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बुधवार, 27 नवंबर 2013

डा श्याम गुप्त की गज़ल--जाना होगा ...



        गज़ल--जाना होगा ...

खुशबू छाई जो फिजाओं में तो जाना जानां |
आपसे  हमको  मुलाक़ात  को जाना होगा  |

झूम के बरसा जो सावन तो हमें ऐसा लगा,
अब तो जाना ही हमें जाना ही जाना होगा |

फिर तो ये दिल भी लगा पहलू से अपने जाने,
आपने  ही  तो  सदा  देके पुकारा  होगा |

अप थे सोच में, आयेंगे कि न आयेंगें ,
याद अपनों ने किया कैसे न आना होगा |

बड़ी शिद्दत से किया याद बुलाया ए हुज़ूर ,
कौन अब कैसे कहे, 'यार! न आना होगा' |

रूह में तुम थे समाये तो चले आये श्याम,
हम ही जब होंगे नहीं आना क्या आना होगा ||

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (28-11-2013) को "झूठी जिन्दगी के सच" (चर्चा -1444) में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. धन्यवाद शास्त्रीजी ...आभार ...

      हटाएं
  2. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं