, सीडी , विदेशी यू-ट्यूब चाहिए---
----- इस सब को प्राप्ति हेतु 80 लाख पैकेज की नौकरी चाहिए, नौकरी करने वाली पत्नी चाहिए --
-----चाहे ये सब किराये का हो या नक़ल का या बच्चों के हितों की अनदेखी के साथ अथवा विदेशी कंपनियों की गुलामी से मिले-----
------देश के लिए त्याग तपस्या अन्य करें हम तो बस भोग करेंगे----
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अमेरिका का 200 वर्ष पहले तक नाम भी नहीं था --- वे अपने यहाँ जैसी मिल रहे है उसी से जीवन चलाते थे, विदेशी नक़ल पर ज़िंदा नहीं थे, ण विदेशी संस्कृति, न कोइ खेल तमाशा कुछ भी -----इस त्याग, तपस्या, परिश्रम के बल पर ऊपर उठे---दुनिया पर छाये 
----चीन व रूस --पहले 50 वर्षों तक विश्व के लिए सारे दरवाज़े बंद थे , न बाहर की कोइ वस्तु आयेगी, न कोइ विचार , न कोइ संस्कृति, न खेल -----जो अपना है जैसा है उसी में काम चलाइये, कम खाकर, भूखे पेट रहकर परिश्रम कीजिये -----इसी त्याग तपस्या के कारण उन्होंने उन्नति की ,,,स्व- उन्नति के बाद वे आगे आये , विश्व पर छागये--- अब उसके फल चख रहे हैं---
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अपनी संस्कृति त्यागकर, भुलाकर , उसपर चलना छोड़कर कौन , राष्ट्र-देश, समाज आगे बढ़ा है----
---नक़ल की संस्कृति पर कौन देश आगे बढ़ा है
-----गुलामी में रहकर , गुलामी की संस्कृति अपना कर सुख-भोग सरल है वही आज हम कर रहे हैं-----दोष देश को, धर्म, समाज को दे रहे हैं--
-----जागे हिन्दुस्तान ---फिर न कहना बताया नहीं ----है किसी में हिम्मत जो ये सुख सुविधाएँ छोड़कर , स्वदेशी भाव-विचार अपनाएं , जो हमारे यहाँ मिलता है उसे ही  अपनाएं---
-----आज भी हमारे यहाँ अच्छा व सस्ता स्वदेशी कपड़ा, जूता, घरेलू सामान सब मिलता है ---

शनिवार, 5 जनवरी 2019

मानवता का प्रथम महासमन्वय --- पौराणिकता आधारित विज्ञान कथा --डा श्याम गुप्त

मानवता का प्रथम महासमन्वय --- पौराणिकता आधारित विज्ञान कथा --डा श्याम गुप्त

                             

मानवता का प्रथम महासमन्वय --- पौराणिकता आधारित विज्ञान कथा 
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सभी कबीलों को एक करके समन्वित करने वाले दक्षिण भारतीय भूभाग के राजा शंभू चिंतित थे | उत्तर क्षेत्र से आये हुए मानवों से प्रारम्भिक झड़प के पश्चात ही उनके सेनापति इन्द्रदेव इस सन्देश के साथ आये कि वे आपस में मिलजुल कर परामर्श करने के इच्छुक हैं | अंतत उन्होंने मिलने का निश्चय किया |
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पितामह ! शम्भू जी पधारे हैं, इन्द्रदेव ने ब्रह्मा जी को सूचित किया |
----उन्हें सादर लायें इन्द्रदेव, वे हमारे अतिथि हैं, सुना है वे अति-बलशाली हैं साथ ही महाविद्वान् व कल्याणकारी शासक भी, ब्रह्मदेव बोले |
------- शंभू  दक्षिण भारतीय भूभाग के एकछत्र अधिपति थे | सुदूर दक्षिण से लेकर मध्यभारत व विन्ध्य-क्षेत्र तक एक उन्नत वनांचल मानव-सभ्यता-संस्कृति का फैलाव था, वे इसके निर्माता थे व जन-जन के पूज्य राजा - जाय जन्तोर राजाल |
-------ब्रह्मा विष्णु व इंद्र  मानसरोवर-सरस्वती-सुमेरु क्षेत्र में विकसित एक अति उन्नत मानव सभ्यता-संस्कृति के प्रतिनिधि थे | ब्रह्मा प्रजापति, विष्णु अधिपति व इंद्र सेनापति तथा अन्य देवता विभिन्न विशिष्ट शक्तियों के धारक थे |
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आबादी बढ़ने पर पृथ्वी अर्थात सुमेरु से हिमालय-क्षेत्र के पार बसने की इच्छा से इंद्र व विष्णु के नेतृत्व में सरस्वती के किनारे किनारे चलकर इस प्रदेश में पधारे |
------कुछ प्रारम्भिक मुठभेड़ों के पश्चात राजा शम्भू की विद्वता व शक्ति के बारे में जानकर कि वे समस्त प्रजा का कल्याणकारी भाव से पालन करते हैं, ब्रह्मदेव ने तुरंत युद्ध रोकने का आदेश दिया एवं उन्हें इंद्र के द्वारा समन्वय का सन्देश भजा गया और वे भी समन्वय के पक्ष में थे अतः पधारे |
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निर्भीक मुद्रा में, हाथ में त्रिशूल, कमर में बाघम्बर लपेटे राजा शंभू का स्वागत करते हुए विष्णु बोले, आइये शम्भू जी, सभा में स्वागत है, आसन ग्रहण कीजिये |
------ परन्तु आप तीन लोग एक समान स्थित हैं, आपके अधिपति कौन हैं ? शंभू आश्चर्य से पूछने लगे |
------ ये ब्रह्मदेव हैं समस्त मानव जाति के पितामह प्रजापति, मैं विष्णु व ये इन्द्रदेव | हम सभी आपस में मिलकर सभी समस्याएं-आर्थिक, सामाजिक व युद्ध संबंधी, सुलझाते हैं, हल करते हैं|
-----ओहो ! ब्रह्मदेव ! आदिपिता, वे तो हमारे भी पितृव्य हैं, शम्भु प्रणाम करते हुए, प्रसन्नता से बोले, अब भी स्मृति में सुमेरु-क्षेत्र ब्रह्मलोक की यादें हैं एवं वे स्मृतियाँ भी जब हम लोग इस क्षेत्र को छोड़कर दिति-सागर पार करके उत्तर सुमेरु क्षेत्र में जाकर बसे थे |
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‘अति शोभनं शम्भू ‘ ब्रह्मा जी कहने लगे, दिति-सागर (टेथिस समुद्र) के हट जाने पर उस उत्तर क्षेत्र में आबादी बढ़ने पर हमने प्रजा को यहाँ पर बसाने का निर्णय किया | सुदूर उत्तर तो समस्त हिम से आबद्ध रहता है अतः बसने योग्य नहीं है |’
-----‘तो तुम पुत्र शंकर हो, रूद्र-शिव जो साधना हेतु सुमेरु से कुमारी-कंदम हेला द्वीप चले आये थे |’ तुम्हारी व तुम्हारे क्षेत्र एवं प्रजा की प्रगति देखकर मैं अति प्रसन्न हूँ |
------जी पितामह, आप सब तो अपने ही लोग हैं, युद्ध की क्या आवश्यकता है, आज्ञा दें, परन्तु मेरे लोग कोई भी अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे |
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अधीनता कभी हमारा मंतव्य व उद्देश्य नहीं रहा, शंभू जी, उचित कहा आपने, युद्ध की क्या आवश्यकता है, विष्णु बोले, समन्वय, मिलजुल कर रहने पर ही उस क्षेत्र, प्रजा व संस्कृति का विकास होता है, ज्ञान का प्रकाश उत्कीर्ण होता है, दोनों संस्कृतियाँ व सभ्यताओं की सम्मिलित, समन्वयात्मक प्रगति होती है |
------सब अपनी अपनी संस्कृति अपनाते हुए मिल-जुल कर निवास करेंगे |
----- स्वीकार है, शम्भू कहने लगे, यद्यपि विरोध होगा, सभी कबीलों, वर्गों को मनाना पडेगा परन्तु मैं सम्हाल लूंगा | प्रगति हेतु समन्वय तो आवश्यक ही है |
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आभार है शम्भू जी, विष्णु व इंद्र बोले, आपका यह कदम मानवता के इतिहास में स्वर्णिम निर्णय कहा जाएगा |
------हम इस समन्वित संस्कृति को ज्ञान के प्रसार, प्रकाश की संस्कृति, विज्ञजनों की, विद्या रूप वैदिक-संस्कृति कहेंगे |
-------भाषा व सभी ज्ञान का संस्कार आप करेंगे ताकि एक विश्ववारा संस्कृति का निर्माण हो |
------मेरा आशीर्वाद सभी के साथ है, सब मिल जुल कर रहें |. ब्रह्मदेव ने प्रसन्नतापूर्वक सभी को आश्वस्त करते हुए कहा |
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इस प्रकार एक उन्नत वनांचल संस्कृति, शायद पूर्व हरप्पा एवं उन्नत ग्राम्य संस्कृति, सुमेरु-सभ्यता का समन्वय हुआ जो विश्व का प्रथम मानव महा समन्वय था | इसे ***शिव-विष्णु समन्वय*** भी कहा जा सकता है |
------यही संस्कृति आगे प्रगतिमान होकर हरप्पा ( हरियूपिया ), सरस्वती सभ्यता, सिन्धु-घाटी सभ्यता वदेव-मानव वैदिक सभ्यता कहलाई और विश्व भर में फ़ैली |

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