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मंगलवार, 19 नवंबर 2013

नियम ..ग़ज़ल .. एवं ग़ज़ल की बात.......डा श्याम गुप्त.....



एक बिना मतले की ग़ज़ल......
  
          नियम
नियम का भी कोई नियम होता है दोस्तो,
कि नियम को नियमों में न बांधा जाए |

अगरचे चाहते हैं दिल से निकले गीत-ग़ज़ल,
बहर वज्न, गणों छंदों से न मापा जाए |

अनुशासन है शासन के पीछे चलना,
शर्त यही  कि जन-मन  को न भुलाया जाए |

यूं तो ग़ज़ल कह रहा है हर खासो-आम यहाँ ,
ग़ज़ल वो जब ख़ास अंदाज़े-वयां लाया जाए |

नियम की अनुशासन की एक हद होती है श्याम,
कि उसे तानाशाही की तरह न चलाया जाए ||




               गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल खुशनुमां अंदाज़ है | इसका शिल्प भी अनूठा है | नज़्म रुबाइयों से जुदा | इसीलिये विश्व भर में जन-सामान्य में प्रचलित हुई | हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती | हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की  सुविधा हेतु गज़ल नज़्म को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है | उदाहरणार्थ - फिल्मे गीतकार साहिर लुधियानवी का गीत/ग़ज़ल...

संसार से भागे फिरते हो संसार को तुम क्या पाओगे।
इस लोक को भी अपना सके उस लोक को में भी पछताओगे।

ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे।

          छंदों गीतों के साथ-साथ दोहा अगीत-छंद लिखते हुए गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे भी संक्षिप्तता सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ..

           गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में कसीदा अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें औरतों औरतों के बारे में गुफ्तगू एक मूल विषय-भाग भी होता था | कसीदा के उसी भाग ताशिब को पृथक करके गज़ल का रूप नाम दिया गया |
           गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ग़ज़ल (ghazal या guzal ) कहा जाता है | इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी | अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे | अतः अरब-कला प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग,  दर्द का प्रतिमान गज़ल के नाम से प्रचलित हुआ | यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थातइश्के-मजाज़ी - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह-वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है | गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई | यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की  एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...
         Where  are you  now? who lies  beneath  your spell  tonight ?                                                   
          Whom   else   rapture’s   road  will   you  expel  to night ?
           My   rivals   for  your love,  you  have  invited   them  all .
            This  is  mere  insult ,  this   is  no  farewell   to night .

                       गज़ल का मूल छंद शे या शेअर है | शेर वास्तव में दोहा का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है | आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद ..अगीत, नव-अगीत त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसेदोहा ही कहा जाता है अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( quasida mono rhyme)|  अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे भी लिख सकता है..गज़ल भी | शेरों की मालिका ही गज़ल है |

           भारत में शायरी गज़ल फारसी के साथ सूफी-संतों के प्रभाववश प्रचलित हुई जिसके छंद संस्कृत छंदों के समनुरूप होते हैं | फारसी में गज़ल के विषय रूप में सूफी प्रभाव से शब्द इश्के-मजाज़ी के होते हुए भी अर्थ रूप में इश्के हकीकी अर्थात ईश्वर-प्रेम, भक्ति, अध्यात्म, दर्शन आदि सम्मिलित होगये | फारसी से भारत में उर्दू में आने पर सामयिक राजभाषा के कारण विविध सामयिक विषय भारतीय प्रतीक कथ्य आने लगे |  उर्दू से हिन्दुस्तानी हिन्दी में आने पर गज़ल में वर्ण्य-विषयों का एक विराट संसार निर्मित हुआ और हर भारतीय भाषा में गज़ल कही जाने लगी | तदपि साकी, मीना सागर इश्के-मजाज़ी गजल का सदैव ही प्रिय विषय बना रहा | बकौल मिर्जा गालिव....     बनती नहीं है वादा सागर कहे बगैर | 
          
         वास्तव में तो  हिन्दी में गज़ल का प्राम्म्भ आगरा में जन्मे पले शायर अमीर खुसरो (१२-१३ वीं शताब्दी)  से हुआ जिसने सबसे पहले इस भाषा को हिन्दवी कहा और वही आगे चलकर हिन्दी कहलाई | खुसरो अपने ग़ज़लों के मिसरे का पहला भाग फारसी या उर्दू में दूसरा भाग हिन्दवी में कहते थे | उदाहरणार्थ... 

  जेहाले  मिस्कीं  मकुल तगाफुल,
   दुराये नैना बनाए बतियाँ |
      कि ताब--हिजां, दारम--जाँ,                                                                                                          न लेहु काहे लगाय छतियाँ |”                       
      
१७ वीं सदी में उर्दू के पहले शायर वली ने भी हिन्दी को अपनाया देवनागरी लिपि का प्रयोग किया | ..यथा....                                       

       सजन  सुख सेती  खोलो  नकाब आहिस्ता-आहिस्ता,
     कि ज्यों गुल से निकलता है गुलाव आहिस्ता-आहिस्ता | 

                 सदियों तक गज़ल राजा-नबावों के दरबारों में सिर्फ इश्किया मानसिक विचार बनी रही जिसे उच्च कोटि की कला माना जाता रहा | परन्तु १८ वीं  सदी में आगरा के नजीर अकबरावादी  ने शायरी को सामान्य जन से जोड़ा और १९ वीं सदी के प्रारम्भ में मिर्ज़ा गालिव ने मानवीय जीवन के गीतों से | उदाहरणार्थ.....

    जब फागुन रंग झलकते हों, तब देख बहारें होली की |
      परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की |” -                             
                         ....... नजीर अकबरावादी                  तथा.... 


      गालिव बुरा मान जो वाइज़ बुरा कहे ,
         ऐसा भी है कोई कि सब अच्छा कहें जिसे |
                          -------गालिव ...



                   १८ वीं सदी में हिन्दी में गज़ल की पहल में भारतेंदु हरिश्चंद्र, निराला, जयशंकर प्रसाद आदि ने सरोकारों की अभिव्यक्ति लोक-चेतना के स्वर दिए..यथा निराला ने कहा...
       लोक में बंट जाय जो पूंजी तुम्हारे दिल में है   

त्रिलोचन, शमशेर, बलबीर सिंह रंग ने भी हिन्दी ग़ज़लों को आयाम दिए | परन्तु आधुनिक खड़ी बोली में हिन्दी-गज़ल के प्रारम्भ का श्रेय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है जिन्होंने हिन्दी भाषा में गज़लें लिख कर गज़ल के विषय भावों को राजनैतिक, संवेदना, व्यवस्था, सामाजिक चेतना आदि के नए नए आयाम दिए | वस्तुतः हिन्दी भाषा ने अपने उदारचेता स्वभाववश उर्दू-फारसी के तमाम शब्दों को भी अपने में समाहित किया, अतः आज के अद्यतन समय में हिन्दी कवियों ने भी ग़ज़ल को अपनाया है व समृद्ध किया है फलस्वरूप  आज गज़ल हिन्दी -गज़ल में  विषयों  व ग़ज़लकारों का एक विराट रचना संसार है जो प्रकाशित पुस्तकों, पत्रिकाओं, रचनाओं एवं अंतर्जाल( इंटरनेट) पर प्रकाशन द्वारा समस्त विश्व में फैला हुआ है तथा जो उर्दू गज़ल, हिन्दी ग़ज़ल, शुद्ध खड़ी-बोली, हिन्दी
5.
एवं हिन्दी की सह-बोलियों के शुद्ध व मिश्रित रूपों से समस्त शायरी-विधा व ग़ज़ल को समर्थ वसमृद्ध कर रहे  है | ... दुष्यंत कुमार की एक गज़ल देखिये....                
                          दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
                              आजकल  नेपथ्य में संभावना है |”
 




      जब मैंने विभिन्न शायरों की शायरीगज़लें नज्में आदि  सुनी-पढीं देखीं  विशेषतया गज़ल...जो विविध प्रकार की थीं..बिना काफिया, बिना रदीफ, वज्न आदि का उठना गिरना आदि ...तो मुझे ख्याल आया कि बहरों-नियमों आदि के पीछे भागना व्यर्थ है, बस लय गति से गाते चलिए, गुनगुनाते चलिए गज़ल बनती चली जायगी, जो कभी मुरद्दस गज़ल होगी या मुसल्सल  या हम रदीफ,  कभी मुकद्दस गज़ल होगी या कभी मुकफ्फा गज़ल, कुछ फिसलती गज़लें होंगी कुछ भटकती ग़ज़ल|  हाँ लय गति यति युक्त गेयता भाव-सम्प्रेषणयुक्तता  तथा सामाजिक-सरोकार युक्त होना चाहिए और आपके पास भाषा, भाव, विषय-ज्ञान कथ्य-शक्ति होना  चाहिए|  यह बात गणबद्ध छंदों के लिए भी सच है | तो कुछ शे आदि जेहन में यूं चले आये.....

             मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,
             यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |

          लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,
             वह भी गज़ल है, चाहे  कोई काफिया नहीं | “  

 बस गाते गुनुगुनाते जाइए गज़लें बनती जायेंगीं .......
 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-11-2013 की चर्चा में है
    कृपया चर्चा मंच पर पधारें
    धन्यवाद

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  2. बहुत सुन्दर आलेख !
    “मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,
    यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |

    लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,
    वह भी गज़ल है, चाहे कोई काफिया नहीं | “
    “मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,
    यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |

    लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,
    वह भी गज़ल है, चाहे कोई काफिया नहीं | “
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