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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण--निर्मलासिंह गौर की कविता

                 ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण 

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण, तुमने देखा है युग दर्पण
तुमने देखी है ज्योत्सना, तुमने देखा है चन्द्र ग्रहण
                                   ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण|
तुमने देखे हैं जन्मोत्सव, तुमने देखे हैं दाहकर्म
तुमने देखी है लूटमार, तुमने देखा है दानधर्म
तुमने देखी है बाढ़ कभी, देखा तुमने सूखा, अकाल
तुमने देखा है अनुद्धत, तुमने  ही देखा है धमाल
कैसे होता है नियम भंग, कैसे होता है अनुशासन
                                  ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
कैसे निर्धन का धन लेकर, इठलाते हैं उद्दोग पति
कैसे निर्बल शोषित होते, कैसे फलती है राजनीति
तुमने देखा है समझौता, तुमने देखा है आन्दोलन
धनवान सभी हैं लाभान्वित, निर्धन होते जाते निर्धन
कैसे मरता आयुष्यमान, कैसे जीता है  मरणासन्न
                                     ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
और अब देखो  कुछ रंग बदले नव अंकुर आये हैं बाहर
जो  हवा चली है पश्चिम की, नवकोंपल पर है चढ़ा असर
क्या पता ये अंकुर अब तरु को किस ओर हांक ले जायेंगे
तुम तो एक दिन झर जाओगे फल कैसे कैसे आयेंगे
पहचान न अपनी खो बैठे,  भगवान बचाये ये मधुबन
                                     ओ ! पतझर के अंतिम त्रण ।






4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (15-11-2013) को "आज के बच्चे सयाने हो गये हैं" (चर्चा मंचःअंक-1430) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मुहर्रम की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद शास्त्री जी ,
    हिंदी साहित्य में आपका योगदान सराहनीय है| लेखकों को प्रोत्साहन देना भी भागीरथ प्रयास है |
    आभार एवं हार्दिक शुभकामनाएं ,
    निर्मला सिंह गौर

    उत्तर देंहटाएं