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सोमवार, 25 नवंबर 2013

तुम

चाहता हूँ, तुझे  मना लूँ प्यार से
लेकिन डर लगता है तेरी नाराज़गी से |

घर मेरा तारीक के आगोश में है
रोशन हो जायेगा तुम्हारे बर्के हुस्न से |

इन्तेजार रहेगा तेरा क़यामत तक
नहीं डर कोई गम-ए–फिराक से |

मालुम है, कुल्फ़ते बे-शुमार हैं रस्ते में
इश्क–ए–आतिश काटेगा वक्त इज़्तिराब से |

बर्के हुस्न तेरी बना दिया है मुझे बे–जुबान
 करूँगा बयां दिल-ए-दास्ताँ,तश्न-एतकरीर से | 

 शब्दार्थ :बर्के =बिजली जैसा चमकीला सौन्दर्य 
        तारीक़= अँधेरा 
        तश्न-ए-तकरीर=होटों की भाषा   



   कालीपद 'प्रसाद'



© सर्वाधिकार सुरक्षित

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (25-11-2013) को "उपेक्षा का दंश" (चर्चा मंचःअंक-1441) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं